भारतीय मज़दूर संघ संस्थापक दत्तोपन्त ठेंगडी जन्म तथा श्रीयंत्र टापू बर्बर पुलिस अत्याचार की वार्षिकी है आज

 10 नवंबर का इतिहास

इतिहास में इसी तारीख को यानि 10 नवंबर को कुछ महत्वपूर्ण घटनाएँ घटी थी जिस के बारे में आपको नहीं पता आज इस लेख के माध्यम से उस महत्वपूर्ण घटनाओं के बारे में जानकारी देने की कोशिश कर रहे हैं तो आईये जानते हैं आज का इतिहास।

  • गोटलिएब डेमलेर ने 1885 में दुनिया की पहली मोटर साइकिल पेश की।
  • रोमानिया में 1940 को आए भूकंप में एक हजार से ज्यादा लोग मारे गए तथा 4 हजार से ज्यादा लोग घायल हुए।
  • अमेरिका के लेखक विलियम फॉकनर को 1950 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मनित किया गया।
  • राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 1951 में प्रस्ताव 96 को स्वीकार किया।
  • अमेरिका में 1951 को डायरेक्ट डायलिंग फोन सेवा प्रारम्भ हुई।
  • बिल गेट्स ने 1983 में विंडोज 1.0 की शुरूआत की।
  • जर्मनी में बर्लिन की दीवार को गिराने का कार्य 1989 में शुरू।
  •  उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर दमनकारी घटनाओं के विरोध और पृथक् उत्तराखण्ड राज्य हेतु आमरण अनशन आरम्भ किया। दस नवंबर 1994 को श्रीयंत्र टापू में आंदोलन कर रहे लोगों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया और आंदोलनकारी यशोधर बेंजवाल व राजेश रावत को को राइफलों के बट और लाठी-डण्डों से मारकरअलकनंदा नदी में फेंक दिया। नदी का बहाव इतना तेज था कि वह तैरकर भी वापस नहीं आ पाए। उनके ऊपर पत्थरों की बरसात कर दी, जिससे इन दोनों की मृत्यु हो गई।कई बाद उनके मृत शरीर बगवान के समीप मिले।.इस टापू पर उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर अनशन चलाया जा रहा था.इन दो आन्दोलनकारियों की हत्या के अलावा पुलिस ने यहाँ से 55 आन्दोलनकारियों को गिरफ्तार किया,जिनमें डा.एस.पी.सती,गढ़वाल विश्वविद्यालय के छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष,अनिल काला काला शामिल थे. अनिल काला अब इस दुनिया में नहीं हैं.

    इन आन्दोलनकारियों को पुलिस गाडी में रास्ते भर बुरे तरीके से पीटते हुए सहारनपुर जेल ले गयी.उस समय उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन था और कांग्रेसी नेता मोतीलाल वोरा उत्तर प्रदेश के राज्यपाल थे.उनकी सदारत में इस दमन काण्ड को अंजाम दिया गया.

    श्रीयन्त्र टापू के शहीद लोग
    • अमर शहीद स्व. श्री राजेश रावत।
    • अमर शहीद स्व. श्री यशोधर बेंजवाल।

    इन दोनों शहीदों के शव 14 नवंबर, 1994 को बागवान के समीप अलकनन्दा में तैरते हुये पाये गये थे।

  • न्यूजीलैंड के आकलैंड में राष्ट्रमंडल शिखर सम्मेलन 1995 में प्रारम्भ।
  • नाइजीरिया में पर्यावरण कार्यकर्ता-नाट्यकार केन सारो वीवा के साथ आठ लोगों को 1995 में सरकार ने फांसी दी।
  • वर्ल्ड कॉम और एमसीआई कम्युनिकेशन ने 37 बिलियन में विलय की घोषणा 1997 में की। यह उस वक्त तक अमेरिका का सबसे बड़ा विलय था।
  • चीन-रूस घोषणा पत्र से दोनों देशों के बीच सीमांकन विवाद 1997 में समाप्त।
  • गंगा-मेकांग सम्पर्क परियोजना का कार्य 2000 में प्रारम्भ।
  • भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 2001 में संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित किया।
  • आस्ट्रेलिया ने 2002 में इंग्लैंड से पहला एशेज टेस्ट जीता।
  • झेंगझोऊ चीन का आठवाँ सबसे पुराना शहर 2004 में घोषित।
  • चीन के विरोध को अस्वीकार करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने 2005 में तिब्बत के निर्वासित धार्मिक नेता दलाई लामा से मुलाकात की। जार्डन के तीन होटलों में विस्फोट में 57 लोगों की मृत्यु।
  • कोलम्बो में 2006 को श्रीलंका के तमिल राजनेता नाडाराजाह रविराज की हत्या कर दी गई।
  •  एक ब्रिटिश अपीलीय कोर्ट ने 2007 में ब्रिटिश सरकार को भारतीय डॉक्टरों के साथ यूरोपीय संघ के डॉक्टरों के समान बर्ताव करने का आदेश दिया।
  • भारत-कतर सम्बन्धों को रणनीतिक गहराई देते हुए दोनों देशों ने 2008 में रक्षा और सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किये।
  • भारत ने 2008 में आस्ट्रेलिया को हराकर 2-0 से बार्डर-गावस्कर ट्राफी जीती।
  • सार्वजनिक क्षेत्र की आन्ध्रा बैंक ने 2008 में अपनी मुख्य उधारी दर (पीएलआर) में 0.75% की कटौती की।
  • नासा ने मंगल ग्रह के लिए अपने फ़ीनिक्स मिशन के समापन की घोषणा 2008 में की।

