विश्व हीमोफीलिया दिवस भी है आज, 17 अप्रैल का इतिहास

खिलाड़ी मुथैया मुरलीधरन  और एस. राधाकृष्णन

देश और दुनिया के इतिहास में आज के दिन कई घटनाएं हुईं, जानते हैं आज के दिन यानि 17 अप्रैल के इतिहास के बारे में।

विश्व हीमोफीलिया दिवस

 हीमोफीलिया की बीमारी के लक्षण और कारण

हीमोफिलिया एक आनुवांशिक बीमारी है, जो माता-पिता से होने वाले बच्चे में भी जा सकती है। गुणसूत्र इस बीमारी की वाहक (आगे भेजने वाली) होते हैं, और यह बीमारी पुरुषों में ज्यादा देखने को मिलती है। जब कोई व्यक्ति हीमोफीलिया से पीड़ित होता है, और उन्हें थोड़ी बहुत भी चोट लग जाती है, तो उनका खून बहना रुकता नहीं है, क्योंकि हीमोफिलिया से पीड़ित लोगों में चोट लगने पर रक्त के पर्याप्त थक्के नहीं जमते हैं।  ऐसे में यदि इस तरह के लोगों का एक्सीडेंट हो जाए, तो यह उनकी जिंदगी के लिए घातक भी हो सकता है, क्योंकि एक्सीडेंट में आई चोट के बाद इन लोगों में खून के बहाव को रोकना बहुत मुश्किल हो जाता है। इन लोगों में थक्के जमने का कारक आठवीं (हीमोफिलिया ए) या IX (हीमोफिलिया बी) नहीं होता है। इसीलिए अगर यह बीमारी परिवार के किसी भी सदस्य को है तो उसे बहुत सावधानी से रहना चाइये। इसीलिए आज हम इस आर्टिकल के जरिये यह जानने की कोशिश करेंगे कि यह बीमारी इतनी खतरनाक क्यों हैं? यह बीमारी इसलिए खतरनाक है क्योंकि इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है। इस बीमारी को सिर्फ एंटी हेमोफिलिक (एएचएफ) से नियंत्रण में रखा जा सकता हैं, जो कि बहुत महंगी होती हैं और कुछ ही जगहों पर मिलती है। यही कारण हैं कि इस बीमारी के चलते कुछ लोगों की मौत बचपन में ही हो जाती हैं।

आइये जानते हैं हीमोफिलिया के लक्षणों के बारे में

1. आनुवंशिक हीमोफिलिया एक आनुवांशिकी बीमारी हैं। जो माँ बाप से बच्चों में होती हैं। हीमोफिलिया की बीमारी खून में थक्के ना जम पाने की वजह से होती हैं। जो अधिकतर पुरुषों में देखने को मिलती है।

2. अक्वाइअर्ड हामोफिलिया अक्वाइअर्ड हामोफिलिया के रोगियों में प्रतिरक्षा प्रणाली एक तरह का आठवा एंटीबॉडी बनता है जिससे खून के थक्के जमना बंद हो जाते हैं और चोट लगने पर खून बहना बंद नहीं होता है। अक्वाइअर्ड हामोफिलिया महिलाओं और पुरुषों दोनों को प्रभावित करता है।

1. नाक से अधिक खून आना हेमोफिलिया बीमारी का पहला लक्षण है नाक से अधिक खून आना। अगर किसी व्यक्ति को बेवजह नाक से बहुत खून आ रहा हो तो उसे हेमोफिलिया हो सकता है।

2. मसूढ़ों से खून आना हीमोफिलिया का दूसरा लक्षण है मसूढ़ों से खून आना। अगर किसी व्यक्ति के मसूढ़ों से खून आ रहा है और रूक नहीं रहा है तो यह उसके लिए खतरनाक हो सकता है।

