‘भारतीय स्वाधीनता संग्राम’ के पहले बलिदानी तिलका माँझी का जन्म और एकात्म मानववादी प. दीनदयाल उपाध्याय हत्या हुई थी आज

11 फ़रवरी का इतिहास

दोस्तों आज जानते हैं 11 फ़रवरी का इतिहास के कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं के बारें मे, उन लोगों के जन्मदिन के बारे में जिन्होंने दुनिया में आकर बहुत बड़ा नाम किया साथ ही उन मशहूर लोगों के बारें मे जो इस दुनिया से चले गए।

11 February History

  • रोम और इंग्लैंड के बीच 1543 में फ़्रांस के ख़िलाफ़ समझौता हुआ।
  • मुगल बादशाह जहांगीर ने 1613 में ईस्ट इंडिया कंपनी को सूरत में कारखाना लगाने की अनुमति दी।
  • स्वीडेन तथा प्रशिया के बीच 1720 में शांति समझौता।
  • नीदरलैंड के वेनलो पर प्रशिया की सेना ने 1793 में कब्जा किया।
  • रोम पर फ़्रांस ने 1798 में कब्ज़ा किया।
  • यूरोपीय देश नॉर्वे ने 1814 में स्वतंत्रता की घोषणा की।
  • लंदन यूनिवर्सिटी की स्थापना 1826 में ‘यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन’ के नाम से की गई।
  • जापान में मेजी संविधान को 1889 में अंगीकार किया गया।
  • अवध पर ईस्‍ट इंडिया कंपनी ने 1856 में कब्‍जा किया।
  • फ्रेडरिक एबर्ट 1919 में जर्मनी के राष्ट्रपति चुने गये।
  • लैटर्न संधि के तहत 1929 में स्वतंत्र बेटिकन सिटी की स्थापना हुई।
  • महात्मा गांधी जी के हरिजन वीकली का प्रकाशन 1933 में शुरू हुआ था।
  • जर्मन की सेना इटली के अप्रिलिया पर 1944 में दोबारा कब्जा किया।
  • सोवियत संघ ने 1953 में इजरायल के साथ कूटनीतिक संबंध तोड़े।
  • भारत में 1855 में पहली बार अखबारों का प्रकाशन शुरू हुआ।
  • भारतीय क्रिकेटर वीनू माकंड ने 1959 में अपना आखिरी टेस्ट वेस्टइंडीज के खिलाफ दिल्ली में खेला।
  • अमेरिका ने 1963 में इराक की नयी सरकार को मान्यता दी।
  • ताइवान ने फ्रांस के साथ 1964 में कूटनीतिक संबंध तोड़े।
  • तुर्क और ग्रीक के बीच 1964 में जंग की शुरुआत हुई।
  • पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का ताशकंद में निधन 1966 में हुआ।
  • लेखक, जनसंघ संस्‍थापक, पत्रकार पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय की हत्‍या 1968 में की गई थी।
  • दक्षिण अफ्रीका के महान नेता नेल्सन मंडेला को 1990 में 27 साल लंबी कैद से आज ही के दिन में रिहाई मिली थी।
  • अल्जीरिया में सुरक्षा बलों ने 1992 में चार मुस्लिम छापामारों की गिरफ़्तारी के साथ भारी मात्रा में हथियार भी बरामद किए।
  • भारतीय खगोल भौतिकविद जयंत वी नार्लीकर 1996 के यूनेस्को के ‘कलिंग पुरस्कार’ से 1997 में सम्मानित।
  • हिंडाल्को द्वारा अमेरिकी ऐल्यूमिनियम फ़र्म नॉवलिस का 2007 में अधिग्रहण।
  • रुस के प्रधानमंत्री विक्टर जुबकोव 2008 में दो दिवसीय यात्रा पर भारत पहुँचे।
  • असमिया के प्रसिद्ध लेखक डॉ. लक्ष्मी नन्दन बोरा को 2009 में सरस्वती सम्मान देने की घोषणा हुई।

