विपक्षी दलों का पूर्ण गठबंधन दूर की कोडी ?

क्या‍ भविष्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के विरुद्ध संपूर्ण विपक्षी दलों का गठबंधन मूर्त रुप ले सकता है ? यह प्रश्न हाल ही में हुए कुछ महत्वपूर्ण घटनाक्रमों से उपजा है, जिसकी वास्तविकता पर निष्पक्ष विवेचना करना आवश्यक है। गत दिनों मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की केंद्रीय समिति ने अपने नेता सीताराम येचुरी के उस प्रस्ताव को निरस्त कर दिया, जिसमें कांग्रेस से गठबंधन का उल्लेख था। कोलकाता में तीन दिन चले मंथन के बाद यह प्रस्ताव 31 के मुकाबले 55 मतों से खारिज हो गया। मतविभाजन में पार्टी के पूर्व महासचिव प्रकाश करात का गुट कांग्रेस से गठजोड़ के खिलाफ था।

उपरोक्त निर्णय की पृष्ठभूमि में एक फरवरी को संसद परिसर में कांग्रेस सहित 17 विपक्षी दलों की बैठक हुई, जिसका नेतृत्व संप्रग अध्यक्षा सोनिया गांधी कर रही थी। बैठक में उन्होंने देश के सभी विपक्षी दलों से स्थानीय मामलों और मतभेदों को भुलाकर राष्ट्रीय मुद्दों पर एक साथ आने का आह्वान किया। इस बैठक में कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के अतिरिक्त सपा, राकांपा, राजद, रालोद, माकपा, भाकपा, तृणमूल कांग्रेस, जनता दल (एस), नेशनल कॉन्फ्रेंस, केरल कांग्रेस सहित अन्य दलों के प्रतिनिधि उपस्थित थे।

कांग्रेस की छटपटाहट को सहज समझा जा सकता है। मई 2014 के बाद भी भ्रष्टाचार के मामलों से उसका पीछा नहीं छूटा है। जहां नेशनल हेराल्ड घोटाले में स्वयं सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी आरोपी है और लगातार उनकी मुश्किलें बढ़ती जा रही है, वही पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम और उनके बेटे कार्ति पर भी करोड़ों की घूसखोरी के मामले में कानूनी शिकंजा कसता जा रहा है।  अब क्योंकि भ्रष्टाचार विरोधी जांच का दायरा नेहरु-गांधी परिवार तक भी पहुंच चुका है, तो ऐसे में स्वाभाविक है कि कांग्रेस किसी भी सूरत में भाजपा, विशेषकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पिंड छुड़ाना चाहेगी। सोनिया गांधी जिन क्षेत्रीय दलों से एक मंच पर आने की अपील कर रही है, उनमें अधिकतर अपने राजनीतिक स्वार्थ को प्राथमिकता देते रहे है। क्या देश में नकारात्मक राजनीति के बल पर एक व्यक्ति विशेष के विरुद्ध महागठबंधन संभव है? लोकसभा के संदर्भ में उत्तरप्रदेश का विशेष महत्व है, जहां प्रचंड बहुमत वाली भाजपा की योगी आदित्यनाथ सरकार है। कुछ माह पूर्व यहां हुए निकाय चुनावों में भाजपा ने 16 में से 14 नगर निगमों में महापौर के पदों पर विजयी प्राप्त की थी। इस प्रदेश के दो बड़े क्षत्रप- समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी- जातीय राजनीति के पुरोधा है। दोनों ही दल स्पष्ट वोटबैंक के लिए राजनीति करते है।

गत वर्ष हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के सहयोग से चुनाव लड़ा, तो बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अकेले जनता के बीच उतरी- किंतु तीनों को असफलता मिली। संसद परिसर में हुई हालिया विपक्षी दलों की बैठक में बसपा का कोई प्रतिनिधि नहीं पहुंचा, जिसने उत्तरप्रदेश में महागठबंधन के हौव्वे की हवा ही निकाल दी है।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की गणना देश में स्वच्छ राजनीतिक छवि वाले राजनीतिज्ञों में होती है। वर्ष 2015 में मोदी विरोध के नाम पर राजद से उनका गठबंधन किसी दु:स्वप्न से कमतर नहीं था। भ्रष्टाचार के कई मामलों में दोषी करार और जेल में बंद लालू प्रसाद यादव से नीतीश कुमार कोई समझौता करेंगे- इसकी संभावनाएं नीतीश स्वयं ही खारिज कर चुके है।

हाल ही में प.बंगाल में एक विधानसभा और एक लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव के परिणाम से स्पष्ट है कि इस प्रदेश में वामपंथियों और कांग्रेस का दायरा सिकुड़ रहा है। यहां जिन दो सीटों पर चुनाव हुए- उनमें उलुबेड़िया लोकसभा सीट पर तृणमूल कांग्रेस ने कब्जा बरकरार रखा, वहीं उत्तर 24 परगना जिले के नोआपाड़ा विधानसभा सीट उसने कांग्रेस से छीन ली। सबसे महत्वपूर्ण यह रहा कि इन दोनों स्थानों पर भाजपा दूसरे स्थान पर रही, जबकि माकपा तीसरे और कांग्रेस चौथे स्थान पर खिसक गई।

