नई दिल्ली। भारत के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में मौजूद उत्तरी सेंटिनल द्वीप, दुनिया के लिए आज भी एक रहस्य है। इसे दुनिया के सबसे खतरनाक टापू में गिना जाता है। कहा जाता है कि आज तक जिस भी बाहरी व्यक्ति ने इस टापू पर पैर रखने का प्रयास किया, वह जिंदा नहीं लौटा। भारत में एंडवेंचर ट्रिप पर आया एक अमेरिकी नागरिक जॉन एलन दिन छह दिन पहले कुछ मछुआरों के साथ दक्षिणी अंडमान के उत्तरी सेंटिनल द्वीप पर गया था। वहां इस खूंखार जनजाति ने तीरों से मारकर उसकी हत्या कर दी थी। इसके बाद से एक बार फिर ये भारतीय द्वीप, दुनिया में चर्चा का विषय बन चुका है।

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो उसका मकसद इन अनजान आदिवासियों के बीच ईसाई धर्म का प्रचार करना था. चाऊ ने दो बार इस द्वीप पर पहुंचने की कोशिश की थी. 14 नवंबर को उनकी पहली कोशिश नाकाम रही थी. इसके बाद 16 नवंबर को वह पूरी तैयारी के साथ वहां पहुंचे लेकिन कहा जा रहा है कि गुस्साए आदिवासियों ने उनको तीरों से छलनी कर दिया और उनकी मौत हो गई. चाऊ इससे पहले 5 बार अंदमान जा चुके थे.

चाऊ सेंटिनेलीज जनजाति के लोगों के साथ मित्रता की कोशिश कर रहे थे

दरअसल 27 वर्षीय जॉन ऐलन चाऊ 7 मछुआरों के साथ बिना इजाजत एडवेंचर ट्रिप पर नॉर्थ सेंटिनल द्वीप पर गए थे. चाऊ सेंटिनेलीज जनजाति के लोगों के साथ दोस्ती करने की कोशिश कर रहे थे लेकिन वहां के लोगों को ये बात समझ नहीं आई और उन लोगों ने उन्हें मार दिया. उनके शव को रेत में ही दफना दिया गया. पुलिस ने 6 मछुआरों और अंदमान निवासी के एस ऐलेक्जेंडर को चाऊ की मदद करने और नियम तोड़ने के लिए गिरफ्तार किया है.

उन्हें फुटबॉल, फिशिंग लाइन और मेडिकल किट भी गिफ्ट किए,पुलिस ने 13 पन्नों का नोट अपने कब्जे में ले लिया है

अंदमान व निकोबार के डीजीपी दीपेंद्र पाठक ने बताया, ‘चाऊ छठी बार पोर्ट ब्लेयर की यात्रा कर रहे थे. उन्होंने मछुआरों को उत्तरी सेंटिनल आइलैंड भेजने में मदद के लिए 25 हजार रुपए दिए थे. मछुआरे 15 नवंबर की रात उन्हें आइलैंड के पश्चिमी सीमा तक एक छोटी नाव से ले गए थे. वहां से अगले दिन चाऊ एक नाव लेकर अकेले ही आइलैंड तक पहुंचे थे. चाऊ अपने दोस्त ऐलेक्जेंडर के यहां पोर्ट ब्लेयर में रह रहे थे और 16 नवंबर को उत्तरी सेंटिनल द्वीप पर गए थे.

आइलैंड में चाऊ ने सेंटिनेलीज के साथ दोस्ती करने की कोशिश की. उन्हें फुटबॉल, फिशिंग लाइन और मेडिकल किट भी गिफ्ट किए. 17 नवंबर को करीब सुबह साढ़े 6 बजे किनारों से लौटकर आए मछुआरों ने पुलिस को बताया कि उन्होंने आदिवासियों को किसी लाश के पास अनुष्ठान करते हुए देखा, जो संभवतया चाऊ की हो सकती है. पुलिस ने 13 पन्नों का नोट अपने कब्जे में ले लिया है जिसे चाऊ ने लिखा था और द्वीप पर जाने से पहले मछुआरों को सौंप दिया था.