10 नवंबर को जन्मे व्यक्ति

  • ईसाई धर्म में एक नई धारा की शुरुआत करने वाले मार्टिन लूथर का जन्म 1483 में हुआ।
  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापकों में से एक और पार्टी के सम्मानित नेता सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का जन्म 1848 में हुआ
  • अमेरिकी संगीतकार और गीतकार जॉनी मार्क्स का जन्म 1909 में हुआ।
  • राष्ट्रवादी ट्रेड यूनियन नेता एवं भारतीय मज़दूर संघ के संस्थापक दत्तोपन्त ठेंगडी Thengadijee.jpgका जन्म 1920 में हुआ।दत्तोपन्त ठेंगड़ी (10 नवम्बर 1920 – 14 अक्टूबर 2004) भारत के राष्ट्रवादी ट्रेड यूनियन नेता एवं भारतीय मजदूर संघस्वदेशी जागरण मंचभारतीय किसान संघ के संस्थापक थे। दत्तोपंत  ठेंगड़ी का जन्म 10 नवम्बर, 1920 को, दीपावली के दिन, महाराष्ट्र के वर्धा जिला के आर्वी नामक ग्राम में हुआ। दत्तोपंत जी के पित्ताजी  बापूराव दाजीबा ठेंगड़ी, सुप्रसिद्ध अधिवक्ता  तथा माता, श्रीमती जानकी देवी थी। परिवार में  छोटा भाई  नारायण ठेंगड़ी और  छोटी बहन श्रीमती अनुसूया थी। 1936 में, नागपुर के ‘‘मौरिस कॉलेज’’ में दाखिला लेकर अपनी स्नातक की पढाई पूरी की और फिर, नागपुर के लॉ कॉलेज से, एल. एल. बी. की उपाधि प्राप्त की। मौरिस कॉलेज में अध्ययन के दौरान, आप सन् 1936-38 तक क्रान्तिकारी संगठन ‘‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसियेसन’’ से सम्बन्ध रहे।

    संघ से संपर्क

    दत्तोपंत  ठेंगड़ी अपने बाल्यकाल से ही संघ शाखा में जाया करते थे। दिसम्बर, 1934 के वर्धा जिले के  शिविर में पहली बार परम पूज्य डॉक्टरजी के दर्शन – उद्बोधन सुनने का सौभाग्य मिला। वह अनियमित स्वयंसेवक थे, फिर भी  अपने सहपाठी और मुख्य शिक्षक  मोरोपंत  पिंगले के सानिध्य में, दत्तोपंत  ने, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संघ शिक्षा वर्गों का तृतीय वर्ष तक  शिक्षण  पूरा किया।

    प्रचारक जीवन का प्रारम्भ

    22 मार्च 1942 को संघ के प्रचारक का चुनौती भरा दायित्व स्वीकार कर सुदूर केरल प्रान्त में संघ का विस्तार करने के लिए ‘‘कालीकट’’ (Kozhikode) पहुंचे। 1942 से 1945 तक रा. स्व. संघ प्रचारक के नाते यशस्वी कार्य खड़ा करने के साथ ही, 1945 से 1947 तक, कलकत्ता में, संघ के प्रचारक के नाते, तथा 1948 से 49 तक बंगाल.असम प्रान्त के प्रान्त प्रचारक का दायित्व सम्पादन किया। इस समय राष्ट्रीय परिदृष्य में,भारत विभाजन, तथा  महात्मा जी की हत्या से उत्पन्न परिस्थितियों का बहाना बना संघ पर आरोपित प्रतिबंध और देशभक्तों द्वारा अन्यायकारी प्रतिबंध के विरूद्ध देशव्यापी सत्याग्रह, इसी बीच जून  में,सरकार के साथ बातचीत का घटनाक्रम तेजी से घटा और  वेंकटराम शास्त्री की मध्यस्थता में, सरकार ने संघ पर लगाया गया प्रतिबंध वापिस लिया। ऐसे चुनौती पूर्ण समय में,  दत्तोपंत  को बंगाल से वापिस नागपुर बुला लिया गया।

