भारोत्तोलक कुंजारानी देवी व मुक्केबाज एमसी मैरीकॉम का जन्म और राष्ट्रकवि सोहन लाल द्विवेदी का निधन हुआ था आज

1 मार्च का इतिहास

1 March History

  • वैज्ञानिक ऑनरी बेकेरल के एक प्रयोग के कारण रेडियोधर्मिता क्या होती है, इसका 1896 में पहली बार पता चला।
  • दुनिया के पहले येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान की 1872 में स्थापना हुई थी।
  • चीन 1914 में यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन का सदस्य बना था।
  • जापानी साम्राज्यवाद के खिलाफ कोरिया में 1919 में आज ही के दिन मार्च के आंदोलन की शुरुआत।
  • ग्रीक ने 1923 से ग्रेगोरीयन कैलेंडर अपनाया।
  • अंतर्राष्ट्रीय निगरानी कोष ने 1947 में कार्य आरंभ किया।
  • अमेरिका ने 1954 में बिकिनी द्वीप-समूह में हाइड्रोजन बम का परीक्षण किया था।
  • ब्रितानी वित्त मंत्री जेम्स कैलाहन ने 1966 में ब्रितानी मुद्रा व्यवस्था में परिवर्तन की घोषणा की।
  • इंटरनेट के सबसे लोकप्रिय सर्च इंजन्स में से एक सर्च इंजन याहू की 1995 में शुरुआत हुई थी।
  • अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश 2006 में राजकीय यात्रा पर भारत पहुँचे।
  • राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने 2009 में चावला को अगले मुख्य चुनाव आयुक्त बनाने की घोषणा की।

1 मार्च को जन्मे व्यक्ति 

  • 1951 में बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री और लोकप्रिय नेता नीतीश कुमार  का जन्म हुआ था।
  • 1968 में भारतीय क्रिकेटर और टीवी अभिनेता सलिल अंकोला का जन्म।
  • 1968 में भारतीय महिला भारोत्तोलक खिलाड़ी कुंजारानी देवी का जन्म।नमेइरक्पम कुंजरानी देवी (जन्म 1 मार्च 1968) भारोत्तोलन में सर्वाधिक पदक जीतने वाली भारतीय महिला खिलाड़ी हैं।1 मार्च 1968 को इम्फाल, मणिपुर के कैरंग मायाई लेकाई में जन्मी कुंजरानी देवी ने 1978 में अपने स्कूल (इम्फाल के सिंदम सिंशांग आवासीय हाई स्कूल) के दिनों से ही खेल में रूचि दिखाना शुरु कर दिया था। इम्फाल के महाराजा बोध चन्द्र कॉलेज से अपनी स्नातक शिक्षा पूर्ण करने के समय तक भारोत्तोलन उनके जीवन का लक्ष्य बन चुका था। वे केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल में शामिल हुईं और वर्तमान में बल के लिए सहायक कमांडेंट के रूप में सेवारत हैं; उन्होंने पुलिस चैंपियनशिप में भी बेहतरीन प्रदर्शन किया और 1996 से 1998 तक भारतीय पुलिस टीम की कप्तानी की।

    खेल इतिहास

    1985 से शुरुआत करके उन्होंने राष्ट्रीय भारोत्तोलन चैंपियनशिप में 44 किलोग्राम, 46 किलोग्राम और 48 किलोग्राम वर्गों में पदक (मुख्यतः स्वर्ण) जीतना आरंभ कर दिया; अंत में 48 किलोग्राम वर्ग को ही उन्होंने अपनी पसंद के वर्ग के रूप में चुना। उन्होंने तिरुवनंतपुरम में 1987 में दो नए राष्ट्रीय रिकार्ड बनाए। अपने वर्ग को 46 किलोग्राम वजन वर्ग में परिवर्तित करके उन्होंने 1994 में पुणे में स्वर्ण पदक जीता, लेकिन चार साल बाद मणिपुर में 48 किलोग्राम वर्ग में प्रतिस्पर्धा करने पर उन्हें रजत पदक से ही संतोष करना पड़ा.

