बेटी के खतने पर  मां को 11 साल की कैद

ब्रिटेन की एक अदालत ने युगांडा की महिला को बेटी का खतना करने पर 11 साल की जेल की सजा सुनाई। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि महिला ने न सिर्फ एक मां के तौर पर बल्कि संरक्षक के तौर पर भी बच्ची के विश्वास को ठेस पहुंचाई। कोर्ट ने घर के अंदर हुए इस काम को क्रूर और बच्चों का शोषण करनेवाला माना।
सांकेतिक चित्र
हाइलाइट्स

  • युगांडा मूल की महिला को ब्रिटिश कोर्ट ने 11 साल की जेल की सजा सुनाई
  • कोर्ट ने खतना की प्रक्रिया को क्रूर और बच्चों के शोषण का अपराध माना
  • कोर्ट ने कहा, ‘एक मां के तौर पर भी महिला ने अपनी बेटी के विश्वास को आहत किया
  • ब्रिटेन में पहली बार किसी शख्स को खतना के लिए 11 साल की सख्त सजा दी गई है
लंदन:ब्रिटेन में पहली बार किसी शख्स को खतना करने के लिए जेल की सजा सुनाई गई है। ब्रिटेन की एक अदालत ने महिला को 3 साल की बच्ची का खतना करने के लिए 11 साल की जेल की सजा सुनाई है। कोर्ट ने इसे अप्राकृतिक क्रूरता की श्रेणी में रखते हुए कहा कि घर में बच्ची के साथ यह क्रूरता हुई, जहां उसे खुद को सबसे सुरक्षित महसूस करना चाहिए था। इस तरह के मामले में दोषी पाई जाने वाली यह पहली महिला है। युगांडा की इस महिला ने 2017 में पूर्वी लंदन में स्थित अपने घर पर इस घटना को अंजाम दिया था। जस्टिस ने इसे बर्बर और घिनौना अपराध करार दिया। जज ने कहा कि खतना ब्रिटेन और यूगांडा दोनों जगह बैन है, उसके बाद भी महिला ने ऐसा किया।
जस्टिस फिलिपा व्हिपल ने सजा का ऐलान करते हुए कहा, ‘यह पूरी तरह से स्पष्ट होना चाहिए कि एफजीएम (महिलाओं का खतना) भी बच्चों के साथ यौन शोषण का ही एक रूप है।’ युगांडा मूल की महिला को सजा सुनाने का ऐलान करते हुए कोर्ट ने कहा, यह एक बेहद क्रूर प्रथा है।’
ब्रिटेन में 30 साल से अधिक समय से इस क्रूर प्रथा को बंद किया जा चुका है। इसके बाद महिला को इस मामले में सजा सुनाई गई है। जज ने महिला के अपराध को गंभीर और क्रूर की श्रेणी में मानते हुए कठोर सजा देने का फैसला किया। कोर्ट ने घर में हुए खतना को भी गंभीर मुद्दा बताया।
दोषी करार दी गई महिला का नाम कानूनी कारणों से जाहिर नहीं किया गया। कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान संवेनशीलता और सुरक्षा के मुद्दे को उठाया। जज ने फैसले में कहा, ‘इस केस से जुड़े कुछ संवेदनशील पहलू पर भी गौर किया जाना चाहिए। जिस बच्ची का खतना हुआ वह महज 3 साल की थी और अपने घर में थी। घर जहां, उसे खुद को सबसे सुरक्षित अहसास होना चाहिए था। एक मां के तौर पर एक संरक्षक के तौर दोषी महिला ने विश्वास को तोड़ा है। औरतों का खतना एक ऐसी प्रथा है जो आज भी भारत समेत दुनिया के बहुत से हिस्सों में जारी है. भारत में औरतों का खतना दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय में सीमित है. बोहरा शिया मुसलमान होते हैं जिनकी आबादी भारत में मुंबई, मध्यप्रदेश और गुजरात में अधिक है. बोहरा समुदाय के आदमी सुनहरे रंग की कढ़ाई वाली टोपी पहनते हैं और औरतों के बुर्कें रंगीन और खूबसूरत कढ़ाईदार होते हैं. इस कारण इस समुदाय के लोगों को आसानी से पहचाना जा सकता है.
वैसे तो बोहरा मुसलमान बहुत प्रोग्रेसिव माने जाते हैं, लेकिन औरतों का खतना करने की इस अमानवीय प्रथा को अभी तक छोड़ नहीं पाए हैं. जैसे ही कोई लड़की 7 साल की होती है, पहले दाइयों और अब डॉक्टरों द्वारा उनका खतना करवा दिया जाता है.क्लिटोरिस का ऊपरी हिस्सा काटकर अलग कर दिया जाता है:
औरतों के जननांग में क्लिटोरिस का बहुत अहम रोल है. यह हिस्सा बच्चे पैदा करने से तो नहीं जुड़ा है लेकिन सेक्शुअल इंटरकोर्स के दौरान औरत के ओर्गैज्म में क्लिटोरिस की मुख्य भूमिका होती है. यह एक उभरा हुआ हिस्सा होता जो वजाइना से थोड़ा ऊपर पाया जाता है. खतना करने के लिए क्लिटोरिस का उभरा हुआ हिस्सा काट दिया जाता है.
इसके पीछे बोहरा समाज के कुछ लोग एक दलील भी पेश करते हैं. क्लिटोरिस को बोहरा समाज में ‘हराम की बोटी’ भी कहा जाता है. उनके मुताबिक छोटी उम्र में ही इस अंग को काट देने से लड़की के मन में सेक्स के प्रति ‘अप्राकृतिक’ इच्छाएं नहीं उपजतीं. उनका मानना है कि जिन लड़कियों का खतना होता है, वो अपने पति के प्रति ज्यादा इमानदार होती हैं. कुल मिलाकर महिलाओं के खतना करने का मकसद उनकी सेक्शुअल इच्छाओं को मार देना है!
जब एक पीड़ित ने खतना रुकवाने के लिए लिखी प्रधानमंत्री को चिट्ठी:
मासूमा रानाल्वी बोहरा समाज से आती हैं और औरतों पर होने वाले जुर्म के खिलाफ लड़ रही हैं. उन्होंने साल 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खत लिखा. इस खत में उन्होंने कहा कि ट्रिपल तलाक पर प्रधानमंत्री का रवैया काबिलेतारीफ रहा लेकिन देश में मुसलमान औरतों की यह अकेली मुसीबत नहीं है.

