सामान्यजन को भी लग गई है टीवी चैनलों  की रायता फैलाने वाली ‘लत’

राणा की पुतली हिली नहीं, तब तक चेतक मुड़ जाता था ! बचपन में महाराणा प्रताप और उनके घोड़े के आपसी तालमेल पर ये सुनते आए थे। खैर, अब घोड़े तो रहे नहीं और न ही प्रताप से वीर योद्धा। अब जो है, सो टीवी ने सब आपके सामने परोस रखा है और उस आधार पर चेतक की भावनाएं, राणा की पुतली से भी फास्ट पलटी मार जाती हैं। पल में तोला- पल में माशा हुईं हैं पिछले चार दिनों में। सोशल मीडिया पर ‘युद्ध ही एक मात्र हल है’ एक झटके में ‘से नो टू वॉर बन’ जाता है। ‘मोदी है तो मुमकिन है’ और ‘वॉट ए जैस्चर फ्रॉम इमरान’ में बंट जाता है।

अभिनंदन के उस पार होने की ख़बर के बाद इस पार मीडिया ने जो रायता फैलाया है, इस बार वो मज़ाक और हंसी के पात्र से ऊपर उठकर आत्ममंथन की भयानक ज़रूरत बन गया है। ‘आई एम नॉट सपोज़्ड टू टैल यू’ से टीवी के रिपोर्टर्स का अभिनंदन के घर के बाहर खड़े होने का सफर-बेहयाई और देश की सुरक्षा की बड़ी खाई को पार करके था। लेकिन सबसे पहले के चक्कर में बाक़ी सब गया तेल लेने। सरकार ने ब्रीफिंग में बताया हमारा पायलट मिसिंग इन एक्शन है, यहां कुछ लोगों ने उकसाने का काम शुरू कर दिया कि मोदीजी ने घर-घर आके नहीं बताया इसका मतलब कुछ छुपाया जा रहा है।

‘सबसे पहले हमारे पास’ वाली चैनलों की ये लत अब आमजन तक भी पहुंच चुकी है। जिसके हाथ जो-जैसा विडियो आया, सब सोशल मीडिया को समर्पित हो गया। बिना उसके असली-नकली की परख किए और बिना सैनिक के सम्मान-स्वाभिमान की परवाह किए!

अपना बंदा दुश्मन के कब्ज़े में देख चैनलों ने बाज़ के सेट पर कबूतर लगा लिए। और फिर अभिनंदन की वापसी की ख़बर आई, चैनलों ने बता दिया जब सर्जिकल स्ट्राइक टू हो सकती है तो पीपली लाइव क्यूं नहीं ? चैनल नहा-धोकर सुबह से मैदान में डटे थे। लेकिन पाकिस्तान तो पाकिस्तान है। इंतज़ार।।।। डर।।।।आशंका।।।।असमंजस।।। वक्त के साथ बढ़ता रहा और सब।।।मतलब सब।।।।सब के सब।।। टीवी पर शाम होते होते।।।।बस कुछ देर और।।।बस कुछ देर और !

ये वक्त जोश के अभिनंदन का था। ‘आज तक’ पर अंजना शायद सुबह से टीवी पर होने के कारण थक गई थीं, लेकिन उस कमी को वाघा के जोश से चित्रा ने पूरा किया। ‘एबीपी’ पर वाघा से जगविंदर पटियाल मोर्चा संभाले रहे। जगविंदर की ग़ैर मिलावटी भाषा और अंदाज़, उन पर दर्शक का यकीन पुख्ता करते हैं, सो उनकी हर ख़बर के आधार पर धड़कनें अंभिनंदन को तैयार थीं।

भावनाओं के उबाल के इन दिनों में भी, ‘एनडीटीवी’ ने पुराने दूरदर्शन को जिंदा रखा। शाम 4:48 पर,  ‘एबीपी’ पर एम.एस बिट्टा साहब ने ऑन एयर ही पूछा-छह बजे मुझे ‘आजतक’ पर जाना है, कितना वक्त और लगेगा? अगले ही पल वो कैमरे पर रो रहे थे और कैमरा पर्सन की ओर से ‘क्लोज़, क्लोज़’ आवाज़ भी ऑन एयर थी!

जैसे बीजेपी को लगता है कि वो राष्ट्र का चेहरा है, ‘ज़ी न्यूज़’ भी उन्ही भावों में बह चुका है। बाक़ी चैनलों ने भले ही अभिनंदन के धरती छूने का धैर्य रख रखा हो,  ‘ज़ी’ शब्दों के पराक्रम से पाकिस्तान को हर आधे घंटे में परास्त करता रहा। कर्कशता और जोश में भी सूत भर का फ़र्क होता है।

नेताओं के स्लीपर सेल सोशल मीडिया पर काम पर थे। जो किसी भी विडियो को किसी का भी बताकर अपनी पार्टी के पक्ष में और दूसरे के ख़िलाफ़ माहौल तैयार कर रहे थे। इस पूरे प्रकरण के बीच बूथ मज़बूत करना शायद पाकिस्तान को बताने के लिए हो कि भारत को फ़र्क नहीं पड़ता लेकिन हमें फ़र्क पड़ रहा था और ये बहुत ग़ैरज़रूरी लगा।

डिवाइड एंड रूल के बाद बंटे और फिर एकजुट होकर बने इस देश को पाकिस्तान अपनी कूटनीति से बांटता रहा और कुछ लोग ‘थैंक्यू इमरान खान’ कह-कह कर नहीं अघा रहे। आई एम सॉरी आई मस्ट टैल यू, यू लैट डाउन पुलवामा!

(ये लेखिका प्रमिला दीक्षित के निजी विचार हैं)

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