मोदी सरकार के एफआरडीआई बिल के भय से खाली हो रहे हैं एटीएम?

नई दिल्ली, 17 अप्रैल ! देश के कई राज्यों में करेंसी संकट की खबरों के बीच रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने माना है कि कुछ राज्यों में यह संकट कैश की कमी के चलते देखने को मिल रहा है. इससे निपटने के लिए रिजर्व बैंक ने अंतरराज्यीय समिति का गठन किया है जो अगले तीन दिन में अन्य राज्यों से कैश संकट वाले राज्यों में कैश पहुंचायेगी. हालांकि आरबीआई की इस दलील के इतर रिजर्व बैंक ऑफिसर कन्फेडरेशन ने दावा किया है कि देश में 30 से 40 फीसदी कैश की कमी है और यह कमी रिजर्व बैंक के लगातार डिजिटल इकोनॉमी का दबाव बनाने से हुई है.अधिकारियों के इस संगठन ने दावा किया है कि देशभर में लोगों में केन्द्र सरकार के प्रस्तावित एफआरडीआई बिल का खौफ है, लिहाजा लोग बैंक में पैसा जमा करने की जगह कैश अपने पास रखने को तरजीह दे रहे हैं. इस संगठन के मुताबिक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया डिजिटल इकोनॉमी बनाने के लिए कैश की राशनिंग कर रहा है जिससे कई राज्यों में कैश का संकट देखने को मिल रहा है.

सर्कुलेशन में 30 से 40 फीसदी करेंसी की कमी 2000 रुपये और 500 रुपये की करेंसी सर्कुलेशन से बाहर जाने के चलते पैदा हुई है. इस तथ्य से यह साफ है कि देशभर में लोगों को बैंकिंग व्यवस्था में संभावित बदलावों का डर पनप रहा है और लोग अधिक से अधिक पैसा बड़ी करेंसी में घर पर रखने को तरजीह दे रहे हैं.

क्या है एफआरडीआई बिल

प्रस्तावित एफआरडीआई बिल के जरिए केन्द्र सरकार सभी वित्तीय संस्थाओं जैसे बैंक, इंश्योरेंस कंपनी और अन्य वित्तीय संगठनों का इंसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी कोड में उचित निराकरण करना चाह रही है. इस बिल को कानून बनाकर केन्द्र सरकार बीमार पड़ी वित्तीय कंपनियों को संकट से उबारने की कोशिश करेगी. इस बिल की जरूरत 2008 के वित्तीय संकट के बाद महसूस की गई जब कई हाई-प्रोफाइल बैंकरप्सी देखने को मिली थी. इसके बाद से केन्द्र सरकार ने जनधन योजना और नोटबंदी जैसे फैसलों से लगातार कोशिश की है कि ज्यादा से ज्यादा लोग बैंकिंग व्यवस्था के दायरे में रहें. इसके चलते यह बेहद जरूरी हो जाता है कि बैंकिंग व्यवस्था में शामिल हो चुके लोगों को बैंक या वित्तीय संस्था के डूबने की स्थिति में अपने पैसों की सुरक्षा की गारंटी रहे.

एफआरडीआई बिल का प्रमुख प्रावधान

इस बिल में एक रेजोल्यूशन कॉरपोरेशन का प्रावधान है जिसे डिपॉजिट इंश्योरेंस और क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन की जगह खड़ा किया जाएगा. यह रेजोल्यूशन कॉरपोरेशन वित्तीय संस्थाओं के स्वास्थ्य की निगरानी करेगा और उनके डूबने की स्थिति में उसे बचाने का प्रयास करेगा. वहीं जब वित्तीय संस्था का डूबना तय रहेगा तो ऐसी स्थिति में उनकी वित्तीय देनदारी का समाधान करेगा. गौरतलब है कि रेजोल्यूशन कॉरपोरेशन का एक अहम काम ग्राहकों को डिपॉजिट इंश्योरेंस देने का भी है हालांकि अभी इस इंश्योरेंस की सीमा निर्धारित नहीं की गई है.

