स्वामी विवेकानंद व भारत रत्न भगवान दास का जन्म और क्रांतिकारी सूर्य सेन का बलिदान हुआ था आज

12 जनवरी आज का इतिहास

दोस्तों, हम हर बार सुनते हैं की हमारा इतिहास बहुत पुराना हैं, लेकिन हमें हमारे देश और दुनिया के इतिहास की पूरी जानकारी नहीं इसलिए हम यहाँ हमारा एक छोटा सा प्रयास कर रहे हैं जो आपको पुरे देश और दुनिया की इतिहास की और आज के इतिहास की जानकारी मिल सके ताकि आपका ज्ञान और बढ़ सके. तो चलिए दोस्तों आज जानते हैं 12 जनवरी के इतिहास की कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं के बारें मे,
12 January History

  • छत्रपति शाहू जी को 1708 में मराठा शासक का ताज पहनाया गया।
  • ब्रिटेन ने पश्चिम बंगाल के बंदेल प्रांत को 1757 में पुर्तग़ाल से अपने कब्जे में लिया।
  • लंदन में रॉयल एयरोनॉटिकल सोसायटी का 1866 में गठन हुआ।
  • पेरिस स्थित एफिल टॉवर से 1908 में पहली बार लंबी दूरी का वायरलेस संदेश भेजा गया।
  • गोपीनाथ साहा की कोलकाता के पुलिस आयुक्त चार्ल्स ऑगस्टस टेगार्ट समझकर 1924 में ग़लती से एक आदमी ने हत्या कर दी। इसके बाद उसे गिरफ़्तार कर लिया गया।
  • भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रान्तिकारी सूर्य सेन को 1934 में चटगांव में फांसी दी गयी। उन्होने इंडियन रिपब्लिकन आर्मी की स्थापना की और चटगांव विद्रोह का सफल नेतृत्व किया।
  • 1948 में महात्मा गांधी ने अपना अंतिम भाषण दिया और सांप्रदायिक हिंसा के विरुद्ध अनशन में बैठने का फैसला किया।
  • स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 12 जनवरी 1950 में ‘संयुक्त प्रांत’ का नाम बदल कर ‘उत्तर प्रदेश’ रखा गया।
  • भारत के पूर्व गेंदबाज बापू नाडकर्णी ने 1964 में मद्रास में इंग्लैंड के साथ पहले टेस्ट में लगातार 21 ओवर मेडन फेंके। छह गेदों के ओवर के इतिहास में यह अब तक रिकॉर्ड है।
  • जांजीबार विद्रोहियों ने क्रांति की शुरुआत और गणतंत्र की घोषणा 1964 में की।
  • स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन के मौके पर 1984 से हर वर्ष देश में इस दिवस को ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ मनाने की घोषणा की गयी।
  • रोमानिया ने कम्युनिस्ट पार्टी पर 1990 में प्रतिबंध लगाया।
  • अमरीकी संसद ने 1991 में कुवैत में इराक के खिलाफ सैनिक कार्रवाई की मंजूरी दी।
  • यूरोप के 19 देश मानव क्लोनिंग पर प्रतिबंधित लगाने पर 1998 में सहमत हुए।
  • भारत का 2001 में इंडोनेशिया-रूस-चीन संधि से इंकार, नैफ नदी पर बांध निर्माण योजना के कारण बांग्लादेश-म्यांमार सीमा पर तनाव के बाद सेनाएँ तैनात।
  • भारतीय मूल की महिला लिंडा बाबूलाल त्रिनिदाद 2003 में संसद की अध्यक्ष बनीं।
  • दुनिया के सबसे बड़े समुद्री जहाज, “आरएमएस क्वीन मैरी 2” ने 2004 में अपनी पहली यात्रा की शुरूआत की।
  • टेम्पल-1 कॉमेट (धूमकेतु) पर उतरने के उद्देश्य से डेल्टा द्वितीय रॉकेट से ‘डीप इम्पैक्ट’ अंतरिक्ष यान का 2005 में प्रक्षेपण किया।
  • भारत और चीन ने हाइड्रोकार्बन पर एक महत्त्वपूर्ण सहमति पत्र पर 2006 में हस्ताक्षर किए।
  • 2007 में आयी आमिर खान की फ़िल्म ‘रंग दे बसन्ती’ बाफ़्टा के लिए नामांकित।
  • कोलकाता में 2008 में आग से 2500 दुकानें जल कर खाक हुई।
  • 2009 में प्रसिद्ध संगीतकार ए. आर. रहमान प्रतिष्ठित गोल्डन ग्लोब अवार्ड जीतने वाले पहले भारतीय बने।
  • इलाहाबाद विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. जयन्त कुमार ने 2009 में दुनिया का सबसे पुराना उल्का पिंड क्रेटर खोजा।
  • हैती में आए 2010 के भूकंप में 2,00,000 से ज्यादा लोग मारे गए। इसमें शहर का एक बड़ा हिस्सा तबाह हो गया।

