भारतीय समाज के विषादपूर्ण स्वरूप को जिम्मेदार है इतिहासकार रामशरण शर्मा का लेखन

एक समय में बिहार के लेनिनग्राद नाम से प्रसिद्ध बेगुसराय में जन्मे विख्यात इतिहासकार रामशरण शर्मा जी का 26  नवंबर को  जन्मदिन था .उन्होंने भारतीय इतिहास का लेखन,मार्क्सवादी दृष्टि से किया.एक दृष्टि से लेखन संकीर्ण हो जाता है,शर्मा जी इस तथ्य को जानकर भी अनजान बने रहे ! नतीजा,आज उनके इतिहास लेखन का परिणाम भयावह है ! उन्होंने,राम और कृष्ण की ऐतिहासिकता और प्रामाणिकता के मामले में भारतीय जनमानस के विरुद्ध जाकर विवाद और संदेह पैदा किया.हरबंस मुखिया के अनुसार प्राचीन भारत में सामंतवाद नाम की कोई चीज नहीं थी.भारत में कृषि एक स्वतंत्र कार्य था.लेकिन,शर्मा जी ने ‘भारत में सामंतवाद’ लिखा ! सामंतवाद का उदय मुगलों और अंग्रेजों के काल में हुआ.लेकिन,शर्मा जी इसके सूत्र प्राचीन भारत में खोजते रहे ? इनके लेखन ने कम से कम तीन पीढ़ियों की इतिहास दृष्टि को बर्बाद कर दिया…जो अभी भी जारी है.आर्य बाहर से आए…उनकी स्थापना को प्रख्यात मार्क्सवादी हिंदी आलोचक रामविलास शर्मा ने खारिज कर दिया.अयोध्या और गुजरात दंगे को उन्होंने एनसीआरटी की किताबों में शामिल कराया ! बहुत सारी बातें हैं..इतना लिखना एक पोस्ट में संभव नहीं है.लेकिन,इतना कहूँगा कि आर.एस. शर्मा जी ने अपनी तथाकथित संकीर्ण वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भारत के बहुविध सांस्कृतिक चेतना की ‘हरिहर परंपरा’ जिसमें बुद्ध,महावीर के साथ मध्यकालीन संतों की विशाल परंपरा शामिल है, को अपनी वैचारिक बर्बरता से तबाह कर दिया.

उन्होंने अपनी पहली किताब इतिहास विभाग,पटना विश्वविद्यालय में पढ़ाते हुए ‘विश्व साहित्य की भूमिका’ हिन्दी में लिखी. हिंदी के प्रति उनके अनन्य प्रेम के लिए उन्हें सादर नमन.

नीचे उनके द्वारा लिखी किताबों की लिस्ट है,जिसके शीर्षक ही बताते हैं कि उन्होंने समाज को एक करने के लिए कुछ भी नहीं लिखा.आज भारतीय समाज के विषादपूर्ण स्वरूप के लिए शर्मा जी का लेखन कम जिम्मेदार नहीं है.यथा-

‘आर्य एवं हड़प्पा संस्कृतियों की भिन्नता’
‘भारतीय सामंतवाद’
‘शूद्रों का प्राचीन इतिहास’
‘प्राचीन भारत में राजनीतिक विचार एवं संस्थाएँ
‘भारत के प्राचीन नगरों का इतिहास’
‘आर्यों की खोज’
‘प्रारंभिक मध्यकालीन भारतीय समाज: सामंतीकरण का एक अध्ययन’
‘कम्युनल हिस्ट्री एंड रामा’ज अयोध्या’
‘विश्व इतिहास की भूमिका’ 1951-52
‘सम इकानामिकल एस्पेक्ट्स ऑफ़ द कास्ट सिस्टम इन एंशिएंट इंडिया’ 1951
‘रोल ऑफ़ प्रोपर्टी एंड कास्ट इन द ओरिजिन ऑफ़ द स्टेट इन एंशिएंट इंडिया’ 1951-52
‘शुद्राज इन एनसिएंट इंडिया एवं आस्पेक्ट्स ऑफ़ आइडियाज़ एंड इंस्टिट्यूशन इन एंशिएंट इंडिया’ 1958
‘आस्पेक्ट्स ऑफ़ पोलिटिकल आइडियाज एंड इंस्टीच्यूशन इन एंशिएंट इंडिया’ 1959
‘इंडियन फयूडलीजम’ 1965
‘रोल ऑफ़ आयरन इन ओरिजिन ऑफ़ बुद्धिज्म’ 1968
‘प्राचीन भारत के पक्ष में’ 1978
‘मेटेरियल कल्चर एंड सोशल फार्मेशन इन एंशिएंट इंडिया’ 1983
‘पर्सपेक्टिव्स इन सोशल एंड इकोनौमिकल हिस्ट्री ऑफ़ अर्ली इंडिया’ 1983
‘अर्बन डीके इन इंडिया-300 एडी से 1000 एडी’ 1987
‘सांप्रदायिक इतिहास और राम की अयोध्या’ 1990-91
‘राष्ट्र के नाम इतिहासकारों की रपट’ 1991
‘लूकिंग फॉर द आर्यन्स’ 1995
‘एप्लायड साइंसेस एंड टेक्नोलाजी’ 1996
‘एडवेंट ऑफ़ द आर्यन्स इन इंडिया’ 1999
‘अर्ली मेडीएवल इंडियन सोसाइटी:ए स्टडी इन फ्यूडलाईजेशन’ 2001