    विद्यार्थी परिषद् की स्थापना

    9 जुलाई, 1949 को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की स्थापना की औपचारिक घोषणा हुई।  दत्तोपंत  को,विद्यार्थी परिषद के संस्थापक सदस्य तथा नागपुर विदर्भ के प्रदेशाध्यक्ष  जिम्मेदारी दी गई।  दत्ताजी डिडोलकर को महामंत्री तथा बबनराव पाठक को संगठन मंत्री का दायित्व दिया ।

    विद्यार्थी परिषद् ने नागपुर-विदर्भ में सरकार के साथ अच्छे संबंध स्थापित किये। मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, अर्थमंत्री, राज्यपाल  सभी को अपने उत्सवों में बुलाने का क्रम  जारी रखा। अन्नमंत्री गोपाल राव काले के नेतृत्व में  अधिक अन्न उपजाओ अभीयान चल रहा था, विद्यार्थी परिषद् ने पूरी शक्ती के साथ उसका समर्थन किया  । बडोदा, फेटरी और गुमथला में सरकारी योजना के अन्तर्गत कम्पोस्ट खाद तैयार करने के यशस्वी प्रयोग भी हुये। प्रादेशिक सरकार ने भी एक डॉक्युमेन्ट्री के द्वारा विद्यार्थी परिषद् के इन प्रयासों को उचित प्रसिद्धी दी।

    अभ्यासक्रम के बाहर भी कुछ महत्वपूर्ण विषयों की जानकारी विद्यार्थीयों को हो यह विचार  किया।  “मध्यप्रदेश मजदूर आन्दोलन का इतिहास” इस विषय के संबंध में प्रादेशिक इंटक के अध्यक्ष पी. वाय. देशपाण्डे के साथ मैं बात करूं यह तय हुआ।  हरिजन सेवक संघ की अध्यक्षा और राज्यसभा सदस्य कुमारी निर्मला देशपांडे के वे पिताजी थे। , उन्होंने गुस्से में कहा कि, “यह सारी फिजूल बातें , देश के मजदूर क्षैत्र पर सबसे बड़ा संकट कम्युनिस्टों का है। वे मॉस्को के पिट्ठू है। मजदूर क्षैत्र में उनके प्रभाव को रोकना आवश्यक है। तुम स्वयं इंटक में आओ और  जिम्मेदारी वहन करो।“ मैं व्यक्तिगत रूप से इंटक में जाना पसंद नहीं करता था  किन्तु श्रीगुरुजी की प्रतिक्रिया देखकर मुझे आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा कि देशपांडे का निमंत्रण   सुवर्ण अवसर है।  चाहता हूं कि ऐसे भी कार्यकर्ता रहे जो मजदूर क्षैत्र में काम करने की पद्धती जानते हो।

    कुछ दिन बाद देशपांडे ने बताया,  मुझे निमंत्रण का सुझाव गृहमंत्री द्वारकाप्रसाद  मिश्र का था। मेरे सभी कार्यों पर उनकी दृष्टी थी। इंटक में उस समय दो गुट  थे। एक मिनिस्टेरियल और दूसरा एंटी मिनिस्टेरियल, एंटी मिनिस्टेरियल गुट के प्रमुख डॉ॰ डेकाटे थे। वे कुशल संगठक थे। उनकी तुलना में दूसरा कोई भी कुशल संगठक मिनिस्टेरियल गुट में नहीं था।  इसके लिये क्या किया जाये यह चर्चा देशपांडे और द्वारकाप्रसाद मे हुई। चर्चा में द्वारकाप्रसाद ने कहा कि, देशपांडे मुझे इंटक में निमंत्रित करे। उन्होंने यह भी विश्वास प्रकट किया कि यह व्यक्ति डॉ॰ डेकाटे का मुकाबला सफलतापूर्वक कर सकेगा।

    परम पूज्य श्री गुरुजी की इच्छा और मजदूर क्षैत्र में प्रवेश

    1949 में ही गुरूजी ने, दत्तोपंत  को, मजदूर क्षेत्र का अध्ययन करने को कहा। इस प्रकार दत्तोपंत के जीवन में एक नया अध्याय प्रारम्भ हुआ। । थोड़े समय में ही इंटक से सम्बधित नो युनियनों ने,  ठेंगड़ी  को, अपना पदाधिकारी बना दिया। अक्टुबर 1950 में, दत्तोपंत को इंटक की राष्ट्रीय परिषद का सदस्य बनाया गया तथा साथ ही तत्कालीन मध्य प्रदेश के इंटक के प्रदेश संगठन मंत्री चुने गये। दत्तोपंत , कहते थे – ‘‘ गुरूजी का यह आग्रह था कि, केवल इंटक की कार्यपद्धति जानना प्रर्याप्त नहीं है। कम्यूनिस्ट यूनियन्स और सोशलिस्ट यूनियन्स की कार्य पद्धति भी जाननी चाहिये।”