3. चोट लगने पर अधिक खून बहना अगर किसी व्यक्ति को हल्की चोट लगने पर भी बहुत ज्यादा खून बेहता है तो उसे हेमोफिलिया की बीमारी हो सकती है।

4. जोड़ों में दर्द और खून आना यदि कोई व्यक्ति हीमोफिलिया से पीड़ित है, तो उसे जोड़ों में दर्द होगा, इसका मुख्य कारण है जोड़ों में आंतरिक खून का बेहना। अगर यह स्थिति खारब हो जाती है तो जोड़ों में सूजन, दर्द और लाल पड़ने लगते हैं।

5. मल और मूत्र में खून आना गुर्दे और मूत्राशय में आंतरिक खून के आने से मल और मूत्र में खून आने लगता है। जो हेमोफिलिया जैसे बीमारी का प्रमुख लक्षण है।

6. मस्तिष्क में खून आना हीमोफिलिया के सबसे गंभीर मामलो में से एक है मस्तिष्क में खून आना। इसमें मस्तिष्क के अंदर खून का स्राव होने लगता है जिससे सिरदर्द, गर्दन में दर्द और उल्टी आने लगती है।

7. कमजोरी और डबल विज़न कमज़ोरी महसूस करना, डबल विज़न यानी हर चीज़ दो दिखना और चलने में मुश्किल होना। यह भी हेमोफिलिया के अन्य प्रमुख लक्षण हैं।Image result for हीमोफीलियाImage result for हीमोफीलिया

 “हीमोफीलिया ए अथवा हीमोफीलिया बी” दो प्रकार का होता हैं।  रोग थक्के के आठ अथवा नौ घटकों की कमी पर निर्भर करता है।  सबसे सामान्य प्रकार “हीमोफीलिया ए” विकार होता है। यह प्रति पांच से दस हजार जन्मे बच्चों में से किसी एक को जन्म के समय होता है। “हीमोफीलिया बी” लगभग प्रति 20 से 34 हजार जन्मे बच्चों में से किसी एक को जन्म के समय प्रभावित करता हैं।
आमतौर पर, हीमोफीलिया की जानकारी जीवन के आरंभिक दिनों में हो जाती है, लेकिन, इस रोग की जानकारी कभी-कभी केवल बड़ी चोट लगने अथवा शल्य चिकित्सा के समय होती है। हीमोफीलिया की जानकारी जन्म के पहले, दौरान अथवा बाद में सामान्य रक्त परीक्षण से प्राप्त की जा सकती हैं। हीमोफीलिया से पीड़ित व्यक्ति स्वस्थ जीवनयापन कर सकता हैं। यद्यपि, इस बीमारी को उपचारित नहीं किया जा सकता है, लेकिन रक्त के थक्कों के घटकों की कमी को नियमित आधान से प्रबंधित किया जा सकता है।
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देश और दुनिया के इतिहास में 17 अप्रैल के दिन महत्‍वपूर्ण घटनाएं1941 द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यूगोस्लाविया ने जर्मनी के समक्ष आत्मसमर्पण किया.

1946 सीरिया ने फ्रांस से आजादी मिलने की घोषणा की.

1986 नीदरलैंड और सिसली देशों के बीच युद्ध की स्थिति को खत्म करने की घोषणा करते हुए शांति बहाल की.

1971 मिस्र, लीबिया और सीरिया ने मिल कर यूनाइटेड अरब स्टेट बनाने के लिए संघ का गठन किया.

1947 श्रीलंका के महानतम खिलाड़ी मुथैया मुरलीधरन का जन्म भी इसी दिन हुआ.

1982 कनाडा ने संविधान अपनाया.

1982 अमेरिका ने नेवादा परीक्षण स्थल पर परमाणु परीक्षण किया.

1993 अंतरिक्ष यान एसटीएस-56 डिस्कवरी धरती पर वापस लौटा.