12 जनवरी को जन्मे व्यक्ति 

  • राजमाता जीजाबाई का जन्म 1598 को महाराष्ट्र के बुलढ़ाणा शहर में हुआ।
  • भारतीय दार्शनिक स्वामी विवेकानंद का जन्म 1863 को कोलकाता में हुआ।
  • भारत रत्न से सम्मानित स्वतंत्रता सेनानी, समाज सेवी और शिक्षा शास्त्री भगवान दास का जन्म 1869 को वाराणसी में हुआ।डाक्टर भगवानदास à¤¡à¥‰à¤•à¥à¤Ÿà¤° भगवान दास(१२ जनवरी १८६९ – १८ सितम्बर १९५८) भारत के प्रमुख शिक्षाशास्त्री, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, दार्शनिक एवं कई संस्थाओं के संस्थापक थे।उन्होने डॉक्टर एनी बेसेन्ट के साथ व्यवसायी सहयोग किया, जो बाद मे सेन्ट्रल हिन्दू कालेज की स्थापना का प्रमुख कारण बना। सेन्ट्रल हिन्दू कालेज, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना का मूल है। बाद मे उन्होने काशी विद्यापीठ की स्थापना की और वहा वे प्रमुख अध्यापक भी थे। डॉक्टर भगवान दास ने हिन्दी और संस्कृत मे ३० से भी अधिक पुस्तकों का लेखन किया है।

    जीवन परिचय

    डॉक्टर भगवानदास का जन्म १२ जनवरी १८६९ ई. में उत्तर प्रदेश के वाराणसी में हुआ था। वे वाराणसी के समृद्ध साह परिवार के  थे। सन्‌ १८८७ में उन्होंने १८ वर्ष की अवस्था में पाश्चात्य दर्शन में एम. ए. की उपाधि प्राप्त की। १८९० से १८९८ तक उत्तर प्रदेश में विभिन्न जिलों में मजिस्ट्रेट के रूप में सरकारी नौकरी करते रहे। सन्‌ १८९९ से १९१४ तक सेंट्रल हिंदू कालेज के संस्थापक-सदस्य और अवैतनिक मंत्री रहे। १९१४ में यही कालेज काशी विश्वविद्यालय के रूप में परिणत कर दिया गया। डॉक्टर॰ भगवान्‌दास हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक-सदस्यों में से एक थे। सन्‌ १९२१ मे काशी विद्यापीठ की स्थापना के समय से १९४० तक उसके कुलपति रहे। असहयोग आंदोलन में भाग लेने के कारण सन्‌ १९२१ में इन्हें कार्य से मुक्त कर दिया गया। किंतु वर्ष के शेष महीनों में घर से अलग काशी विद्यापीठ में रहते हुए एकांतवास करके उन्होंने कारावास की अवधि पूरी की। १९३५ में उत्तरप्रदेश के सात शहरों से भारत की केंद्रीय व्यवस्थापिका सभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया और एकांत रूप से दार्शनिक चिंतन एवं भारतीय विचारधारा की व्याख्या में संलग्न रहे। भारत के राष्ट्रपति ने सन्‌ १९५५ में उन्हें भारत रत्न की सर्वोच्च उपाधि से विभूषित किया।

    दर्शन

    “अहं एतत्‌ न’ (मैं-यह-नहीं) ऐसा महावाक्य है कि यदि इसके तीनों शब्दों के अर्थ एक साथ लिए जाएं तो केवल एक एकाकार, एक रस, अखंड, निष्क्रिय, संवित्‌ देख पड़ती है। “मै-यह-नहीं’ इसमें कोई क्रिया विक्रिया नहीं है, कोई परिवर्त परिणमन नहीं है। केवल एक बात सदा के लिए कूटस्थवत्‌ स्थिर है, अर्थात्‌ केवल “मैं’ है और “मैं’ के सिवाय और कुछ नहीं है। अथच “मैं’ अपने सिवाय कोई अन्य वस्तु, ऐसे ऐसे रूप रंग नाम आदि का अन्य पदार्थ नहीं हूँ। यदि इस वाक्य के दो खंड कीजिए, पहले “मै-यह’ और फिर “यह-नहीं’ तो इसी वाक्य में संसार की सब कुछ क्रिया, इसके संपूर्ण परिवर्त का तत्व, देख पड़ता है “मै-यह-हूँ’, यह जीवन का, जनन का, शरीरत्याग का, स्वरूप है। क्रियामात्र का यही द्वंद स्वरूप है  लेना और देना, पकड़ना और छोड़ना, बढ़ना और घटना, हँसना और रोना, जीना और मरना, उपाधि का ग्रहण करना और उसमे अहंकार करना और फिर उसको छोड़कर उससे विमुख होना, पहले एक वस्तु में सुख मानना और फिर उसी वस्तु में पीछे दु:ख मानना। अध्यारोप और अपवाद, प्रवृत्ति ओर निवृत्ति, इन दो शब्दों में संसार का, संसरण का तत्व सब कह दिया है। द्रष्टा और दृश्य, भोक्ता और भोग्य, विषय और विषयी, ज्ञाता और ज्ञेय, एष्टा और इष्य, कर्त्ता और कार्य, जीव और देह, चेतन और जड़, आत्मा और अनात्मा, “मैं’ और “यह’, दोनों इसमें मौजूद हैं। जिस जिस वस्तु का निषेध, प्रतिषेध, अपलाप, अथवा निराकरण, निरास किया जाता है, उसका पहले अध्युमगम, अध्यारोप, विधान, संभावन संकल्प, अध्यास कर लिया जाता है। पहले यह माना जाता है कि उसका संभव है और तब उसकी वास्तवता का निषेध होता है। इसी से असत्‌ पदार्थ पर सत्ता का मिथ्या आरोप दीख पड़ता है।

