शायर शौक़ बहराइची और तबला वादक अहमद जान थिरकवा का निधन हुआ था आज

13 जनवरी का इतिहास

दोस्तों, हमें अक्सर परीक्षाओं में इतिहास बारे में प्रश्न पूछें जाते हैं लेकिन बहुत बार हमें देश विदेश के इतिहास के बारे में पता नहीं होता, यहाँ हमने 13 जनवरी के इतिहास की कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं के बारे में जानकारी दी हैं यह हमारा छोटा सा प्रयास हैं आपको जरुर पसंद आयेंगा

13 January History

  • एलिजाबेथ (प्रथम) इंग्लैंड की साम्राज्ञी 1559 में बनी।
  • स्पेन में राष्ट्रीय दिवालिएपन की घोषणा के बाद 1607 में ‘बैंक ऑफ जेनेवा’ का पतन हुआ।
  • इतालवी खगोलविद, भौतिकविद एवं गणितज्ञ गैलीली गैलिलियो ने 1610 में बृहस्पति के चौथे उपग्रह कैलिस्टो की खोज की।
  • मुगल बादशाह बहादुर शाह  ने 1709 में अपने तीसरे भाई काम बख्श को हैदाराबाद में हराया।
  • उदयपुर के राणा ने 1818 में मेवाड़ प्रांत की रक्षा के लिये ब्रिटिश सेना के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए।
  • ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी की सेना के अधिकारी डॉ. विलियम ब्राइडन 1842 में ‘आंग्ल अफ़गान युद्ध’ में जिंदा बचे रहने वाले इकलौते ब्रिटिश  रहे।
  • अंग्रजों और सिखों के बीच 1849 में चिलियनवाला में दूसरा युद्ध हुआ।
  • असम में युवाओं ने 1889 में अपनी साहित्यिक पत्रिका ‘जोनाकी का प्रकाशन शुरु किया।
  • न्यूयॉर्क शहर में दुनिया का पहला सार्वजनिक रेडियो प्रसारण 1910 से प्रारम्भ हुआ।
  • इटली के एवेज्जानो शहर में 1915 में आये विनाशकारी भूकंप में 30 हजार से अधिक लोग मारे गए।
  • 1930 में पहली बार मिकी माउस कॉमिक स्ट्रिप का प्रकाशन हुआ।
  • राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हिन्दू-मुस्लिम एकता बनाये रखने के लिये 1948 में आमरण अनशन शुरू किया।
  • टोगों के राष्ट्रपति सिलवेनस ओलिम्पियो की 1963 में एक सैनिक विद्रोह में हत्या कर दी गयी।
  • भारत के पूर्वी राज्य पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में 1964 में हिंदू और मुसलमानों के बीच भयानक सांप्रदायिक दंगे हुए। जिनमें करीब 200 लोग मारे गए और 300 से ज़्यादा लोग घायल हुए।
  • 1966 में अमेरिका ने नवादा में परमाणु परीक्षण किया।
  • नासा ने 1978 में पहली अमेरिकन महिला अंतरिक्षयात्री का चयन किया।
  • 1988 में चीन के राष्ट्रपति चिंग चियांग कुमो का निधन।
  • अमरीका और उसके सहयोगियों ने 1993 में दक्षिणी इराक़ में नो फ़्लाई ज़ोन लागू करने के लिए इराक़ पर हवाई हमले की शुरूआत की।
  • 1995 में बेलारूस नाटो का 24वाँ सदस्य देश बना।
  • परमाणु कार्यक्रम को लेकर 2006 में ईरान पर सैन्य आक्रमण से ब्रिटेन ने इन्कार किया।
  • महिलाओं के प्रति भेदभाव दूर करने के लिए संयुक्त राष्ट्र का 37वाँ अधिवेशन 2007 में न्यूयार्क में शुरू।
  • जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारुख़ अब्दुल्ला 2009 में नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष बनाए गए।