17 April History

  • जियोवान्नी वेराजानो ने 1524 में न्यूयॉर्क खाड़ी की खोज की।
  • सर नेविले चैंबरलिन ने 1875 में स्नूकर का अविष्कार किया।
  • चीन और जापान के बीच 1895 में शिमोनोसेकी का समझौता हुआ।
  • कलकत्ता को 1899 में पनबिजली मिली।
  • द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1941 में यूगोस्लाविया ने जर्मनी के समक्ष आत्मसमर्पण किया।
  • सीरिया ने 1946 में फ्रांस से आजादी मिलने की घोषणा की।
  • लीबिया, मिस्र और सीरिया ने 1971 में मिल कर यूनाइटेड अरब स्टेट बनाने के लिए संघ का गठन किया।
  • सन 1977 में स्वतंत्र पार्टी का जनता पार्टी में विलय।
  • कनाडा ने 1982 में संविधान अपनाया।
  • अमेरिका ने 1982 में नेवादा परीक्षण स्थल पर परमाणु परीक्षण किया।
  • भारत ने 1983 में “एसएलवी-3” राकेट का प्रक्षेपण किया।
  • सन 1986 में सिसली और नीदरलैंड देशों के बीच युद्ध की स्थिति को खत्म करने की घोषणा करते हुए शांति बहाल की।
  • अंतरिक्ष यान “एसटीएस-56” डिस्कवरी 1993 में धरती पर वापस लौटा।
  • पाकिस्तान में बाल मज़दूरी को समाप्त करने वाले युवा कार्यकर्ता इक़बाल मसीह की 1995 में हत्या हुई ।
  • लगभग 55 वर्षों बाद 2003 में भारत-ब्रिटेन संसदीय मंच का गठन हुआ।
  • 2014 के एशियाड के लिए 2007 में दक्षिण कोरिया को मेजबानी मिली।
  • ब्राजील व भारत के बीच 2008 में चार महत्त्वपूर्ण संधी पर हस्ताक्षर किये गए।
  • प्रसिद्ध कोलंबियाई उपन्यासकार ग्रैबिएल मार्क़ेज का 2014 में निधन।

17 अप्रैल को जन्मे व्यक्ति – Famous Birthdays on 17 April

  • श्रीलंका के महानतम खिलाड़ी मुथैया मुरलीधरन का जन्म 1947 में हुआ।मुथैया मुरलीधरन (तमिलமுத்தையா முரளிதரன்सिंहली : මුත්තයියා මුරලිදරන්, जन्म 17 अप्रैल 1972), मुरली के नाम से प्रसिद्ध, एक श्रीलंकाई क्रिकेटर हैं जिन्हें विजडन क्रिकेटर्स अलमनाक द्वारा 2002 में अब तक के महानतम टेस्ट मैच गेंदबाज का दर्जा दिया गया था। मुथैया मुरलीधरन श्रीलंकाई क्रिकेट खिलाड़ी हैं। उन्होंने 22 जुलाई 2010 में अपने अंतिम टेस्ट मैच की अपनी अंतिम गेंद पर अपना 800वां और अंतिम विकेट लेकर 2010 में टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लिया।
  •  संत आसाराम बापू का जन्म 1941 को हुआ।
  • भारत के बिलियर्ड्स और स्नूकर गीत सेठी का जन्म 1961 को हुआ।

