बस दस साल और… फिर बूंद-बूंद पानी को तरसेगा भारत

भारत के कई इलाकों में जलसंकट से लोग नाराज़ हैं. चेन्नई में लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं. (फाइल फोटो)

अपने एशियाई पड़ोसी देशों की तुलना में भारत के पास कहीं ज़्यादा जल संसाधन हैं. इसके बावजूद जलस्रोत देश की नीतियों की बलि चढ़ रहे हैं. समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो अंजाम बेहद खतरनाक होंगे.
भारत में पानी जानलेवा ज़हर बनने की ओर है. देश के नीति निर्माताओं ने पानी के साथ इतनी बदसलूकी की और दुरुपयोग की इजाज़त दी कि कई इलाकों में पीने का पानी खत्म हो चुका है. ये हालात और खराब हो सकते हैं अगर समय रहते ज़रूरी कदम न उठाए गए. कृषि के साथ ही नदियों और जलस्रोतों को लगातार प्रदूषित कर रहे उद्योगों से जुड़े सख़्त कदम उठाने होंगे. आइए ज़रा पड़ताल करें कि कहां क्या और कितना ग़लत हुआ.आज के ज़माने में पानी से जुड़ी लड़ाइयों की पुराने समय की बातें बेमानी ज़रूर हैं, लेकिन देश में हकीकत डरावनी हो चुकी है. अब हालात ये हैं कि इस जंग में समाज के तमाम धड़े शामिल हो गए हैं – उद्योग, कृषि, आम आदमी और सत्ता से जुड़े लोग तक.

इस विषय के केंद्र में एक विडंबना है और वो ये कि भारत को अपने पड़ोसी देशों की तुलना में भरपूर पानी का वरदान मिला. इसके बावजूद भारत में पानी के साथ इस कदर बदसलूकी हुई कि अब स्थिति गंभीर हो चुकी है. क्लाइमेट चेंज को भी मद्देनज़र रखा जाए, तो एक दशक के भीतर पानी की समस्या भारत को पंगु बना सकती है.

भ्रष्टाचार से निपटना चुनौती है
जलस्रोतों को साफ रखने के कामों के मद्देनज़र पानी से जुड़ा भ्रष्टाचार बहुत बड़े स्तर का है. पश्चिमी घाटों के पर्यावरणीय नुकसान के मुद्दे पर गाडगिल कमेटी की रिपोर्ट कहती है कि उद्योगों ने कुछ इलाकों में कैसे और किस स्तर तक भूमिगत जलस्रोतों को नुकसान पहुंचाया. स्पष्ट तौर पर, प्रदूषण नियंत्रण अधिकारियों ने कायदों और पैमानों का अध्ययन नहीं किया. नतीजा ये है कि देश में भूमिगत जलस्रोत भी प्रदूषित हो चुके हैं.

महाराष्ट्र के राजनीतिज्ञों ने अपने गन्ना खेती के साम्राज्यों को खड़ा करने के लिए पानी का अंधाधुंध अपहरण तक किया. नतीजतन, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में कृषि संकट मुंह बाए खड़ा है. भविष्य को ध्यान में रखते हुए पानी से जुड़ी योजनाओं के निर्माण और क्रियान्वयन करने में भी देश के नीति निर्माता नाकाम रहे. ये इसलिए भी चिंता का विषय है क्योंकि पानी के लंबे समय तक इस्तेमाल के तरीकों पर फोकस नहीं रहा.

बनी हुई है पानी के लिए स्पष्ट नीतियों की ज़रूरत
ये भी ध्यान देने लायक है कि अगर क्लाइमेट चेंज पूरी दुनिया को प्रभावित करेगा, तो भारत कैसे बच सकता है? इस सवाल से इतर भारत में तेज़ी से उद्योगों का विकास हो रहा है. मतलब कि उद्योग ज़्यादा पानी चूस रहे हैं. जलसंकट का कारण बन रहे हैं. ऐसे में, औद्योगिक विकास के मद्देनज़र देश में पानी से जुड़ी स्पष्ट योजनाएं होना ज़रूरी है. जिस तरह प्राथमिक शिक्षा या स्वास्थ्य के मुद्दे अ​हमियत रखते हैं, उसी तरह पानी का भी लेकिन असलियत ये है कि देश तीनों ही मुद्दों पर बुरी तरह पिछड़ रहा है.