11 फ़रवरी को जन्मे व्यक्ति 

  • 1750 में ‘भारतीय स्वाधीनता संग्राम’ के पहले शहीद तिलका माँझी शहीद तिलका माँझी के लिए इमेज परिणामका जन्‍म हुआ था। तिलका माँझी उर्फ जबरा पहाड़िया (11 फ़रवरी 1750-13 जनवरी 1785) भारत के आदिविद्रोही हैं। दुनिया का पहला आदिविद्रोही रोम के पुरखा आदिवासी लड़ाका स्पार्टाकस को माना जाता है। भारत के औपनिवेशिक युद्धों के इतिहास में जबकि पहला आदिविद्रोही होने का श्रेय पहाड़िया आदिम वनवासी समुदाय के लड़ाकों को माना जाता हैं जिन्होंने राजमहल, झारखंड की पहाड़ियों पर ब्रितानी हुकूमत से लोहा लिया। इन पहाड़िया लड़ाकों में सबसे लोकप्रिय आदिविद्रोही जबरा या जौराह पहाड़िया उर्फ तिलका मांझी हैं।

    परिचय

    जबरा पहाड़िया (तिलका मांझी) भारत में ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देने वाले पहाड़िया समुदाय के वीर वनवासी थे। सिंगारसी पहाड़, पाकुड़ के जबरा पहाड़िया उर्फ तिलका मांझी के बारे में कहा जाता है कि उनका जन्म 11 फ़रवरी 1750 ई. में हुआ था। 1771 से 1784 तक उन्होंने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध लंबी और कभी न समर्पण करने वाली लड़ाई लड़ी और स्थानीय महाजनों-सामंतों व अंग्रेजी शासक की नींद उड़ाए रखा। पहाड़िया लड़ाकों में सरदार रमना अहाड़ी और अमड़ापाड़ा प्रखंड (पाकुड़, संताल परगना) के आमगाछी पहाड़ निवासी करिया पुजहर और सिंगारसी पहाड़ निवासी जबरा पहाड़िया भारत के आदिविद्रोही हैं। इन्होंने 1778 ई. में पहाड़िया सरदारों से मिलकर रामगढ़ कैंप पर कब्जा करने वाले अंग्रेजों को खदेड़ कर कैंप को मुक्त कराया। 1784 में जबरा ने क्लीवलैंड को मार डाला। बाद में आयरकुट के नेतृत्व में जबरा की गुरिल्ला सेना पर जबरदस्त हमला हुआ जिसमें कई लड़ाके मारे गए और जबरा को गिरफ्तार कर लिया गया। कहते हैं उन्हें चार घोड़ों में बांधकर घसीटते हुए भागलपुर लाया गया। पर मीलों घसीटे जाने के बावजूद वह पहाड़िया लड़ाका जीवित था। शहीद तिलका माँझी के लिए इमेज परिणामखून में डूबी उसकी देह तब भी गुस्सैल थी और उसकी लाल-लाल आंखें ब्रितानी राज को डरा रही थी। भय से कांपते हुए अंग्रेजों ने तब भागलपुर के चौराहे पर स्थित एक विशाल वटवृक्ष पर सरेआम लटका कर उनकी जान ले ली। हजारों की भीड़ के सामने जबरा पहाड़िया उर्फ तिलका मांझी हंसते-हंसते फांसी पर झूल गए। तारीख थी संभवतः 13 जनवरी 1785। बाद में आजादी के हजारों लड़ाकों ने जबरा पहाड़िया का अनुसरण किया और फांसी पर चढ़ते हुए जो गीत गाए – हांसी-हांसी चढ़बो फांसी …! – वह आज भी हमें इस आदिविद्रोही की याद दिलाते हैं।

    पहाड़िया समुदाय का यह गुरिल्ला लड़ाका एक ऐसी किंवदंती है जिसके बारे में ऐतिहासिक दस्तावेज सिर्फ नाम भर का उल्लेख करते हैं, पूरा विवरण नहीं देते। लेकिन पहाड़िया समुदाय के पुरखा गीतों और कहानियों में इसकी छापामार जीवनी और कहानियां सदियों बाद भी उसके आदिविद्रोही होने का अकाट्य दावा पेश करती हैं।