मछुआरे पोर्ट ब्लेयर लौटकर आए और ऐलेक्जेंडर को सारी बताई

मछुआरे पोर्ट ब्लेयर लौटकर आए और ऐलेक्जेंडर को सारी बात बताई. इसके बाद ऐलेक्जेंडर ने चाऊ की मां को उसकी हत्या के बारे में बताया. उन्होंने चेन्नई में यूएस वाणिज्य दूतावास में अमेरिकी नागरिक सेवाओं के वाइस कंसुलेट जनरल डेविड एन रॉबर्ट्स को ईमेल लिखा. पाठक ने बताया कि भारतीय तटरक्षक द्वीप के नजदीक पहुंचे और एसपी जतिन नारीवाल ने हवाई सर्वेक्षण भी किया, लेकिन शव को नहीं ढूंढ सके. पुलिस वन और आदिवासी कल्याण विभाग से मदद लेकर प्रयास कर रही है. पुलिस ने मामले में मछुआरे सॉ जंपो, सॉ टैरे, सॉ वाटसन, सॉ मोलियन, एम भूमि, सॉ रेमिस और ऐलेक्जेंडर को आदिवासी जनजातियों (विनियमन) अधिनियम की सुरक्षा का उल्लंघन करने और चाऊ की मौत का कारण बनने के लिए गिरफ्तार किया है.

भारत का नार्थ सेंटीनल आइलैंड इतना खतरनाक है कि इसे मौत का टापू भी कहते हैं। इस टापू पर एक बेहद खतरनाक आदिवासी जनजाति रहती हैं, जिन्हें सेंटिनेलिस कहा जाता है। ये टापू इतना खतरनाक है कि भारत सरकार ने इसे प्रतिबंधित कर रखा है। बंगाल की खाड़ी में चारों तरफ समुद्र से घिरे इस भारतीय टापू का हवाई नजारा बेहद खूबसूरत है। बावजूद यहां जाने के लिए आज तक कोई रास्ता नहीं है। केवल समुद्री मार्ग से ही यहां पहुंच सकते हैं।

पत्थर, तीर और आग के गोलों से करते हैं स्वागत
बताया जाता है कि इस टापू पर एक बेहद खतरनाक जनजाति रहती है, जिसने आधुनिक सभ्यता को पूरी तरह से नकार दिया है। भारत समेत पूरी दुनिया से इनका संपर्क जीरो है। बताया जाता है कि इस समुदाय के लोग, दूसरी दुनिया के लोगों से हमेशा हिंसक तरीके से ही मिले। ये लोग आसमान में नीचे उड़ने वाले हवाई जहाज या हैलिकॉप्टर का स्वागत तीरों, पत्थरों या आग के गोलों से करते हैं।

2006 में मछुआरों की हत्या की थी
ये टापू इतना खतरनाक है कि समुद्र में दूर तक जाने वाले मछुआरे भी इस टापू पर गलती से नहीं आते हैं। खबरों के अनुसार वर्ष 2006 में कुछ मछुआरे इस आइलैंड पर गलती से पहुंच गए थे। उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ी थी। इससे पहले भी ये लोग टापू पर आने वाले कई लोगों के साथ जानलेवा हिंसा कर चुके हैं। काफी साल पहले इस आइलैंड पर एक कैदी जेल से भागकर पहुंच गया था। आदिवासियों ने उसे भी मार दिया था। ये लोग तीर चलाने में माहिर हैं।

लॉस्ट ट्राइब हैं ये
ये जनजाति देश-दुनिया से इस कदर कटी हुई है कि इसके बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं है। किसी को नहीं पता कि इस समुदाय का व्यवहार, रिति-रिवाज, भाषा और रहन-सहन कैसा है। कहा जाता है कि ये जनजाति करीब 60 हजार सालों से यहां रह रही है। इन्हें लॉस्ट ट्राइब यानि ऐसी खोई हुई जनजाति जिसके बारे में किसी को कुछ पता नहीं है। कुछ रिपोर्टों में इसे सबसे अलग-थलग रहने वाली जनजाति करार दिया गया है। इन्हें किसी तरह की दखलअंदाजी पसंद नहीं है और इनका मानव सभ्यता से कोई लेना-देना नहीं है।

भारत सरकार भी यहां हस्तक्षेप की हिम्मत नहीं करती
अब तक जितने भी लोगों ने इन तक पहुंचने का प्रयास किया और इन्हें मुख्य धारा से जोड़ना चाहा, उन्हें भी इन लोगों ने मार दिया। इस टापू पर रहने वाले आदिवासी इतने खतरनाक हैं कि भारत सरकार भी यहां हस्तक्षेप की हिम्मत नहीं जुटा पाती है। 2004 में आयी भयंकर सुनामी के चलते अंडमान द्वीप तबाह हो गए थे। ये द्वीप भी अंडमान द्वीपों की श्रृंखला का एक हिस्सा है। तूफान के तीन दिन बाद भारत सरकार के आदेश पर सेना के एक हेलिकॉप्टर ने इन लोगों की खोज-खबर लेने के लिए आइलैंड के ऊपर उड़ान भरी। जनजाति ने उस पर पत्थर और तीरों की बरसात कर दी।