    दत्तोपन्त ने इस दिशा में प्रयत्न प्रारंभ किये और 1952 से 1955 के कालखंड में दत्तोपंत , कम्युनिस्ट प्रभावित ‘‘ऑल इण्डिया बैंक एम्पलाइज एसोशियेशन’’ (AIBEA) नामक मजदूर संगठन के प्रांतीय संगठन मंत्री रहे। 1954 से 55 में आर. एम. एस. एम्पलॉइज युनियन नामक पोस्टल मजदूर संगठन के वे सेन्ट्रल सर्कल (अर्थात् आज का मध्यप्रदेश, विदर्भ, और राजस्थान) के अध्यक्ष इसी कालखंड में (1949 से 1955)  ठेंगड़ी ने कम्युनिज्म का गहराई से अध्ययन किया। कम्युनिज्म के तत्व ज्ञान और कम्युनिस्टों की कार्य पद्धति आदि विषयों पर श्री गुरूजी से वे रात के कई घंटों तक विस्तृत चर्चा किया करते थे। (शून्य से सृष्टि तक पृ. स. 14-15)

    भारतीय मजदूर संघ की स्थापना

    लोकमान्य तिलक की 99वीं जयन्ती के अवसर पर, देश के अन्यान्य प्रान्तों से आये हुए 35 प्रतिनिधियों की उपस्थिति में, 23 जुलाई 1955 को, भोपाल में, भारतीय मजदूर संघ की, एक अखिल भारतीय केन्द्रीय कामगार संगठन के रूप में स्थापना की गई।

    दत्तोपंत ने, मात्र तीन दशक में ही, उस समय के सबसे बड़े, और कांग्रेस से सम्बन्ध मजदूर संगठन इण्डियन नेशनल ट्रेड युनियन कॉग्रेस INTUC को पीछे छोड़ दिया। सन् 1989 में, भारतीय मजदूर संघ की सदस्य संख्या 31 लाख थी, जो कम्युनिस्ट पार्टियों से सम्बन्ध, एटक AITUC तथा सीटू CITU की सम्मलित सदस्यता के भी अधिक थी। सन् 2002 में, भारतीय मजदूर संघ 81 लाख सदस्यता के साथ भारत का विशालतम श्रम संगठन बन गया, देश के सभी अन्यान्य केन्द्रीय श्रम संगठनों की कुल सदस्यता से कहीं अधिक थी। आज 2012 की गणना के अनुसार भारतीय मजदूर संघ की सदस्य संख्या 1 करोड़ 71 लाख से अधिक थी।

    गुरूजी ने, एक नवम्बर 1972 को ठाणे बैठक में कहा, ‘‘ जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने सोचा कि मजदूर क्षेत्र में भारतीय मजदूर संघ स्वंतत्र रूप से काम करें और इसका संगठन दत्तोपंत ठेंगड़ी खड़ा करें तो यह काम उन पर सौंप दिया गया। उन्होंने अकेले ‘सिंगल हैंडिड’ यह कार्य किया।  (शून्य से सृष्टि तक पृष्ठ संख्या -14)