    तिलका माँझी उर्फ जबरा पहाड़िया विवाद

    तिलका मांझी संताल थे या पहाड़िया इसे लेकर विवाद है। आम तौर पर तिलका मांझी को मूर्म गोत्र का बताते हुए अनेक लेखकों ने उन्हें संताल आदिवासी बताया है। परंतु तिलका के संताल होने का कोई ऐतिहासिक दस्तावेज और लिखित प्रमाण मौजूद नहीं है। वहीं, ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार संताल वनवासी समुदाय के लोग 1770 के अकाल के कारण 1790 के बाद संताल परगना की तरफ आए और बसे।शहीद तिलका माँझी के लिए इमेज परिणाम

    The Annals of Rural Bengal, Volume 1, 1868 By Sir William Wilson Hunter (page no 219 to 227) में साफ लिखा है कि संताल लोग बीरभूम से आज के सिंहभूम की तरफ निवास करते थे। 1790 के अकाल के समय उनका माइग्रेशन आज के संताल परगना तक हुआ। हंटर ने लिखा है, ‘1792 से संतालों नया इतिहास शुरू होता है’ (पृ. 220)। 1838 तक संताल परगना में संतालों के 40 गांवों के बसने की सूचना हंटर देते हैं जिनमें उनकी कुल आबादी 3000 थी (पृ. 223)। हंटर यह भी बताता है कि 1847 तक मि. वार्ड ने 150 गांवों में करीब एक लाख संतालों को बसाया (पृ. 224)।1910 में प्रकाशित ‘बंगाल डिस्ट्रिक्ट गजेटियर: संताल परगना’, वोल्यूम 13 में एल.एस.एस. ओ मेली ने लिखा है कि जब मि. वार्ड 1827 में दामिने कोह की सीमा का निर्धारण कर रहा था तो उसे संतालों के 3 गांव पतसुंडा में और 27 गांव बरकोप में मिले थे। वार्ड के अनुसार, ‘ये लोग खुद को सांतार कहते हैं जो सिंहभूम और उधर के इलाके के रहने वाले हैं।’ (पृ. 97) दामिनेकोह में संतालों के बसने का प्रामाणिक विवरण बंगाल डिस्ट्रिक्ट गजेटियर: संताल परगना के पृष्ठ 97 से 99 पर उपलब्ध है।शहीद तिलका माँझी के लिए इमेज परिणाम

    इसके अतिरिक्त आर. कार्सटेयर्स जो 1885 से 1898 तक संताल परगना का डिप्टी कमिश्नर रहा था, उसने अपने उपन्यास ‘हाड़मा का गांव’ (Harmawak Ato) की शुरुआत ही पहाड़िया लोगों के इलाके में संतालों के बसने के तथ्य से की है।पूर्वजों के नाम पर बच्चे का नाम रखने की परंपरा अन्य वनवासी समुदायों की तरह संतालों में भी है. लेकिन संतालों में पूर्व में और आज भी किसी व्यक्ति का नाम ‘तिलका’ नहीं मिलता है। लेकिन पहाड़िया समुदाय के लोगों में आज भी ‘जबरा’ नाम रखने का प्रचलन है।शहीद तिलका माँझी के लिए इमेज परिणाम

    अंग्रेजों ने जबरा पहाड़िया को खूंखार डाकू और गुस्सैल (तिलका) मांझी (समुदाय प्रमुख) कहा। संतालों में भी मांझी होते हैं और बड़ी आबादी व 1855 के हूल के कारण वे ज्यादा जाने गए, इसलिए तिलका मांझी उर्फ जबरा पहाड़िया के संताल आदिवासी होने का भ्रम फैला। दरअसल, जबरा प्रत्यक्षतः भागलपुर के तत्कालीन जिला कलेक्टर क्लीवलैंड द्वारा गठित ‘पहाड़िया हिल रेंजर्स’ के सेना नायक के रूप में अंग्रेजी शासन के वफादार बनने का दिखावा करते थे और नाम बदल कर ‘तिलका’ मांझी के रूप में अपने सैंकड़ों लड़ाकों के साथ गुरिल्ला तरीके से अंग्रेज शासक, सामंत और महाजनों के साथ युद्धरत रहते थे। वैसे, पहाड़िया भाषा में ‘तिलका’ का अर्थ है गुस्सैल और लाल-लाल आंखों वाला व्यक्ति। चूंकि वह ग्राम प्रधान था और पहाड़िया समुदाय में ग्राम प्रधान को मांझी कहकर पुकारने की प्रथा है। इसलिए हिल रेंजर्स का सरदार जौराह उर्फ जबरा मांझी तिलका मांझी के नाम से विख्यात हो गए। ब्रिटिशकालीन दस्तावेजों में भी जबरा पहाड़िया मौजूद है पर तिलका का कहीं नामोल्लेख नहीं है।

