हिंदी व भारतीय भाषाओं के संदर्भ में कह सकते हैं कि हमें वहां विषयवस्तु से भी बढ़कर भाषा का संगीत मिलता है। बिंबों व प्रतीकों के माध्यम से वह हमें ऐसी दृष्टि देती है, जिसका अपना सौंदर्य है। हिंदी सबसे समता रखती है। यही बंधुता उसे बनाए रखेगी।भाषा के प्रवाह को संस्कृति के सम्मान के रूप में लिया जा सकता है। हिंदी व भारतीय भाषाओं को प्राथमिक तौर पर तीन अंतर्निहित अर्थों में ले सकते हैं : आशा, अभिव्यक्ति व प्रवाह। भाषा संस्कृति की मौखिक व लिखित अभिव्यक्ति है। यदि अपनी भाषा में ही अपनी बात कह पाने का सामर्थ्य नहीं आ पाया तो स्वतंत्रता के बाद भी प्रश्नचिह्न बना रहेगा कि स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ क्या? पराधीनता को तोड़ने का एक बड़ा आधार भाषा है, जिसे हम दैनंदिन उपयोग में लाते हैं। भाषा केवल संचरण का हेतु नहीं, आत्मीयता का सेतु भी है। भाषा के माध्यम से सृजन प्रक्रिया, स्रोत एवं संरचना के आधारों का पता चलता है। भारतीय भाषाओं के प्रयोग से रचनात्मक उत्स, कलात्मकत्व, कल्पनाशक्ति और मूल्य हमारी धरती से आते हैं। मानविकी, विज्ञान, अभियंत्रण, चिकित्सा, प्रबंधन, प्रशासन, वित्त, शिक्षा आदि से जुड़े विषयों पर हिंदी और भारतीय भाषाओं में मौलिक विचारों का प्रकाशन आपको दुर्लभ लग सकता है इसलिए हमारी भाषा में साहित्य के अलावा विचार व बहस भी श्रेठ कोटि के आने चाहिए ताकि हमें ज्ञान संपदा मिले व संप्रेषण में अपनी भाषा और अग्रणी हो।

महत्वपूर्ण यह नहीं कि हम अपने विचारों को किसी भी भाषा में व्यक्त कर लें। चुनौती यह है कि जिस भाषा का चयन हम अपनी अभिव्यक्ति के लिए करते हैं, उसके माध्यम से अपने देश की जनता को अपनी प्राकृतिक व सामाजिक परिस्थितियों व समस्त विश्व के संदर्भ में किस तरह परिभाषित करते हैं। हिंदी व भारतीय भाषाओं के संदर्भ में कह सकते हैं कि विषयवस्तु से भी बढ़कर भाषा का संगीत हमें वहां मिलता है। बिंबों और प्रतीकों के माध्यम से वह हमें ऐसी दृष्टि देती है, जिसका अपना सौंदर्य होता है। संस्कृति इतिहास का उत्पाद है और साथ ही इतिहास को व्यक्त करने का माध्यम भी। हमारी अपनी भाषा में स्मृतियां हैं। विश्व की अन्य अनेक भाषाओं से अछूता रहा जाए, यह उचित नहीं। जितनी भाषाएं आएं, श्रेयस्कर हैं। भाषाओं से समृद्ध होना अपने स्व को समृद्ध करना व सामाजिक परिपार्श्व को बेहतरीन बनाना है। सबसे बारीक व सघन अभिव्यक्ति अपनी भाषा में ही संभव है। इसलिए हिंदी का प्रयोग स्मृति का खूबसूरत उपयोग है। हमारे देश की वास्तविक बेचैनी तो भारतीय भाषाओं में ही आ सकती है। भारतीय भाषाओं में ही किसानों की संस्कृति है।