    इसी महाचेतना में सब संसार की सृष्टि, स्थिति और लय है। “अहम्‌’ अर्थात “मैं’ आत्मा का स्वरूप है। “एतन्‌’ अर्थात्‌ “यह’ अनात्मा का स्वरूप है। इन दोनों का संबंध निषेध रूप है। “मैं यह नहीं हूं’ इस भावना, इस धारणा, इस संवित्‌ को यदि क्रमदृष्टि से देखिए तो इसमें तीन बातें अवश्य मिलती हैं। पहले तो “मैं’ के सामने “यह’ पदार्थ आता है। इस क्षण में ज्ञान होता है। इसके पीछे “मैं’ और “यह’ के संयोग वियोग का संभंव होता है। यही इच्छा है। तीसरे क्षण में संयोग वियोग होता है। यह क्रिया है। संयोग वियोग दोहरा क्षण में संयोग वियोग होता है। यह क्रिया है। संयोग वियोग दोहरा शब्द इसलिए कहा जाता है कि पहले संयोग होकर पीछे वियोग होता है। पहले राग, पीछे द्वेष, पहले प्रवृत्ति पीछे निवृत्ति, पहले लेना पीछे देना, पहले जन्म पीछे मरण, पुन: जन्म पुन: मरण, यही संसरण क्रिया है।

    जैसा डॉक्टर भगवान्‌दास प्रतिपादित करते थे, प्रति क्षण में प्रत्येक जीव इसी ज्ञान, इच्छा, क्रिया के फेरे में फिरा करता है। पहले ज्ञान, तब इच्छा, तब क्रिया। और क्रिया के बाद फिर ज्ञान, फिर इच्छा, फिर क्रिया। यह अनंत चक्र सर्वदा चल रहा है। अहम्‌-आत्मा-पुरुष अथवा प्रत्यगात्मा में जो इन तीन पदार्थो का बीज है उसको सत्‌-चित् और आनंद के नाम से कहते हैं। अर्थात्‌ ज्ञान चिदात्मक, क्रिया सदात्मक और इच्छा आनंदात्मक। तथा अनात्मा अर्थात्‌ मूल प्रकृति में ये ही तीन पदार्थ सत्वज्ञानात्मक, रजस्‌ क्रियात्मक और तमस्‌ इच्छात्मक कहलाते हैं। ये ही तीन प्रत्येक परमाणु और प्रत्येक ब्रह्मांड में सदा विद्यमान हैं।

    मनोविज्ञान

    मनोविज्ञान में डॉक्टर॰ भगवान दास का नाम आवेगों अथवा रागद्वेष के परंपरित वर्गीकरण के लिए स्मरण किया जाता है। सुखद वस्तुओं के लिए आकर्षण और दु:खद वस्तुओं के लिए विकर्षण जब चेतन प्राणियों के संबंध में प्रयुक्त होते हैं, तब ये ही राग अथवा प्रेम और द्वेष का रूप ले लेते हैं। आलंबन के प्रति महत्ता, समानता तथा हीनता की भावना के अनुसार यही राग या प्रेम क्रमश: श्रद्धा, स्नेह तथा दया का रूप ले लेता है और इसी प्रकार द्वेष आलंबनभेद से भय, क्रोध तथा घृणा का रूप ले लेता है। अपने बड़े के प्रति श्रद्धा या भय होता है, बराबर के प्रति स्नेह तथा क्रोध होता है और छोटे के प्रति दया अथवा घृणा होती है। ये ही छह आवेग अतिरंजित होने अथवा अनुपयुक्त विषयों के साथ संलग्न होने पर मनोविकार बन जाते हैं और अंतिम रूप में अनेक प्रकार के उन्मादों का रूप ले लेते हैं।

    वैयक्तिक सामाजिक संगठन

    परमात्मा के स्वभाव से, प्रकृति से, उत्पन्न तीन गुण, सत्व, रजस्‌, ही ज्ञान, क्रिया और इच्छा के मूलतत्व या बीज हैं। डाक्टर साहब के विचारानुसार इनकी प्रधानता से, तीन प्रकार के, तीन प्रकृति के, मनुष्य होते हैं :

    • (१) ज्ञानप्रधान,
    • (२) पोषक,
    • (३) संग्रही; और
    • (४) इन तीन के साथ चौथी प्रकृति, “बालकबुद्धि’ जिसमें किसी एक गुण की प्रधानता, विशेष विकास, न देख पड़े “गुणसाम्य’ हो, वह सेवक, श्रमी।

    ये हुए चार वर्ण। किसी देश के किसी भी सभ्य समाज में ये वर्ण अवश्य पाए जाते हैं, पद उतने विवेक से और उस काम-दाम-आराम के, धर्म-कर्म-जीविका के, विभाजन के साथ नहीं, जैसा भारतवर्ष में, प्राचीन स्मृतियों ने इनके लिए आदेश किया है।

    जैसे समाज के जीवन में चार मुख्य पेशे हैं वैसे ही प्रत्येक मनुष्य के जीवन में चार “आश्रम’ हैं: (१) ब्रह्मचर्य, विद्या सीखने का, (२) गृहस्थ का, (३) वानप्रस्थ का; (४) संन्यासी का।

    मनुष्य के चार पुरुषार्थ हैं : धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष वा ब्रह्मानंद। पहले तीन आश्रमों में अधिकतर धर्म-अर्थ-काम और चौथे में विशेष रूप से मोक्ष को साधना चाहिए।

