महाभारत-2019 / मोदी सरकार, सबसे कठिन रहा अक्टूबर

लोगों की प्रतिक्रियाएं बताती हैं कि प्रधानमंत्री की लोकप्रियता भाजपा की बढ़त है, पर सवाल है कि यह कब तक रहेगी?

  • रफाल सौदे का तूफान, मी टू, सबरीमाला गतिरोध और सीबीआई मसले ने सरकार की छवि को धक्का पहुंचाया है

अकाउंटिंग के क्षेत्र में स्टॉक और फ्लो की दो अवधारणाएं हैं, जिनसे पता चलता है कि फर्म की होल्डिंग (स्टॉक) और उसमें वृद्धि व कमी (फ्लो) क्या है। सी-वोटर ने अक्टूबर 2018 में जब इसे राजनीति पर आजमाया तो पाया कि प्रधानमंत्री और उनकी सरकार के लिए बहुत ऊंचा पॉलिटिकल स्टॉक है लेकिन, नकारात्मक फ्लो भी है, जो खतरे का अंदेशा जता रहा है। मोदी सरकार के 54 महीनों में यह अक्टूबर जनता की धारणा के हिसाब से सबसे खराब माह रहा। रफाल सौदे का राजनीतिक तूफान, मी टू विवाद, सबरीमाला गतिरोध और सीबीआई मसले ने सरकार की छवि को धक्का पहुंचाया है। मोदी सरकार का सबसे मजबूत प्रदर्शन मूल्यवृद्धि, भ्रष्टाचार और सुरक्षा नीति पर केंद्रित रहा है। लेकिन, अक्टूबर 2018 में सरकार को इन तीनों ही मुद्‌दों पर नकारात्मकता देखनी पड़ी। हालांकि, प्रधानमंत्री मोदी और केंद्र सरकार की लोकप्रियता जनवरी-14 के ट्रैकर वेव में यूपीए-2 की संबंधित रेटिंग से काफी आगे है। राहुल गांधी की संभावनाओं में मामूली सुधार हुआ है, पर वह अभी नेतृत्व के मामले में बहुत अंतर के साथ पीछे हैं।
एनडीए-2 की रेटिंग में आई यह कमी निम्नतम स्तर है या विचलन का बिंदु है? 2019 के लिए दौड़ रोचक होती जा रही है। जब पिछले साल की तुलना में उनके जीवनस्तर के बारे में पूछने पर प्रतिक्रिया देने वाले 31.3 फीसदी लोगों ने बताया कि इसका पतन हुआ है। जनवरी 14 के लिए यह आंकड़ा 27 फीसदी रहा था। ‘उम्मीद’ के लिए हमारे संकेतक ने ऐसा ही परिदृश्य पेश किया। प्रतिक्रिया देने वाले 16.8 फीसदी लोग मानते हैं कि अगले साल उनका जीवनस्तर और नीचे आएगा। यह करीब सर्वकालिक अधिकतम है। इसी तरह सिर्फ 47.8 फीसदी लोगों ने अगले साल के लिए उम्मीद जताई है। यह अब तक का निम्नतम प्रतिशत है। जनवरी-14 की लहर की तुलना में संबंधित आंकड़े क्रमश: 7 और 53 फीसदी थे।
प्रतिक्रिया देने वाले लोगों में व्यक्तिगत स्तर पर ‘फील गुड’ फैक्टर में साफ कमी दिखाई दी। पिछला साल रोजगार व आय के स्तर जैसे व्यक्तिगत मानकों के हिसाब से अपेक्षा अनुरूप नहीं था। इससे संकेत मिलता है कि अर्थव्यवस्था के हिसाब से मैदानी स्तर पर कुछ संकट पैदा हो रहा है। हताशाजनक भूतकाल से वाकिफ होने के कारण अगले साल के लिए आशावाद कम है। खास बात यह है कि आशावाद का स्तर उससे भी नीचे है, जो यूपीए-2 के कार्यकाल में जनवरी-14 की लहर के दौरान दर्ज किया गया था। राजनीतिक रूप से यह फिसलनभरा उतार है, क्योंकि व्यक्तिगत स्तर पर जो भी शिकायतें हों वह सामूहिक स्तर पर मूड को आकार देता है और गुस्से को बढ़ा देता है। यदि हम जन-भावनाओं को क्षेत्र वार देखें तो पूर्वी क्षेत्र अन्य तीन क्षेत्रों की तुलना में अधिक आशावादी दिखता है।