17 अप्रैल को हुए निधन – Famous Deaths on 17 April

  • अंग्रेज़ प्राच्य विद्यापंडित और विधिशास्त्री तथा प्राचीन भारत संबंधी सांस्कृतिक अनुसंधानों के प्रारम्भकर्ता विलियम जोंस का 1794 में निधन।
  • उड़िया भाषा और साहित्य के प्रमुख कवि राधानाथ राय का 1908 में निधन।
  • भारत के समाज सुधारक वी. एस. श्रीनिवास शास्त्री का 1946 में निधन।
  • भारत के द्वितीय राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन का 1975 में आज ही दिन निधन।डॉ॰ राधाकृष्णन का जन्म तमिलनाडु के तिरूतनी ग्राम में, जो तत्कालीन मद्रास से लगभग 64 कि॰ मी॰ की दूरी पर स्थित है, 5 सितम्बर 1888 को हुआ था। जिस परिवार में उन्होंने जन्म लिया वह एक ब्राह्मण परिवार था। उनका जन्म स्थान भी एक पवित्र तीर्थस्थल के रूप में विख्यात रहा है। राधाकृष्णन के पुरखे पहले कभी ‘सर्वपल्ली’ नामक ग्राम में रहते थे और 18वीं शताब्दी के मध्य में उन्होंने तिरूतनी ग्राम की ओर निष्क्रमण किया था। लेकिन उनके पुरखे चाहते थे कि उनके नाम के साथ उनके जन्मस्थल के ग्राम का बोध भी सदैव रहना चाहिये। इसी कारण उनके परिजन अपने नाम के पूर्व ‘सर्वपल्ली’ धारण करने लगे थे।डॉ॰ राधाकृष्णन एक ग़रीब किन्तु विद्वान ब्राह्मण की सन्तान थे। उनके पिता का नाम ‘सर्वपल्ली वीरास्वामी’ और माता का नाम ‘सीताम्मा’ था। उनके पिता राजस्व विभाग में काम करते थे। उन पर बहुत बड़े परिवार के भरण-पोषण का दायित्व था। वीरास्वामी के पाँच पुत्र तथा एक पुत्री थी। राधाकृष्णन का स्थान इन सन्ततियों में दूसरा था। उनके पिता काफ़ी कठिनाई के साथ परिवार का निर्वहन कर रहे थे।

    विद्यार्थी जीवन

    राधाकृष्णन का बाल्यकाल तिरूतनी एवं तिरुपति जैसे धार्मिक स्थलों पर ही व्यतीत हुआ। उन्होंने प्रथम आठ वर्ष तिरूतनी में ही गुजारे। यद्यपि उनके पिता पुराने विचारों के थे और उनमें धार्मिक भावनाएँ भी थीं, इसके बावजूद उन्होंने राधाकृष्णन को क्रिश्चियन मिशनरी संस्था लुथर्न मिशन स्कूल, तिरूपति में 1896-1900 के मध्य विद्याध्ययन के लिये भेजा। फिर अगले 4 वर्ष (1900 से 1904) की उनकी शिक्षा वेल्लूर में हुई। इसके बाद उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज, मद्रास में शिक्षा प्राप्त की।

    इन 12 वर्षों के अध्ययन काल में राधाकृष्णन ने बाइबिल के महत्त्वपूर्ण अंश भी याद कर लिये। इस उम्र में उन्होंने वीर सावरकर और स्वामी विवेकानन्द का भी अध्ययन किया। उन्होंने 1902 में मैट्रिक स्तर की परीक्षा उत्तीर्ण की और उन्हें छात्रवृत्ति भी प्राप्त हुई। इसके बाद उन्होंने 1904 में कला संकाय परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। उन्हें मनोविज्ञान, इतिहास और गणित विषय में विशेष योग्यता की टिप्पणी भी उच्च प्राप्तांकों के कारण मिली। इसके अलावा क्रिश्चियन कॉलेज, मद्रास ने उन्हें छात्रवृत्ति भी दी। दर्शनशास्त्र में एम०ए० करने के पश्चात् 1916 में वे मद्रास रेजीडेंसी कॉलेज में दर्शनशास्त्र के सहायक प्राध्यापक नियुक्त हुए। बाद में उसी कॉलेज में वे प्राध्यापक भी रहे। डॉ॰ राधाकृष्णन ने अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से विश्व को भारतीय दर्शन शास्त्र से परिचित कराया।