    तीन (अथवा चार) ऋणों को लेकर मनुष्य पैदा होता है।

    • (१) देवों का ऋण जिन्होंने पंचमहाभूतों की सृष्टि, परमात्मा के नियमों के अनुसार फैलाई है; जिन महाभूतों से हमारी पंचेंद्रियों के सब विषय बने हैं;
    • (२) पितरों का ऋण, जिनकी संतति, वंशपरंपरा से, हम हैं, जिनसे हमको यह शरीर मिला है, जो देह हमारे सब अनुभवों का साधन है,
    • (३) ऋषियों का ऋण, जिन्होंने वह महासंचय, विविध प्रकार के ज्ञानों का, शास्त्रों में भरकर रख दिया है, जिसकी सहायता से हमारा वैयक्तिक और सामाजिक जीवन सभ्य, शिष्ट बनता है, जिसके बिना हम पशुप्राय होते;
    • (४) चौथा ऋण, परमात्मा का, कहा जा सकता है, जो हमारा चेतन ही है, प्राण ही है, जिसके बिना हम निर्जीव होते।

    इन चार ऋणों के निर्मोचन निर्यातन का उपाय भी चार आश्रमों के धर्म कर्मो का उचित निर्वाह ही है। विद्यासंग्रहण और संतति के उत्पादन, पालन, पोषण से पितरों का ऋण चुकता है। यथा, वायु देवता से हमारा श्वास प्रश्वास चलता है, हवा को हम गंदा करते हैं; उत्तम सुगंधित पदार्थो के धूप-दीप से, होम हवन से, हवा पुन: स्वच्छ करनी चाहिए। जंगल काट काटकर हम लकड़ी को जलाने में, मकान और सामान के काम में, खर्च कर डालते हैं। नए लखरॉव, बाग, उद्यान लगाकर फिर नए पेड़ तैयार कर देना चाहिए। वरुण देव के जल का प्रति दिन हम लोग व्यय करते रहते हैं; नए तालाब, कुएँ, नहर आदि बनाकर, उसकी पूर्ति करनी चाहिए। ये सब यज्ञ हैं। परोपकारार्थ जो भी काम किया जाय वह सब यज्ञ हैं। परमात्मा का ऋण, मुक्ति प्राप्त करने से, सब में एक ही आत्मा को व्याप्त देखने से, चुकता है। क्रम से, चार आश्रमों में चार ऋण अदा होते हैं।

    ऐसी ही तीन या चार एषणाएँ, आकांक्षाएँ, वासनाएँ मनुष्य की, स्वाभाविक, होती हैं।

    • (१) लोकैषण, अहं स्याम्‌, में इस लोक और परलोक में सदा बना रहूँ, मेरा नाश कभी न हो, इसका शरीर रूप आहार की इच्छा है और मानस रूप, सम्मान, यश, कीर्ति की इच्छा,
    • (२) वित्तैषणा, “अहं बहु स्याम्‌’, मैं और अधिक होऊँ, इसका शरीर रूप, सब अंगों की, हाथ पैर की, पुष्टि, बलवृद्धि, सौंदर्यवृद्धि और मानसरूप, विविध प्रकार के धन दौलत का बढ़ाना;
    • (३) दार सुतैषण, “अहं बहुधा स्याम्‌’, मैं अकेला हूँ सो बहुत हो जाऊँ; मेरे पत्नी हो और बालबच्चे हों, बहुतों पर मेरा अधिकार हो, ऐश्वर्य हो,
    • (४) चौथी एषणा मोक्षैषणा है, इस सब जंगल में, बहुत भटक चुका, अब इससे छुटकारा हो।

    ये चार एषणाएँ भी चार पुरुषार्थोकी रूपांतर ही हैं और चारों आश्रमों के धर्म कर्म से उचित रीति से पूरी होती हैं।

    डॉक्टर भगवान्‌दास “कर्मण वर्ण, जन्म अभिकर्मण’ सिद्धांत के प्रतिपादक थे। उनके मत से बिना कर्मण वर्णसिद्धांत को माने इस समय, वर्तमान अवस्था में, किसी भी दूसरे उपाय से हिंदू समाज का कल्याण नहीं हो सकता।

    चारों वर्णो के लिए चार मुख्य धर्म अर्थात्‌ कर्तव्य और चार वृत्तियाँ, जीविका और चार तोषण, राधन, प्रोत्साहन, हैं।

    • (१) विद्योपजीवी, विद्वान्‌, शिक्षक, उपदेष्टा, के लिए, ज्ञानसंग्रह और ज्ञानप्रचार करना, अध्यापन, याजन प्रतिग्रह, यान, विद्या सिखाकर, किसी विषय का ज्ञान देकर उसके लिए आदरसहित दक्षिणा लेना, किसी “यज्ञ’ में, “पब्लिक वर्क’ में, सार्वजनिक हित के कार्य में, ज्ञान की, सहायता देकर, दक्षिणा लेना; वा आदर के साथ जो कोई दान दे, “भेंट’ पुरस्कार, दे वह लेना।
    • (२) क्रियोपजीवी, “शास्त्री’, रक्षक, शासक, के लिए, जो कर, लगान, मालगुजारी, राष्ट्र की ओर से वेतन, मिले, उसे लेना।
    • (३) वातोंपजीवी, कृषक, गोपालक, वणिक्‌, के लिए अन्न वस्त्र आदि जीवनोपयोगी, विविध प्रकार के, आवश्यक और विलासीय पदार्थ, उत्पन्न करना और उचित दाम लेकर देना औरय जो इस रोजगार से लाभ हो, वह लेना।
    • (४) श्रमोपजीवी, भृतक, कर्मकर, किंकर के लिए, अन्य तीन वर्णो की सेवा सहायता करके, जो मजदूरी भृत्ति, मिले वह लेना।