    1989 में मैनचेस्टर में आयोजित विश्व महिला भारोत्तोलन चैम्पियनशिप उनकी प्रथम विश्व चैम्पियनशिप थी और उसमें जीते गए तीन रजत पदकों ने उनका काफी उत्साहवर्धन किया। उसके बाद से उन्होंने लगातार सात बार विश्व चैंपियनशिप में हिस्सा लिया है और 1993 के मेलबोर्न संस्करण के अपवाद के अतिरिक्त उन्होंने प्रत्येक प्रतियोगिता में कोई न कोई पदक अवश्य जीता है। लेकिन वे कभी भी स्वर्ण पदक पर कब्जा नहीं कर पायीं और उन्हें हमेशा रजत पदक से ही संतोष करना पड़ा.

    1990 के बीजिंग और 1994 के हिरोशिमा एशियाई खेलों में वे केवल कांस्य पदक ही हासिल कर पायीं, लेकिन 1198 के बैंकॉक एशियाई खेलों में उन्हें कोई भी पदक हासिल नहीं हुआ।

    एशियाई भारोत्तोलन चैंपियनशिप में उनकी किस्मत ने उनका अधिक साथ दिया और वे नियमित रूप से इसमें हिस्सा लेती आई हैं। शंघाई में 1989 में आयोजित संस्करण में एक रजत और दो कांस्य पदकों के साथ शुरुआत करके, उन्होंने इंडोनेशिया में 1991 में आयोजित संस्करण के 44 किलोग्राम वर्ग में तीन रजत पदकों पर कब्जा किया। उन्होंने उसके बाद 1992 में थाईलैंड और 1993 में चीन में आयोजित प्रतियोगिताओं में अपने दूसरे स्थान को बरकरार रखा। उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दक्षिण कोरिया में 1995 में आयोजित प्रतियोगिता में आया जहां उन्होंने 46 किलोग्राम वर्ग में दो स्वर्ण तथा एक कांस्य पदक पर कब्जा किया। लेकिन 1996 में जापान में आयोजित चैम्पियनशिप में उनके प्रदर्शन में फिर से गिरावट आई और उन्हें दो रजत तथा एक कांस्य पदक से ही संतोष करना पड़ा.

    विवाद

    कुंजरानी देवी 2001 में एनाबोलिक स्टेरॉयड के लिए पोजिटिव पाए जाने के बाद छह माह का निलंबन झेल चुकी हैं।

    सम्मान

    1990 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार प्रदान किया गया था और वर्ष 1996-1997 के लिए राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार को उन्होंने लिएंडर पेस के साथ साझा किया था। उसी वर्ष उन्होंने के.के. बिड़ला खेल पुरस्कार भी जीता।

    वे अब तक पचास से अधिक अंतरराष्ट्रीय पदक जीत चुकी हैं। उन्होंने 2006 में मेलबर्न में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों के महिला भारोत्तोलन मुकाबले के 48 किलोग्राम वर्ग में स्वर्ण पदक जीता था; यह पदक उन्होंने कुल 166 किलो वजन उठाने के एक नए रिकॉर्ड के साथ जीता, जिसमें स्नैच में 72 किलो और क्लीन एंड जर्क में 94 किलो का वजन उठाया जाना शामिल था।कुंजरानी केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) में एक सहायक कमांडेंट के पद पर कार्यरत हैं।

