लेफ्ट के कंधों पर सवार हो उभरी भाजपा बंगाल में ?

पश्चिम बंगाल: ममता बनर्जी के पतन का आकलन कितना सही

ममता बनर्जी की रैली

कोलकाता के कॉलेज स्ट्रीट के मशहूर ‘कॉफ़ी हाउस’ में आज कोई टेबल खाली नहीं है. ये ‘कॉफ़ी हाउस’ कोलकाता के उन अड्डों में से है जहां शहर भर के बुद्धिजीवी जमा होते हैं. यहाँ स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर लोग चर्चा करते सुने जा सकते हैं.चाहे वो लातिन अमरीका की राजनीति हो या उत्तर कोरिया मसला- तमाम अंतरराष्ट्रीय विषयों पर भी यहां चर्चाएं होती हैं. और जब बात आती है बंगाल के लोक सभा के परिणामों की तो कल्पना की जा सकती है की कॉफ़ी हाउस का माहौल कैसा हो सकता है.मेरी बग़ल की टेबल पर शहर के बुद्धिजीवियों का एक समूह ज़ोर ज़ोर से बहस कर रहा है. ये सब वरिष्ठ नागरिक हैं जिनका यही अड्डा है.कुछ ही पल में उनकी चर्चा में मैं भी शामिल हो गया.

भाजपा और बेहतर करती अगर…

इन बुद्धिजीवियों से बातें करते हुए इतना तो समझ में आया कि भारतीय जनता पार्टी का प्रदर्शन और भी बेहतर हो सकता था क्योंकि प्रचार के आख़िरी क्षणों में भाजपा अध्यक्ष की रैली के बाद विद्यासागर कॉलेज में हुई हिंसा ने कुछ सीटों को प्रभावित किया.भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाकों में जिस तरह से सीटें जीतीं, कोलकाता शहर में उसे वैसी कामयाबी नहीं मिल पायी.एक प्रकाशन समूह के मालिक हेबेन पात्रो का कहना है कि कालेज में जिस तरह ईश्वर चन्द्र विद्यासागर की मूर्ति तोड़े जाने की घटना हुई उससे भारतीय जनता पार्टी को कोलकाता की कई सीटों पर नुक़सान का सामना करना पड़ा.

टीएमसी

घटना के बाद तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस घटना को बंगाली स्वाभिमान से जोड़ दिया.इसका नतीजा ये हुआ कि तृणमूल कांग्रेस के सुदीप बंदोपाध्याय ने उत्तरी कोलकाता, माला रॉय ने दक्षिणी कोलकाता, अभिनेत्री मिमी चक्रवर्ती ने जादवपुर, सौगत रॉय ने दमदम, काकोली दस्तीदार ने बारासात और ममता बनर्जी के विवादों में घिरे भतीजे अभिषेक बनर्जी ने ‘डायमंड-हारबर’ सीटों पर अपनी अपनी जीत दर्ज कराई.यानी वह मानते हैं कि विद्यासागर कॉलेज की घटना अगर नहीं होती तो भारतीय जनता पार्टी को और ज़्यादा सीटें मिलतीं.भारतीय जनता पार्टी के नेता भी इस बात को स्वीकार करते हैं. पार्टी ऑफिस में मौजूद एक नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि अगर ये घटना नहीं होती तो कोलकाता में भी उन्हें कई सीटों पर कामयाबी मिलती.

विधानसभा चुनाव में बेहतर की उम्मीद

हालांकि भाजपा नेता शिशिर बाजोरिया ईश्वर चन्द्र विद्यासागर की मूर्ति तोड़ने की घटना का इल्ज़ाम तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर ही लगाते हैं.वो कहते हैं कि भले ही लोकसभा चुनावों में भाजपा ने कोलकाता शहर में उतना बेहतर प्रदर्शन न किया हो, मगर आने वाले विधानसभा के चुनावों से पहले तृणमूल कांग्रेस टूट जायेगी और भारतीय जनता पार्टी का वोट शेयर और बढ़ेगा.उन्होंने जीती हुई सीटों का उदारण देते हुए कहा, ”सिर्फ एक संसदीय क्षेत्र में कई विधानसभा की सीटें होती हैं और हमने तो लगभग उतनी सीटों पर अपना दबदबा बना लिया है जितनी सीटों से हमें बहुमत मिल सकता है.”

