साहित्यकार मोहन राकेश का जन्म हुआ था आज

8 जनवरी का इतिहास

दोस्तों आज जानते हैं 8 जनवरी का इतिहास के कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं के बारें मे, उन लोगों के जन्मदिन के बारे में जिन्होंने दुनिया में आकर बहुत बड़ा नाम किया ! साथ ही उन मशहूर लोगों के बारें मे जो इस दुनिया से चले गए।8 January History

  • ब्रिटेन में आखिरी बार ईशनिंदा के आरोप के लिए 1697 में मृत्युदंड दिया गया था।
  • अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन ने 1790 में पहली बार देश को सम्बोधित किया।
  • डॉ. जॉन वीच ने हाइड्रेटेड सोडियम बोरेट की खोज 1856 में की थी।
  • हर्मन होलैरिथ को पंच कार्ड टैब्युलेटिंग मशीन के आविष्कार का पेटेंट 1889 में मिला था।
  • नीदरलैंड्स और वेस्टइंडीज के बीच 1929 में पहला टेलीफोन संपर्क स्थापित हुआ।
  • जॉर्डन ने 1952 में संविधान अंगीकार किया।
  • पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने 1971 में  शेख मुजीबुर रहमान को जेल से आजाद किया।
  • रूस का स्‍पेस “मिशन ल्‍यूना 21” 1973 में लांच किया था।
  • मिस्र के पुरात्ववेत्ताओं ने 2009 में 4,300 वर्ष पुराने पिरामिड में रानी सेशेशेट की ममी की खोज की।

8 जनवरी को जन्मे व्यक्ति 

  • 1890 में हिन्दी साहित्यकार रामचन्द्र वर्मा का जन्म।
  • 1908 में प्रसिद्ध भारतीय अभिनेत्री निडर नाडिया (Fearless Nadia) का जन्म।
  • 1909 में उपन्यासकार आशापूर्णा देवी का जन्म।
  • 1925 में साहित्यकार मोहन राकेश का जन्म। मोहन राकेश(८ जनवरी १९२५ – ३ जनवरी, १९७२) नई कहानी आन्दोलन के सशक्त हस्ताक्षर थे। 3 जनवरी 1972 को 46 साल की उम्र में मोहन राकेश दुनिया को अलविदा कह गए. लेकिन मोहन राकेश आज भी मंच पर नई कहानी के महानायक माने जाते हैं.हिंदी के बड़े लेखक मोहन राकेश जीवित होते तो आज 93 साल के हो जाते! पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम ए किया। जीविकोपार्जन के लिये अध्यापन। कुछ वर्षो तक ‘सारिका’ के संपादक। ‘आषाढ़ का एक दिन‘,’आधे अधूरे’ और लहरों के राजहंस के रचनाकार। ‘संगीत नाटक अकादमी’ से सम्मानित। ३ जनवरी १९७२ को नयी दिल्ली में आकस्मिक निधन। मोहन राकेश हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न नाट्य लेखक और उपन्यासकार हैं। समाज के संवेदनशील व्यक्ति और समय के प्रवाह से एक अनुभूति क्षण चुनकर उन दोनों के सार्थक सम्बन्ध को खोज निकालना, राकेश की कहानियों की विषय-वस्तु है। मोहन राकेश की डायरी हिंदी में इस विधा की सबसे सुंदर कृतियों में एक मानी जाती है।

    नाट्य-लेखन

    मोहन राकेश को कहानी के बाद सफलता नाट्य-लेखन के क्षेत्र में मिली। हिंदी नाटकों में भारतेंदु और प्रसाद के बाद का दौर मोहन राकेश का दौर है जिसें हिंदी नाटकों को फिर से रंगमंच से जोड़ा। हिन्दी नाट्य साहित्य में भारतेन्दु और प्रसाद के बाद यदि लीक से हटकर कोई नाम उभरता है तो मोहन राकेश का। हालाँकि बीच में और भी कई नाम आते हैं जिन्होंने आधुनिक हिन्दी नाटक की विकास-यात्रा में महत्त्वपूर्ण पड़ाव तय किए हैं; किन्तु मोहन राकेश का लेखन एक दूसरे ध्रुवान्त पर नज़र आता है। इसलिए ही नहीं कि उन्होंने अच्छे नाटक लिखे, बल्कि इसलिए भी कि उन्होंने हिन्दी नाटक को अँधेरे बन्द कमरों से बाहर निकाला और उसे युगों के रोमानी ऐन्द्रजालिक सम्मोहक से उबारकर एक नए दौर के साथ जोड़कर दिखाया। वस्तुतः मोहन राकेश के नाटक केवल हिन्दी के नाटक नहीं हैं। वे हिन्दी में लिखे अवश्य गए हैं, किन्तु वे समकालीन भारतीय नाट्य प्रवृत्तियों के द्योतक हैं। उन्होंने हिन्दी नाटक को पहली बार अखिल भारतीय स्तर ही नहीं प्रदान किया वरन् उसके सदियों के अलग-थलग प्रवाह को विश्व नाटक की एक सामान्य धारा की ओर भी अग्रसर किया। प्रमुख भारतीय निर्देशकों इब्राहीम अलकाजी,ओम शिवपुरीअरविन्द गौड़श्यामानन्द जालानराम गोपाल बजाजऔर दिनेश ठाकुर ने मोहन राकेश के नाटकों का निर्देशन किया।

