ब्राह्मण न गिरते तो भारतीयता कदापि न हिलती  *************चिंतन …….(सुधा राजे)

पहले ही कहे देते हैं इस पोस्ट पर ज्ञान बघारोगे तो ब्लौकिया दिये जाओगे ,

यह मेरा नितांत निजी मत है ,सहमत होना न होना आपका मत है ,
हाँ सार्थक टिप्पिणियों का स्वागत है
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यह किसने कहा कि ब्रह्मतत्व के बिना ब्राह्मण ??
किंतु यह बहुत अहंकृत सोच है कि यदि ,
पादरी कुछ नहीं कमाता तो भी सब उसको रहने खाने पहनने को देते हैं ,
यदि मौलवी कुछ भी नहीं कमाता तो भी लोग रहने खाने पहनने को देते हैं ,
यदि दिंगंबर और पंचप्यारे पंथी ग्रंथी कुछ नहीं कमाते तो भी लोग पहनने रहने खाने को देते हैं ,
,
अब
ब्राह्मण जब पृथक से कुछ नहीं कमाता तब ????लोग उसकी विद्वत्ता योग्यता कर्मकांड ज्ञेयता पर सौ सौ सवाल उठाते हैं ?
हम कहते हैं जन्मना जायते विप्र ,
क्यों
बुरा लगा ?
तो समझो कि ज्ञान एक यात्रा है डीएनए की ,ये डीएनए और आरएनए वही तत्व है जिससे हूबहू वही क्लोन तैयार किया जा सकता है यह विज्ञान साबित कर चुका है।
अब जिनकी पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान परंपरा में अब उससे आगे बढ़ो वत्स इस तक तो मैं लिख कर मर रहा हूँ ,
की यह तपश्चर्या रही हो ,उनका डीएन ए ,
कितना निखर चुका होगा यह कहने की नहीं ,सुबूतों सहित देखने की चीज है ,
मेंडल के पीली मटर ,गोल मटर ,झुर्रीदार मटर के सिद्धांत को मानते हो ,
किशक्तिशाली प्रभाविता तीसरी चौथी पीढ़ी तक आती है और कुलक्षण वाहक रहते हैं प्रकट नहीं परन्तु अगली पीढ़ी में होते हैं !!
तो
यह भी मानना ही पड़ेगा कि मार में बोओ चाहे ऊसर में रेगर में चाहे दलदल में ,
चने से चना ही निकलेगा ,
चाहे पनप न पाये ,चाहे लहलहा जाये ।
इस से हमने सहमति नहीं माँगी है ,
विज्ञान ने माँगी है ,
और नीग्रो माता ,गोरे पिता का बच्चा ,
पिता या मां या फिर सात पीढ़ी पहले के किसी दो कुल में से एक का या ,दोनों के सुमेल से तीसरी ही ईज़ाद का होगा।
तो ,
मानसिक गुण भी आते है नयी संतान में ।
यह सब तो पहले ही ब्राह्मणों ने खोज लिया था ,
और सगोत्र विवाह वर्जित करके ,
वर्ण व्यवस्था बनायी जिसमें पुरखों की हुनर कला बारीकी सब पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होते रहने की खूबी छिपी थी ।
दूसरी ओर ,
स्वयं वेदव्यास जी कहते हैं ,
शुचि चैव श्वपाको च ब्राह्मण:समदर्शिन:, अन्यथा मल्लाह की पुत्री की संतान पूज्न होती ,न ही वाल्मीकि पूज्य होते ,Image result for ब्रह्म तत्व के बिना ब्राह्मण
भारत में ज्ञान की पूजा होती रही ।
ब्राह्मण ज्ञान कर्म में कंठ तक धँसे रहे ,
और यह कार्य सौ वर्ष की आयुमान में नहीं हो सकता था । कि एक कार्य आरंभ तो किया 19 वर्ष की आयु में 70 में थक गये तो छोड़ दिया!उसे आगे नयी पीढ़ी ले जायेगी ,
यह कौन सी नयी पीढ़ी ?वह जो तीन माह की पालना वाली चेतना से तीस वर्ष तक के प्रशिक्षण में वह सब देखती समझती करती रही ।
वे नहीं जो ,किसी अन्य खानदानी कार्में से अचानक बालिग होकर आए और बोले मैं करूँगा पंडिताई !करो भई ,
हो सके तो करो ,
किंतु वह जो गर्भावस्था में आने के पूर्व का डीएनए शुक्राणु का शिक्षण है जो ,गर्भ से रहती स्त्री के आसपास का वातावरण है ,वह जो पालने से परिणय के दिन तक का संस्कार वातावरण है वह तो “”रह ही गया ”
अब वह आवे तो कहाँ से ,
पुस्तकेषु का विद्या ?????
परहस्ते गतं धनं !!!!!
यही मूल बात है ,
ब्राह्मण बनने से भारतीयता में कहीं भी रोक नहीं है ,परन्तु यदि शहीद की संतान का सम्मान है ,अधिकारी के परिवार को पेंशन है ,शरणार्थी की संतानों को मुआवजा है तो ,ज्ञान तप में रही पीढ़ियों की संतानों को भी सामाजिक सम्मान मिलना ही चाहिये ।
बंदऊ प्रथम महीसुर चरणा ,मोह जनित संशय सब हरणा