  • 1983 में ओलंपिक और कॉमनवेल्थ गेम्स में महिला मुक्केबाजी के लिए पदक जीतने वाले पहली महिला बॉक्सर एमसी मैरीकॉमसन् २०११ मे नई दिल्ली में मैरी कॉ म 
  • का जन्म हुआ था।मैंगते चंग्नेइजैंग मैरी कॉम (एम सी मैरी कॉम) (जन्मः १ मार्च १९८३) जिन्हें मैरी कॉम के नाम से भी जाना जाता है, एक भारतीय महिला मुक्केबाज हैं। वे मणिपुर, भारत की मूल निवासी हैं। मैरी कॉम छः बार ‍विश्व मुक्केबाजी प्रतियोगिता की विजेता रह चुकी हैं। २०१२ के लंदन ओलम्पिक में उन्होंने काँस्य पदक जीता। 2010 के ऐशियाई खेलों में काँस्य तथा 2014 के एशियाई खेलों में उन्होंने स्वर्ण पदक हासिल किया।दो वर्ष के अध्ययन प्रोत्साहन अवकाश के बाद उन्होंने वापसी करके लगातार चौथी बार विश्व गैर-व्यावसायिक बॉक्सिंग में स्वर्ण जीता। उनकी इस उपलब्धि से प्रभावित होकर एआइबीए ने उन्हें मॅग्नीफ़िसेन्ट मैरी (प्रतापी मैरी) का संबोधन दिया।उनके जीवन पर एक फिल्म भी बनी जिसका प्रदर्शन 2014 में हुआ। इस फिल्म में उनकी भूमिका प्रियंका चोपड़ा ने निभाई।

    प्रारंभिक जीवन और परिवार

    मैरी कॉम का जन्म 1 मार्च 1983 को मणिपुर के चुराचांदपुर जिले में एक गरीब किसान के परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा लोकटक क्रिश्चियन मॉडल स्कूल और सेंट हेवियर स्कूल से पूरी की। आगे की पढाई के लिये वह आदिमजाति हाई स्कूल, इम्फाल गयीं लेकिन परीक्षा में फेल होने के बाद उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और फिर राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय से परीक्षा दी। मैरी कॉम की रुचि बचपन से ही एथ्लेटिक्स में थी।

    उनके मन में बॉक्सिंग का आकर्षण 1999 में उस समय उत्पन्न हुआ जब उन्होंने खुमान लम्पक स्पो‌र्ट्स कॉम्प्लेक्स में कुछ लड़कियों को बॉक्सिंग रिंग में लड़कों के साथ बॉक्सिंग के दांव-पेंच आजमाते देखा। मैरी कॉम बताती है कि

    “मैं वह नजारा देख कर स्तब्ध थी। मुझे लगा कि जब वे लड़कियां बॉक्सिंग कर सकती है तो मैं क्यों नहीं?”

    साथी मणिपुरी बॉक्सर डिंग्को सिंह की सफलता ने भी उन्हें बॉक्सिंग की ओर आकर्षित किया।

    मैरीकॉम की शादी ओन्लर कॉम से हुई है। उनके जुङवाँ बच्चे हैं।

    उपलब्धियाँ व पुरस्कार

    मैरी कॉम ने सन् 2001 में प्रथम बार नेशनल वुमन्स बॉक्सिंग चैंपियनशिप जीती। अब तक वह 10 राष्ट्रीय खिताब जीत चुकी है। बॉक्सिंग में देश का नाम रोशन करने के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2003 में उन्हे अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया एवं वर्ष 2006 में उन्हे पद्मश्री से सम्मानित किया गया। जुलाई 29, 2009 को वे भारत के सर्वोच्च खेल सम्मान राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार के लिए (मुक्केबाज विजेंदर कुमार तथा पहलवान सुशील कुमार के साथ) चुनीं गयीं।.

    मध्यप्रदेश के ग्वालियर में स्त्रीत्व को नई परिभाषा देकर अपने शौर्य बल से नए प्रतिमान गढ़ने वाली विश्व प्रसिद्ध मुक्केबाज श्रीमती एमसी मैरी कॉम 17 जून 2018 को वीरांगना सम्मान से विभूषित किया गया।नई दिल्ली में आयोजित 10 वीं एआईबीए महिला विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप 24 नवंबर, 2018 को उन्होंने 6 विश्व चैंपियनशिप जीतने वाली पहली महिला बनकर इतिहास बनाया