    मोहन राकेश के दो नाटकों आषाढ़ का एक दिन मोहन राकेश के लिए इमेज परिणामतथा लहरों के राजहंस में ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को लेने पर भी आधुनिक मनुष्य के अंतर्द्वंद और संशयों की ही गाथा कही गयी है। एक नाटक की पृष्ठभूमि जहां गुप्तकाल है तो दूसरा बौद्धकाल के समय के ऊपर लिखा गया है। आषाढ़ का एक दिन में जहां सफलता और प्रेम में एक को चुनने के द्वन्द से जूझते कालिदास एक रचनाकार और एक आधुनिक मनुष्य के मन की पहेलियों को सामने रखते हैं वहीँ प्रेम में टूटकर भी प्रेम को नही टूटने देनेवाली इस नाटक की नायिका के रूप में हिंदी साहित्य को एक अविस्मरनीय पात्र मिला है। लहरों के राजहंस में और भी जटिल प्रश्नों को उठाते हुए जीवन की सार्थकता, भौतिक जीवन और अध्यात्मिक जीवन के द्वन्द, दूसरों के द्वारा अपने मत को दुनिया पर थोपने का आग्रह जैसे विषय उठाये गए हैं। राकेश के नाटकों को रंगमंच पर मिली शानदार सफलता इस बात का गवाह बनी कि नाटक और रंगमंच के बीच कोई खाई नही है। मोहन राकेश का तीसरा व सबसे लोकप्रिय नाटक आधे अधूरे है । जहाँ नाटककार ने मध्यवर्गीय परिवार की दमित इच्छाओ कुंठाओ व विसंगतियो को दर्शाया है । इस नाटक की पृष्ठभूमि एतिहासिक न होकर आधुनिक मध्यवर्गीय समाज है । आधे अधूरे मे वर्तमान जीवन के टूटते हुए संबंधो ,मध्यवर्गीय परिवार के कलहपुर्ण वातावरण विघटन ,सन्त्रास ,व्यक्ति के आधे अधूरे व्यक्तित्व तथा अस्तित्व का यथात्मक सजीव चित्रण हुआ है । मोहन राकेश का यह नाटक , अनिता औलक की कहानी दिन से दिन का नाट्य रुपांतरण है

    मोहन राकेश-अनीता की प्रेम कहानी

    बीबीसी हिंदी को दिए एक इंटरव्यू में मोहन राकेश की पत्नी अनीता राकेश ने अपने रिश्तों को लेकर दिलचस्प बातें बताई हैं. अनीता की मां चंद्रा मोहन राकेश की मुरीद थीं. वो उनको खत लिखा करती थीं. उन्होंने ही मोहन राकेश से एक बार अनुरोध किया कि वो मुंबई से दिल्ली जाते हुए बीच में ग्वालियर रुकें. मोहन ने वो निमंत्रण स्वीकार कर लिया. ग्वालियर में ठहरने के दौरान ही मोहन और अनीता का प्रेम प्रसंग शुरु हुआ. अनीता उस वक्त बालिग भी नहीं हुई थीं और राकेश मोहन उम्र के 38वें पड़ाव पर थे. कुछ ही दिनों में अनीता ने अपना घर छोड़ राकेश के साथ रहने का फैसला किया और दोनों ने शादी कर ली. अनीता राकेश की तीसरी पत्नी थीं.

    उनकी प्रेम कहानी को अनुराधा अनोखे रिश्ते की एक मिसाल मानती हैं, जो समाज के बनाए दकियानूसी नियम-कायदों को चुनौती देता है.