देखिये ब्राह्मणवाद कहकर जिस ज्ञान तत्व को कुटिया में रहकर याचक होकर भी धर्म धारा से कण कण जोड़े रखने के लिये दुत्कारा जाता है तो कारण है कि न ब्राह्मण होगा न ही कोई रिलीजनीकरण मजहबीकरण में बाधा बनेगा ,क्योंकि यही तो वह अमूर्त तत्व है जो सबको बता जता समझा देता है कि तुम हो कौन करना क्या है क्या नहीं और सनातन है क्यों इसकी श्रेष्ठता क्यों है इसी वर्ग के कारण संस्कृत हवन होम वैदिक पाठ कथा मंत्र जनेऊ तिलक जीवित हैं अन्यथा तो ,गए कब के गए .Image result for ब्रह्म तत्व के बिना ब्राह्मण

अपनी दुर्दशा के स्वयं ब्राह्मण दोषी तो है हीं ,परन्तु उनको बनाया गया साजिशन ,
एक उदाहरण देते है सच्चा ,
हमारे एक उपरोहित जी थे ,
कौटुंबिक मंदिर की सेवा में रहते ,बाग पर आते जाते ,उनको हमारे पुरखों ने कुछ बीघे खेत दान में दे दिये थे और संपन्न होकर रहते थे ,
फिर भी माँ हर मंगलवार को सीधा और हर तीज त्यौहार पर वस्त्रादिक देना नहीं भूलतीं थीं ,
उनका परिवार उनके गाँव का एकमात्र विद्वान परिवार है ,
,
इधर जब प.उ.प्र.में आये तो ,
हमारे पुरोहित जी का अचानक देहांत हो गया ,
नाबालिक नादान लड़के जो अल्पविद्या रह गये ,आस पास एक भी वैदिक संस्कृत विद्यालन होने से पुरोहित कर्म भी न सीख सके ,
हिस्से आया पुराना खंडहर घर ,
और कुछ कृषक यजमान जो केवल सौ सवा सौ रुपये देकर यदा कदा कथा करा लेते ,
दस रुपये राखी पर, पाँच गन्ने देवोत्थान पर और सवामीटर कपड़ा दीवाली पर पकड़ा देते ,चैत में पाँच पाँच किलो अनाज ,Image result for ब्रह्म तत्व के बिना ब्राह्मण
,
इतने से जीना कठिन ऊपर से माँ का कूल्हा टूट गया ,
,
मजबूरन हमने बच्चों को कुछ पुस्तकें लाकर दी मथुरा से ,
कुछ पूजा पाठ सिखाया ,
और कुछ उनकी बीमार माँ ने ,
पेट के लिये किराना स्टोर खोला ,ब्रश कारखाने में काम किया ,छोटा तो फरीदाबाद चला गया ,
बड़ा पंडिताई करता है ,
परन्तु अल्पज्ञ होने से ,पर्याप्त आसरा ज्ञान नहीं है ,
तो ?
क्यों नहीं ब्राह्मण के लिये मदरसे जैसी ,चर्च जैसी कोई संस्था रहने पाई ? कारण वही कि सेकूलरिज्म मतलब संस्कृत सनातन और वैदिक परंपरा का नाश

ज्ञान का मान समाप्त होता है तो ,रह जाता है देहपिंड ,
वह क्या पहने खाये ?
हमारे सहपाठी थे गुरुभाई भी ,पहले कचहरी में नौकरी करते थे ,मामूली वेतन पर किराये के कमरे में रहते ,
हमने एक मैया की तसवीर राखी बंधन पर दे दी ,
आज देवीभागवताचार्य है करोड़पति भी ,
यह समझने समझाने का जिम्मा भी विप्र का ही है ,
कि
ज्ञान का मान कम कराया ही साजिश के तहत था ।
पुरोहित जी को दिये गये खेत जोतने बोने तक हमारे लोग जाते रहे ताकि वे ,वह कर सकें जिसमें वे अधिक कर सकते हैं ,
अब आप हमसे ही कहिये कि ,दिन भर हल चलाकर पंडित जी रात को कितना पुराण लिख सकते हैं ?Image result for ब्रह्म तत्व के बिना ब्राह्मण

पांडित्य कर्म को छोटा ,
बतवाया गया ,
हर कहानी का खलनायक बनाया गया ,
शिखा ,मुंडन तिलक जनेऊ पीले वस्त्र खड़ाऊ देखते ही साष्टांग प्रणाम हो जाने वाला भारतीय उनका मज़ाक बनाने लगा ,जबकि ,ऊँचे पाजामे लंबी दाड़ी केश कच्छा कड़ा कृपाण नगन दिगंबर सफेद चोगे का मजाक कभी नहीं बनाया गया ।
क्यों ?
क्योंकि
यह साष्टांग दंडवत् करते रहने वाला ,भारतीय कभी धर्म परिवर्तन को राजी ही नहीं होता ।Image result for ब्रह्म तत्व के बिना ब्राह्मण
मुझे बहुत से दूर पासके कुटुंबी नहीं चाहते कि मैं रहूँ ,क्योंकि मेरे न होने से यह सब जायदाद उनकी होगी यह बिलकुल वैसा ही है

नारि मुई गृह संपति नासी
मूड़ मुड़ाई भए सन्यासी
जाके नख अरु जटा विशाला
सोई तपसी कलिकाल कराला
(सादर साष्टांग दंडवत् प्रणाम समस्त ब्राह्मणों को )

©®सुधा राजे लेखक,पत्रकार ,अधिवक्ता के साथ-साथ प्रसिद्ध कवियित्रि भी हैं ।

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