13 जनवरी को जन्मे व्यक्ति 

  • 1450 में जिस के जलमार्ग का प्रयोग करके ही वास्को डी गामा ने भारत के जलमार्ग की खोज की थी उस पुर्तग़ाल के नाविक बारथोलोमियु डेयाज़ का जन्म हुआ।
  • 1896 में भारत के प्रसिद्ध कन्नड़ कवि और साहित्यकार दत्तात्रेय रामचन्द्र बेंद्रे का जन्म हुआ।
  • 1911 में हिन्दी कवि शमशेर बहादुर सिंह का जन्म हुआ।
  • 1938 में प्रसिद्ध भारतीय संतूर वादक शिवकुमार शर्मा का जन्म हुआ।
  • 1949 में अंतरिक्ष में जाने वाले पहले भारतीय विंग कमांडर राकेश शर्मा का जन्म हुआ।
  • 1978 में भारतीय अभिनेता अश्मित पटेल का जन्म हुआ।
  • 1926 में प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता एवं निर्देशक शक्ति सामंत का जन्म हुआ।
  • 1919 में उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल मर्री चेन्ना रेड्डी का जन्म हुआ।

13 जनवरी को हुए निधन

  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में कार्य कर चुके आर.एन. माधोलकर का 1921 में निधन।
  • प्रसिद्ध शायर शौक़ बहराइची शौक़ बहराइची के लिए इमेज परिणामका 1964 में निधन।शौक़ बहराइची (6 जून 1884-13 जनवरी 1964) एक भारतीय उर्दू शायर थे। उनका वास्तविक नाम ‘रियासत हुसैन रिज़वी’ था। ये बहुत प्रसिद्ध शायर थे। नेताओं व ग़लत कार्यों में लिप्त व्यक्तियों पर कटाक्ष करने के लिए नीचे दिया गया शेर देश में सर्वाधिक इस्तेमाल होता है पर बहुत कम ऐसे लोग हैं, जिन्हें यह पता होगा कि इस शेर को लिखने वाले शायर का नाम ‘शौक़ बहराइची’ है।

    ‘बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी है
    हर शाख पे उल्लू बैठें हैं अंजाम ऐ गुलिस्तां क्या होगा।’

    शौक़ बहराइची का जन्म 6 जून1884 को अयोध्या के सैयदवाड़ा मोहल्ले में एक साधारण मुस्लिम शिया परिवार में हुआ था। इनके जन्म का नाम ‘रियासत हुसैन रिज़वी’ था जो बाद में बहराइच में रहने के कारण बहराइची हुआ। यहीं पर उन्होंने ग़रीबी में भी शायरी से नाता जमाए रखा। रियासत हुसैन रिज़वी उर्फ ‘शौक़ बहराइची’ के नाम से शायरी के नए आयाम गढ़ने लगे, जो काम 13 जनवरी1964 में हुई उनकी मौत तक बदस्तूर जारी रहा। उनके बारे में जो भी जानकारी प्रामाणिक रूप से मिली, वह उनकी मौत के तकरीबन 50 साल बाद बहराइच जनपद के निवासी व लोक निर्माण विभाग के रिटायर्ड इंजीनियर ताहिर हुसैन नक़वी के नौ वर्षों की मेहनत का नतीजा है। उन्होंने उनके शेरों को संकलित कर ‘तूफ़ान’ किताब की शक्ल दी  है।

    ग़रीबी में बीता जीवन

    ताहिर नक़वी बताते हैं “जितने मशहूर अन्तराष्ट्रीय शायर शौक़ साहब हुआ करते थे उतनी ही मुश्किलें उनके शेरों को ढूँढने में सामने आईं, निहायत ही ग़रीबी में जीने वाले शौक़ की मौत के बाद उनकी पीढ़ियों ने उनके कलाम या शेरों को सहेजा नहीं, अपनी खोज के दौरान तमाम कबाडी की दुकानों से खुशामत करके और ढूंढ ढूंढकर उनके लिखे हुए शेरों को खोजना पड़ा”। शौक़ बहराइची की एक मात्र आयल पेंटिग वाली फोटो के बारे में ताहिर नक़वी बताते हैं “यह फोटो भी हमें अचानक एक कबाड़ी की ही दुकान पर मिल गई अन्यथा इनकी कोई भी फोटो मौजूद नहीं थी।” व्यंग जिसे उर्दू में तंज ओ मजाहिया कहा जाता है इसी विधा के शायर शौक़ ने अपना वह मशहूर शेर बहराइच की कैसरगंज विधानसभा से विधायक और 1957 के प्रदेश मंत्री मंडल में कैबिनेट स्वास्थ मंत्री रहे हुकुम सिंह की एक स्वागत सभा में पढ़ा था जहाँ से यह मशहूर होता ही चला गया। ताहिर नक़वी बताते हैं कि यह शेर जो प्रचलित है उसमें और उनके लिखे में थोडा सा अंतर कहीं कहीं होता रहता है। वह बताते हैं कि सही शेर यह है “बर्बाद ऐ गुलशन कि खातिर बस एक ही उल्लू काफ़ी था, हर शाख पर उल्लू बैठा है अंजाम ऐ गुलशन क्या होगा”]