1991 में भारत सरकार ने किया प्रतिबंधित
1967 से 1991 के बीच भारत सरकार ने यहां के लोगों को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए उनसे संपर्क करने का काफी प्रयास किया। लेकिन टापू के लोगों की आक्रामकता की वजह से वह अपना संदेश वहां नहीं पहुंचा सके। 91 के बाद से भारत की तरह से ऐसा की प्रयास नहीं किया। सरकार ने इस इलाके को एक्सक्लूसन जोन घोषित कर यहां किसी बाहरी शख्स के प्रवेश करने पर प्रतिबंध लगा दिया है। इनकी जनसंख्या कितनी है ये भी किसी को नहीं पता।

खेती नहीं करते, शिकार पर निर्भर
इन्होंने आज तक अपनी जमीन पर किसी बाहरी व्यक्ति को पैर रखने नहीं दिया है। इसलिए उनकी ढंग की फोटो भी उपलब्ध नहीं हैं। इनकी जो भी तस्वीर व वीडियो हैं, वह बहुत दूरी से ली गई हैं। ये दिखते कैसे हैं, ये भी रहस्य बना हुआ है। ये जनजाति इतनी पिछड़ी हुई है कि आज भी इन्हें खेती करना नहीं आता। पूरे इलाके में घने जंगल हैं। इससे अनुमान लगाया जाता है कि यहां के लोग जंगली जानवरों के शिकार और जंगल के फल खाकर पेट भरते हैं।

एक मुसाफिर की नाव पर किया था हमला
1981 में एक मुसाफिर ने इस आइलैंड के बारे में बताया था। वो अपनी नाव पर साथियों के साथ भटकते हुए इस आइलैंड के करीब पहुंच गया था। उन्होंने किनारे पर ट्राइब के कुछ लोगों को तीर कमान व भाले लेकर खड़ा देखा। नजदीक पहुंचते ही उन्होंने हमला शुरू कर दिया। ये लोग तब टापू से कुछ दूरी पर थे, लिहाजा किसी तरह वह वहां से भाग निकले।

सेंटिनेलिस: बाहरी लोगों की दुश्मन जनजाति, देखते ही करते हैं हमला

  • सेंटिनेलिस: बाहरी लोगों की दुश्मन जनजाति, देखते ही करते हैं हमलाअंडमान और निकोबार द्वीप समूह के एक द्वीप पर सेंटिनेलिस जनजाति  बाहरी लोगों के वहां आने या उनसे संपर्क करने का विरोध करती है. जानते हैं कौन होते हैं सेंटिनेलिस और क्या है इनकी कहानी…
  • सेंटिनेलिस: बाहरी लोगों की दुश्मन जनजाति, देखते ही करते हैं हमला
    अभी भी कुछ गिनी चुनी ऐसी आदिम जनजातियां है, जिन्हें अपने जीवन में बाहरी दुनिया का हस्तक्षेप पसंद नहीं है. ऐसी ही एक जनजाति है सेंटिनेलिस. यह जनजाति भारत में अंडमान और निकोबार के उत्तरी सेंटिनल द्वीप में अलग से रहती है और यह उन आखिरी जनजातियों में से एक है, जो बाहरी दुनिया से डिस्कनेक्ट रहती है और वो किसी से संबंध नहीं रखना चाहते.
  • सेंटिनेलिस: बाहरी लोगों की दुश्मन जनजाति, देखते ही करते हैं हमलाइस जनजाति के बहुत कम अवशेष बचे हैं और ऐसा माना जाता है कि वो करीब 60,000 सालों तक द्वीप में रह रहे हैं. इस जनजाति की आबादी 40 से 500 के बीच कहीं भी हो सकती है.
  • सेंटिनेलिस: बाहरी लोगों की दुश्मन जनजाति, देखते ही करते हैं हमलासाल 2011 की जनगणना में 12 पुरुष और तीन महिलाओं सहित द्वीप पर 15 सेंटिनेलिस रिकॉर्ड किए गए हैं. कहा जाता है कि अंडमान का उत्तरी सेंटिनल द्वीप सेंटिनेलिस का गढ़ है, जो एक स्वदेशी जनजाति है.
  • सेंटिनेलिस: बाहरी लोगों की दुश्मन जनजाति, देखते ही करते हैं हमलासेंटिनेलिस को शत्रुतापूर्ण जनजाति माना जाता है और वे शिकारी हैं. ऐसा माना जाता है कि वे अफ्रीका मूल के पहले मनुष्यों के प्रत्यक्ष वंशज हैं.
  • सेंटिनेलिस: बाहरी लोगों की दुश्मन जनजाति, देखते ही करते हैं हमलाभारत सरकार ने 1964 से जनजाति तक पहुंचने के कई प्रयास किए हैं लेकिन उनसे मिल नहीं पाए. वैसे कोई भी अधिकारी द्वीप पर नहीं जाते हैं और इस पर स्थिति के बारे में कुछ नहीं जानते हैं.
  • सेंटिनेलिस: बाहरी लोगों की दुश्मन जनजाति, देखते ही करते हैं हमला2017 में सरकार ने स्पष्ट किया था कि सेंटिनेलियों को आदिवासी जनजाति के रूप में पहचाना जाता है. उन्हें दिखाए जाने वाले वीडियो सोशल मीडिया या इंटरनेट पर अपलोड नहीं किए जा सकते हैं.
  • सेंटिनेलिस: बाहरी लोगों की दुश्मन जनजाति, देखते ही करते हैं हमलाऐसा माना जाता है कि वो किसी भी बाहरी इंसान से संपर्क नहीं रखना चाहते. वो उनके क्षेत्र में किसी की आमद को स्वीकार नहीं करते हैं. भारतीय कानून सेंटिनली लोगों की रक्षा करता है. उनकी संख्या 50 से कम होने का अनुमान है. वे भारतीय मुद्रा का उपयोग भी नहीं करते हैं.
  • सेंटिनेलिस: बाहरी लोगों की दुश्मन जनजाति, देखते ही करते हैं हमलाउन पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है. उनके साथ कोई संपर्क या उनके निवास क्षेत्रों में प्रवेश अवैध घोषित है. सेंटिनली लोगों के वीडियो भी लेना प्रतिबंधित है.