    दत्तोपंत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क्षेत्र के अनेक समानान्तर दायित्वों का, साथ–साथ निर्वहन कर रहे थे। इसी कालखंड में, 1949 से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संस्थापक सदस्य, हिन्दुस्तान समाचार के संगठन मंत्री, 1951से 53, संगठन मंत्री, भारतीय जनसंघ, मध्यप्रदेश 1956 से 57 संगठन मंत्री, भारतीय जनसंघ, दक्षिणांचल।1964 से 1976 तक दो बार उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए चुने गये। राज्यसभा में जाने का निर्णय हुआ तो दत्तोपंत कहते है, ‘‘मैंने  गुरूजी से पूछा कि मुझे राज्यसभा में काहे के लिए भेज रहे हो?  गुरूजी विनोद करते  बोले, ‘‘जाओ, भाषण दो, विश्राम करो, बहुत परिश्रम किया है।’’, क्षणभर में ही गम्भीर स्वर में बोले, ‘‘एक और भी काम हो सकता है, राज्य सभा में अनेक दलों और अनेक विचारधाराओं के वरिष्ठ लोग आते है, उनके साथ व्यक्तिगत चर्चा, व्यक्तिगत सम्बन्ध,व्यक्तिगत मित्रता स्थापित करने का अवसर भी है, जो आगे चलकर अपने कार्य के लिए उपयोगी हो सकता है।’’  गुरूजी, कितना आगे का सोचते थे, यह आपातकाल के विरूद्ध देश व्यापी आन्दोलन के समय अनुभव में आई। राज्यसभा के कार्यकाल के दौरान,देश के सभी प्रमुख राजनैतिक नेताओं से, समाजवादियों से लेकर साम्यवादियों तक,  दत्तोपंत  के अत्यन्त व्यक्तिगत सम्बन्ध होने के कारण, आपातकाल विरोधी आन्दोलन में सभी का सहयोग और विश्वास सम्पादित करना सहज सम्भव हुआ। 1964 से 1976 तक राज्य सभा के सदस्य रहते हुऐ,  राज्यसभा के महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। 1968 से70 तक आप राज्य सभा के उपाध्यक्ष मंडल के माननीय सदस्य रहे। 1965 से 66 तक, संसद की हाऊस कमेटी के सदस्य रहे। 1968 से 70 तक सार्वजनिक उद्योग समिति के सदस्य रहे।

    सोवियत रूस की यात्रा और कम्युनिज्म से साक्षात्कार

    1969 में लोकसभा अध्यक्ष  नीलम संजीव रेड्डी की अध्यक्षता में, तथा राज्यसभा के सेक्रेटरी जनरल  बी. के. बेनर्जी के मंत्रीत्व में, भारतीय संसद के शिष्ट मंडल का सोवियत रूस जाने का कार्यक्रम तय हुआ। उस समय  वी. वी. गिरी राष्ट्रपति थे।  वी. वी. गिरी ने, इस संसदीय प्रतिनिधि मंडल में जाने के लिए  दत्तोपंत  का नाम प्रस्तावित किया।  वी. वी. गिरी, जो स्वयं मजदूर क्षैत्र से संबंध रहे थे, चाहते थे कि, सोवियत रूस में औद्योगिक सम्बन्धों का स्वरूप क्या है? इसका बारीकी से और निरपेक्ष भाव से अध्ययन करके, सम्यक जानकारी प्राप्त हो, क्योंकि कुछ समय बाद वी. वी. गिरी भी रूस दौरे पर जाने वाले थे। 16 दिनों की सोवियत रूस की यात्रा में, उनके साथ, कम्यूनिष्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता,  हीरेन मुखर्जी तथा फारवर्ड ब्लॉक के  शिलभद्रया प्रमुख थे। इस प्रतिनिधि मंडल के साथ, 16 दिनों तक सोवियत रूस तथा हंगरी की यात्रा की।

    साम्यवादी विचारधारा का खोखलापन तथा, साम्यवादी विचारधारा के अन्तर्विरोधों का प्रत्यक्ष अनुभव करने के बाद श्रद्धेय दत्तोपंत जी ने, अथाह आत्म–विश्वासपूर्वक राष्ट्र को आश्वस्त करते हुए कहा था कि, ‘‘साम्यवाद अपने अन्तर्विरोधों के कारण, स्वतः समाप्त होने वाला है, साम्यवाद को समाप्त करने के लिए किसी को प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं है।’’ देश भर में, अपने उद्बोधनों में, श्री दत्तोपंत जी ने यह उद्घोष किया, उस समय दुनियां के आधे देशों पर लाल झंडा लहरा रहा था। कोई भी जानकार व्यक्ति ऐसी बात मानना तो दूर, सोचना भी, समझदारी नहीं मानता था, ऐसे, सटीक विश्लेषक थे दत्तोपंत जी, आज, परिणाम हम सभी के सामने है।

