विश्लेषणः2019 में सपा-बसपा और कांग्रेस को फायदेमंद साबित होगा त्रिकोणीय मुकाबला

ध्रुवीकरण की राजनीति में विपक्षी पार्टियों का एंटी-बीजेपी मोबिलाइजेशन असल में बीजेपी की रणनीति को अधिक सूट करता है. क्योंकि बीजेपी बनाम अन्य की लड़ाई असल में हिंदू बनाम अन्य का चुनाव नजर आने लगता है. ANALYSIS: 2019 में सपा-बसपा और कांग्रेस के लिए ऐसे फायदेमंद साबित होगा त्रिकोणीय मुकाबलामायावती और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी

धुर विरोधी सपा और बसपा ने आगामी लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन का ऐलान कर दिया है लेकिन कांग्रेस इस गठबंधन का हिस्सा नहीं होगी. कांग्रेस नेता पीएल पूनिया ने कहा कि पार्टी लोकसभा चुनाव के लिए यूपी में तैयारी कर रही है, गठबंधन उतना महत्वपूर्ण नहीं है.
हालांकि सपा-बसपा के इस कदम के कई सवाल उठते हैं. उदाहरण के लिए, क्या इससे राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के खिलाफ महागठबंधन को झटका लगेगा? क्या छत्तीसगढ़, राजस्थान और एमपी में कांग्रेस ने यूपी की पार्टियों को उतनी जगह नहीं दी इसलिए सपा-बसपा ने यह कदम उठाया?
इन सवालों के जवाब फूलपुर और गोरखपुर में पिछले साल हुए उपचुनावों के नतीजों और 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन को मिली हार में मिलते हैं.फूलपुर और गोरखपुर के नतीजों में यूपी में एंटी-बीजेपी गठबंधन के लिए एक महत्वपूर्ण सीख छिपी है. यूपी में बिहार जैसा महागठबंधन उतना प्रभावी नहीं होगा. जबकि त्रिकोणीय मुकाबला सपा-बसपा और कांग्रेस को अधिक सूट करता है.
मंडल-कमंडल दौर के बाद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस सिमटकर रह गई है. अच्छे हालात में क्षेत्रीय नेताओं ने जीत दर्ज की, वहीं हालात बिगड़े तो पार्टी के बड़े नेता ही जैसे-तैसे लोकसभा तक पहुंच पाए.यूपी में कांग्रेस का वोट बेस 10 प्रतिशत से भी कम है, उसमें भी ज्यादातर शहरी और उच्च वर्ग के मतदाता शामिल हैं. जबकि सपा-बसपा के पास जाति विशेष के वोट हैं. कांग्रेस यदि एंटी बीजेपी गठबंधन का हिस्सा बनती है तो यह वोट उस गठबंधन की बजाए बीजेपी के खाते में चला जाएगा.
उदाहरण के लिए यदि फूलपुर और गोरखपुर में कांग्रेस ने सपा-बसपा के साथ चुनाव लड़ा होता तो संभावना थी कि कांग्रेस को मिले वोट बीजेपी के खाते में चले जाते.  यानी, यदि फूलपुर में कांग्रेस ने ब्राह्मण उम्मीदवार नहीं उतारा होता तो उनको मिले वोट बीजेपी को आसानी से मिल जाते. गोरखपुर में भी सपा उम्मीदवार को बीजेपी उम्मीदवार की तुलना में जितने मार्जिन से जीत मिली वह कांग्रेस उम्मीदवार को मिले वोट के बराबर थी.2017 के यूपी विधानसभा चुनाव का एनालिसिस बताता है कि सपा ने यदि कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं किया होता तो सपा या बसपा की कुछ सीटें बच सकती थीं.
दूसरी तरफ, ध्रुवीकरण की राजनीति में विपक्षी पार्टियों का एंटी-बीजेपी मोबिलाइजेशन असल में बीजेपी की रणनीति को अधिक सूट करता है. क्योंकि बीजेपी बनाम अन्य की लड़ाई असल में हिंदू बनाम अन्य का चुनाव नजर आने लगता है.फूलपुर और गोरखपुर को लेकर यह कहना मुश्किल है कि गठबंधन से खुद को अलग रखना कांग्रेस की मजबूरी थी या रणनीति.2019 में हो सकता है कि सपा-बसपा 12 सीटों (जहां कांग्रेस मजबूत है) पर ऐसे उम्मीदवार उतारे जो कांग्रेस की रणनीति को सूट करते हैं.