    साहित्य में जबरा पहाड़िया उर्फ तिलका मांझी

    बांग्ला की सुप्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी ने तिलका मांझी के जीवन और विद्रोह पर बांग्ला भाषा में एक उपन्यास ‘शालगिरर डाके’ की रचना की है। अपने इस उपन्यास में महाश्वेता देवी ने तिलका मांझी को मुर्मू गोत्र का संताल आदिवासी बताया है। यह उपन्यास हिंदी में ‘शालगिरह की पुकार पर’ नाम से अनुवादित और प्रकाशित हुआ है।हिंदी के उपन्यासकार राकेश कुमार सिंह ने जबकि अपने उपन्यास ‘हूल पहाड़िया’ में तिलका मांझी को जबरा पहाड़िया के रूप में चित्रित किया है। ‘हूल पहाड़िया’ उपन्यास 2012 में प्रकाशित हुआ है।तिलका मांझी के नाम पर भागलपुर में तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय नाम से एक शिक्षा का केंद्र स्थापित किया गया है।

  • 1847 में तेज दिमाग के बूते दुनिया को कई नायाब चीजें देने वाले अल्‍वा एडिसन का जन्‍म हुआ था।
  • 1901 में भारतीय क्रांतिकारी दामोदर स्वरूप सेठ का जन्‍म हुआ था।
  • 1917 में भारतीय क्रांतिकारी टी नागि रेड्डी का जन्‍म हुआ था।
  • 1917 में दुनिया में सबसे ज्‍यादा पढ़े जाने लेखकों में से एक सिडनी शेल्‍डन का जन्‍म हुआ था।

11 फ़रवरी को हुए निधन 

  • मुग़ल सम्राट जहाँदारशाह का निधन 1713 में हुआ।
  • प्रसिद्ध समाजसेवी जमनालाल बजाज का निधन 1942 में हुआ।
  • हिन्दी के आरम्भिक उपन्यास लेखकों में से एक हरिकृष्ण ‘जौहर’ का निधन 1945 में हुआ।
  • एकात्म मानववादी राजनीतिज्ञ पण्डित दीनदयाल उपाध्यायPandit Deendayal Upadhyay Statue at Bapat Square (Sukhliya) Indore.jpg का निधन 1968 में हुआ।पण्डित दीनदयाल उपाध्याय ( जन्म: २५ सितम्बर १९१६–११ फ़रवरी १९६८) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चिन्तक और संगठनकर्ता थे। वे [भारतीय जनसंघ] के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने [भारत] की सनातन विचारधारा को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करते हुए देश को एकात्म मानववाद जैसी प्रगतिशील विचारधारा दी।उपाध्यायजी नितान्त सरल और सौम्य स्वभाव के व्यक्ति थे। राजनीति के अतिरिक्त साहित्य में भी उनकी गहरी अभिरुचि थी। उनके हिंदी और अंग्रेजी के लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते थे। केवल एक बैठक में ही उन्होंने चन्द्रगुप्त नाटक लिख डाला था।