अंडमान निकोबार के आदिवासी समुदाय 

ग्रेट अंडमानी
इनमें यहां पर रहने वाले दस अलग-अलग समुदाय शामिल है। यह अंडमान में रहते हैं। 1788-89 में पहली बार यहां पर अंग्रेजों ने यहां पर इस समुदाय के लोगों की गिनती की थी। उस वक्‍त इनकी संख्‍या करीब 6000-8000 थी। यही वजह थी उस वक्‍त अंग्रेज इस पर अपना अधिपत्‍य हासिल नहीं कर सके थे। लेकिन 1859 में अंग्रेजों ने पोर्ट ब्‍लेयर पर अधिकार प्राप्‍त कर लिया। इस दौरान उनका ग्रेट अंडमानी लोगों से काफी कड़ा संघर्ष चला, जिसको इतिहास में द अबेरदिन वार के नाम से जाना जाता है। 1901 में इनकी संख्‍या 625 थी।

ओंगे
छोटा अंडमान के डूगोंग क्रीक के पास रहने वाली यह जनजाति भी अन्‍य आदिवासी समुदायों की ही तरह जल और जंगल पर टिकी है। इनकी आबादी करीब एक हजार तक है। बदलते दौर में इस समुदाय में भी कुछ बदलाव की झलक देखने को मिली है और यह बाहरी लोगों के लिए खूंखार साबित नहीं होते हैं।

जारवा
इस समुदाय की आबादी करीब 400 तक बताई जाती है। अंडमान द्वीप पर रहने वाली यह जनजाति बाहरी लोगों से बिल्‍कुल कटी हुई रहती है। यह आबादी अपने लिए पूरी तरह से जंगलों और समुद्र पर निर्भर है। यह समुदाय पूरी तरह से नग्‍न रहता है। समुद्र से प्राप्‍त सीपियों और अन्‍य पत्‍थरों से बनी माला इनका आभूषण होती है। पहले ये दक्षिण-पूर्वी अंडमान मे रहते थे लेकिन अंग्रेजों की वजह से यह इस द्वीप के पश्चिम में चले गए थे। 1990 में यहां पर जीटी रोड बनने के बाद कुछ बदलाव जरूर आया है।

सेंटिनेलिस
इन तक पहुंचना लगभग नामुमकिन होता है। इस द्वीप समूह पर रहने वाला यह समुदाय पूरी दुनिया से अलग-थलग रहना पसंद करता है। 1967 में पहली बार सरकार ने इनसे संपर्क साधने की कोशिश की थी। इसके लिए उन्‍हें खाना, नारियल आदि चीजों को देने की कोशिश की गई थी, लेकिन आदिवासियों के नाराज होने की वजह से योजना सफल नहीं हो सकी। इतना ही नहीं वर्ष 2006 में इन लोगों ने दो मछुआरों को इसलिए मार गिराया था क्‍योंकि यह इनके टापू के निकट मछली पकड़ने पहुंचे थे।