2019 के रण का गेम प्लान, गठबंधन को 20 सीटों से कम पर नहीं मानेगी कांग्रेस

दिल्ली की कुर्सी की रेस में उत्तर प्रदेश कांग्रेस पार्टी की सबसे कमजोर कड़ी है. इसे मजबूत किए बिना कांग्रेस दिल्ली की रेस में शामिल ही नहीं हो सकती.ANALYSIS: 2019 के रण का गेम प्लान, गठबंधन के लिए 20 सीटों से कम पर नहीं मानेगी कांग्रेसराहुल गांधी और सोनिया गांधी

कहते हैं दिल्ली की कुर्सी (केंद्र सरकार) का रास्ता लखनऊ से होकर जाता है, यानी उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटें जिसके साथ हो, दिल्ली की कुर्सी उसकी हो जाती है. साल 2004 के आम चुनाव में जब पूरा देश अटल सरकार की वापसी की उम्मीद लगाए बैठा था. ऐसे में यूपी ने बीजेपी का चुनावी रथ ऐसा रोका कि पार्टी 10 साल तक सत्ता से बाहर रही. फिर जब 2014 में बीजेपी की वापसी हुई, तो भी उत्तर प्रदेश की रास्ते. यहां की 80 सीटों में से 73 सीटें बीजेपी के नाम रही.

ऐसे में दिल्ली की कुर्सी की रेस में शामिल कोई भी राजनीतिक दल उत्तर प्रदेश को नज़रअंदाज करके नहीं चल सकता. दिल्ली की कुर्सी की रेस में उत्तर प्रदेश कांग्रेस पार्टी की सबसे कमजोर कड़ी है. इसे मजबूत किए बिना कांग्रेस दिल्ली की रेस में शामिल ही नहीं हो सकती.कांग्रेस पार्टी को भी इसका अंदाजा है. इसलिए यूपी को लेकर पार्टी का क्या गेम प्लान है, ये अहम सवाल है.
अब तक की चर्चाओं पर गौर करें, तो एसपी-बीएसपी गठबंधन कांग्रेस को रायबरेली और अमेठी छोड़ कोई और सीट देने वाला नहीं है. वहीं, कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस के पास प्लान ए और प्लान बी दोनों तैयार है. यानी गठबंधन का प्लान और बिना गठबंधन चुनाव में जाने का प्लान.

प्लान ए में जहां कांग्रेस गठबंधन में 15-20 सीटें पर मान जाएगी, क्योंकि दिल्ली की लड़ाई में परिणाम के बाद इन दोनों दलों की भूमिका अहम होगी. लेकिन गठबंधन की बात नहीं बनी, तो कांग्रेस ने 20 से 30 ऐसी सीटों की पहचान कर ली है, जहां वह पूरी ताकत से चुनाव लड़ेगी.

सूत्रों की मानें, तो हाईकमान का मानना है कि पार्टी के पास पीएल पुनिया, आरपीएन सिंह, जतिन प्रसाद, प्रदीप जैन, सलमान खुर्शीद, रत्ना सिंह, श्रीप्रकाश जायसवाल, राज बब्बर, प्रमोद कृष्णम जैसे नेताओं का चेहरा है, जिनके चेहरे पर पार्टी चुनाव जीतने का दांव लगा सकती है.
कांग्रेस के रणनीतिकार मानते है कि पार्टी इन चुनावों में गठबंधन नहीं होने की हालात में सभी 80 सीटों पर ताकत लगातर डीफोकस नहीं होना चाहती. जो सीटें कांग्रेस की प्राथमिकता में हैं, उनमें रायबरेली, अमेठी के अलावा सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, धौरहरा, खीरी, गौतमबुद्ध नगर, बाराबंकी, कानपुर, प्रतापगढ़, झांसी, संभल, मुरादाबाद शामिल है.पिछले चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन इन सीटों पर दमदार रहा है. बहरहाल, अब देखना है कि पार्टी का गेम प्लान कितना कारगर साबित होता है.प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर ने मामले पर चुप्पी तोड़ते हुए कहा है कि सपा और बसपा के गठबंधन को लेकर अभी दोनों में से किसी भी पार्टी ने औपचारिक तौर पर ऐलान नहीं किया है. साथ उन्होंने कहा कि कांग्रेस प्रदेश सभी 80 लोकसभा सीटों पर तैयारी करेगी.