    दत्तोपंत की चीन यात्रा

    3 अप्रेल से 19 अप्रेल 1985 को, ऑल चायना फेडरेशन ऑफ़ ट्रेड यूनियन्स के निमंत्रण पर,  दत्तोपंत ठेंगड़ी के नेतृत्व में, भारतीय मजदूर संघ का प्रतिनिधि मंडल चीन यात्रा पर गया। प्रतिनिधि मंडल में, मनहर भाई मेहता,  रास बिहारी मैत्र,  वेणुगोपाल, और  ओम प्रकाश अग्धी शामिल थे। 17 दिवसीय चीन यात्रा के दौरान, दत्तोपंत  ने, चीन, के समाज जीवन, औद्योगिक सम्बन्धों, मजदूर संगठनों, राज्य व्यवस्था का अत्यन्त बारीकी से अध्ययन किया। यात्रा के दौरान, चीन के मजदूर नेताओं, प्रसासनिक अधिकारियों, कम्यूनिष्ट पार्टी के नेताओं से विस्तार से चर्चा हुई। प्रतिनिधि मंडल के विदाई के अवसर पर, चीन रेडियो द्वारा,  दत्तोपंत  का विदाई संदेश रिकार्ड किया गया, जो 28अप्रेल 1985 को सार्वजनिक रूप से प्रसारित ! चीन यात्रा के पश्चात, अपने देश व्यापी प्रवास के दौरान, अनुभव बताते हुए उन्होंने कहा कि, ‘‘चीन में, केवल नाम मात्र के लिए कम्यूनिज्म है, चीन, कम्यूनिज्म छोड़ चुका है।’’ उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता प्रकट की , कि, चीन के ट्रेड यूनियन्स ने, बी. एम. एस. की कार्यप्रणाली का व्यापक अध्ययन करने के बाद, हमें निमंत्रित किया था। उन्होंने कहा कि, बी. एम. एस. की त्रिसूत्री, ‘‘राष्ट्र का औद्यौगिकिकरण, उद्यौगों का श्रमिकीकरण, और श्रमिकों का राष्ट्रीयकरण, ’’ की सभी ने प्रसंशा की।

    भारतीय किसान संघ की स्थापना

    3-4 मार्च 1979 में, कोटा, राजस्थान में भारतीय किसान संघ के अखिल भारतीय अधिवेशन का आयोजन कर, किसानों के अखिल भारतीय संगठन की स्थापना की। देश के बहुत बड़े, शौषित–पीड़ित और असंगठित जन समुदाय में आत्म विश्वास जाग्रत करते हुए उन्होंने आव्हान किया कि, ‘‘हर किसान हमारा नेता है’’ और नारा दिया कि, ‘‘देश के हम भंडार भरेंगे, लेकिन कीमत पूरी लेगें।’’

    सामाजिक समरसता मंच और सर्वपंथ समादर मंच की स्थापना

    बाबा साहेब अम्बेडकर जन्म शताब्दी के अवसर पर पुणे में,  14 अप्रेल 1983 को सामाजिक समरसता मंच की स्थापना की। इसी दिन प. पू. डॉक्टर  का जन्मदिन वर्ष-प्रतिपदा भी था। ‘‘सामाजिक समरसता के बिना सामाजिक समता असम्भव है।’’ इस ध्येय वाक्य का उद्घोष कर,  दत्तोपंत को हिन्दू समाज की अत्यन्त पीड़ादयक व्याधि के उपचार  को,  बाबा साहब अम्बेडकर के निकट सानिध्य का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।  बाबा साहब के हृदय की पीड़ा को समझने का महान अवसर प्राप्त हुआ था। सर्वसमावेशी सनातन हिन्दू धर्म के अधिष्ठान पर हिन्दू समाज की एकात्मता के महान कार्य को सम्पादित करने के लिए,सामाजिक समरसता मंच के माध्यम से मार्गदर्शन प्रारम्भ किया। इसी कड़ी में,  16 अप्रेल 1991 को नागपुर में, सर्वपंथ समादर मंच की स्थापना की।

    आर्थिक साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष – स्वदेशी जागरण मंच की स्थापना

    सन् 1980 के आस-पास ठेंगड़ी, ने विकसित गौरे देशों के,साम्राज्यवादी षडयंत्रों से राष्ट्र को सावधान करना प्रारम्भ कर दिया ।  सार्वजनिक भाषणों, कार्यकर्ता बैठकों, अर्थशास्त्रज्ञों की गोष्ठींयों तथा व्यक्तिगत बातचीत में राष्ट्र पर आसन्न संकट की स्पष्ट सम्भावना प्रकट करते थे।  ठेंगड़ी  ने सावधान किया , ‘‘विश्व बैंक, अर्न्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष और, बहुराष्ट्रीय कम्पनियां, पश्चिमी गौरे देशों के, शौषण करने के नये हथियार है, जिनसे, साम–दाम–दंड–भेद का उपयोग करते हुऐ गौरे देश, विकासशील तथा अविकसित देशों का शौषण कर रहे हैं।’’ जनरल एग्रीमेंट ऑन टेरिफ एण्ड ट्रेड (गेट) की स्थापना 1 जनवरी 1948 में की गई थी, इसमें केवल एक  विषय था, माल का अन्तराष्ट्रीय व्यापार। 1986 में, गेट समझौते की उरूग्वै वार्ताओ के दौर में, कुख्यात डंकेल प्रस्तावों का मसविदा, सामने आया। अभी तक गैट वार्ताओं में, केवल माल पर लगने वाले सीमा शुल्क को कम करने के बारे में बातचीत होती थी। लेकिन, 1986 में, गैट के अध्यक्ष आर्थर डंकेल ने, गैट का दायरा विस्तृत करते हुऐ, ‘‘वस्तुओं के व्यापार के साथ, सेवाओं के व्यापार को भी शामिल करने का प्रस्ताव रखा और तीन नये विषय गैट वार्ता की टेबल पर लाये:-