टीएमसी

तृणमूल नेताओं की चुप्पी

उधर तृणमूल कांग्रेस के दफ्तरों में सन्नाटा पसरा हुआ है. पार्टी के वर्रिष्ठ नेता मीडिया से बात नहीं कर रहे हैं.सब कालीघाट स्थित मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आवास पर मौजूद हैं और खराब प्रदर्शन को लेकर मंथन में जुटे हुए हैं. सौगत रॉय, आम तौर पर बात कर लेते हैं. मगर फ़ोन करने पर उन्होंने बताया कि वो कोई भी बयान नहीं देंगे.राजनीतिक विश्लेषक निर्मल्या मुख़र्जी मानते हैं कि तृणमूल कांग्रेस के राजनीतिक पतन का दौर एक साल पहले हुए पंचायत चुनावों से ही शुरू हो गया था जब पार्टी के कार्यकर्ताओं पर आरोप लगा कि उन्होंने 35 प्रतिशत लोगों को वोट नहीं डालने दिया.वो कहते हैं, “ये 35 प्रतिशत लोग तृणमूल कांग्रेस को सबक़ सिखाने का मौक़ा ढूंढ रहे थे. पंचायत चुनाव राज्य के प्रशानिक अमले की देख रेख में होते हैं जबकि लोकसभा चुनाव सीधे तौर पर भारत के चुनाव आयोग की देखरेख में. इस बार इन 35 प्रतिशत लोगों के वोट ने भाजपा को पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा खिलाड़ी बना दिया.”निर्मल्या मुख़र्जी के अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने बंगाल में अपनी तैयारी कई साल पहले ही शुरू कर दी थी. इसका सीधा लाभ भारतीय जनता पार्टी को उत्तरी बंगाल में मिला. ख़ासतौर पर उन इलाकों में जो बांग्लादेश की सीमा से लगे हुए हैं.

खेमों में बंटी तृणमूल कांग्रेस

विश्लेषकों का मानना है कि वाम मोर्चे की कार्यशैली भी कुछ इसी तरह की थी जिससे उसका पतन हुआ. वाम मोर्चे को ख़त्म करने के लिए तृणमूल कांग्रेस भी उसी रास्ते पर चली, मगर वो अतिवादी रवैया अपनाने लगी.इसको लेकर पार्टी के अंदर कलह भी साफ़ उजागर होने लगी. जानकार बताते हैं कि सिर्फ़ बर्धमान ज़िले में ही तृणमूल कांग्रेस के तीन दफ्तर हैं जो तीन अलग अलग खेमों के नेताओं के हैं.

ममता बनर्जी की रैली

तुषार कांति दास पेशे से व्यवसायी हैं. वो कहते हैं कि तृणमूल कांग्रेस का उदय ही हुआ था ताकि पश्चिम बंगाल के लोगों को कांग्रेस और वाम मोर्चे का विकल्प मिल सके. चूँकि तृणमूल कांग्रेस भी अतिवादी रास्ते पर चल निकली तो भारतीय जनता पार्टी ने खुद को एक विकल्प के रूप में पेश किया.विश्लेषकों का मानना है कि जितनी तेज़ी के साथ तृणमूल कांग्रेस का उदय हुआ था उतनी ही तेज़ी के साथ उसका पतन भी हो सकता है. मगर तृणमूल कांग्रेस के नेता और विधायक दुलाल चन्द्र दास कहते हैं कि सिर्फ लोकसभा के नतीजों के बाद उनकी पार्टी के अस्तित्व को ही नकार देना ग़लत होगा.दास कहते हैं कि इन परिणामों से पार्टी को आत्ममंथन करने का मौक़ा मिला है और वो अपनी कमियों को सुधारकर पहले से भी बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरेगी.उन्होंने आरोप लगाया कि तृणमूल कांग्रेस से राजनीतिक बदला लेने के लिए ही वाम मोर्चे के कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने भाजपा के लिए काम किया. वहीं वाम मोर्चा इन आरोपों को ख़ारिज करता है.

बंगाल में लेफ्ट के कंधों पर सवार होकर उभरती बीजेपी

बांग्ला में एक बहुत पुरानी कहावत हैः

कारू पौष मास, कारू सर्वनाश.

यानी किसी के लिए ख़ुशी का मौक़ा है तो किसी के लिए बर्बादी का.पश्चिम बंगाल में हाल में हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा और सीपीएम के संबंधों पर यह कहावत एकदम सटीक बैठती है. इन चुनावों में पहली बार कभी अपने सबसे मज़बूत गढ़ रहे बंगाल में सीपीएम का खाता तक नहीं खुल सका.लेकिन वाम के समर्थन पर सवार होकर जय श्रीराम का नारा लगाने वाली बीजेपी यहां दो से 18 सीटों तक पहुंच गई है. यह कहना ज़्यादा सही होगा कि बंगाल में भगवा रंग लेफ्ट के लाल रंग के मिश्रण से और चटख़ हो रहा है.अटकलें और आशंकाएं तो पहले से ही जताई जा रही थीं. लेकिन नतीजों ने साफ़ कर दिया है कि तृणमूल कांग्रेस के विकल्प के तौर पर वामपंथी वोटरों ने अबकी भाजपा का जमकर समर्थन किया.यही वजह रही है कि भाजपा को मिले वोट साल 2014 के 17 फीसदी के मुक़ाबले एक झटके में बढ़ कर जहां 40 फीसदी से ऊपर पहुंच गए, वहीं लेफ्ट के वोटों में भी लगभग इतनी ही गिरावट दर्ज की गई. यह समझने के लिए सियासी पंडित होना ज़रूरी नहीं है कि गांव-देहात में सीपीएम समर्थकों ने टूट कर बीजेपी के पक्ष में वोट डाले हैं.