    दाम्पत्य जीवन

    उस समय मद्रास के ब्राह्मण परिवारों में कम उम्र में ही शादी सम्पन्न हो जाती थी और राधाकृष्णन भी उसके अपवाद नहीं रहे। 1903 में 16 वर्ष की आयु में ही उनका विवाह  ‘सिवाकामू’ के साथ सम्पन्न हो गया। उस समय उनकी पत्नी की आयु मात्र 10 वर्ष की थी। अतः तीन वर्ष बाद ही उनकी पत्नी ने उनके साथ रहना आरम्भ किया। यद्यपि उनकी पत्नी सिवाकामू ने परम्परागत रूप से शिक्षा प्राप्त नहीं की थी, लेकिन उनका तेलुगु भाषा पर अच्छा अधिकार था। वह अंग्रेज़ी भाषा भी लिख-पढ़ सकती थीं। 1908 में राधाकृष्णन दम्पति को सन्तान के रूप में पुत्री की प्राप्ति हुई। 1908 में ही उन्होंने कला स्नातक की उपाधि प्रथम श्रेणी में प्राप्त की और दर्शन शास्त्र में विशिष्ट योग्यता प्राप्त की। शादी के 6 वर्ष बाद ही 1909 में उन्होंने कला में स्नातकोत्तर परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली। इनका विषय दर्शन शास्त्र ही रहा। उच्च अध्ययन के दौरान वह अपनी निजी आमदनी के लिये बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का काम भी करते रहे। 1908 में उन्होंने एम० ए० की उपाधि प्राप्त करने के लिये एक शोध लेख भी लिखा। इस समय उनकी आयु मात्र बीस वर्ष की थी। इससे शास्त्रों के प्रति उनकी ज्ञान-पिपासा बढ़ी। शीघ्र ही उन्होंने वेदों और उपनिषदों का भी गहन अध्ययन कर लिया। इसके अतिरिक्त उन्होंने हिन्दी और संस्कृत भाषा का भी रुचिपूर्वक अध्ययन किया।

    हिन्दू शास्त्रों का गहरा अध्ययन

    शिक्षा का प्रभाव जहाँ प्रत्येक व्यक्ति पर निश्चित रूप से पड़ता है, वहीं शैक्षिक संस्थान की गुणवत्ता भी अपना प्रभाव छोड़ती है। क्रिश्चियन संस्थाओं द्वारा उस समय पश्चिमी जीवन मूल्यों को विद्यार्थियों के भीतर काफी गहराई तक स्थापित किया जाता था। यही कारण है कि क्रिश्चियन संस्थाओं में अध्ययन करते हुए राधाकृष्णन के जीवन में उच्च गुण समाहित हो गये। लेकिन उनमें एक अन्य परिवर्तन भी आया जो कि क्रिश्चियन संस्थाओं के कारण ही था। कुछ लोग हिन्दुत्ववादी विचारों को हेय दृष्टि से देखते थे और उनकी आलोचना करते थे। उनकी आलोचना को डॉ॰ राधाकृष्णन ने चुनौती की तरह लिया और हिन्दू शास्त्रों का गहरा अध्ययन करना आरम्भ कर दिया। डॉ॰ राधाकृष्णन यह जानना चाहते थे कि वस्तुतः किस संस्कृति के विचारों में चेतनता है और किस संस्कृति के विचारों में जड़ता है? तब स्वाभाविक अंतर्प्रज्ञा द्वारा इस बात पर दृढ़ता से विश्वास करना आरम्भ कर दिया कि भारत के दूरस्थ स्थानों पर रहने वाले ग़रीब तथा अनपढ़ व्यक्ति भी प्राचीन सत्य को जानते थे। इस कारण राधाकृष्णन ने तुलनात्मक रूप से यह जान लिया कि भारतीय आध्यात्म काफ़ी समृद्ध है और क्रिश्चियन मिशनरियों द्वारा हिन्दुत्व की आलोचनाएँ निराधार हैं।

