बांग्ला तथा अंग्रेज़ी लेखक ‘अंतिम भूरा साहब’ नीरद सी चौधरी का जन्म हुआ था आज

23 नवंबर का इतिहास 23 November History

 पोप एलेक्जेंडर तृतीय निर्वासन के बाद 1165 में  रोम वापस लौटे।
  • ब्रिटिश प्रधानमंत्री जान कार्टरे ने 1744 में इस्तीफा दिया।
  • वियतनाम की राजधानी हनोई पर 1873 में फ़्रांस के सैनिकों का अधिकार हो गया।
  • इटली में 1890 में आम चुनाव हुये।
  • लोमानी कांगो के युद्ध में बेल्जियम ने 1892 में अरब को हराया।
  • अमेरिका के सेंट लुईस में 1904 में तीसरे ओलंपिक खेलों का समापन।
  • जर्मनी की गुस्ताव स्ट्रेसीमैन की गठबंधन सरकार का 1923 में पतन हो गया।
  • वियतनाम के हैफ्योंग शहर में 1946 में फ्रांसीसी नौसेना के जहाज में लगी भीषण आग, छह हजार लोगों की मौत।
  • भारत में 1983 में पहली बार राष्ट्रमंडल शिखर सम्मेलन का आयोजन हुआ।
  • लंदन के व्यस्ततम ऑक्सफोर्ड सर्कस स्टेशन पर 1984 में आग लगने से क़रीब एक हज़ार लोग फंस गए थे।
  • इथियोपिया के एक अपहृत विमान का ईंधन समाप्त होने पर 1996 में वो हिंद महासागर में जा गिरा. इस विमान में चालक दल सहित कुल 175 लोग सवार थे जिनमें से कम से कम 100 लोग मारे गए।
  • साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता नीरद सी चौधरी Image result for नीरद सी चौधरीने 1997 में अपने जीवन के 100 वर्ष पूरे किये।
    नीरद सी चौधरी

    नीरद चौधरी को भारत के सबसे विवादास्पद लेकिन क़ाबिल लेखकों में माना जाता है. ‘द ऑटोबायोग्राफ़ी ऑफ़ एन अननोन इंडियन’, ‘कॉन्टिनेंट ऑफ़ सर्से’, ‘पैसेज टु इंग्लैंड’ जैसी पुस्तकों के लेखक नीरद चौधरी को पश्चिम में ज़रूर सराहा गया लेकिन भारत में उनको वो सम्मान कभी नहीं मिल पाया जिसके वो हक़दार थे.

    नीरद चन्द्र चौधरी (अंग्रेज़ीNirad Chandra Chaudhuri ; जन्म- 23 नवम्बर1897, किशोरगंज, पूर्वी बंगाल; मृत्यु- 1 अगस्त1999, ऑक्सफ़ोर्ड, इंग्लैण्डभारत में जन्मे प्रसिद्ध बांग्ला तथा अंग्रेज़ी लेखक और विद्वान, जिनकी अंतिम पुस्तक ‘थ्री हॉर्समेन ऑफ़ द न्यू एपोकैलिप्स’ (1997) का प्रकाशन उनके सौवें जन्मदिन से कुछ ही दिन पहले हुआ था।

    नीरद चन्द्र चौधरी का जन्म 23 नवम्बर, 1897 को पूर्वी बंगाल (आज का बांग्लादेश) के किशोरगंज में हुआ था। वकील पिताऔर निरक्षर माता के बेटे नीरद चन्द्र चौधरी का शेक्सपीयर तथा संस्कृत के शास्त्रीय ग्रंथों पर समान अधिकार था। वह अपनी संस्कृति के ही समान पश्चिमी संस्कृति के भी प्रशंसक थे। वह एक पांडित्यपूर्ण, लेकिन जटिल व सनकी व्यक्ति थे और उनकी सबसे सटीक व्याख्या ग़लत स्थान पर ग़लत समय में जन्मे व्यक्ति के रूप में की जा सकती है।खुशवंत सिंह उन्हें अपना गुरू मानते थे और कहा करते थे कि नीरद बाबू को इस बात में बहुत आनंद आता था जब ग़लत कारणों से उनकी आलोचना की जाती थी.ये सही है कि 1970 में इंग्लैंड जाने के बाद वो भारत कभी नहीं लौटे और वहीं ऑक्सफ़र्ड में बस गए लेकिन ये बहुत कम लोगों को पता है कि उन्होंने आख़िर तक अपने भारतीय पासपोर्ट को सरेंडर नहीं किया.