    धर्मविज्ञान

    डॉक्टर॰ भगवान्‌दास ने तटस्थ रूप से धर्मो का वैज्ञानिक विश्लेषण किया है। उनके मत से सभी धर्मो के उसूल एक हैं। सभी धर्मो में यह माना गया है कि परमात्मा सबके हृदय में आत्मा रूप से मौजूद है। सब भूतों, सब प्राणियों के भीतर में बैठा है। सबके आगे, सबके पीछे, “मैं’ ही है। सभी धर्मो में तीन अंग हैं, ज्ञान, भक्ति और कर्म। उसूली “अकायद’ यानी ज्ञानकांड और, “हकीकत’ की बातें तो सब मजहबों में एक हैं ही, “इबादत्त” यानी भक्तिकांड ओर “तरीकत” की बातें भी एक ही हैं और “मामिलात यानी कर्मकांड या “शरियत की ऊपरी, सतही बातें भी एक या एक सी हैं। यह बात सभी मजहबवाले मानते हैं कि खुदा है और वह एक है, वाहिद है, अद्वितीय है। यह भी सब मानते हैं कि पुण्य का फल सुख और पाप का फल दु:ख होता है। व्रत, उपवास, तीर्थयात्रा, धर्मार्थ दान ये भी सब मजहबों में हैं। सभी धर्मो’ में तीन अंग हैं, ज्ञान, भक्ति और कर्म। उसूली “अकायद” यानी ज्ञानकांड और, “हकीकत’ की बातें तो सब मजहबों में एक हैं ही, “इबादत्त’ यानी भक्तिकांड और “तरीकत’ की बातें भी एक ही हैं और “मामिलात’ यानी कर्मकांड या “शरियत’ की ऊपरी, सतही बातें भी एक या एक सी हैं। सभी धर्मो में धर्म के चार मूल माने गए हैं : त्रुटि, स्मृति, सदाचार और हृदयाभ्यनुज्ञा। खुदा को ला-मकान और निराकार कहते हुए भी सभी उसके लिए खास खास मकान बनाते हैं, मंदिर, मस्जिद और चर्च आदि के नाम से।

    डॉक्टर भगवान्‌ दास ने सभी धर्मो के अनुयायियों की नासमझी में भी समता दिखाई है। मेरा मजहब सबसे अच्छा है, दूसरे मजहबवालों को जबरदस्ती से अपने मजहब में लाना चाहिए, यह अहंकार सबमें देखा जाता है। यह नहीं समझते कि खास तरीके खास खास देशकाल अवस्था के लिए बताए गए हैं। अंत में डॉक्टर॰ भगवान्‌ दास ने इस बात पर बल दिया है कि आदमी की रूह इन सबों में बड़ी है। आदमियों ने ही मजहब की शक्ल समय-समय पर बदल डाली है।

  • अमरीकी लेखक जैक लंदन का जन्म 1876 को अमेरिका के कैलीफोर्निया में हुआ।
  • प्रसिद्ध महिला क्रांतिकारी नेली सेनगुप्ता का जन्म 1886 को कैम्ब्रिज, इंग्लैण्ड में हुआ।Image result for क्रांतिकारी नेली सेनगुप्तानेली सेनगुप्त (Nellie Sengupta ; 1886–1973) एक अंग्रेज महिला थीं जिन्होने भारत की स्वतन्त्रता के लिये संघर्ष किया। वे यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त की पत्नी थीं। १९३३ के कोलकाता अधिवेशन में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सभापति चुनी गयीं।
  • भारत के प्रसिद्ध गणितज्ञ बद्रीनाथ प्रसाद का जन्म 1899 को आजमगढ़ जिले के मुहम्मदाबाद गोहना गाव में हुआ।
  • भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन’ के पुरोधा उमाशंकर दीक्षित का जन्म 1901 को ‎ उत्तर प्रदेश के उन्नाव शहर में हुआ।
  • भारतीय अध्यात्मवादी महर्षि महेश योगी का जन्म 1917 को जबलपूर शहर में हुआ।
  • हिन्दी फ़िल्म निर्माता-निर्देशक, गायक और संगीतकार सी. रामचन्द्र का जन्म 1918 को महाराष्ट्र के अहमदनगर में हुआ।
  • प्रसिद्ध उर्दू कवि अहमद फ़राज़ का जन्म 1931 को कोहाट, पाकिस्तान में हुआ।
  • भारतीय राजनीतिज्ञ अजय माकन का जन्म 1964 को दिल्ली में हुआ।
  • राजनीतिज्ञ तथा उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा का जन्म 1964 को लखनऊ शहर में हुआ।
  • पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की बेटी प्रियंका गांधी का जन्म 1972 को दिल्ली में हुआ।

12 जनवरी को हुए निधन

  • 1665 में फ़्रांस के गणितज्ञ पियरडी फ़रमा का निधन हुआ।
  • 1924 में पश्चिम बंगाल के स्वतंत्रता सेनानी गोपीनाथ साहा का निधन हुआ।
  • 1934 में भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले प्रसिद्ध क्रांतिकारी सूर्य सेन का निधन हुआ।सूर्य सेन (1894 – 12 जनवरी 1934) भारत की स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रान्तिकारी थे। उन्होने इंडियन रिपब्लिकन आर्मी की स्थापना की और चटगांव विद्रोह का सफल नेतृत्व किया। वे नेशनल हाईस्कूल में सीनियर ग्रेजुएट शिक्षक के रूप में कार्यरत थे और लोग प्यार से उन्हें “मास्टर दा” कहकर सम्बोधित करते थे।अंग्रेजों ने उन्हें १२ जनवरी १९३४ को मेदिनीपुर जेल में फांसी दे दी।Image result for क्रांतिकारी सूर्य सेन