खुद भुक्तभोगी रही हैं मासूमा रानाल्वी

इंडियन एक्सप्रेस अखबार में छपे इस खत में उन्होंने लिखा, “खतना मासूम बच्चियों का किया जाता है, जिनमें तब तक अपने शरीर को लेकर समझ भी पैदा नहीं हुई होती. शारीरिक और मानसिक रूप से बच्चियों पर इसका बहुत बुरा असर पड़ता है. बच्चियां इस दर्द को सह नहीं पातीं और हर साल बहुत सी बच्चियां इस दर्द से या तो कोमा में चली जाती हैं या उनकी मौत हो जाती है.”
मासूमा की भी है एक दर्दनाक कहानी:
यह कहानी पढ़ते हुए आपका विचलित होना स्वाभाविक है. अगर आप चाहें तो इसे ना पढ़कर अगले हिस्से की ओर बढ़ सकते हैं. सोचिए, उन लड़कियों के बारे में, जिन्हें ऐसी जिंदगी जीने के लिए मजबूर किया जाता है.
मासूमा ने बहुत से मौकों पर अपनी कहानी भी साझा की है. वो बताती हैं कि जब वो 7 साल की हुईं, एक रोज उनकी दादी उन्हें मुंबई के बोहरा मोहल्ले में लेकर गईं, आइसक्रीम का लालच देकर. संकरी, अंधेरी गलियों से होते हुए वो लोग एक घर की पहली मंजिल पर पहुंचे. वहां एक औरत पहले से मौजूद थी, जिसने मासूमा को जमीन पर लेटने को कहा और खिड़कियों के पर्दे लगा दिए.
फिर उस औरत ने मासूमा की पैंट उतारी और कहा कि थोड़ा सा दर्द होगा. उस 7 साल की बच्ची को समझ ही नहीं आ रहा था कि ये हो क्या रहा था. उसने अपनी दादी का हाथ कसकर पकड़ लिया. दर्द से तड़प उठी वो बच्ची और अचानक उस औरत ने उसकी पैंट वापस चढ़ा दी और उन्हें घर वापस भेज दिया. घर आकर मासूमा अपनी मां से लिपटकर बहुत रोई. मां ने कहा कि वो जल्द ही ठीक हो जाएगी. वो घाव तो भर गया, लेकिन इसका दिमाग पर जो असर पड़ा, मासूमा कहती हैं कि वो आजतक उनके साथ चलता है.

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