    गुमनाम शायर

    शौक़ बहराइची की मौत के 50 वर्ष बीत जाने के बाद भी इनके बारे में कहीं कोई सुध ना लेना एक मशहूर शायर को काफ़ी गुमनाम मौत देने का जिम्मेदार साहित्य की दुनिया को माना जा सकता है। शौक़ की इस गुमनामियत पर उनका ही एक और मशहूर शेर सही बैठता है।

    “अल्लाहो गनी इस दुनिया में, सरमाया परस्ती का आलम, बेज़र का कोई बहनोई नहीं, ज़रदार के लाखों साले हैं”

    शौक़ बहराइची के बहराइच में बीते दिन काफ़ी ग़रीबी में रहे और यहाँ तक की उन्हें कोई मदद भी नहीं मिली। आज़ादी के बाद सरकार की ओर से कुछ पेंशन बाँध देने के बाद भी जब पेंशन की रकम उन तक नहीं पहुंची तो बहुत बीमार चल रहे शायर शौक़ के मन ने उस पर भी तंज कर ही दिया।

    “सांस फूलेगी खांसी सिवा आएगी, लब पे जान हजी बराह आएगी, दादे फ़ानी से जब शौक़ उठ जाएगा, तब मसीहा के घर से दवा आएगी”

    शायर शौक़ बहराइची की ग़ज़लों से 10 बड़े शेर

    शौक़ बहराइची उर्दू के मशहूर शायरों में से एक हैं और उन्हें हास्य, व्यंग्य की श्रेणी में अग्रणी माना जाता है। पेश हैं उनकी ग़ज़लों से मशहूर शेर

    वाइज़ ये गुलिस्ताँ ये बहारें ये घटाएँ
    साग़र कोई ऐसे में खनक जाए तो क्या हो
    उठ कर तेरी चौखट से हम और चले जाएँ
    इंग्लैण्ड अरे तौबा जापान अरे तौबा

    ऐ ‘शौक़’ ये जफ़ाएँ हैं क्या ये सितम हैं क्या

    ऐ ‘शौक़’ ये जफ़ाएँ हैं क्या ये सितम हैं क्या
    हर इम्तिहाँ में बैठ कोई इम्तिहाँ न छोड़
    सकूँ मिलता है उन को और न हम को चैन रातों को
    परेशाँ कर रखा है आप के हाल-ए-परेशाँ ने

    सफ़्हा-ए-दिल पे नज़र आते हैं अब दाग़ ही दाग़

    सफ़्हा-ए-दिल पे नज़र आते हैं अब दाग़ ही दाग़
    गोद डाला किसी कम्बख़्त ने सारा काग़ज़
    हम ने माना ये कि ज़ाहिद है बुज़ुर्ग-ओ-मोहतरम
    बात करता है मगर कम्बख़्त बचकाना अभी

    हो कैसे किसी वादे का इक़रार रजिस्टर्ड

    हो कैसे किसी वादे का इक़रार रजिस्टर्ड
    जब ख़ुद ही नहीं है मिरी सरकार रजिस्टर्ड
    हर मुल्क इस के आगे झुकता है एहतिरामन
    हर मुल्क का है फ़ादर हिन्दोस्ताँ हमारा