–शैलेश सृष्टि की फेसबुक वाल से

  • Image may contain: one or more people and outdoor    Studied at L.S. College,Studied at JNU New Delhi,Studied at Hindu College,Lives in New Delhi, Indiaराम शरण शर्मा (जन्म 26 नवम्बर 1919 – 20 अगस्त 2011) एक भारतीय इतिहासकार हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय (1973-85) और टोरंटो विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया है और साथ ही लंदन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज में एक सीनियर फेलो, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नेशनल फेलो (1958-81) और 1975 में इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। 1970 के दशक में दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के डीन के रूप में प्रोफेसर आर.एस. शर्मा के कार्यकाल के दौरान विभाग का व्यापक विस्तार किया गया था।  वे भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च) (आईसीएचआर) के संस्थापक अध्यक्ष भी थे।

    उन्होंने पंद्रह भाषाओं में प्रकाशित 115 पुस्तकें लिखी हैं। शर्मा भारतीय इतिहास लेखन के “मार्क्सवादी मत” से संबद्ध रहे हैं।शर्मा का जन्म बिहार के बरौनी, बेगूसराय में एक गरीब परिवार में हुआ था।वास्तव में उनके पिता को अपनी रोजी-रोटी के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा था और बड़ी मुश्किल से वे मैट्रिक तक उनकी शिक्षा की व्यवस्था कर पाए. उसके बाद वे लगातार छात्रवृत्ति प्राप्त करते रहे और यहां तक कि अपनी शिक्षा में सहयोग के लिए उन्होंने निजी ट्यूशन भी पढ़ाई.

    शिक्षा और उपलब्धियां

    उन्होंने 1937 में मैट्रिक पास किया और पटना कॉलेज में दाखिला लिया जहां उन्होंने इंटरमीडिएट से लेकर स्नातकोत्तर कक्षाओं में छः वर्षों तक अध्ययन किया। उन्होंने अपनी पीएचडी लंदन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज से प्रोफेसर आर्थर लेवेलिन बैशम के अधीन पूरी की. 1946 में पटना विश्वविद्यालय के पटना कॉलेज में आने से पहले उन्होंने आरा (1943) और भागलपुर (जुलाई 1944 से नवंबर 1946 तक) के कॉलेजों में अध्यापन कार्य किया। 1958-1973 तक वे पटना विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के प्रमुख बने. 1958 में वे एक यूनिवर्सिटी प्रोफेसर बन गए। 1973-1978 तक उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के प्रोफ़ेसर और डीन के रूप में कार्य किया। 1969 में उन्हें जवाहरलाल फैलोशिप मिल गयी। 1972-1977 तक वे भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च) के संस्थापक चेयरमैन रहे. वे लंदन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज (1959-64) में एक अतिथि फैलो; विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के राष्ट्रीय फैलो (1958-81); टोरंटो विश्वविद्यालय में इतिहास के अतिथि प्रोफ़ेसर (1965-1966); 1975 में इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस के अध्यक्ष और 1989 में जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार के प्राप्तकर्ता भी रहे.1973-1978 तक वे मध्य एशिया के अध्ययन के लिए यूनेस्को (UNESCO) के डिप्टी-चेयरपर्सन बने; उन्होंने नेशनल कमीशन ऑफ हिस्ट्री ऑफ साइंसेस इन इंडिया के एक महत्वपूर्ण सदस्य और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के एक सदस्य के रूप में सेवा की है।

    शर्मा ने नवंबर 1987 में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बॉम्बे द्वारा प्रदान किया जाने वाला 1983 का कैम्पबेल मेमोरियल गोल्ड मेडल (उत्कृष्ट इंडोलॉजिस्ट के लिए) प्राप्त किया; 1992 में उन्हें अर्बन डिके इन इंडिया के लिए भारतीय इतिहास कांग्रेस द्वारा एच.के. बरपुजारी बाइनियल नेशनल अवार्ड मिला और उन्होंने भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (1988-91) के एक नेशनल फेलो के रूप में भी कार्य किया। वे कई शैक्षिक समितियों और संघों के सदस्य भी हैं। उन्होंने पटना के के.पी. जायसवाल अनुसंधान संस्थान (1992-1994) का के.पी. जायसवाल फैलोशिप प्राप्त किया है; अगस्त 2001 में उन्हें एशियाटिक सोसाइटी की ओर से उत्कृष्ट इतिहासकार के लिए हेमचंद्र रायचौधरी जन्म शताब्दी स्वर्ण पदक प्राप्त करने के लिए आमंत्रित किया गया था; और 2002 में भारतीय इतिहास कांग्रेस ने आजीवन सेवा और भारतीय इतिहास में उनके योगदान के लिए उन्हें विश्वनाथ काशीनाथ राजवाड़े पुरस्कार प्रदान किया। उन्हें बर्दवान विश्वविद्यालय से डी.लिट ओनोरिस कॉसा (Honoris Causa) की उपाधि और इसी के समकक्ष डिग्री सारनाथवाराणसी के उच्चस्तरीय तिब्बती अध्ययन के केन्द्रीय संस्थान से प्राप्त हुई है। वे शैक्षिक पत्रिका सोशल साइंस प्रोबिंग्स के संपादकीय समूह के अध्यक्ष भी हैं। वे खुदा बख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी की समिति के एक सदस्य हैं। हिंदी और अंग्रेजी में लिखे जाने के अलावा उनकी रचनाओं का कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया गया है। उनकी 15 रचनाओं का अनुवाद बंगाली भाषा में किया गया है। भारतीय भाषाओं के अलावा उनकी कई रचनाओं का अनुवाद अनेकों विदेशी भाषाओं में किया गया है जैसे कि जापानीफ्रेंचजर्मनरूसी आदि

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