    संक्षिप्त जीवनी

    पण्डित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म २५ सितम्बर १९१६ को मथुरा जिले के नगला चन्द्रभान ग्राम में हुआ था | इनके पिता का नाम भगवती प्रसाद उपाध्याय था ये नगला चंदभान( फरह, मथुरा) के निवासी थे | माता रामप्यारी धार्मिक वृत्ति की थीं। पिता रेल्वे में जलेसर रोड स्टेशन पर सहायक स्टेशन मास्टर थे |रेल की नौकरी होने के कारण उनके पिता का अधिक समय बाहर ही बीतता था। कभी-कभी छुट्टी मिलने पर ही घर आते थे। थोड़े समय बाद ही दीनदयाल के भाई ने जन्म लिया जिसका नाम शिवदयाल रखा गया। पिता भगवती प्रसाद ने बच्चों को ननिहाल भेज दिया। उस समय उनके नाना चुन्नीलाल शुक्ल धनकिया में स्टेशन मास्टर थे। मामा का परिवार बहुत बड़ा था। दीनदयाल अपने ममेरे भाइयों के साथ खाते खेलते बड़े हुए।३ वर्ष की मासूम उम्र में दीनदयाल पिता के प्यार से वंचित हो गये। पति की मृत्यु से माँ रामप्यारी को अपना जीवन अंधकारमय लगने लगा। वे अत्यधिक बीमार रहने लगीं। उन्हें क्षय रोग लग गया। ८ अगस्त १९२४ को रामप्यारी जी का देहावसान हो गया। ७ वर्ष की कोमल अवस्था में दीनदयाल माता-पिता के प्यार से वंचित हो गये।दीनदयाल उपाध्याय के लिए इमेज परिणाम

    उपाध्याय जी ने पिलानी, आगरा तथा प्रयाग में शिक्षा प्राप्त की। बी०.एससी० बी०टी० करने के बाद भी उन्होंने नौकरी नहीं की। छात्र जीवन से ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सक्रिय कार्यकर्ता हो गये थे। अत: कालेज छोड़ने के तुरन्त बाद वे उक्त संस्था के प्रचारक बन गये और एकनिष्ठ भाव से संघ का संगठन कार्य करने लगे। उपाध्यायजी नितान्त सरल और सौम्य स्वभाव के व्यक्ति थे।

    सन १९५१ ई० में अखिल भारतीय जनसंघ का निर्माण होने पर वे उसके संगठन मन्त्री बनाये गये। दो वर्ष बाद सन् १९५३ ई० में उपाध्यायजी अखिल भारतीय जनसंघ के महामन्त्री निर्वाचित हुए और लगभग१५ वर्ष तक इस पद पर रहकर उन्होंने अपने दल की अमूल्य सेवा की। कालीकट अधिवेशन (दिसम्बर १९६७) में वे अखिल भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। ११ फरवरी१९६८ की रात में रेलयात्रा के दौरान मुगलसराय के आसपास उनकी हत्या कर दी गयी। विलक्षण बुद्धि, सरल व्यक्तित्व एवं नेतृत्व के अनगिनत गुणों के स्वामी भारतीय राजनीतिक क्षितिज के इस प्रकाशमान सूर्य ने भारतवर्ष में समतामूलक राजनीतिक विचारधारा का प्रचार एवं प्रोत्साहन करते हुए सिर्फ ५२ साल की उम्र में अपने प्राण राष्ट्र को समर्पित कर दिए। आकषर्क व्यक्तित्व के स्वामी दीनदयालजी उच्च-कोटि के दार्शनिक थे किसी प्रकार का भौतिक माया-मोह उन्हें छू तक नहीं सका।दीनदयाल उपाध्याय के लिए इमेज परिणाम

    एक दृष्टि में

    • मैट्रिक और इण्टरमीडिएट-दोनों ही परीक्षाओं में गोल्ड मैडल।
    • कानपुर विश्वविद्यालय से आपने बी० ए० किया।
    • सिविल सेवा परीक्षा में भी उतीर्ण हुए लेकिन उसे त्याग दिया।
    • १९३७ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गये।
    • १९४२ से पूरी तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिये काम करना शुरू किया।
    • राष्ट्रधर्म, पाञ्चजन्य और स्वदेश जैसी पत्र-पत्रिकाएँ प्रारम्भ की।
    • १९५१ में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ की स्थापना के समय उत्तर-प्रदेश का महासचिव बनाया गया।
    • हाल ही मे केन्द्र सरकार ने मुगलसराय जंक्शन का नाम दीन दयान उपाध्याय स्टेशन कर दिया गया।
    • इसी के साथ कान्दला बन्दरगाह के नाम को दीन दयाल उपाध्याय बन्दरगाह कर दिया गया।