    बौद्धिक सम्पदा अधिकारों का व्यापार(TRIPS) निवेश सम्बन्धी उपक्रमों का व्यापार(TRIMS) तथा कृषि(Agreement on Agriculture) डंकेल प्रस्तावों का व्यापक अध्ययन करने के पश्चात्  दत्तोपंत ,ने देश को आव्हान किया कि, ‘‘डंकेल प्रस्ताव गुलामी का दस्तावेज है।’’ उन्होंने आगाह किया कि, भारत सरकार देश विरोधी डंकेल प्रस्तावों को अस्वीकार करें क्योंकि डंकेल प्रस्ताव, आर्थिक साम्राज्यवाद लाने वाला है। राष्ट्र सम्प्रभुता संकट में पड़ जाएगी। उन्होंने सरकार को चेतावनी ही नहीं दी वरन् डंकेल प्रस्तावों के विरोध में व्यापक जन–आंदोलन खड़ा करने के लिए, सरकार पर जन दबाव लाने के लिए देश भर में जन-जागरण का आव्हान भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ तथा अनेक देश भक्त संगठनों की विशाल-रेलियों तथा प्रदर्शनों से, आर्थिक साम्राज्यवाद के कारण, आसन्न आर्थिक गुलामी के विरोध में,राष्ट्र व्यापी आन्दोलन का आव्हान किया। उन्होंने इसे, स्वतंत्रता का दूसरा संग्राम कहा और इसके लिए 22 नवम्बर 1991 को नागपुर में स्वदेशी जागरण मंच की स्थापना की।  बैठक में अखिल भारतीय स्वरूप की पांच संस्थाओं के प्रमुख पदाधिकारी उपस्थित थे। जिसमें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, सहकार भारती, अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत, भारतीय किसान संघ तथा भारतीय मजदूर संघ शामिल थे।

    नागपुर बैठक में, स्वदेशी जागरण मंच के संयोजक  डॉ॰ मा. गो.बोकरे को दायित्व दिया , डॉ॰ बोकरे सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री तथा नागपुर विश्वविद्यालय के उप- कुलपति रहे। पूर्व में कट्टर मार्क्सवादी और कम्यूनिष्ट पार्टी के चोटी के विचारक,  परन्तु कालान्तर में विचारों में परिवर्तन हुआ और विख्यात पुस्तक ‘हिन्दू अर्थशास्त्र’ लिखा।  मदनदास  देवी को राष्ट्रीय सह संयोजक का दायित्व दिया गया। स्वदेशी जागरण मंच,भारतीय मजदूर संघ तथा भारतीय किसान संघ तथा अनेक देशभक्त संगठनों द्वारा व्यापक जन जागरण तथा जन दबाव के अभियानों के बावजूद, केन्द्र सरकार ने, संसद को भी अंधेरे में रख, डंकेल प्रस्तावों पर हस्ताक्षर कर विश्व व्यापार संगठन समझौते को स्वीकार कर लिया।

    दत्तोपंत  ने, इस चुनौती को स्वीकार कर स्वदेशी जागरण मंच के हैदराबाद अधिवेशन में, सम्मेलन “युद्ध परिषद्” की बैठक संबोधित करते हुये विदेशी ताकतों के साथ “प्रत्यक्ष युद्ध” की घोषणा की, और सभी को, स्वतंत्रता की दूसरी लड़ाई में भाग लेने का आव्हान किया। उनके आव्हान की ताकत थी की, देश की सारी मनीषा स्वदेशी जागरण मंच की संचालन समिति में भर गई ! मुरलीधर राव,  एस. गुरुमूर्ति,  गोविन्दाचार्य,  रविन्द्र महाजन, डॉ॰ महेशचन्द्र शर्मा, डॉ॰ भगवती प्रकाश शर्मा,  योगानंद काले, अब्राहम वर्गीज,  अरूण ओझा,  बी. एस. कुमार स्वामी,  बी. के. केला, डॉ॰ महेश शर्मा आदि केवल कुछ नाम है।