    प्रारम्भिक जीवन

    सूर्य सेन के पिता का नाम रमानिरंजन था। चटगांव के नोआपाड़ा इलाके के निवासी सूर्य सेन एक अध्यापक थे। १९१६ में उनके एक अध्यापक ने उनको क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित किया जब वह इंटरमीडियेट की पढ़ाई कर रहे थे और वह अनुशीलन समूह से जुड़ गये। बाद में वह बहरामपुर कालेज में बी ए की पढ़ाई करने गये और युगान्तर से परिचित हुए और उसके विचारों से काफी प्रभावित रहे।

    चटगांव विद्रोह

    मास्टर दा की एकमात्र पूर्णाकार मूर्ति कोलकाता उच्च न्यायालय के सामने है।

    महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय से संबद्ध इतिहासवेत्ता एम मलिक के अनुसार घटना 18 अप्रैल 1930 से शुरू होती है जब बंगाल के चटगांव में आजादी के दीवानों ने अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने के लिए इंडियन रिपब्लिकन आर्मी (आईआरए) का गठन कर लिया।आईआरए के गठन से पूरे बंगाल में क्रांति की ज्वाला भड़क उठी और 18 अप्रैल 1930 को सूर्यसेन के नेतृत्व में दर्जनों क्रांतिकारियों ने चटगांव के शस्त्रागार को लूटकर अंग्रेज शासन के खात्मे की घोषणा कर दी। क्रांति की ज्वाला के चलते हुकूमत के नुमाइंदे भाग गए और चटगांव में कुछ दिन के लिए अंग्रेजी शासन का अंत हो गया।

    चटगाँव विद्रोह का प्रभाव, गिरफ्तारी तथा मृत्यु

    इस घटना ने आग में घी का काम किया और बंगाल से बाहर देश के अन्य हिस्सों में भी स्वतंत्रता संग्राम उग्र हो उठा। इस घटना का असर कई महीनों तक रहा। पंजाब में हरिकिशन ने वहां के गवर्नर की हत्या की कोशिश की। दिसंबर 1930 में विनय बोस, बादल गुप्ता और दिनेश गुप्ता ने कलकत्ता की राइटर्स बिल्डिंग में प्रवेश किया और स्वाधीनता सेनानियों पर जुल्म ढ़हाने वाले पुलिस अधीक्षक को मौत के घाट उतार दिया।

    मलिक के अनुसार आईआरए की इस जंग में दो लड़कियों प्रीतिलता वाडेदार और कल्पना दत्त ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सत्ता डगमगाते देख अंग्रेज बर्बरता पर उतर आए। महिलाओं और बच्चों तक को नहीं बख्शा गया। आईआरए के अधिकतर योद्धा गिरफ्तार कर लिए गए और तारकेश्वर दस्तीदार को फांसी पर लटका दिया गया।अंग्रेजों से घिरने पर प्रीतिलता ने जहर खाकर मातृभमि के लिए जान दे दी, जबकि कल्पना दत्त को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

    सूर्य सेन इस विद्रोह के बाद छिपे रहे और एक स्थान से दूसरे स्थान पर चलते रहे। वे एक कार्यकर्ता, एक किसान, एक पुजारी, गृह कार्यकर्ता या धार्मिक मुसलमान के रूप में छिपे रहे। इस तरह उन्होंने ब्रिटिशों के गिरफ्त में आने से बचते रहे। एक बार उन्होंने नेत्र सेन नाम के एक आदमी के घर में शरण ली। लेकिन नेत्र सेन ने उनके साथ छल कर धन के लालच में ब्रिटिशों को उनकी जानकारी दे दी और पुलिस ने फरवरी 1933 में उन्हें पकड़ लिया। इससे पहले कि नेत्र सेन को अंग्रेजों ने पुरस्कृत किया, एक क्रांतिकारी उनके घर में आया और दा (एक लंबी चाकू) के साथ उसका सिर काट डाला। नेत्र सेन की पत्नी सूर्य सेन के एक बड़ी समर्थक थी, इसलिए उन्होंने कभी भी उस क्रांतिकारी के नाम का खुलासा नहीं किया जिन्होंने नेत्र सेन की हत्या की थी। सेन को फांसी देने से पहले, अमानवीय ब्रिटिश शासकों ने उन पर क्रूरता से अत्याचार किया। बर्बर ब्रिटिश जल्लादों ने हथौड़े के साथ उनके सभी दांतों को तोड़ दिया, और सभी नाखूनों को निकाल फेंका। उनके सभी अंगों और जोड़ों को तोड़ दिया गया और उनके अचेतन शरीर को फांसी की रस्सी तक घसीटा गया था। 12 जनवरी 1934 को एक अन्य क्रांतिकारी तारकेश्वर दस्तीदार को भी सेन के साथ फांसी दी गई थी। उनकी मृत्यु के बाद, उनके मृत शरीर को अंतिम संस्कार नहीं दिया गया। बाद में पाया गया कि जेल अधिकारियों द्वारा,एक धातु के पिंजरे में उसकी मृत शरीर को डाल दिया और बंगाल की खाड़ी में फेंक दिया गया था।