    कृतियाँ

    जनसंघ के राष्ट्रजीवन दर्शन के निर्माता दीनदयालजी का उद्देश्य स्वतंत्रता की पुर्नरचना के प्रयासों के लिए विशुद्ध भारतीय तत्व-दृष्टी प्रदान करना था . उन्होंने भारत की सनातन विचारधारा को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करते हुए देश को एकात्म मानववाद जैसी प्रगतिशील विचारधारा दी। दीनदयालजी को जनसंघ के आर्थिक नीति के रचनाकार बताया जाता है। आर्थिक विकास का मुख्य उद्देश्य समान्य मानव का सुख है या उनका विचार था। विचार–स्वातंत्रय के इस युग में मानव कल्याण के लिए अनेक विचारधारा को पनपने का अवसर मिला है। इसमें साम्यवाद, पूंजीवाद , अन्त्योदय, सर्वोदय आदि मुख्य हैं। किन्तु चराचर जगत को सन्तुलित , स्वस्थ व सुंदर बनाकर मनुष्य मात्र पूर्णता की ओर ले जा सकने वाला एकमात्र प्रक्रम सनातन धर्म द्वारा प्रतिपादित जीवन – विज्ञान, जीवन –कला व जीवन–दर्शन है।

    संस्कृतिनिष्ठा दीनदयाल जी के द्वारा निर्मित राजनैतिक जीवनदर्शन का पहला सुत्र है उनके शब्दों में- “ भारत में रहनेवाला और इसके प्रति ममत्व की भावना रखने वाला मानव समूह एक जन हैं . उनकी जीवन प्रणाली ,कला , साहित्य , दर्शन सब भारतीय संस्कृति है . इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद का आधार यह संस्कृति है . इस संस्कृतिमें निष्ठा रहे तभी भारत एकात्म रहेगा .”

    “वसुधैव कुटुम्बकम” हमारी सभ्यता से प्रचलित है। इसी के अनुसार भारत में सभी धर्मो को समान अधिकार प्राप्त हैं। संस्कृति से किसी व्यक्ति ,वर्ग , राष्ट्र आदि की वे बातें जो उनके मन,रुचि, आचार, विचार, कला-कौशल और सभ्यता का सूचक होता है पर विचार होता है। दो शब्दों में कहें तो यह जीवन जीने की शैली है। भारतीय सरकारी राज्य पत्र (गज़ट) इतिहास व संस्कृति संस्करण में यह स्पष्ट वर्णन है कि हिन्दुत्व और हिंदूइज़्म एक ही शब्द हैं तथा यह भारत के संस्कृति और सभ्यता का सूचक है।

    उपाध्यायजी पत्रकार तो थे ही चिन्तक और लेखक भी थे। उनकी असामयिक मृत्यु से एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि जिस धारा में वह भारतीय राजनीति को ले जाना चाहते थे वह धारा हिन्दुत्व की थी जिसका संकेत उन्होंने अपनी कुछ कृतियों में ही दे दिया था। तभी तो कालीकट अधिवेशन के बाद विश्व भर के मीडिया का ध्यान उनकी ओर गया। उनकी कुछ प्रमुख पुस्तकों के नाम[2] नीचे दिये गये हैं-

    • दो योजनाएँ ,
    • राजनीतिक डायरी,
    • भारतीय अर्थनीति का अवमूल्यन ,
    • सम्राट चन्द्रगुप्त ,
    • जगद्गुरु शंकराचार्य, और
    • एकात्म मानववाद (अंग्रेजी: Integral Humanism)
    • राष्ट्र जीवन की दिशा
    • एक प्रेम कथा
  • भारतवर्ष के पाँचवे राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद का निधन 1977 में हुआ।
  • हिन्दी के प्रसिद्ध कवि, लेखक एवं सम्पादक पंडित नरेंद्र शर्मा का निधन 1989 में हुआ।
  • प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता-निर्देशक कमाल अमरोही का निधन 1993 में हुआ।
  • हिंदी तथा ब्रज के सरस गीता-दोहाकार विष्णु विराट का निधन 2015 में हुआ।

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