1 मार्च को हुए निधन 

  • 1914 में भारत का वाइसराय तथा गवर्नर-जनरल लॉर्ड मिण्टो द्वितीय का निधन।
  • 1917 में पंजाबी, हिंदी और उर्दू भाषाओं में लिखने वाले प्रसिद्ध साहित्यकार करतार सिंह दुग्गल का निधन।
  • 1989 में भारतीय राजनीतिज्ञ वसन्तदादा पाटिल का निधन।
  • 1988 में हिन्दी के प्रसिद्ध राष्ट्रकवि सोहन लाल द्विवेदी का निधन।सोहन लाल द्विवेदी (22 फरवरी 1906 – 1 मार्च 1988) हिन्दी के प्रसिद्ध कवि थे। ऊर्जा और चेतना से भरपूर रचनाओं के इस रचयिता को राष्ट्रकवि की उपाधि से अलंकृत किया गया। महात्मा गांधी के दर्शन से प्रभावित, द्विवेदी  ने बालोपयोगी रचनाएँ भी लिखीं। 1969 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री उपाधि प्रदान कर सम्मानित किया था।22 फरवरी सन् 1906 को उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले की तहसील बिन्दकी ग्राम सिजौली नामक स्थान पर जन्मे सोहनलाल द्विवेदी हिंदी काव्य-जगत की अमूल्य निधि हैं। उन्होंने हिन्दी में एम.ए. तथा संस्कृत का भी अध्ययन किया। राष्ट्रीयता से संबन्धित कविताएँ लिखने वालो में इनका स्थान मूर्धन्य है। महात्मा गांधी पर आपने कई भाव पूर्ण रचनाएँ लिखी है, जो हिन्दी जगत में अत्यन्त लोकप्रिय हुई हैं। आपने गांधीवाद के भावतत्व को वाणी देने का सार्थक प्रयास किया है तथा अहिंसात्मक क्रान्ति के विद्रोह व सुधारवाद को अत्यन्त सरल सबल और सफल ढंग से काव्य बनाकर ‘जन साहित्य’ बनाने के लिए उसे मर्मस्पर्शी और मनोरम बना दिया है।द्विवेदी जी पर लिखे गए एक लेख में अच्युतानंद मिश्र ने लिखा है-
    “मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, रामधारी सिंह दिनकर, रामवृक्ष बेनीपुरी या सोहनलाल द्विवेदी राष्ट्रीय नवजागरण के उत्प्रेरक ऐसे कवियों के नाम हैं, जिन्होंने अपने संकल्प और चिन्तन, त्याग और बलिदान के सहारे राष्ट्रीयता की अलख जगाकर, अपने पूरे युग को आन्दोलित किया था, गाँधी जी के पीछे देश की तरूणाई को खडा कर दिया था। सोहनलाल उस श्रृंखला की महत्वपूर्ण कड़ी थे।

    डॉ॰ हरिवंशराय ‘बच्चन’ ने एक बार लिखा था-

    जहाँ तक मेरी स्मृति है, जिस कवि को राष्ट्रकवि के नाम से सर्वप्रथम अभिहित किया गया, वे सोहनलाल द्विवेदी थे। गाँधीजी पर केन्द्रित उनका गीत ‘युगावतार’ या उनकी चर्चित कृति ‘भैरवी’ की पंक्ति ‘वन्दना के इन स्वरों में एक स्वर मेरा मिला लो, हो जहाँ बलि शीश अगणित एक सिर मेरा मिला लो’ स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का सबसे अधिक प्रेरणा गीत था।

    अच्युतानंद  ने डांडी यात्रा का उल्लेख करते हुए लिखा है-

    “गाँधी जी ने 12 मार्च 1930 को अपने 76 सत्याग्रही कार्य कर्त्ताओं के साथ साबरमती आश्रम से 200 मील दूर दांडी मार्च किया था। भारत में पद यात्रा, जनसंपर्क और जनजागरण की ऋषि परम्परा मानी जाती है। उस यात्रा पर अंग्रेजी सत्ता को ललकारते हुए सोहनलाल ने कहा था -”या तो भारत होगा स्वतंत्र, कुछ दिवस रात के प्रहरों पर या शव बनकर लहरेगा शरीर, मेरा समुद्र की लहरों पर, हे शहीद, उठने दे अपना फूलों भरा जनाजा। आज दांडी मार्च के उत्सव में सोहनलाल का जिक्र कहीं है?”