    उन्होने आखिरी पत्र अपने दोस्तों को लिखा था जिसमें कहा था: “मौत मेरे दरवाजे पर दस्तक दे रही है। मेरा मन अनन्तकाल की ओर उड़ रहा है … ऐसे सुखद समय पर,ऐसे गंभीर क्षण में, मैं तुम सब के पास क्या छोड़ जाऊंगा ? केवल एक चीज, यह मेरा सपना है, एक सुनहरा सपना- स्वतंत्र भारत का सपना …. कभी भी 18 अप्रैल, 1 9 30, चटगांव के विद्रोह के दिन को मत भूलना … अपने दिल के देशभक्तों के नाम को स्वर्णिम अक्षरों में लिखना जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता की वेदी पर अपना जीवन बलिदान किया है।”

    मीडिया में

    भारतीय फिल्म निर्देशक आशुतोष गोवारिकर ने फिल्म खेलें हम जी जान से (2010) में सेन के जीवन को दर्शाया। अभिनेता अभिषेक बच्चन ने सेन की भूमिका निभाई। एक अन्य फिल्म चटगांव (2012), जो बेदब्रत पाइन द्वारा निर्देशित थी, सेन की हथियार छापे के बारे में था। मनोज बाजपेयी ने प्रमुख भूमिका निभाई थी।

    कोलकाता मेट्रो ने बांशद्रोणी स्टेशन को मास्टर सूर्य सेन मेट्रो स्टेशन के रूप में नामित किया। कुछ सड़कें उनके नाम पर भी हैं, उदाहरणतया, कोलकाता के दक्षिणेश्वर के पास सूर्य सेन रोड।

  • 1941 में भारतीय क्रांतिकारियों में से एक प्यारे लाल शर्मा का निधन हुआ।
  • 1976 में दुनिया के सबसे जाने माने जासूसी उपन्यासकारों में से एक अगाथा क्रिस्टी का निधन हुआ।
    डेम अगाथा क्रिस्टी
    Agatha Christie.png
    जन्म अगाथा मैरी क्लैरिसा मिलर
    15 सितम्बर 1890 
    टॉर्क्वेडेवन, इंग्लैंड, यूके
    मृत्यु 12 जनवरी 1976 (उम्र 85)
    वैलिंगफ़ोर्ड, ऑक्सफोर्डशायर, इंग्लैंड
    मृत्यु स्थान/समाधि सेंट मैरी गिरिजाघर, कोल्से, ऑक्सफोर्डशायर, इंग्लैंड
    उपनाम मैरी वेस्टम्कॉट
    अगाथा क्रिस्टी
    व्यवसाय उपन्यासकार, लघु-कथा लेखिका, नाटककार, कवि
    विधा रोमांचकअपराध उपन्यासजासूसीप्रेमकथा, भावोत्तेजक, रहस्य इत्यादि।
    साहित्यिक आन्दोलन जासूसी साहित्य काल
    उल्लेखनीय कार्यs चरित्र निर्माण हर्क्युल पोईरॉट और मिस जेन मार्पलमर्डर ऑन द ओरिएंट एक्स्प्रेसद मर्डर ऑन ओरिएंट एक्सप्रेस,द मर्डर ऑफ़ रोज़र ऐक्रॉएडडेथ ऑन द नाइलद मर्डर एट द विकारेजपार्टनर्स इन क्राइमद एबीसी मर्डर्सऐंड देन देयर वेयर ननद माउसट्रैप
    जीवनसाथी आर्की क्रिस्टी
    (वि. 1914; अल. 1928)
    सर मैक्स मैलोवेन
    (वि. 1930)
    सन्तान रोज़ालैंड हिक्स (1919–2004)

    हस्ताक्षर

    अगाथा क्रिस्टी (अंग्रेज़ीAgatha Christie) (1890-1976) (पूरा नाम अगाथा मैरी क्लरिस्सा क्रिस्टी, लेडी मैलोवैन/डेम अगाथा क्रिस्टी; Agatha Mary Clarissa, Lady Mallowan/Dame Agatha Christie) विश्वप्रसिद्ध अंग्रेज़ी उपन्यासकार थीं। वो अंग्रेजी अपराध उपन्यासकार, लघु कथा लेखिका, और नाटक रचनाकार थी। वह अपने 66 जासूसी उपन्यासों के लिए विशेष तौर पर जानी जाती हैं। इनके द्वारा रचित दो मुख्य पात्र हैं एर्क्यूल प्वारो और मिस मार्पल। इनकी प्रसिद्धि इस बात से ज़ाहिर होती है कि इनकी लिखित किताबें विलियम शेक्सपियर के अतिरिक्त विश्व के किसी और लखक की किताबों से अधिक बिकी हैं। 2006 तक विश्व की महानतम महिला लेखिकाओं में से एक गिनी जाने वाली अगाथा के उपन्यासों की एक अरब से भी अधिक प्रतिलिपियाँ बिक चुकी हैं, तथा 100 से भी अधिक भाषाओं में अनुवादित की गई हैं।

    व्यक्तिगत जीवन

    श्रीमती क्रिस्टी का जन्म १५ सितम्बर १८९० को इंग्लैंड के टॉर्क्वे (Torquay) नगर में हुआ। उनके पिता अमरीकी थे और माता इंग्लैंड से थीं। इन्होंने १९१४ में कर्नल आर्किबॉल्ड क्रिस्टी (Colonel Archibald Christie) से विवाह किया, जिसके बाद उनकी एकमात्र पुत्री रोज़ालिन्ड हिक्स का जन्म हुआ। १९२८ में इस विवाह का अंत तलाक़ में हुआ। १९३० में उन्होंने एक पुरातत्वविद सर मैक्स मैलोवैन से विवाह किया। श्रीमती क्रिस्टी का देहान्त १२ जनवरी १९७६ को ऑक्सफोर्डशायर में हुआ।

