बजट  2019: यूनिवर्सल बेसिक इनकम के छह फॉर्म्युले, कौन  तरीका अपनाएगी सरकार ?

 इस बजट में यूनिवर्सल बेसिक इनकम (UBI) स्कीम का ऐलान होना करीब-करीब तय है। ऐसे में सवाल यह है कि मोदी सरकार इसे किस रूप में लागू करेगी। आइए देखतें हैं अलग-अलग अर्थशास्त्रियों ने कैसे-कैसे सुझाव दिए हैं।

नई दिल्ली :पिछले दिनों हिंदी बेल्ट के 3 राज्यों के विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के लिए अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करने के लिए नए सिरे से रणनीति बनानी पड़ रही है. इस बीच सूत्रों का कहना है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार लोकसभा चुनाव से पहले एक ऐसी योजना लाने की तैयारी कर रही है, जो चुनाव के दौरान ‘गेम चेंजर’ साबित हो सकती है.

सूत्रों के अनुसार, केंद्र सरकार की यह योजना किसानों की कर्जमाफी वाली योजना से भी दो कदम आगे हैं. इस स्कीम को UBI यानी Universal Basic Income स्कीम माना जा रहा है. इस स्कीम के दायरे में देश के सभी नागरिक आएंगे, इनमें किसान, व्यापारी और बेरोजगार युवा भी शामिल होंगे. इस योजना के तहत देश के हर नागरिक को 2,000 से 2,500 रुपये तक हर महीने दिए जा सकते हैं.

सरकार जीरो इनकम वाले सभी नागरिकों के बैंक खातों में एक तयशुदा रकम सीधा ट्रांसफर करेगी. जीरो इनकम वाले नागरिकों का मतलब साफ है कि वो नागरिक जिनके पास कमाई का कोई जरिया नहीं है.

सरकार किसानों के लिए सरकार एक अलग स्कीम लाने पर भी विचार कर रही है जिसके तहत कम कीमत पर फसल बेचने वाले किसानों के नुकसान की भरपाई की जाएगी. नुकसान की भरपाई के लिए जो भी रकम दी जाएगी, वो सीधे किसानों के बैंक खाते में ट्रांसफर की जाएगी.

सूत्रों के अनुसार पीएमओ में जल्दी ही अलग-अलग मंत्रालयों के साथ बैठक भी करेगा जिससे  जल्दी से जल्दी स्कीम का खाका तैयार किया जा सके.

खाते में कैसे आएगा पैसा?

यूनिवर्सल बेसिक इनकम योजना को लागू करने के लिए आधार नंबर का इस्तेमाल किया जाएगा. योजना में शामिल होने वाले नागरिक के बैंक खाते को आधार नंबर से लिंक किया जाएगा और फिर सरकार की ओर से दिए जाने वाले पैसे को सीधे उसके खाते में ट्रांसफर कर दिया जाएगा. अभी तक घरेलू गैस सिलेंडर पर मिलने वाली सब्सिडी खाते में ट्रांसफर होती थी, लेकिन हो सकता है कि इस स्कीम के लागू होने के बाद हर तरह की सब्सिडी बंद कर दी जाए.

लंदन के एक प्रोफेसर का था आइडिया

यूबीआई का सुझाव सबसे पहले लंदन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर गाय स्टैंडिंग ने दिया था जिनकी अगुवाई में मध्य प्रदेश के इंदौर के पास 8 गांवों में पांच साल के लिए एक पायलट प्रोजेक्ट चलाया गया. ट्रायल के तौर पर इन गांवों की 6,000 की आबादी के बीच 2010 से 2016 के बीच इस प्रोजेक्ट को चलाया गया. फिर 500 रुपये गांव वालों के बैंक खाते में हर महीने डाले गए. वहीं बच्चों के खाते में 150 रुपये जमा कराए गए. इससे लोगों को काफी फायदा हुआ.

प्रयोग के सफल होने के बाद प्रोफेसर स्टैंडिंग ने दावा किया कि मोदी सरकार इस स्कीम को लागू करने के लिए गंभीर है. शुरुआत में इस स्कीम के तहत आर्थिक सर्वे 2011 के आधार पर लोगों को शामिल किया सकता है.

इस स्‍कीम की चर्चा लंबे समय से की जा रही थी, लेकिन कहा जा रहा है कि हाल ही में विभिन्न मंत्रालयों से इस संबंध में राय मांगी गई है. इस स्कीम के तहत करीब 10 करोड़ लोग शामिल हो सकते हैं. साल 2016-17 के आर्थिक सर्वे में सरकार को इस स्कीम को लागू करने की सलाह दी गई थी. उम्‍मीद की जा रही है कि नए साल के बजट में इस बड़ी योजना का एलान हो सकता है.