ऐसा नहीं है कि पहली बार भाजपा ने प.बंगाल के चुनावों में दूसरा स्थान प्राप्त किया है। गत वर्ष हुए कांथी विधानसभा उपचुनाव में भाजपा 31 प्रतिशत वोट के साथ दूसरे स्थान पर रही थी। अगस्त 2017 में भी निकाय चुनावों में उसने इसी स्थान को सुरक्षित रखा। 21 दिसंबर 2017 को हुए सबंग विधानसभा उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी को 37 हजार 476 मत मिले थे, जबकि 2016 के विधानसभा चुनाव में उसके उम्मीदवार को केवल 5,610 मत प्राप्त हुए थे- अर्थात् डेढ़ वर्ष में उसी सीट पर लगभग 32 हजार वोटों की वृद्धि।

34 वर्षों तक प.बंगाल पर शासन करने वाले वामपंथियों के प्रति जनता का जुड़ाव सत्ता से दूर होने के सात वर्ष बाद भी नहीं हो सका है- इसका एकमात्र कारण भाजपा का बढ़ता जनाधार है। यदि यह स्थिति आगे भी जारी रही, तो आगामी वर्षों में वामपंथियों का प्रभाव यहां नगण्य हो जाएगा। यहां कांग्रेस पहले से अवसाद की ओर से अग्रसर है। इस स्थिति में तृणमूल, वामपंथी दल और कांग्रेस “मोदी विरोध” के नाम पर एक मंच आना अस्वाभाविक ही लगता है। तृणमूल और वामपंथियों का स्थानीय मुद्दों पर भारी टकराव है। यहां तक उसके कार्यकर्ताओं में आए दिन हिंसक झड़पें में भी होती रहती है। यदि यहां तथाकथित महागठबंधन मूर्त रुप लेता भी है, तो बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच मुख्य विपक्षी दल के रुप में उभरते भाजपा को ही लाभ पहुंचेगा। प.बंगाल में वर्ष 2016 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और वामपंथियों ने तृणमूल के विरुद्ध हाथ मिलाया था, किंतु असफल हुए। यह किसी हास्यास्पद घटना से कम नहीं है कि जब प.बंगाल में गठबंधन की सेज पर कांग्रेस और वामपंथी गलबहियां कर रहे थे, उसी दौरान केरल में विधानसभा चुनाव हो रहे थे और वहां वामपंथी व कांग्रेस एक दूसरे के विरुद्ध चुनावी मैदान में थे।

वर्ष 1957 से केरल में अधिकतर मार्क्सवादियों और कांग्रेस का शासन रहा है। 1981 से इस प्रदेश में बारी-बारी इन दोनों राजनीतिक धड़ों की सरकारें रही है। वर्ष 2016 के विधानसभा चुनाव में वाम गठबंधन एलडीएफ, कांग्रेस नीत यूडीएफ को हटाकर पुन: सत्तारुढ़ हुई। वर्ष 2014 के बाद से केरल में भाजपा का भी जनाधार बढ़ रहा है, जिसे रोकने के लिए हिंसा का सहारा लिया जा रहा है। ऐसे में केरल में कांग्रेस और वामपंथी- जो छह दशकों से पारंपरिक राजनीतिक विरोधी रहे है, उनके एक साथ आने से भाजपा की स्थिति ही मजबूत होगी।

इसी वर्ष 18 फरवरी को 60 सदस्यीय त्रिपुरा विधानसभा के लिए चुनाव होना है। यहां बीते 25 वर्षों से वामपंथियों का शासन है। एक चुनावी सर्वेक्षण के अनुसार, यहां भाजपा-आईपीएफटी गठबंधन सरकार बनाती दिख रही है। सर्वेक्षण में भाजपा नीत गठबंधन को 31 से 37 सीटों का अनुमान लगाया गया है, जबकि वामपंथी धड़े को 23 से 29 सीटें मिलने की भविष्यवाणी की गई है। यह सब एकाएक नहीं हुआ है। यहां गत वर्ष हुए तीन उप-चुनावों में भाजपा दूसरे स्थान पर रही थी, जबकि शहरी-ग्रामीण निकायों में उसने 50 से अधिक सीटें भी जीती थी। यदि भाजपा की त्रिपुरा में विजयी होती है, तो वह देश में उसके शासन वाला 20वां और पूर्वोत्तर भारत में असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और नागालैंड के बाद पांचवा राज्य होगा। राजस्थान के हालिया उप-चुनावों में भाजपा को कांग्रेस के हाथों पराजय झेलनी पड़ी है। स्वाभाविक रुप से कांग्रेस नतीजों से गद-गद है। अब यदि मोदी विरोध के नाम पर महागठबंधन मूर्त रुप लेता भी है, तो इन परिणामों से अति-उत्साहित कांग्रेस अपनी शर्तों पर गठबंधन करना चाहेगी, जो अन्य दलों को स्वीकार्य हो- उसकी संभावना कम ही है।

नकारात्मक राजनीति से अल्पकालिक लाभ तो साधे जा सकते है, किंतु उसकी भी एक सीमा होती है- वर्ष 2015 का बिहार विधानसभा चुनाव इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। यदि देश में विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस को प्रासंगिक रहना तो उसे सकारात्मक राजनीति को प्रोत्साहित करना होगा।

बलबीर पुंज

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