मजे की बात है कि दक्षिण क्षेत्र के अलावा भाजपा की कमजोर मौजूदगी के जो दो क्षेत्र हैं, पूर्वी क्षेत्र उनमें से एक है। यदि भाजपा इस सकारात्मक भावना को भुना सके तो यह उत्तर और पश्चिम में सत्ताविरोधी भावनाओं से होने वाले नुकसान को संतुलित कर सकती है। लेकिन, सामूहिक स्तर पर चाहे दिशा वही हो पर यह अधिक संतुलित है। व्यक्तिगत स्तर पर चाहे प्रतिक्रिया देने वालों ने निराशाजनक परिदृश्य खींचा है लेकिन, उन्हें लगता है कि देश कम से कम कुछ तो बेहतर कर रहा है। 51.3 फीसदी लोगों ने कहा कि आज का भारत आगे बढ़ रहा है और उसके साथ वे भी आगे बढ़ रहे हैं। जनवरी 14 में 46 फीसदी लोगों ने यह बात कही थी। लेकिन, इसमें यह सावधानी का पुट जोड़ना होगा कि देश के साथ खुद को खराब स्थिति में देखने वाले जुलाई 14 के बाद पहली बार बढ़कर 23.5 फीसदी हो गए हैं।

बहुत कुछ इस बात पर निर्भर है कि व्यक्तिगत भावनाएं अंतत: सामूहिक स्तर पर कैसा रूप लेती हैं। जहां एनडीए के तहत सितंबर 18 के आशावादी यूपीए-2 जनवरी 14 की तुलना में अधिक हैं पर निराशावादियों का प्रतिशत गहरा रहा है। यह कुछ हद तक सत्ताविरोधी रुख का नतीजा है पर एनडीए के समर्थक इसे संतुलित कर रहे हैं। फिर दो प्रमुख मुद्‌दों में महंगाई की वापसी सत्ता में बैठे नेताओं के लिए नकारात्मक संकेत है। महंगाई वोट घटाने वाला तत्व है। पूर्वी क्षेत्र सर्वाधिक आशावादी है तो दक्षिण क्षेत्र सर्वाधिक निराशावादी पर दोनों क्षेत्रों में भाजपा की न्यूनतम मौजूदगी है।

चुनाव पूर्व यूपीए-2 और एनडीए-2 के खिलाफ लोगों के गुस्से को लेकर तुलना के लिए ज्यादा कुछ नहीं है पर संबंधित प्रधानमंत्रियों के प्रति गुस्सा समान स्तर पर पहुंचने लगा है। सितंबर और अक्टूबर 18 के बीच  केंद्र सरकार के लिए लोगों के गुस्से में बढ़ता ट्रेंड दिखा है। विशिष्ट मुद्‌दों के हिसाब से देखें तो प्राथमिकता में स्पष्ट बदलाव दिखता है। जनवरी 14 में महंगाई 26 फीसदी के साथ सबसे महत्वपू्र्ण मुद्‌दा था। इसके बाद 21 फीसदी के साथ भ्रष्टाचार और 13 फीसदी के साथ बेरोजगारी थी। सितंबर 18 में तो महंगाई शीर्ष दो मुद्‌दों में भी नहीं थी लेकिन, कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने के साथ अक्टूबर 18 में इसका उलटा होता दिखा। अब सबसे ऊपर 20.2 फीसदी के साथ बेरोजगारी फिर 17.3 फीसदी के साथ महंगाई और 10.7 फीसदी के साथ भ्रष्टाचार के मुद्‌दे थे।

प्रधानमंत्री मोदी की ईमानदारी को लोगों ने स्वीकार किया और रफाल सौदे पर विपक्ष द्वारा जरूरत से ज्यादा जोर देना काम नहीं आ रहा है। क्षेत्रवार तीन मुद्‌दे मोटे तौर पर समान ही हैं। जहां पश्चिम व दक्षिण में महंगाई तो उत्तर और पूर्व में बेरोजगारी मुख्य मुद्‌दा होगा। दक्षिण व पश्चिम के औद्योगिकीकृत क्षेत्र ऊर्जा पर अधिक निर्भर अर्थव्यवस्थाएं हैं और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की बढ़ती कीमतों पर सरकार की उदासीन प्रतिक्रिया ने मतदाताओं में प्रतिक्रिया पैदा की है। हालांकि, प्रधानमंत्री मोदी के पक्ष में भावनाएं मजबूत हैं और 53.6 फीसदी लोगों ने उन्हें 2019 में प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे योग्य प्रत्याशी बताया। यह 2017 के 66 फीसदी के सर्वकालिक उच्चांक से कम है।

राहुल गांधी 22.7 फीसदी के साथ पीछे हैं पर यह सितंबर 18 के 18 फीसदी से अधिक है। उनकी लोकप्रियता अभी सर्वकालिक ऊंचाई पर है, जो 2017 में 10 फीसदी के निम्नतम स्तर पर थी। 56% (सितंबर 18 में 60%) मोदी को तो 36 फीसदी (2017 में 26 फीसदी) राहुल को प्रधानमंत्री चुनेंगे। कहानी इसी में छिपी है। प्रधानमंत्री मोदी सबसे कद्‌दावर नेता दिखते हैं और अब तक बिना मुद्‌दे रहे चुनाव में यह भाजपा की असेट है लेकिन, सवाल यह है कि यह कब तक बनी रहेगी?

(ये लेखक यशवंत देशमुखयशवंत देशमुख के अपने विचार हैं)

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