  • ब्रिटेन के एडिनबरा विश्वविद्यालय में दिये अपने भाषण में डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था- “मानव को एक होना चाहिए। मानव इतिहास का संपूर्ण लक्ष्य मानव जाति की मुक्ति तभी सम्भव है जब देशों की नीतियों का आधार पूरे विश्व में शान्ति की स्थापना का प्रयत्न हो।” डॉ॰ राधाकृष्णन अपनी बुद्धि से परिपूर्ण व्याख्याओं, आनन्ददायी अभिव्यक्तियों और हल्की गुदगुदाने वाली कहानियों से छात्रों को मन्त्रमुग्ध कर देते थे।  दर्शन जैसे गम्भीर विषय को भी वह अपनी शैली से सरल, रोचक और प्रिय बना देते थे।

    अध्यवसायी जीवन

    1909 में 21 वर्ष की उम्र में डॉ॰ राधाकृष्णन ने मद्रास प्रेसिडेंसी कॉलेज में कनिष्ठ व्याख्याता के तौर पर दर्शन शास्त्र पढ़ाना प्रारम्भ किया। यह उनका परम सौभाग्य था कि उनको अपनी प्रकृति के अनुकूल आजीविका प्राप्त हुई थी। यहाँ उन्होंने 7 वर्ष तक न केवल अध्यापन कार्य किया अपितु स्वयं भी भारतीय दर्शन और भारतीय धर्म का गहराई से अध्ययन किया। उन दिनों व्याख्याता के लिये यह आवश्यक था कि अध्यापन हेतु वह शिक्षण का प्रशिक्षण भी प्राप्त करे। इसी कारण 1910 में राधाकृष्णन ने शिक्षण का प्रशिक्षण मद्रास में लेना आरम्भ कर दिया। इस समय इनका वेतन मात्र 37 रुपये था। दर्शन शास्त्र विभाग के तत्कालीन प्रोफ़ेसर राधाकृष्णन के दर्शन शास्त्रीय ज्ञान से काफ़ी अभिभूत हुए। उन्होंने उन्हें दर्शन शास्त्र की कक्षाओं से अनुपस्थित रहने की अनुमति प्रदान कर दी। लेकिन इसके बदले में यह शर्त रखी कि वह उनके स्थान पर दर्शनशास्त्र की कक्षाओं में पढ़ा दें।  1912 में डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की “मनोविज्ञान के आवश्यक तत्व” शीर्षक से एक लघु पुस्तिका भी प्रकाशित हुई जो कक्षा में दिये गये उनके व्याख्यानों का संग्रह था। इस पुस्तिका से उनकी यह योग्यता प्रमाणित हुई कि “प्रत्येक पद की व्याख्या करने के लिये उनके पास शब्दों का अतुल भण्डार तो है ही, उनकी स्मरण शक्ति भी अत्यन्त विलक्षण है।”

    मानद उपाधियाँ

    जब डॉ॰ राधाकृष्णन यूरोप एवं अमेरिका प्रवास से पुनः भारत लौटे तो यहाँ के विभिन्न विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद उपाधियाँ प्रदान कर उनकी विद्वत्ता का सम्मान किया। 1928 की शीत ऋतु में इनकी प्रथम मुलाक़ात पण्डित जवाहर लाल नेहरू से उस समय हुई, जब वह कांग्रेस पार्टी के वार्षिक अधिवेशन में सम्मिलित होने के लिये कलकत्ता आए हुए थे। यद्यपि सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारतीय शैक्षिक सेवा के सदस्य होने के कारण किसी भी राजनीतिक संभाषण में हिस्सेदारी नहीं कर सकते थे, तथापि उन्होंने इस वर्जना की कोई परवाह नहीं की और भाषण दिया। 1929 में इन्हें व्याख्यान देने हेतु ‘मानचेस्टर विश्वविद्यालय’ द्वारा आमन्त्रित किया गया। इन्होंने मानचेस्टर एवं लन्दन में कई व्याख्यान दिये। इनकी शिक्षा सम्बन्धी उपलब्धियों के दायरे में निम्नवत संस्थानिक सेवा कार्यों को देखा जाता है-