क्यों है एफआरडीआई बिल से डर

एफआरडीआई बिल के जरिए रेजोल्यूशन कॉरपोरेशन को फेल होने वाली संस्था को उबारने के लिए (बेल इन) कदम उठाने का भी अधिकार है. जहां बेल आउट के जरिए सरकार जनता के पैसे को सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था में निवेश करती है जिससे उसे उबारा जा सके वहीं बेल इन के जरिए बैंक ग्राहकों के पैसे से संकट में पड़े बैंक को उबारने का काम किया जाता है. एफआरडीआई बिल के इसी प्रावधान के चलते आम लोगों में डर है कि यदि उनका बैंक विफल होता है तो उन्हें अपनी गाढ़ी कमाई से हाथ धोना पड़ सकता है. गौरतलब है कि मौजूदा प्रावधान के मुताबिक किसी बैंक के डूबने की स्थिति में ग्राहक को उसके खाते में जमा कुल रकम में महज 1 लाख रुपये की गारंटी रहती है और बाकी पैसा लौटाने के लिए बैंक बाध्य नहीं रहते. प्रस्तावित एफआरडीआई बिल में फिलहाल सरकार ने गांरटी की इस रकम पर अभी कोई फैसला नहीं लिया है.

बैंक ग्राहकों के लिए क्या मायने रखता है एफआरडीआई विधेयक

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आदिल शेट्टी, बैंक बाजार 

वित्तीय समाधान और बीमा जमा (एफआरडीआई) विधेयक कई वजहों से चर्चा में है। इस विधेयक में लोगों के मन में तमाम आशंकाएं हैं। इसलिए इसे अच्छी तरह से समझने आवश्यकता है। आज हम आपको एफआरडीआई विधेयक से संबंधित जरूरी जानकारी देने जा रहे हैं।

एफआरडीआई विधेयक है सकारात्मक
फिलहाल, एफआरडीआई विधेयक से डरने की कोई जरूरत नहीं है। विधेयक के मसौदे को पढ़कर यह समझा जा सकता है कि विधेयक वित्तीय संस्थानों के लिए एक जोखिम निगरानी प्रणाली स्थापित करना चाहता है। फिलहाल, रेग्युलेटर्स के लिए वित्तीय संस्थानों का प्रबंधन करने का कोई सिस्टम नहीं है। एफआरडीआई विधेयक के प्रावधानों में वित्तीय संस्थानों के भीतर जोखिम पर लगातार निगरानी रखने की व्यवस्था होगी। यह धीरे-धीरे गंभीर रूप से बीमार संस्थानों को सलूशन की ओर ले जाएगा।

विधेयक से समाधान प्रक्रिया का निर्माण
एफआरडीआई विधेयक में वित्तीय संस्थाओं के भीतर जोखिम को ट्रैक करने के लिए 5 चरण की प्रक्रिया है। जोखिम के स्तर को न्यूनतम, मध्यम, भौतिक, आसन्न, और संकटपूर्ण के रूप में वर्गीकृत किया गया है। दूसरी ओर यह निगम द्वारा एक समाधान संकल्प की स्थापना के लिए अनुमति देता है। इसके अंतर्गत समाधान के लिए 5 विधियां हैं: विलय/ अधिग्रहण, जमानत, अपने एसेट्स का हस्तांतरण और थर्ड पार्टी लायबिलिटी, एसेट्स और लायबिलिटी को कंट्रोल करने के लिए एक कंपनी बनाना और लिक्विडेशन। यह विधेयक का मूल है।

समाधान निगम 
यह संकट में उलझे फर्म के समाधान की देखरेख करेगा। इसमें वित्त मंत्रालय के साथ-साथ सभी वित्तीय नियामकों के सदस्यों और स्वतंत्र निदेशकों द्वारा प्रतिनिधित्व किया जाएगा। इसमें जोखिम के स्तर को वर्गीकृत किया जाएगा।