    हजारी प्रसाद द्विवेदी, जो कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय में सोहनलाल  के सहपाठी थे, उन्होंने सोहनलाल द्विवेदी  पर एक लेख लिखा था-

    “विश्वविद्यालय के विद्यार्थी समाज में उनकी कविताओं का बड़ा गहरा प्रभाव पडता था। उन्हें गुरूकुल महामना मदनमोहन मालवीय का आशीर्वाद प्राप्त था। अपने साथ स्वतंत्रता संग्राम में जूझने के लिए नवयुवकों की टोली बनाने में वे सदा सफल रहे भाई सोहनलाल ने ठोंकपीट कर मुझे भी कवि बनाने की कोशिश की थी, छात्र कवियों की संस्था ‘सुकवि समाज’ के वे मंत्री थे और मै संयुक्त मंत्री, बहुत जल्दी ही मुझे मालूम हो गया कि यह क्षेत्र मेरा नहीं है, फिर भी उनके प्रेरणादायक पत्र मिलते रहते थे। यह बात शायद वे भी नहीं जानते थे कि ‘हिन्दी साहित्य की भूमिका ‘मैने उन्हीं के उत्साहप्रद पत्रों के कारण लिखी थी।”

    सन् 1941 में देश प्रेम से लबरेज भैरवी, उनकी प्रथम प्रकाशित रचना थी। उनकी महत्वपूर्ण शैली में पूजागीत, युगाधार, विषपान, वासन्ती, चित्रा जैसी अनेक काव्यकृतियाँ सामने आई थी। उनकी बहुमुखी प्रतिभा तो उसी समय सामने आई थी जब 1937 में लखनऊ से उन्होंने दैनिक पत्र ‘अधिकार’ का सम्पादन शूरू किया था। चार वर्ष बाद उन्होंने अवैतनिक सम्पादक के रूप में “बालसखा” का सम्पादन भी किया था। देश में बाल साहित्य के वे महान आचार्य थे।

    1 मार्च 1988 को राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी चिर निद्रा में लीन हो गए।

    रचनाएँ

    उनकी रचनाएँ ओजपूर्ण एवं राष्ट्रीयता की परिचायक हैं। गांधीवाद को अभिव्यक्ति देने के लिए इन्होंने युगावतार, गांधी, खादी गीत, गाँवों में किसान, दांडीयात्रा, त्रिपुरी कांग्रेस, बढ़ो अभय जय जय जय, राष्ट्रीय निशान आदि शीर्ष से लोकप्रिय रचनाओं का सृजन किया है। इसके अतिरिक्त आपने भारत देश, ध्वज, राष्ट्र प्रेम और राष्ट्र नेताओं के विषय की उत्तम कोटि की कविताएँ लिखी है। इन्होंने कई प्रयाण गीत लिखे हैं, जो अनुप्रासयुक्त होने के कारण सामूहिक रूप से गाए जाते हैं।

    प्रमुख रचनाएँ : भैरवी, पूजागीत सेवाग्राम, प्रभाती, युगाधार, कुणाल, चेतना, बाँसुरी, तथा बच्चों के लिए दूधबतासा।

    उनकी ‘भैरवी’ काव्य-संग्रह की प्रथम कविता बहुत लोकप्रिय हुई-

    वन्दना के इन स्वरों में एक स्वर मेरा मिला लो।
    वंदिनी माँ को न भूलो, राग में जब मस्त झूलो॥
    अर्चना के रत्नकण में एक कण मेरा मिला लो।
    जब हृदय का तार बोले, श्रृंखला के बंद खोले॥
    हों जहाँ बलि शीश अगणित, एक शिर मेरा मिला लो।