    ब्रिटिश शासन के वफ़ादार

    भारत के साहित्यिक परिदृश्य पर नीरद चन्द्र चौधरी का आगमन विवादों से घिरा हुआ था। वह ब्रिटिश शासन के प्रति वफ़ादार थे और उन्होंने अपनी पहली पुस्तक ‘द ऑटोबायोग्राफ़ी ऑफ़ एन अननोन इंडियन’ (1951) को ब्रिटिश साम्राज्य को समर्पित किया था। उनका दृढ़ विश्वास था कि “हममें जो कुछ भी अच्छा तथा जीवंत है, वह दो सौ वर्ष पुराने औपनिवेशिक शासन के दौरान ही पोषित और विकसित हुआ है।” अपनी असुरक्षाओं से जूझने की कोशिश कर रहे नव-स्वतंत्र राष्ट्र में, जहां उपनिवेश विरोधी भावनाएं चरम पर थीं, उनकी कृति का स्वागत नहीं हुआ। वह अस्वीकार्य व्यक्ति बन गए और उन्हें बौद्धिक यंत्रणाएं झेलनी पड़ीं। व्यवस्था ने उनके प्रति काफ़ी कड़ा रुख अपनाया और उन्हें ऑल इंडिया रेडियो से बाहर निकाल दिया गया, जहां वह प्रसारक तथा राजनीतिक टिप्पणीकार के रूप में कार्यरत थे।

    जबरन रिटायरमेंट

    नीरद चौधरी

    नीरद चौधरी को उनकी आकाशवाणी की नौकरी से सिर्फ़ इसलिए जबरन रिटायर किया गया था क्योंकि उन्होंने अपनी आत्मकथा को ब्रिटिश साम्राज्य को समर्पित किया था और ये फ़ैसला भारत सरकार में उच्चतम स्तर पर लिया गया था.ध्रुव चौधरी बताते हैं कि राष्ट्रीय अभिलेखागार में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का वो नोट सुरक्षित है जिसमें उन्होंने लिखा है कि अगर इन्हें भारतीय लोगों पर इतना भरोसा नहीं है तो उन्हें कहीं और चले जाना चाहिए.

    इंग्लैण्ड में निवासनीरद चन्द्र चौधरी

    नीरद चन्द्र चौधरी को ‘अंतिम ब्रिटिश साम्राज्यवादी’ और ‘अंतिम भूरा साहब’ कहा गया। उनकी कृति की लगातार आलोचना की गई तथा भारत के साहित्यिक जगत् से उन्हें निष्कासित कर दिया गया। स्वनिर्वासन के तौर पर 1970 के दशक में वह इंग्लैंण्ड रवाना हो गए और विश्वविद्यालय शहर ऑक्सफ़ोर्ड में बस गए। उनके लिए यह घर लौटने के समान था। लेकिन यह घर उस इंग्लैण्ड से काफ़ी भिन्न था, आदर्श रूप में चौधरी जिसकी कल्पना करते थे।

    सम्मान

    इंग्लैण्ड में भी नीरद चौधरी उतने ही अलग-थलग थे, जितने भारत में। अंग्रेज़ों ने उन्हें सम्मान दिया, उन्हें ‘ऑ’क्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय’ से मानद डॉक्टरेट की उपाधि मिली। उन्हें महारानी की ओर से मानद सी.बी.ई. से सम्मानित किया गया, लेकिन वे लोग उनकी दृढ़ भारतीयता के साथ ब्रिटिश साम्राज्य के पुराने वैभव की उनकी यादों के क़ायल नहीं हो पाए।