औद्योगिकीकरण के साथ इस बात का ध्यान रखना भी ज़रूरी है कि कृषि पर इसका प्रतिकूल असर न पड़े. कृषि संकट के लिए भारत में ज़मीन के विखंडन को दोष दिया जाना ठीक नहीं है. चीन ने ये साबित करके दिखाया है कि कम पानी के बावजूद ज़्यादा उत्पाद कैसे पैदा किए जाते हैं. इस सबका मतलब यही है कि भारत ने ये समझा ही नहीं कि औद्योगिकीकरण से पहले यही शर्त होती है कि खपत, वॉटर हार्वेस्टिंग, रीसाइकिलिंग और ट्रीटमेंट से जुड़ा बेहतर जल प्रबंधन हो.

इस चार्ट के ज़रिये समझें. तुलनात्मक रूप से कम विकसित इलाकों में ज़्यादा पानी कृषि के लिए इस्तेमाल होता है. कृषि का पानी पर दावा सबसे बड़ा है. लोग पानी के सबसे बड़े उपभोक्ता नहीं होते. वो सिर्फ 10 फीसदी तक पानी का इस्तेमाल करते हैं.

किसी को न बख़्शने का इरादा ज़रूरी
समस्या तब शुरू होती है जब इलाकों में उद्योग आते हैं. उद्योग ज़्यादा पानी की मांग करते हैं, 50 फीसदी से भी ज़्यादा. उद्योगों के लिए ज़रूरी है कि उन्हें पानी मिले लेकिन साथ ही, उनके ज़रिये पानी का संरक्षण और संवर्धन भी होता रहे, ऐसी नीतियां हों. ऐसी नीतियां होतीं तो नमामि गंगे जैसी योजनाओं की ज़रूरत ही नहीं थी. क्या सरकारों ने अपना काम ठीक से किया? भारत की नदियों में जितना जीवनदायी पानी था, क्या उनके साथ बदसलूकी पर लगाम कसी गई?

जल प्रबंधन के लिए ज़रूरी है बेहतर निरीक्षण बना रहे, कठोर जुर्माने हों, भले ही बात ब्यूरोक्रेट्स की हो, जजों की या राजनीतिज्ञों की. जो भी जल नीतियों का उल्लंघन करे उसके लिए सख़्त नियम हों. इसके अलावा, जलस्रोतों की धाराओं का प्रबंधन भूमिगत जलस्तर के लिए होना चाहिए. साथ ही, फसल के पैटर्न के लिए नीतियां, इलाकों के हिसाब से होनी ज़रूरी हैं. देश में कृषि और जल से संबंधित नीतियों में आमूलचूल परिवर्तन ही कारगर हो सकता है.

इन कदमों के लिए पहले से कहीं ज़्यादा राजनीतिक इच्छा का होना ज़रूरी है. अलग-अलग बहानों से पानी बर्बाद करने वाले नेताओं पर लगाम लगाना ज़रूरी है. कठोर नियमों का होना और उनका सख़्ती से पालन होना ज़रूरी है. नियम तोड़ने पर अगर प्रशासन पर कार्रवाई नहीं होगी तो आम लोगों में भी पानी के साथ बदसलूकी करने की प्रवृत्ति पर भी काबू नहीं पाया जा सकेगा. हो सकता है कि ये सब राजनीतिकों के लिए बहुत मुश्किल हो, लेकिन जब तक ऐसा होगा नहीं, भारत का भविष्य खतरे में रहेगा.

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