लोकसभा चुनाव में आरक्षण बनाम आरक्षण होगा मुद्दा?

राज्यवार ओबीसी आबादी

मोदी सरकार की मंत्री अनुप्रिया पटेल ने उठाए सवाल- 55 फीसदी आबादी को सिर्फ 27 फीसदी आरक्षण क्यों? जातीय जनगणना की रिपोर्ट सार्वजनिक करने और जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण देने की मांग ने पकड़ा जोर

मोदी सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के लोगों को 10% आरक्षण देने संबंधी 124वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित करवा लिया. इसके साथ ही एक नई बहस शुरू हो गई है. ये बहस है जातीय जनगणना की रिपोर्ट सार्वजनिक कर सबको उनकी आबादी के हिसाब से आरक्षण  देने की. खुद सरकार में मंत्री अनुप्रिया पटेल ने यह मांग उठाई. कुछ दिन पहले एनडीए छोड़कर यूपीए का दामन थामने वाले उपेंद्र कुशवाहा ने भी जातियों की संख्या के हिसाब से आरक्षण मांगा. सियासी जानकारों का कहना है कि मोदी सरकार का यह दांव 2019 के लोकसभा चुनाव का मिजाज बदलेगा. चुनाव में सबसे ऊपर आरक्षण बनाम आरक्षण का का मुद्दा होगा.
राजनीतिक विश्लेषक आलोक भदौरिया का कहना है कि सरकार ने आरक्षण का जिन्न बोतल से निकाल दिया है, अब यह क्या-क्या करेगा कुछ कहा नहीं जा सकता. लेकिन इतना कहा जा सकता है कि इसे वापस बोतल में बंद करना मुश्किल होगा. देखिए अब आरक्षण से जुड़ी किस-किस तरह की मांग होती है, कौन-कौन उठाता है. निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की मांग उठ रही है. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल ये है कि सरकारी नौकरियां कितनी हैं? इस सवाल का जवाब मिले बिना आरक्षण का कोई मतलब नहीं है.         
दिल्ली यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के एसोसिएट प्रोफेसर सुबोध कुमार का कहना है कि आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों को आरक्षण देने के बाद अब सरकार पर जातीय जनगणना की रिपोर्ट सार्वजनिक करने का दबाव बनेगा. ओबीसी समुदाय, जिसे उसकी आबादी के अनुपात में लगभग आधा ही आरक्षण मिला हुआ है वह अब अपने पूरे हक के लिए मांग करने लग गया है. लोकसभा में मुद्दा उठ रहा है.
24 अकबर रोड के लेखक रशीद किदवई कहते हैं कि ओबीसी और दलित समुदाय में ये बेचैनी है कि कहीं आगे चलकर आरक्षण का आधार सामाजिक और शैक्षणिक से हटाकर आर्थिक न कर दिया जाए. गुजरात के विधायक जिग्नेश मेवाणी ने भी ऐसी की आशंका जाहिर करता हुआ एक ट्विट किया है.
बीजेपी के बागी सांसद ने मांगा 100 फीसदी आरक्षण
हरियाणा के कुरुक्षेत्र से बागी भाजपा सांसद राजकुमार सैनी तो काफी पहले से जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण देने की मांग उठा रहे हैं. उनकी मांग जातीय जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक कर 100 फीसदी आरक्षण की है. उन्होंने कहा है कि हर परिवार में एक नौकरी  मिले. जानकारों का कहना है कि आरक्षण पर सहयोगी दलों का परस्पर विरोधी रुख बीजेपी के लिए चुनौती बन सकता है.
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अनुप्रिया का तंज, 50 प्रतिशत का अघोषित आरक्षण था
मंगलवार (8 जनवरी) को अनुप्रिया पटेल ने शुरुआत में इस बिल पर सरकार का समर्थन किया. लेकिन अगले ही पल उन्होंने तंज भी कसना शुरू कर दिया. कहा कि 50 प्रतिशत का अनारक्षित हिस्‍सा असल में एक तरह का अघोषित आरक्षण हुआ करता था, जो केवल सामान्य वर्ग के लिए हुआ करता था. अब उस आरक्षण में भी गरीब को हिस्‍सेदारी मिलेगी. उन्होंने सवाल किया कि क्या ओबीसी के जातिगत जनगणना के आंकड़े आने के बाद पिछड़ों को आबादी के अनुपात में आरक्षण मिलेगा?
पटेल ने इस पर चिंता जाहिर की कि कि पिछड़ों की आबादी 55 प्रतिशत है, लेकिन उन्‍हें केवल 27 फीसदी आरक्षण ही दिया गया है. कई ऐसे राज्य हैं जहां पिछड़ों को मिलने वाला आरक्षण पूरी तरह से लागू नहीं हुआ है. मध्‍य प्रदेश में ओबीसी को 27 की जगह‍ 14 फीसदी आरक्षण ही मिल रहा है. उन्होंने सरकार से पूछा कि जिन राज्यों में आबादी के अनुपात में आरक्षण नहीं है, क्या उसको लेकर सरकार कोई प्रावधान नहीं करेगी? क्‍या प्राइवेट सेक्‍टर में भी आरक्षण दिया जाएगा?
‘जातीय जनगणना की रिपोर्ट प्रकाशित होनी चाहिए’
राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने लोकसभा में कहा, संविधान में 50 फीसदी आरक्षण का जो बैरियर है उसे तोड़ा जाना चाहिए. कहा कि जातीय जनगणना, सामाजिक जनगणना और आर्थिक जनगणना हुई है उसकी रिपोर्ट प्रकाशित होनी चाहिए. ओबीसी की जितनी संख्या है उसके अनुपात में जितना आरक्षण मिलना चाहिए वो देना चाहिए. कुशवाहा ने कहा कि उनके क्षेत्र के सवर्ण युवक उन्हें आरक्षण वाला मंत्री कहते थे.
समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेंद्र यादव ने कहा कि सरकार को सभी पदों पर असमानता दूर करने की आवश्यकता है. आबादी के हिसाब से समाज के सभी वर्गों को आरक्षण की जरूरत है.

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85 फीसदी के लिए 90 फीसदी हो आरक्षण
आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने केंद्र सरकार द्वारा सवर्ण वर्ग को दस फीसदी आरक्षण देने के निर्णय पर मांग की कि पहले केंद्र जातीय-आर्थिक जनगणना की रिपोर्ट को जारी करे, ताकि यह पता तो चले कि 51 फीसदी मजदूर किस जाति के हैं?  उन्होंने कहा कि जब 15 फीसदी सवर्ण को 10 फीसदी आरक्षण देने का निर्णय लिया गया है तो 85 फीसदी दलित-शोषित एवं पिछड़ों के लिए 90 फीसदी आरक्षण भी देना चाहिए.
मायावती का स्टैंड
बसपा सुप्रीमो ने गरीब सवर्णों को आरक्षण देने के फैसले का समर्थन किया है लेकिन ये भी कहा है कि देश में अभी तक SC/ST, OBC को जो 49.5 फीसदी आरक्षण मिलता है उसकी समीक्षा करने की आवश्यकता है. तर्क दिया है कि लगातार जनसंख्या बढ़ रही है ऐसे में जातियों का अनुपात भी बढ़ रहा है, इसलिए समीक्षा की जरूरत है. बढ़ी हुई आबादी के आधार पर ही आरक्षण का अनुपात भी बढ़ना चाहिए, इसके लिए नई संवैधानिक व्यवस्था लागू की जानी चाहिए.

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