     अनीता और मोहन राकेश के प्रेम ने ये सिखाया कि किस तरह से जिंदगी में फ्रीडम ली जाती है. जिंदगी को समाज के बनाए कानून के मुताबिक जिया नहीं जा सकता. अनीता और राकेश, दोनों ने एक तरह से ये जिंदगी जी और युवाओं के लिए एक मिसाल भी हैं कि आप जिस तरह से जीना चाहते हैं, आप जिएं. उनमें कंपैनियनशिप दिखाई देती थी. एक तरह से सोचने, जीने का तरीका था. आप अपनी जिम्मेदारी खुद ले रहे हैं, ये उनके रिश्ते में दिखता था. उन्होंने बताया कि समाज, समाज का ढांचा आपको कई आजादी नहीं देता वो आपको लेनी पड़ती है.
  • मोहन राकेश-अनीता की प्रेम कहानीस्वभाव से मोहन राकेश शुरू से ही फक्कड़ थे. जब वो अपनी पहली शादी के लिए इलाहाबाद पहुंचे थे तो उनके साथ कोई बारात नहीं थी.लगभग यही उन्होंने अपनी दूसरी शादी के वक्त भी किया था. न किसी को ख़बर की और न ही किसी को बुलाया. दोनों ही शादियाँ नहीं चलीं. फिर उनकी मुलाकात अनीता औलख से हुई.
    दिलचस्प बात ये थी कि अनीता की माँ चंद्रा मोहन राकेश की मुरीद थीं. वो उनको ख़त लिखा करती थीं. उन्होंने ही उनसे एक बार अनुरोध किया कि वो मुंबई से दिल्ली जाते हुए बीच में ग्वालियर रुकें. मोहन ने वो निमंत्रण स्वीकार कर लिया.
    ग्वालियर में उनके रुकने के दौरान अनीता ने महसूस किया कि मोहन की निगाहें हमेशा उनका पीछा करती थीं.
    अनीता बताती हैं, “एक दिन पूरा परिवार ‘दिल एक मंदिर’ फ़िल्म देखने सिनेमा हॉल गया. मैं मोहन के बगल में बैठी. फ़िल्म के दौरान कितनी बार एक हत्थे पर दो बांहें टकराईं. तभी मेरा रूमाल ज़मीन पर गिर गया. मैं रुमाल उठाने के लिए झुकी तो अनजाने में ही मेरा हाथ उनके पैरों से छु गया. मैं ख़ामोश रही और उस ख़ामोशी का जवाब भी उसी तरीके की एक ख़ामोशी से दिया गया.”

    वो नाटक जो पूरा होकर भी अधूरा रह गया…

    मोहन राकेश अपने आखिरी नाटक “पैर तले की जमीन” को जीते जी अंतिम रूप नहीं दे सके. उनकी पत्नी अनीता राकेश के मुताबिक, “अपने भीतर वो पैर तले की जमीन की रिहर्सल ही नहीं, पूरा नाटक, पूरी साज-सज्जा के साथ अंतिम रूप से खेल चुके थे. एक मायने में अब केवल टाइपराइटर पर कागज चढ़ाकर उसे उतारना ही बाकी था.” लेकिन 3 जनवरी 1972 को वो ये काम पूरा किए बिना ही चल दिए. अनीता राकेश ने लिखा है, “जिस दिन वे मुझे एकाएक धोखा देकर सदा के लिए चले गए, तब भी टाइपराइटर पर इसी नाटक का एक पृष्ठ – आधा टाइप हुआ, आधा खाली – लगा रह गया था..” बाद में मोहन राकेश के सबसे करीबी दोस्त कमलेश्वर ने इस नाटक को अंतिम रूप दिया, जो प्रकाशित भी हुआ.
    नई कहानी की तिकड़ी के तीसरे स्तंभ राजेंद्र यादव ने अपने संस्मरण में मोहन राकेश को “तीसरे अंक का स्थगित नायक” कहा है. एक ऐसा नायक जिसकी तस्वीर विदाई के 45 साल बाद भी हिंदी साहित्य के रंगमंच पर धुंधली नहीं पड़ी है.