    स्वतंत्रता के दूसरे संघर्ष के आव्हान की गूंज दलों और वैचारिक सीमाओं को लांघते हुए सर्वदूर सुनाई देने लगी। विख्यात वामपंथी नेता श्रीपाद् अमृतडांगे की पुत्री श्रीमती रोजा देशपांडे, सोशलिस्ट नेता  एस. आर. कुलकर्णी, पूर्व प्रधानमंत्री  चंद्रशेखर, विख्यात मजदूर नेता  जॉर्ज फर्नाडीज, विख्यात वामपंथी विचारक और सर्वोच न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस वी. आर. कृष्ण अय्यर, विख्यात अर्थशास्त्री  रुद्रदत्त, विख्यात पर्यावरणविद् श्रीमती वंदना शिवा, आदि सभी, लोकमान्य नेताओं ने स्वदेशी के आव्हान को समर्थन और ताकत प्रदान की। यह दत्तोपंत के आव्हान की ताकत थी। अनेक देश भक्त संगठनों ने अपने अपने प्रकार से शौध अध्ययन, समाचार पत्रों में, प्रचार प्रसार और विश्व व्यापार संगठन से देश पर होने वाले व्यापक दुष्परिणामों का व्यापक अध्ययन और शोध करके स्वदेशी आन्दोलन को ताकत प्रदान की। ऐसे महापुरूषों में डॉ॰ बी. के. केला ने पेटेन्ट कानूनों के दुष्परिणामों का व्यापक अध्ययन किया।

    वैश्विक आन्दोलन का नेतृत्व

    दत्तोपंत  के स्पष्ट मार्गदर्शन से स्वदेशी आन्दोलन कम समय में ही राष्ट्रव्यापी आन्दोलन बन गया। विश्व व्यापार संघ की द्विवार्षिक मंत्रीस्तरीय बैठकों से पूर्व देश भर में व्यापक जन जागरण और जन दबाव  से सरकार पर लगातार दबाव बनाने में मंच ने सफलता प्राप्त की। पहली सफलता सियेटल में मिली। सियेटल  डब्लयु. टी. ओ. की मंत्रीस्तरीय बैठक में भारत के वाणिज्य मंत्री,  मुरासोली मारन ने हिम्मत के साथ, भारत की जनता का पक्ष रखा। वे स्वदेशी जागरण मंच के लोकप्रिय स्लोगन ‘‘ नो न्यू नेगोशियेसन बट री–नेगोशियेसन’’ पर स्थिर रहे और वार्ता आगे न बढ सकी। सभी ने उसकी सराहना की। W.T.O. की अगली ‘‘दोहा’ मंत्रीस्तरीय बैठक’  भी सफल नहीं हो सकी। उसके बाद अगली कानकुन मंत्रीस्तरीय बैठक   से पूर्व देश भर में, W.T.O. के विरोध में व्यापक प्रदर्शन किये गये। दिल्ली में एक लाख लोगों का विशाल प्रदर्शन हुआ।  सरकार पर दबाव  हुआ। कानकुन सम्मेलन में  अरूण जेटली ने भारत का पक्ष व्यापकता से रखा। कानकुन बैठक में अफ्रिकी देशों तथा कैरेबियन देशों ने भी भारत का साथ दिया तथा कानकुन बैठक असफल रही।

    दत्तोपंत  ने विश्व व्यापार संगठन के समझौते पर स्पष्ट मार्गदर्शन करते हुए कहा था कि, ‘‘वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन इज ए मिसनोमर, इट इज ए, वैस्टर्न वर्ल्ड, ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन’’ इतना कहने से सारा विषय समझ में आ जाता था। W.T.O. के विरोध में उन्होंने प्रसिद्ध नारा दिया था कि, ‘‘डब्ल्यु.टी.ओ., तोड़ो, छोड़ो या मोड़ो’’। स्वदेशी आन्दोलन के माध्यम से दत्तोपंत ने वैश्विक आन्दोलन का सफल नेतृत्व किया।

    14 अक्टुबर (अमावस्या) 2004 को पुणे में,  दत्तोपंत ठेंगड़ी को महानिर्वाण हुआ।  लगभग 200 से अधिक छोटी–बड़ी पुस्तके, सेकड़ों प्रतिवेदन  तथा हजारों  आलेख पत्र–पत्रिकाओं में प्रकाशित है।

10 नवंबर को हुए निधन

  • अरबी के प्रसिद्ध सूफ़ी कवि, साधक और विचारक इबने अरबी का निधन 1240 में हुआ।
  • भारत की आज़ादी के लिए फाँसी के फंदे पर झूलने वाले अमर शहीदों में से एक कनाईलाल दत्त का निधन 1908 में हुआ।
  • हिन्दी भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार गंगाप्रसाद अग्निहोत्री का निधन 1931 में हुआ
  • फ्रांस के भूतपूर्व राष्ट्रपति चार्ल्स द गॉल का 1970 में देहांत हुआ।
  • भोपाल के प्रसिद्ध शायर फजल ताबिश का निधन 1995 में हुआ।
  • राजस्थानी भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार विजयदान देथा का निधन 2013 में हुआ।

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