राज बब्बर ने कहा कि दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन की बात सिर्फ अफवाह है और कुछ नहीं. उन्होंने कहा, ‘अखिलेश यादव की सरकार को सत्ता से गए कितने साल हो गए हैं. मुझे यकीन है कि इस पर वो अच्छा वक्तव्य देंगे. अभी तक किसी भी स्टेक होल्डर ने सीट शेयरिंग को लेकर कोई बात नहीं कही है. अभी तक जो भी बातें सामने आई हैं वो सिर्फ सूत्रों के हवाले से कही जा रही हैं जो कि पूर्ण रूप से अफवाह हैं.’

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो बीते शुक्रवार को समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती के बीच लंबी बैठक हुई. सूत्रों के मुताबिक इस बैठक में दोनों ने करीब 71 सीटों पर सहमति जताई. सूत्रों के मुताबिक इस बैठक में यह तय हुआ कि सपा प्रदेश की 35 लोकसभा सीटों पर और बसपा 36 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ सकती है. वहीं, राष्ट्रीय लोकदल को 3 सीटें देने और 4 सीटों को रिजर्व रखने की बात तय हुई. यह भी कहा गया कि इस बैठक में दोनों ने अमेठी और रायबरेली से अपने उम्मीदवार न उतारने पर सहमती जताई है. हालांकि, कांग्रेस ने ऐसे किसी भी गठबंधन की आशंका को खारिज कर दिया है और कहा है कि अभी दोनों में से किसी भी पार्टी ने प्रत्यक्ष रूप से गठबंधन और सीट शेयरिंग के फार्मूले की बात नहीं की है.बता दें कि एक दिन पहले राज्यसभा सांसद और समाजवादी पार्टी के महासचिव रामगोपाल यादव ने भी कहा था कि सपा और बसपा के बीच किसी प्रकार के समझौता की उन्हें जानकारी नहीं है. उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं पता कि दोनों नेताओं के बीच बातचीत हुई भी है या नहीं. साथ ही रामगोपाल यादव ने कहा कोई भी घोषणा होगी तो वह मायावती और अखिलेश यादव द्वारा की जाएगी.कांग्रेस प्रवक्ता अखिलेश प्रताप सिंह ने इस मुद्दे पर कहा कि जो भी गठबंधन बनेगा वो बीजेपी के खिलाफ बनेगा, क्योंकि देश परिवर्तन चाहता है. उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने कहा कि सपा और बसपा में गठबंधन  की बेचैनी स्पष्ट हो रही है. उन्होंने याद दिलाया कि 2014 आम चुनाव में मायावती के नेतृत्व में बसपा को एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं हुई थी.उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी भी केवल 5 सीटें जीत पाई थी, जो केवल उनके परिवार के लोगों की ही थी. साथ ही कांग्रेस भी केवल गांधी परिवार वाली दो सीटें ही जीत पाई थी. ऐसी स्थिति में इन सभी दलों में बेचैनी है कि कैसे भी केंद्र की मोदी सरकार को हराया जा सके. लेकिन प्रधानमंत्री के मुकाबले में विपक्ष के पास कोई चेहरा नहीं है. उन्होंने कहा कि विपक्ष के पास न तो नेतृत्व है और न ही नियत है इसलिए यह गठबंधन पूरी तरह से फेल होगा.

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