हमारी दुनिया में जर्मनी, जापान, चीन, फ्रांस जैसे कई देश हैं, जो अभिव्यक्ति व शिक्षा दोनों के लिए अपनी भाषा का प्रयोग करते हैं। वे उपनिवेशवादी मानसिकता को सांस्कृतिक रूप से विच्छिन्न् कर चुके हैं। भाषाओं के प्रति वैज्ञानिक सोच यह है कि उनका प्रयोग होते रहने से ही उनकी जीवंतता बनी रहती है। यह अच्छा है कि लोग हिंदी व भारतीय भाषाओं के प्रयोग में रुचि दिखा रहे हैं। देशी व विदेशी यात्राओं में भी वे हिंदी का प्रयोग कर रहे हैं। आवश्यक यह है कि संघ लोक सेवा आयोग, मंत्रालयों, सार्वजनिक स्थलों, विचार-विमर्श के केंद्रों में भी हिंदी का बेहतर प्रयोग हो। केवल अनुवाद व राजभाषा के रूप में हिंदी का विकास उसे सीमित कर देगा। उसमें राष्ट्र के आलोड़न की क्षमता है। इतने सारे अखबार, पत्रिकाएं, चैनल, प्रसार माध्यम हिंदी में हैं। उनका सटीक व ऊर्जापूर्ण इस्तेमाल होना चाहिए। उनसे रोजगार के रास्ते तलाशे जाने चाहिए। भारत में फिल्मों का निर्माण सबसे अधिक हिंदी में ही होता है। किंतु दुर्भाग्य कि इन फिल्मों के फिल्मकार, कलाकार हिंदी का उपयोग कर धन तो अर्जित करते हैं किंतु हिंदी बरतते नहीं। उनका कोई इंटरव्यू ले तो वे चाहेंगे कि अंग्रेजी में हो। भले ही अपनी फिल्मों का प्रचार वे हिंदी में करते हों। इस दोहरेपन से उन्हें मुक्ति पानी होगी। वे दिल से यदि हिंदी व भारतीय भाषाओं को बरतें तो यह भारत की जनता के लिए बड़ा उदाहरण होगा।

हमारी अपनी भाषा में अनुभव, स्मृति व विचार का अमूर्त नृत्य होता है। इसीलिए जब हम हिंदी या भारतीय भाषा का प्रयोग करते हैं तो उसमें आवेगात्मकता व तन्मयता दोनों होती है। सहजवृत्ति के संबंध के साथ-साथ सृजनशीलता व स्वतंत्रता की गतिशीलता वहां होती है। साहित्य के अलावा अन्य विचारपरक अनुशासनों में हिंदी बेहतर हो, उसके प्रयोग के लिए राजनीतिक संकल्पशक्ति हो, उसे द्वितीयक (सेकंडरी) होने का दंश न झेलना पड़े, हिंदी की उपभाषाओं का बराबर विकास हो, उपभाषाएं भी भाषाओं की तरह ही सम्मान की अधिकारिणी बनें तो कोई वजह नहीं कि हिंदी को अपना प्राप्य न मिले।

हिंदी सबसे समता रखती है, यही बंधुता उसे आगे ले जाएगी। सच पूछिए तो हिंदी को पुनर्जागरण की आवश्यकता है, जिसे नई व्यवस्था व जनता मिलकर लाए। सत्ता के संकल्प, भारतीय भाषाओं को सही तरीके से लागू करने के भाव तथा जनता को भारतीय भाषाओं के प्रति स्मृतिशील सम्मति के आधार पर भाषा के नए यथार्थ की रचना हो सकती है। हिंदी को राजभाषा दर्शाते हुए मंत्रालयों में आंकड़ों, संख्याओं व सांख्यिकी से परे जाना चाहिए। उसे वास्तविक शक्तिशालिनी, समन्यवकारिणी व बहुलता को समेटने वाली भाषा की वृहत्तरता को धारण करना उचित होगा। इससे वह इस देश की जनता के अस्तित्व के मर्म तक पहुंचेगी तथा अन्य के साथ संपर्क का बड़ा मंच भी बनी रहेगी। हिंदी व भारतीय भाषाओं को वास्तविक बौद्धिक वातावरण का कारक बनना होगा, जिसमें सामाजिक क्रियाकलाप व अनगढ़ अनुभव शामिल होंगे तथा समकालीन जटिलताओं व परंपरा, दोनों को समाहित करने का यथार्थ। हिंदी में सभी विचार, प्रबंधन, प्रशासन, ज्ञान-विज्ञान समेटने की क्षमता है। उसमें यह भी क्षमता है कि वह आधारहीनता, पराएपन व अलगाव को खत्म कर दे। वह देश को एक करने की क्षमता रखती है।

(लेखक परिचय दास हिंदी-भोजपुरी अकादमी के सचिव रहे हैं। ये उनके निजी विचार हैं)