    अब ख़ुदा के लिए रख हम पे करम ऐ नासेह

    अब ख़ुदा के लिए रख हम पे करम ऐ नासेह
    हैं परेशाँ तेरी बकवास से हम ऐ नासेह
    उन की वहशत से ये ज़ाहिर हो रहा है ख़ुद-ब-ख़ुद
    ये उसी मौज़ा में रहते हैं जो है मंगल के पास

  • भारत के प्रसिद्ध तबला वादक अहमद जान थिरकवा अहमद जान थिरकवाका 1976 में निधन। अहमद जान थिरकवा (जन्म: 1891उत्तर प्रदेश – मृत्यु: 13 जनवरी1976भारत के प्रसिद्ध तबला वादकों में गिने जाते थे। लखनऊमेरठ और फ़र्रूख़ाबाद आदि कई घरानों का इन्हें बाज याद था। थिरकवा जी विशेष रूप से दिल्ली और फ़र्रूख़ाबाद का बाज बजाने में निपुण थे।
  • अहमद जान थिरकवा का जन्म 1891 में मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनके नाना बाबा कलंदर बख़्श और उनके भाई इलाही बख़्श (नाटोरी वाले), बोली बख़्श, करीम बख़्श सभी मुरादाबाद के प्रसिद्ध तबला वादकों में शामिल थे। अहमद जान थिरकवा के चाचा शेर ख़ाँ, मामा फ़ैयाज ख़ाँ, बसवा ख़ाँ और फ़जली ख़ाँ प्रसिद्ध तबला नवाज थे।

    नामकरण

    पटियाला के स्वर्गीय उस्ताद अब्दुल अजीज ख़ाँ कहा करते थे कि अहमद जान जब छोटी उम्र से ही तबला सीखा करते थे, तो उनका हाथ तबले पर एक विचित्र प्रकार से थिरकता था। इसीलिए उनका नाम ‘थिरकवा’ पड़ गया। ऐसा भी कहा जाता है कि अपने छात्र जीवन में नटखट होने के कारण यह नाम ‘थिरकवा’ उस्ताद मुनीर ख़ाँ के पिता उस्ताद काले ख़ाँ द्वारा दिया गया।

    शिक्षा

    थिरकवा ने मेरठ के रहने वाले उस्ताद मुनीर ख़ाँ से तबला बजाने की विधा सीखी थी। मुनीर ख़ाँ ताल विद्या के उत्कुष्ट विद्धान हो गए थे। इनको सैकडों बोल और परनें याद थीं। यद्यपि थिरकवा के घर में भी तबले का प्रबन्ध था, क्योंकि आपके चाचा उस्ताद शेर ख़ाँ एक नामी तबलिए हो गए थे, किन्तु तबले की नियमित शिक्षा के लिए आपको उस्ताद मुनीर ख़ाँ के पास ही जाना पड़ा।

    निपुणता

    तबला वादन में थिरकवा ने अपनी मेहनत एवं लगन से बहुत शीघ्र ही निपुणता प्राप्त कर ली थी। लखनऊमेरठ, अजराड़ा, फ़र्रूख़ाबाद आदि सभी घरानों का बाज थिरकवा को याद था, किन्तु विशेष रूप से वे दिल्ली और फ़र्रूख़ाबाद का बाज बजाने में वे सिद्ध हस्त थे। तबला बजाते समय जिन संगीत प्रेमियों ने उस्ताद थिरकवा के मुँह के बोल सुने थे, उन्हें ज्ञात था कि जितना सुन्दर वे बजाते थे, उतने ही सुन्दर और स्पष्ट बोल उनके मुख से निकलते थे। कठिन तालें भी वे बड़ी सुगमता से बजाते थे।

    पुरस्कार व सम्मान

    सन 1953-1954 में थिरकवा को ‘राष्ट्रपति पुरस्कार’ मिला था। इसके बाद सन 1970 में भारत सरकार द्वारा उन्हें ‘पद्मभूषण‘ उपाधि देकर सम्मानित किया गया।

    निधन

    अहमद जान थिरकवा काफ़ी समय तक रामपुर दरबार में रहे। बाद में लखनऊ आकर बस गए। यहीं पर 13 जनवरी1976 को उनका इन्तकाल हो गया।

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