1 फरवरी को पेश होने जा रहे अंतरिम बजट में यूनिवर्सल बेसिक इनकम(UBI) स्कीम की घोषणा लगभग तय है। ऐसे में कयास लगने लगे हैं कि सरकार इसे किस तरीके से लागू करेगी, न्यूनतम आय के रूप में कितने पैसे मिलेंगे, किन्हें मिलेंगे और कब-कब मिलेंगे। ऐसे में उन छह अर्थशास्त्रियों की राय जानना जरूरी है जिन्होंने यूबीआई लागू करने के लिए अपने-अपने सुझाव पेश किए हैं। इनमें से चार अर्थशास्त्रियों की राय में इस स्कीम का लाभ हरेक व्यक्ति को दिया जाना चाहिए। वहीं, दो अर्थशास्त्रियों ने विशेष वर्ग के लोगों को इसके दायरे में लाने का सुझाव दिया है।

अगर सिर्फ 67% आबादी को UBI दी जाती है तो GDP का 2.5% और 50% आबादी को इसका लाभ मिलता है तो GDP का 1.9% खर्च।
** करीब 10% आबादी
 

मिनिमम इनकम के पक्ष और विपक्ष में राय

समर्थन विरोध
गरीबी से लड़ाई: गरीबी और गरीबों को शोषण की वारदातों में कमी आएगी। गलत जगह पर खर्च: बिना मेहनत की आमदनी जरूरत की जगह लालच पूरी करने में खर्च होगी। पुरुष इस पैसे से नशे की लत पूरी करेंगे।
हर गरीब को लाभ: अभी हर कल्याणकारी योजना किसी लक्षित समूह तक ही सीमित होती है। चूंकि यूनिवर्सल बेसिक इनकम (UBI) के दायरे में एक-एक व्यक्ति आएगा, इसलिए एक भी गरीब का योजना के लाभ से वंचित रहने की आशंका खत्म हो जाएगी। अभी गरीबों की योजनाओं का 60% लाभ अमीर उठा रहे हैं। श्रमबल में कमी: चूंकि न्यूनतम आय से मूलभूत जरूरतें पूरी हो जाएंगी, इसलिए लोग का करना नहीं चाहेंगे। इससे मार्केट में श्रमिकों की कमी होगी। इससे मजदूरी बढ़ेगी और आखिर में महंगाई बढ़ेगी।
वित्तीय समावेशन: इससे वित्तीय समावेशन (फाइनैंशल इन्क्लूजन) के प्रयासों को गति मिलेगी क्योंकि सरकार मिनिमम इनकम की रकम लोगों के बैंक खातों में ही डालेगी। ज्यादा खातों के कारण बैंकों को ज्यादा लाभ होगा। साथ ही, बैंकों के पास ज्यादा धन जमा होंगे तो वे कम आय वाले जरूरतमंदों को ज्यादा कर्ज दे पाएंगे। कार्यान्वयन का झंझट: UBI से बैंकिंग सिस्टम पर दबाव बढ़ेगा क्योंकि अचानक करोड़ों लोगों का ट्रांजैक्शन शुरू हो जाएगा।
प्रशासनिक दक्षता में वृद्धि: कई सरकारी योजनाओं की जगह एक UBI को लागू करने में प्रशासनिक दक्षता भी बढ़ेगी। राज्यों पर प्रशासनिक बोझ कम होगा। बढ़ेगी मांग: एक बार योजना लागू हो गई तो कोई भी सरकार इसे खत्म करने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगी, भले ही भविष्य में इसका औचित्य नहीं रहे। यानी, इस योजना का हाल कुछ-कुछ आरक्षण जैसा हो जाएगा।
मनोवैज्ञानिक बढ़त: तयशुदा आमदनी मिलने के कारण लोगों को रोजमर्रा की जरूरतों से जूझने की जरूरत नहीं रहेगी। इससे उनकी रचनात्मकता बढ़ेगी और अपनी पसंद का काम दिलोजान से कर पाएंगे, न कि जरूरतें पूरी करने के दबाव में वह काम भी करेंगे जिनमें उनका मन नहीं लगता। इस तरह रचनात्मका के साथ-साथ उत्पादकता भी बढ़ेगी। करदाताओं पर दबाव बढ़ेगा: सरकार इस योजना की फंडिंग के लिए टैक्स दर बढ़ा सकती है या नया टैक्स लगा सकती है। अगर इनकम टैक्स में वृद्धि हुई तो मध्यवर्ग का खरीद क्षमता कम होगी जिसका उल्टा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

सूत्रों के मुताबिक इस स्कीम को अंतिम समय में बजट भाषण में शामिल किया जा सकता है। ये स्कीम अरविंद सुब्रमणियन के सुझाव से अलग होगी। बता दें कि आर्थिक सर्वे 2016-17 में इस स्कीम की सिफारिश की गई थी।

इस स्कीम में सबके बजाय सिर्फ गरीबों को शामिल किया जा सकता है। इसका आधार चल-अचल संपत्ति, आमदनी, पेशे को बनाया जा सकता है। सूत्रों के मुताबिक सरकार स्कीम के साथ सब्सिडी खत्म करने का कदम नहीं उठाना चाहती। सब्सिडी खत्म करने में राजनीतिक नुकसान की आशंका है। बता दें कि फूड सब्सिडी के तौर पर सालाना 169323 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। वहीं, मनरेगा में सालाना 55 हजार करोड़ रुपये खर्च होते हैं। सूत्रों के मुताबिक अगर स्कीम सफल हुई तो सब्सिडी किस्तों में खत्म की जा सकती है। इस स्कीम को पूरे देश में एक साथ लागू करने के बजाय चरणों में लागू किया जा सकता है। स्कीम को पहले पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर चुनिंदा जिलों में लागू किया जा सकता है।

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