    राजनीतिक जीवन

    १९६३ में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी के साथ वार्ता करते हुए डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन
    सर्वपल्ली राधाकृष्णन की यह प्रतिभा थी कि स्वतन्त्रता के बाद इन्हें संविधान निर्मात्री सभा का सदस्य बनाया गया। वे 1947 से 1949 तक इसके सदस्य रहे। इसी समय वे कई विश्वविद्यालयों के चेयरमैन भी नियुक्त किये गये। अखिल भारतीय कांग्रेसजन यह चाहते थे कि सर्वपल्ली राधाकृष्णन गैर राजनीतिक व्यक्ति होते हुए भी संविधान सभा के सदस्य बनाये जायें। जवाहरलाल नेहरू चाहते थे कि राधाकृष्णन के संभाषण एवं वक्तृत्व प्रतिभा का उपयोग 14 - 15 अगस्त 1947 की रात्रि को उस समय किया जाये जब संविधान सभा का ऐतिहासिक सत्र आयोजित हो। राधाकृष्णन को यह निर्देश दिया गया कि वे अपना सम्बोधन रात्रि के ठीक 12 बजे समाप्त करें। क्योंकि उसके पश्चात ही नेहरू जी के नेतृत्व में संवैधानिक संसद द्वारा शपथ ली जानी थी।
    

    राजनयिक कार्य

    सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने ऐसा ही किया और ठीक रात्रि 12 बजे अपने सम्बोधन को विराम दिया। पण्डित नेहरू और राधाकृष्णन के अलावा किसी अन्य को इसकी जानकारी नहीं थी। आज़ादी के बाद उनसे आग्रह किया गया कि वह मातृभूमि की सेवा के लिये विशिष्ट राजदूत के रूप में सोवियत संघ के साथ राजनयिक कार्यों की पूर्ति करें। इस प्रकार विजयलक्ष्मी पंडित का इन्हें नया उत्तराधिकारी चुना गया। पण्डित नेहरू के इस चयन पर कई व्यक्तियों ने आश्चर्य व्यक्त किया कि एक दर्शनशास्त्री को राजनयिक सेवाओं के लिए क्यों चुना गया? उन्हें यह सन्देह था कि डॉक्टर राधाकृष्णन की योग्यताएँ सौंपी गई ज़िम्मेदारी के अनुकूल नहीं हैं। लेकिन बाद में सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने यह साबित कर दिया कि मॉस्को में नियुक्त भारतीय राजनयिकों में वे सबसे बेहतर थे। वे एक गैर परम्परावादी राजनयिक थे। जो मन्त्रणाएँ देर रात्रि होती थीं, वे उनमें रात्रि 10 बजे तक ही भाग लेते थे, क्योंकि उसके बाद उनके शयन का समय हो जाता था। जब राधाकृष्णन एक शिक्षक थे, तब भी वे नियमों के दायरों में नहीं बँधे थे। कक्षा में यह 20 मिनट देरी से आते थे और दस मिनट पूर्व ही चले जाते थे। इनका कहना था कि कक्षा में इन्हें जो व्याख्यान देना होता था, वह 20 मिनट के पर्याप्त समय में सम्पन्न हो जाता था। इसके उपरान्त भी यह विद्यार्थियों के प्रिय एवं आदरणीय शिक्षक बने रहे।