    चौधरी भी इंग्लैण्ड में कुछ वर्षों में हुए आमूलचूल परिवर्तन को स्वीकार नहीं कर पाए और मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता के पूर्ण अभाव से काफ़ी निराश हुए, क्योंकि इसी विशेषता ने एक समय में इंग्लैण्ड को महान् राष्ट्र बनाया था। उनकी ये भावनाएँ उनकी कृतियों और उनकी आत्मकथा के अंतिम खंड ‘दाई हैंड’, ‘ग्रेट एनार्क’ (1987) में प्रदर्शित होती है, जो उन्होंने 90 वर्ष की आयु में लिखी थी। उन्होंने लिखा कि- “अग्रेज़ों की महानता हमेशा के लिए समाप्त हो गई है।” उनके निबंधों की अंतिम पुस्तक ‘थ्री हॉर्समेन ऑफ़ द न्यू एपोकैलिप्स’ भारतीय नेतृत्व और राष्ट्र के पतन के बारे में टिप्पणी है।नीरद चौधरी अक्सर प्लेटो के उस कथन को उद्धृत किया करते थे कि वो जीवन जिस पर सवाल नहीं उठाए जाएं, वो जीने लायक़ नहीं हैं.नीरद सी चौधरी

    देशवासियों की प्रशंसा

    बाद के वर्षों में नीरद चन्द्र चौधरी को अपने देशवासियों की प्रशंसा मिली, जिन्होंने पहले उन्हें ग़लत समझा था और उनकी अनदेखी की थी। एक अधिक परिपक्व, सर्वदेशीय और आत्मविश्वास से युक्त उच्च वर्ग ने उनकी आत्मकथा के अंतिम खंड की प्रशंसा की। उन्होंने फिर से बांग्ला में लिखना शुरू किया और बाद में उन्हें कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में एक साहित्यिक पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

    निधन

    नीरद चन्द्र चौधरी का निधन 1 अगस्त1999 को ऑक्सफ़ोर्ड, इंग्लैण्ड में हुआ।

  • जी-20 की बैठक 2002 में नई दिल्ली में शुरू।
  • अमेरिका ने 2006 में रूस की जेट निर्माण कम्पनी सुखोई से प्रतिबंध हटाया।
  • ऑस्ट्रेलिया में 2007 में हुए चुनाव में लेबर पार्टी की जीत हुई।
  • फिलीपींन्स में 2009 में 32 मीडियाकर्मियों की हत्या।

23 नवंबर को जन्मे व्यक्ति

  • भारत में जन्मे प्रसिद्ध बांग्ला तथा अंग्रेज़ी लेखक और विद्वान नीरद चन्द्र चौधरी का जन्म 1897 में हुआ।
  • हिन्दी  के प्रमुख यशस्वी कथाकार कृश्न चन्दर का जन्म 1914 में हुआ।
  • डोनाल्ड टेनंट, अमेरिकी विज्ञापन एजेंसी के कार्यकारी का जन्म 1922 में हुआ।
  • आध्यात्मिक गुरू साई बाबा का जन्म 1926 में हुआ।
  • प्रसिद्ध पाश्र्वगायिका गीता दत्त का जन्म 1930 में हुआ।

23 नवंबर को हुए निधन

  • क्रांतिकारी लेखक, इतिहासकार तथा पत्रकार सखाराम गणेश देउसकर का निधन 1912 में हुआ।
  • वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस का निधन 1937 में हुआ।
  • फ़्रांस के प्रसिद्ध लेखक और कलाविद आंद्रे मैलरो का निधन 1976 में हुआ।
  • संसद के लोकसभा सदस्य और संस्कृत के विद्वान् साथ ही आर्य समाज के नेता के रूप में प्रसिद्ध प्रकाशवीर शास्त्री का निधन 1977 में हुआ।
  • 20वीं सदी के सबसे महान् लेखकों में शुमार रोल्‍ड डाॅल का निधन 1990 में हुआ।

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