    प्रमुख कृतियाँ

    • उपन्यास
    अंधेरे बंद कमरेमोहन राकेश-अनीता की प्रेम कहानी के लिए इमेज परिणाम, ‘बाकलमा खुद’,अन्तराल, न आने वाला कलमोहन राकेश-अनीता की प्रेम कहानी के लिए इमेज परिणाम
    • नाटक
    आषाढ़ का एक दिनलहरों के राजहंसमोहन राकेश-अनीता की प्रेम कहानी के लिए इमेज परिणाममोहन राकेश-अनीता की प्रेम कहानी के लिए इमेज परिणामआधे अधूरेमोहन राकेश-अनीता की प्रेम कहानी के लिए इमेज परिणाम, अण्डे के छिलके
    • कहानी संग्रहमोहन राकेश की कहानियां :मोहन राकेश के लेखन की शुरुआत १९४४ में नन्ही कहानी से मानी जाती है, जो उनके निधन उपरान्त “सारिका” में मार्च १९७३ में प्रकाशित करायी गयी। तदुपरान्त सन १९४६ में उनकी भिक्षु  कहानी आई, जिसका प्रकाशन “सरस्वती” में हुआ। राकेश की डायरी के अनुसार यह उनकी प्रथम प्रकाशित कहानी है। राकेश जी के पांच कहानी संग्रह उपलब्ध हैं –मोहन राकेश-अनीता की प्रेम कहानी के लिए इमेज परिणाम
      • १ इन्सान के ख्ंडहर [१९५०]
      • २ नये बादल  [१९५७]
      • ३ जानवर और जानवर [१९५८]
      • ४ एक और जिन्दगी [१९६१]
      • ५ फौलाद का आकाश [१९६६]

              इन कहानी संग्रहों की कहानियों को पुन: चार जिल्दों में अलग-अलग स्थितियों और संदर्भों के अनुसार बांट दिया गया। इनके नाम हैं – “आज के साये”, “रोयें-रेशे”, “एक-एक दुनिया” और “मिले जुले चेहरे”। कुछ को छोडकर सारी कहानियां पहले वाले संग्रहों की थीं। पुन: इन कहानियों को राजपाल एंड सन्स से तीन खण्डों में प्रकाशित कराया गया। इनमें “क्वार्टर” में १५ कहानियां, “पहचान” में १६ कहानियां और “वारिस” में २० कहानियां संकलित हैं । इस प्रकार ५४ कहानियां इन संग्रहों में संकलित हैं।मोहन राकेश-अनीता की प्रेम कहानी के लिए इमेज परिणाम

      इसके अतिरिक्त उनके निधन के पश्चात “सारिका” में मोहन राकेश स्मॄति विशेषांक में  उनकी अन्य अप्रकाशित कहानियां प्रकाशित हुई ।- “बनिया बनाम इश्क”, “भिक्षु”, “लडा़ई”, “कटी हुई पतंगें”, “गुमशुदा”, “लेकिन इस तरह”, “नन्ही”, “मन्दिर मन्दिर की देवी”, “सतयुग के लोग”, “चांदनी और स्याह दाग”, “एक घटना”, और “अर्द्धविराम”। इस प्रकार मोहन राकेश की लगभग ६६ कहानियां दिखाई देती हैं ।

     ‘मिसपाल’, ‘आद्रा’, ‘ग्लासटैंक’, ‘जानवर’ ,क्वार्टर तथा अन्य कहानियाँ, पहचान तथा अन्य कहानियाँ, वारिस तथा अन्य कहानियाँ।
    • निबंध संग्रह
    परिवेश
    • अनुवाद
    मृच्छकटिक, शाकुंतलम।
    • यात्रा वृताँत
    आखिरी चट्टान

    सम्मान

    संगीत नाटक अकादमी,१९६८

  • 1926 में भारतीय ओडिसी नृत्याचार्य केलुचरण महापात्र का जन्म।
  • 1929 में भारतीय अभिनेता सईद जाफ़री का जन्म।
  • 1938 में भारतीय फ़िल्मों की प्रसिद्ध अभिनेत्री नन्दा का जन्म।
  • 1942 में प्रसिद्ध ब्रितानी भौतिक विज्ञानी स्टीफन हॉकिंग का जन्म।
  • 1975 में भारतीय संगीतकार हैरिस जयराज का जन्म।
  • 1984 में उत्तर कोरिया के तीसरे सर्वोच्च नेता किम जोंग उन का जन्म।

8 जनवरी को हुए निधन 

  • एक प्रसिद्ध धार्मिक व सामाजिक सुधारक और ‘ब्रह्म समाज’ के संस्थापकों में से एक केशव चन्द्र सेन का 1884 में निधन हुआ।
  • भारत सेवाश्रम संघ के स्वामी प्रणवानंदा महाराज का 1941 में निधन हुआ।
  • पहली भारतीय महिला पायलट सुषमा मुखोपाध्याय का 1984 में निधन हुआ।
  • क्रिकेटर पी जी जोशी का 1987 में निधन हुआ।
  • स्वतंत्रता सेनानी और जयप्रकाश नारायण तथा राममनोहर लोहिया के सहयोगी रहे मधु लिमये का 1995 में निधन हुआ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *