विपक्ष की आत्महन्ता मुद्रा !

 विपक्षी पार्टियां क्या सचमुच अगले लोकसभा चुनाव तक हाराकिरी कर लेंगी? पहली परीक्षा में विपक्ष के फेल होने से तो कम से कम ऐसा ही लग रहा है। पहली परीक्षा कर्नाटक में थी। विपक्षी पार्टियों को एकजुट होना था। एचडी देवगौड़ा की पार्टी जनता दल एस ने दिल्ली में लगभग हर बार कांग्रेस की बुलाई विपक्षी पार्टियों की बैठक में हिस्सा लिया था। बहुजन समाज पार्टी के नेता भी ज्यादातर मौकों पर विपक्ष के साथ रहे थे। राज्यसभा से मायावती के इस्तीफे के समय पूरा विपक्ष जिस अंदाज में उनके साथ खड़ा हुआ था उससे ऐसा लगने लगा था कि सारी पार्टियां अपने छोटे छोटे हित छोड़ एकजुट होंगी।

परंतु विपक्षी एकता की सैद्धांतिक बातें व्यावहारिक राजनीति धरातल पर नहीं उतर सकीं। कर्नाटक में जेडीएस और बसपा ने तीसरा मोर्चा बना दिया। इन दोनों पार्टियों का गठबंधन राज्य की सभी सीटों पर लड़ेगा। बसपा सिर्फ 20 सीटों पर लड़ेगी और बाकी सीटों पर जेडीएस का उम्मीदवार होगा। इन दोनों पार्टियों का वैचारिक और जातीय समीकरण कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने वाला है। इन दोनों पार्टियों की ओर से वोक्कालिगा, ओबीसी, मुस्लिम और दलित उम्मीदवार ज्यादा संख्या में चुनाव मैदान में उतरेंगे। इसका सीधा नुकसान कांग्रेस को होगा।

कहने को कहा जा सकता है कि गुजरात के चुनाव में भी विपक्षी एकता नहीं बनी थी फिर भी कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया और भाजपा को उसके गढ़ में नाको चने चबवा दिए। पर गुजरात की बात अलग थी। वहां भाजपा के खिलाफ ढाई दशक की एंटी इन्कंबैंसी थी और पटेल आरक्षण आंदोलन की वजह से राज्य का सबसे मजबूत मतदाता वर्ग भाजपा के खिलाफ था। कर्नाटक में ऐसा नहीं है। वहां अगर एंटी इन्कंबैंसी है तो वह कांग्रेस के खिलाफ है। हो सकता है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से भी कुछ नाराजगी हो लेकिन राज्य के चुनाव में मतदान बुनियादी रूप से राज्य के मुद्दों पर ही होगा। वहां गुजरात की तरह मोदी बनाम कांग्रेस का मुकाबला बनाना भी आसान नहीं होगा क्योंकि मुख्यमंत्री सिद्धरमैया और मुख्यमंत्री पद के दावेदार बीएस येदियुरप्पा दोनों बड़े नेता हैं।

कर्नाटक से बाहर अगर दूसरे राज्यों और प्रादेशिक क्षत्रपों की राजनीति को देखें तो आत्महत्या की यह प्रवृत्ति चौतरफा दिखाई दे रही है। मायावती जब कांग्रेस के खिलाफ गठबंधन में शामिल होने के लिए कर्नाटक पहुंच गईं तो इस बात की संभावना कम है कि वे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस गठबंधन में शामिल होंगी। यह हो सकता है कि राज्यसभा की एक सीट और लोकसभा चुनाव में ज्यादा सीटों के लिए दबाव डालने की राजनीति के तहत वे कर्नाटक में कांग्रेस विरोधी मोर्चे में शामिल होने गई हों पर अगर इतने छोटे हित पार्टियां नहीं छोड़ेंगी तो बड़े लक्ष्य की प्राप्ति कैसे होगी?

राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व हथियाने के लिए शरद पवार अलग राजनीति कर रहे हैं और ममता बनर्जी अलग हाथ पैर मार रही हैं। हार्दिक पटेल ने कोलकाता जाकर ममता बनर्जी से मुलाकात की। ममता खुद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के संपर्क में हैं। नवीन पटनायक की राजनीति भाजपा और कांग्रेस से समान दूरी की है तो तमिलनाडु में डीएमके को इस बार अकेले ही जंग जीत लेने का भरोसा है। समाजवादी पार्टी ने अलग ऐलान कर दिया है कि उसका अभी कांग्रेस से तालमेल करने का कोई इरादा नहीं है। वामपंथी पार्टियों में कांग्रेस से तालमेल को लेकर वैचारिक मतभेद हैं। सो, कुल मिला कर भाजपा के विरोध में विपक्ष वैचारिक रूप से और दिल्ली में भले एकजुट दिख रहा है पर चुनावी राजनीति में सबके बीच बड़ी दूरी बनी हुई है।

सवाल है कि क्या कर्नाटक के चुनाव नतीजों से यह दूरी मिटेगी? संभव है कि कर्नाटक के नतीजे विपक्षी एकता के लिए उत्प्रेरक का काम करें। कांग्रेस जीतती है तब भी और हारती है तब भी, दोनों स्थितियों में कर्नाटक के नतीजे का राष्ट्रीय राजनीति पर बड़ा असर होगा। कांग्रेस जीती तो यह अपने आप स्थापित होगा कि वह भाजपा के राष्ट्रीय विकल्प के तौर पर उभर रही है। फिर भाजपा विरोधी पार्टियों को उसके साथ जाने के लिए मजबूर होना होगा।  अगर कांग्रेस हार जाती है तो इस आधार पर आकलन होगा कि जेडीएस और बसपा गठबंधन ने कांग्रेस को हराने में कितनी बड़ी भूमिका निभाई और अगर दोनों साथ होते तो क्या भाजपा को रोका जा सकता था। दोनों स्थितियों में गठबंधन की तस्वीर अलग अलग होगी। कर्नाटक में कांग्रेस हारी तो विपक्ष कांग्रेस के ऊपर हावी होने का प्रयास करेगा। फिर सभी पार्टियां कांग्रेस की बजाय किसी और नेता की कमान में चुनाव लड़ने की मांग करेंगी या बिना प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित किए चुनाव में जाना चाहेंगी। और अगर कांग्रेस जीती तो वह अपनी शर्तों पर तालमेल के लिए दबाव डालेगी। फिर कांग्रेस राहुल गांधी के नाम पर लोकसभा चुनाव लड़ेगी और सीटों के बंटवारे में भी ज्यादा से ज्यादा हिस्सा लेने का प्रयास करेगी। दोनों स्थितियां मजबूत विपक्षी गठबंधन के लिए अनुकूल नहीं होंगी।

विपक्षी गठबंधन इस बात पर भी निर्भर करेगा कि लोकसभा के चुनाव कब होते हैं। अगर अगले साल अप्रैल -मई में चुनाव होता है और उससे पहले इस साल के अंत में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनाव होते हैं तो उनके नतीजों का भी बड़ा असर होगा। इन चुनावों में भी दो स्थितियां बनेंगी या तो कांग्रेस मजबूत होगी या कमजोर होगी। दोनों ही हालात गठबंधन को प्रभावित करेंगे। असल में सभी विपक्षी पार्टियां अपने निजी हित से प्रेरित होकर काम कर रही हैं। जब तक एक साझा हित नहीं बनेगा, जैसा कि बिहार में बना था तब तक मजबूत गठबंधन संभव नहीं होगा।

– अजित द्विवेदी 

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