वाम और राम का मेल

लंबे अरसे तक मुख्यमंत्री और बंगाल में लेफ्ट का चेहरा रहे सीपीएम के वरिष्ठ नेता बुद्धदेव भट्टाचार्य ने आख़िरी दौर के मतदान से पहले पार्टी (सीपीएम) के मुखपत्र गणशक्ति को दिए एक इंटरव्यू में वाम और राम के घालमेल के ख़तरे का साफ़ संकेत दिया था.उन्होंने आम लोगों को चेताया था कि टीएमसी के “फ्राइंग पैन” से भाजपा के “फायरप्लेस” में कूदना बेमतलब है. भट्टाचार्य ने राज्य में भाजपा के बढ़ते उभार को ख़तरा बताते हुए कहा था कि टीएमसी से मुक्ति के लिए लोगों को बीजेपी को चुनने की ग़लती नहीं करनी चाहिए.लेकिन उनकी यह चेतावनी ज़रा देरी से आई. तब तक जितना नुक़सान होना था वह हो चुका था. ख़राब स्वास्थ्य की वजह से पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य चुनाव प्रचार से पूरी तरह दूर रहे. लेकिन उनका कहना था, “लोकसभा चुनावों में सीपीएम की असली दुश्मन भाजपा थी, टीएमसी नहीं. टीएमसी से बचने के लिए बीजेपी को समर्थन देना ग़लत है.”साल 1964 में सीपीआई से अलग होकर वजूद में आने के बाद अब तक बंगाल में कभी सीपीएम की ऐसी दुर्गति नहीं हुई थी. बंगाल में लोकसभा चुनावों में बेहतरीन प्रदर्शन की वजह से ही साल 1989, 1996 और 2004 में पार्टी ने केंद्र में सरकार के गठन में अहम भूमिका निभाई थी.साल 2004 में उसे राज्य की 42 में से 26 सीटें मिली थीं. लेकिन टीएमसी के उभार के साथ वर्ष 2009 के बाद उसके पैरों तले की ज़मनीन खिसकने लगी और 34 साल तक बंगाल में एकछत्र राज करने वाली पार्टी को साल 2014 में महज़ दो सीटों से ही संतोष करना पड़ा.

वजह

लेकिन आख़िर लेफ्ट के वोटरों के थोक भाव में भाजपा के ख़ेमे में जाने की क्या वजह रही?राजनीतिक पर्यवेक्षक इसके लिए लेफ्ट की नीतियों और नेतृत्व के अभाव को दोषी ठहराते हैं. दूसरी ओर, आम लोगों के मन में भी इसी वजह से लेफ्ट से दूरी बढ़ती रही.मेदिनीपुर इलाक़े में रहने वाले शैवाल दास (58) का परिवार दशकों से लेफ्ट का कट्टर समर्थक रहा है. लेकिन अबकी उन्होंने बीजेपी को वोट दिया है. लेकिन क्यों? इस सवाल पर दास कहते हैं, “सीपीएम का अब कोई वजूद नहीं है. उसकी रैलियों में 15-20 लोग ही जुटते थे. ऐसी पार्टी को वोट देने से क्या फ़ायदा?.”वे कहते हैं कि ममता पहले से ही हमारी दुश्मन हैं. ऐसे में उस पार्टी का समर्थन करना चाहिए जो उनसे दो-दो हाथ करने में सक्षम हो.महानगर के दमदम इलाक़े में टैक्सी चलाने वाले तड़ित मंडल कहते हैं, “मेरा पूरा परिवार सीपीएम का समर्थक था, लेकिन अब की इसे वोट देने का मतलब अपना वोट बर्बाद करना था. इसीलिए स्थानीय नेताओं ने टीएमसी को हराने के लिए हमसे बीजेपी के पक्ष में मतदान करने को कहा था.”

फिर छाएगा बंगाल पर लाल?

नदिया ज़िले के कल्याणी विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र पढ़ाने वाले सुप्रियो बासु भी कहते हैं, “कई जगह सीपीएम के स्थानीय नेताओं ने आख़िरी मौक़े पर अपने समर्थकों से भाजपा का समर्थन करने की अपील की थी. कोई ठोस नीति नहीं होने और नेतृत्व की भारी कमी ने ही सीपीएम को रसातल में पहुंचा दिया है.”राजनीतिक पर्यवेक्षक विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, “बंगाल में सीपीएम के लिए भाजपा का समर्थन अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है. इससे उसकी बची-खुची साख भी ख़त्म हो गई है.”कभी अपने सबसे मज़बूत लालकिले में ऐसी दुर्गति की कल्पना शायद सीपीएम के स्थानीय नेताओं ने भी नहीं की थी. प्रदेश सीपीएम सचिव सूर्यकांत मिश्र कहते हैं, “हम नतीजों का विश्लेषण करने के साथ ही आत्ममंथन करेंगे. उसके बाद अपनी ग़लतियों को दूर करने की दिशा में ठोस क़दम उठाएँगे.”लेकिन पर्यवेक्षकों के साथ-साथ आम लोग भी मानते हैं कि बंगाल में सीपीएम का सूरज अब ढल चुका है और निकट भविष्य में उसके दोबारा उदय होने की गुंजाइश बेहद क्षीण है.

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