जमाकर्ताओं के लिए लाभकारी
यह विधेयक का एक पहलू है जिसने लोग सबसे ज्यादा परेशान हैं। जमानत की प्रक्रिया समाधान संकल्प के पांच तरीकों के बीच सूचीबद्ध है। जमानत की प्रक्रिया में, एक संकटग्रस्त कंपनी बाहरी सहायता की तलाश करती है। जमानत में वह कंपनी अपने ऋण को बंद कर सकती है या उधार लेने की शर्तों पर फिर से बातचीत कर सकती है। एक संकटग्रस्त बैंक के मामले में ऋणदाता ही जमाकर्ता होते हैं जिन्होंने इसे अपनी मेहनत से अर्जित धन उन्हें सौंपा है।

अभी तक 1 लाख रुपये तक की जमा राशि जमा बीमा और क्रेडिट गारंटी निगम द्वारा इंश्योर्ड होती है। यह सीमा 1993 में स्थापित की गई थी। एफआरडीआई विधेयक इसके आधुनिकीकरण का प्रयास करता है, जो इसे 2017 में कई स्तरों तक पहुंचाएगा। यह मेजॉरिटी जमाकर्ताओं के लिए सकारात्मक होगा। इसके अतिरिक्त, एफआरडीआई विधेयक, सहमति आधारित प्रक्रिया में जमानत देता है जिसे आपको अपनी राशि जमा करते समय सहमति देने की जरूरत होती है।

एक परिपक्व अर्थव्यवस्था में जरूरी है
पिछले 3 दशकों में भारतीय वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में काफी विकास हुआ है, जहां से निजी क्षेत्र के धुरंधरों के लिए काफी मौके हैं। कई स्टार्टअप भी शुरू हो गए हैं। अधिकांश बड़े बैंक नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स के साथ बैठे रहते हैं, जिससे परेशानी बढ़ जाती है। इसके लिए जोखिमों की बेहतर निगरानी करना जरूरी है। अभी ऐसा कोई सिस्टम मौजूद नहीं है। इसलिए एपआरडीआई इसमें मददगार साबित हो सकता है।

स्मार्ट मनी के विकल्प को करेगा प्रोत्साहित
आपकी बैंक जमा राशि भी खतरे में हो सकती है, आम आदमी को विभिन्न निवेश विकल्पों की तलाश करनी चाहिए। बस सेविंग्स अकाउंट और फिक्स्ड डिपॉजिट्स के माध्यम से ब्याज अर्जित करने के बजाय और अचेछे विकल्पों का चयन कर बचाव किया जा सकता है। म्युचूअल फंड, बॉन्ड, इक्विटी, पीपीएफ, गोल्ड और रियल एस्टेट खरीद सकते हैं।

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बैंकिंग सचिव राजीव कुमार ने कहा है, ”आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और उत्तरी बिहार में मुख्य रूप से दिक्कत थी. हम 500 रूपये के नोट की सप्लाई बढ़ाने जा रहे हैं. कल 86% एटीएम काम कर रहे थे और आज भी 85% एटीएम  काम कर रहे हैं.

क्या है कैश संकट?
आरबीआई और सरकार तर्क दे रहे हैं कि कैश की कमी के पीछे डिमांड बढ़ना है. दरअसल कैश संकट के पीछे व्यापार का बेहद सीधे सा फॉर्मूला ‘डिमांड और सप्लाई’ का खेल है. बैंकों के माध्यम से राज्य सरकार आरबीआई को कैश की डिमांड भेजती है. यहां पर यही फॉर्मूला फेल हो गया, राज्य सरकार ने जितनी डिमांड की उनता कैश उन्हें नहीं दिया गया. इस पर शादियां और त्योहारी सीजन ने भी दिक्कत बढ़ा दी. जिससे एटीएम और बैंकों से अचानक कैश गायब हो गया.

सबसे ज्यादा स्थिति में बिहार में खराब
सबसे ज्यादा चिंताजनक स्थिति बिहार में है. बिहार में एटीएम तो दूर की बात है, बैंकों में ही पैसे नहीं हैं. पैसे के लिए एटीएम और बैंक जा रहे लोगों का कहना है कि पैसे की किल्लत से कई जरूरी काम रुक रहे हैं. बिहार की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राजधानी पटना के सबसे वीआईपी इलाके राजभवन के एटीएम में भी कैश नहीं है. इसी इलाके में राज्यपाल और सीएम नीतीश कुमार का आवास है.

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