    कृतियाँ

    श्रीमती क्रिस्टी का पहला उपन्यास था ‘द़ मिस्टीरियस अफेयर ऍट स्टाइल्स’ (The Mysterious Affair at Styles), जो 1916 में लिखा गया और 1920 में प्रकाशित हुआ। इस रचना ने जासूसी उपन्यासों के लिए ऊँचे मानदंड स्थापित किए। आपका अगला मशहूर उपन्यास था ‘द़ मर्डर औफ़ रोज़र ऍक्रौयड’ (The Murder of Roger Ackroyd), जिसके आश्चर्यजनक अंत ने पाठकों को अचंभित किया। हालाँकि कुछ पाठकों ने इसको विवादास्पद माना, इस उपन्यास ने श्रीमती क्रिस्टी को जासूसी उपन्यास लेखकों में उच्च स्थान दिलाया।

    इसके पश्चात्‌ श्रीमती क्रिस्टी ने लगभग हर वर्ष एक नया उपन्यास छापा। उन्होंने अपनी कथाओं में कई ऐसे यन्त्र पहली बार प्रयोग किए, जिनको अन्य लेखकों ने जासूसी उपन्यासों, कहानियों या फ़िल्मों में बार बार उपयोग किया। आपके उपन्यासों पर आधारित अनेक मशहूर फ़िल्में बनाई गईं। उदाहरणतया, हिन्दी फ़िल्म ‘गु़मनाम’ आपके उपन्यास ‘ऍन्ड द़ॅन दॅ़र वेर नन’ (And Then There Were None) पर आधारित है।

    सम्मान

    श्रीमती क्रिस्टी को अनेक सम्मान प्राप्त हुए। इनमें महत्त्वपूर्ण हैं 1955 में मिस्टरी राईटर्स औफ़ अमॅरिका (Mystery Writers of America) का सर्वोत्तम ग्रैन्ड मास्टर पुरस्कार (Grand Master Award) और 1971 में ब्रिटिश राज्य की ‘डेम कमान्डर’ पदवी, जो ब्रिटिश राज्य के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से है।

  • 1992 में भारत के प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक कुमार गंधर्व का निधन हुआ।
  • 2005 में भारतीय सिनेमा के प्रसिद्ध अभिनेता और खलनायक अमरीश पुरी का निधन हुआ।
  • 2008 में विश्व के सबसे बड़े फ़िल्म शो टोरंटो अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव की बुनियाद रखने वाले ‘मुर्रे दस्ती कोहल’ का निधन हुआ।

12 जनवरी के महत्त्वपूर्ण अवसर एवं उत्सव

  • 12 जनवरी सारे भारत में राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता।
    राष्ट्रीय युवा दिवस
    Swami Vivekananda 1896.jpg
    अनुयायी Flag of India.svg भारत
    उद्देश्य स्वामी विवेकानंद का जन्म दिन
    आरम्भ 1984[1]
    तिथि १२ जनवरी
    आवृत्ति वार्षिक

    राष्ट्रीय युवा दिवस में युवकों के परेड।

    भारत में स्वामी विवेकानन्द की जयन्ती, अर्थात १२ जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

    संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार सन् १९८४ ई. को ‘अन्तरराष्ट्रीय युवा वर्ष‘ घोषित किया गया। इसके महत्त्व का विचार करते हुए भारत सरकार ने घोषणा की कि सन १९८४ से 12 जनवरी यानी स्वामी विवेकानन्द जयन्ती का दिन राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में देशभर में सर्वत्र मनाया जाए।

    इस सन्दर्भ में भारत सरकार का विचार था कि –

    ऐसा अनुभव हुआ कि स्वामी जी का दर्शन एवं स्वामी जी के जीवन तथा कार्य के पश्चात निहित उनका आदर्श—यही भारतीय युवकों के लिए प्रेरणा का बहुत बड़ा स्रोत हो सकता है।

    इस दिन देश भर के विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में तरह-तरह के कार्यक्रम होते हैं; रैलियाँ निकाली जाती हैं; योगासन की स्पर्धा आयोजित की जाती है; पूजा-पाठ होता है; व्याख्यान होते हैं; विवेकानन्द साहित्य की प्रदर्शनी लगती है।

    महत्व

    वास्तव में स्वामी विवेकानन्द आधुनिक मानव के आदर्श प्रतिनिधि हैं। विशेषकर भारतीय युवकों के लिए स्वामी विवेकानन्द से बढ़कर दूसरा कोई नेता नहीं हो सकता। उन्होंने हमें कुछ ऐसी वस्तु दी है जो हममें अपनी उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त परम्परा के प्रति एक प्रकार का अभिमान जगा देती है। स्वामी जी ने जो कुछ भी लिखा है वह हमारे लिए हितकर है और होना ही चाहिए तथा वह आने वाले लम्बे समय तक हमें प्रभावित करता रहेगा। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में उन्होंने वर्तमान भारत को दृढ़ रूप से प्रभावित किया है। भारत की युवा पीढ़ी स्वामी विवेकानन्द से निःसृत होने वाले ज्ञान, प्रेरणा एवं तेज के स्रोत से लाभ उठाएगी।

  • 12 जनवरी से सारे भारत में राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा सप्ताह ।
  • 10 दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोह आयोजन।

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