    उपराष्ट्रपति

    1952 में सोवियत संघ से आने के बाद डॉक्टर राधाकृष्णन उपराष्ट्रपति निर्वाचित किये गये। संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति का नया पद सृजित किया गया था। नेहरू जी ने इस पद हेतु राधाकृष्णन का चयन करके पुनः लोगों को चौंका दिया। उन्हें आश्चर्य था कि इस पद के लिए कांग्रेस पार्टी के किसी राजनीतिज्ञ का चुनाव क्यों नहीं किया गया। उपराष्ट्रपति के रूप में राधाकृष्णन ने राज्यसभा में अध्यक्ष का पदभार भी सम्भाला। सन 1952 में वे भारत के उपराष्ट्रपति बनाये गये। बाद में पण्डित नेहरू का यह चयन भी सार्थक सिद्ध हुआ, क्योंकि उपराष्ट्रपति के रूप में एक गैर राजनीतिज्ञ व्यक्ति ने सभी राजनीतिज्ञों को प्रभावित किया। संसद के सभी सदस्यों ने उन्हें उनके कार्य व्यवहार के लिये काफ़ी सराहा। इनकी सदाशयता, दृढ़ता और विनोदी स्वभाव को लोग आज भी याद करते हैं।

    शिक्षक दिवस

    हमारे देश के द्वितीय किंतु अद्वितीय राष्ट्रपति डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिन (5 सितम्बर) को प्रतिवर्ष ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इस दिन समस्त देश में भारत सरकार द्वारा श्रेष्ठ शिक्षकों को पुरस्कार भी प्रदान किया जाता है।

    भारत रत्न

    यद्यपि उन्हें 1931 में ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा “सर” की उपाधि[1] प्रदान की गयी थी लेकिन स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात उसका औचित्य डॉ॰ राधाकृष्णन के लिये समाप्त हो चुका था। जब वे उपराष्ट्रपति बन गये तो स्वतन्त्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद जी ने १९५४ में उन्हें उनकी महान दार्शनिक व शैक्षिक उपलब्धियों के लिये देश का सर्वोच्च अलंकरण भारत रत्न प्रदान किया।

    सर्वपल्ली राधाकृष्णन
    சர்வபள்ளி ராதாகிருஷ்ணன்
    सर्वपल्ली राधाकृष्णन

    कार्यकाल
    १३ मई१९६२ – १३ मई१९६७
    प्रधान  मंत्री गुलजारी लाल नंदा (प्रथम कार्यावधि)
    लाल बहादुर शास्त्री
    गुलजारीलाल नंदा (द्वितीय कार्यावधि)
    पूर्व अधिकारी राजेंद्र प्रसाद
    उत्तराधिकारी डॉ॰ ज़ाकिर हुसैन

    कार्यकाल
    १३ मई१९५२ – १२ मई१९६२
    राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद
    उत्तराधिकारी डॉ॰ ज़ाकिर हुसैन

    जन्म ५ सितम्बर १८८८
    तिरुट्टनीतमिल नाडुभारत
    मृत्यु १७ अप्रैल १९७५ (आयु: ८८ वर्ष)
    चेन्नईतमिल नाडुभारत
    जीवन संगी शिवकामु
    संतान ५ पुत्रियाँ एवं १ पुत्र
    व्यवसाय राजनीतिज्ञ, दार्शनिक, शिक्षाविद, विचारक

    डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन (तमिलசர்வபள்ளி ராதாகிருஷ்ணன்; 5 सितम्बर 1888 – 17 अप्रैल 1975) भारत के प्रथम उप-राष्ट्रपति (1952 – 1962) और द्वितीय राष्ट्रपति रहे। वे भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद, महान दार्शनिक और एक आस्थावान हिन्दू विचारक थे। उनके इन्हीं गुणों के कारण सन् १९५४ में भारत सरकार ने उन्हें सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया था। उनका जन्मदिन (५ सितम्बर) भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है

  • राजनीतिज्ञ एवं साहित्यकार उत्तर प्रदेश एवं हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल रहे विष्णु कांत शास्त्री का 2005 में निधन हुआ।
  • प्रसिद्ध कोलंबियाई उपन्यासकार ग्रैबिएल मार्क़ेज का 2014 को निधन हुआ था।

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