    महात्मा गांधी ने भारतीय स्वतंत्राता संग्राम के अहिंसात्मक आन्दोलन का सफल और कुशल नेतृत्व किया था। अतः उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को रेखांकित करना स्वाधीनता संघर्ष का वन्दन एवं अभिनन्दन माना गया। अपनी अनेक कविताओं के माध्यम से पं. सोहनलाल द्विवेदी ने गांधीजी के प्रति अपने श्रद्धापूर्ण उद्गार अभिव्यक्त किये हैं। ‘भैरवी’ में संग्रहित ‘युगावतार गांधी’ की निम्नलिखित पंक्तियां उदाहरण स्वरूप उल्लेखनीय हैं:

    चल पड़े जिधर दो डग मग में, चल पड़े कोटि पग उसी ओर।
    पड़ गई जिधर भी एक दृष्टि, गड़ गये कोटि हग उसी ओर॥
    जिसके सिर पर निज धरा हाथ, उसके सिर-रक्षक कोटि हाथ।
    जिस पर निज मस्तक झुका दिया, झुक गये उसी पर कोटि माथ॥
    हे कोटि चरण, हे कोटि बाहु, हे कोटि रूप, हे कोटिनाम।
    तुम एक मूर्ति, प्रतिमूर्ति कोटि, हे कोटि मूर्ति तुझको प्रणाम ॥

    वीर महाराणा प्रताप के सम्बन्ध में रचित उनकी ओजस्वी कविता भी ‘भैरवी’ में संग्रहित है। यह देश-प्रेम और राष्ट्रीयता की भावना से ओत-प्रोत वीर रस की रचना है। विशेष रूप से निम्नलिखित पंक्तियां द्रष्टव्य हैं-

    वैभव से विह्वल महलों को कांटों की कटु झोपड़ियों पर।
    मधु से मतवाली बेलायें भूखी बिलखाती घड़ियों पर॥
    रानी, कुमार-सी निधियों को मां के आंसू की लड़ियों पर।
    तुमने अपने को लुटा दिया आजादी की फुलझड़ियों पर॥

    द्विवेदी जी ने अनेक अभियान गीतों और प्रयाण गीतों का भी सृजन किया। जनता के उद्बोधन में इन प्रयाण गीतों ने महती भूमिका निभाई। कुछ अभियान गीतों की झांकी दृष्टव्य है:

    उठो, बढ़ो आगे, स्वतंत्रता का स्वागत-सम्मान करो।
    वीर सिपाही बन करके बलिवेदी पर प्रस्थान करो॥
    हम मातृभूमि के सैनिक हैं, आजादी के मतवाले हैं।
    बलिवेदी पर हँस-हँस करके, निज शीश चढ़ाने वाले हैं॥
    सन्तान शूरवीरों की हैं, हम दास नहीं कहलायेंगे।
    या तो स्वतन्त्र हो जायेंगे, या रण में मर मिट जायेंगे॥
    हम अमर शहीदों की टोली में, नाम लिखाने वाले हैं।
    हम मातृभूमि के सैनिक हैं, आजादी के मतवाले हैं॥
    x x x
    तैयार रहो मेरे वीरो, फिर टोली सजने वाली है।
    तैयार रहो मेरे शूरो, रणभेरी बजने वाली है॥
    इस बार बढ़ो समरांगण में, लेकर वह मिटने की ज्वाला।
    सागर-तट से आ स्वतन्त्रता, पहना दे तुझको जयमाला॥
    प्रेरणा गीत
    लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती
    कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

    नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है
    चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है
    मन का विश्वास रगों में साहस भरता है
    चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
    आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
    कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

    डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है
    जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है
    मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में
    बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में
    मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती
    कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

    असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो
    क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो
    जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम
    संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम
    कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती
    कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

  • गुजराती भाषा के प्रसिद्ध हास्य लेखक तारक मेहता  का 2017 में 87 वर्ष की आयु में निधन हो गया था।

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