फ्रांस के सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट और सातवें प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की ताजपोशी हुई थी आज

  • Read Why is history important day of December 2मंगलवार २ दिसंबर असम में दीफू रेलवे स्टेशन पर खड़ी लामडिंग तिनसुकिया मेल में धमाका हुआ, जिससे २ की मृत्यु व ३० घायल हुए।
  • 1804 – नेपोलियन बोनापार्ट की फ्रांस के सम्राट के तौर पर ताजपोशी की गई।
    नेपोलियन बोनापार्ट
    Jacques-Louis David - The Emperor Napoleon in His Study at the Tuileries - Google Art Project 2.jpg
    फ्रांस के सम्राट
    राज्यकाल 17 मई 1804 – 11 अप्रैल 1814
    20 मार्च 1814 – 22 जुन 1814
    राज्याभिषेक 2 दिसंबर 1804
    पूर्वाधिकारी स्वयं प्रथम वाणिज्य-दूत
    उत्तराधिकारी फ्रांस के लुई XVIII
    इटली के राजा
    राज्यकाल १७ मार्च १८०५ – ११ अप्रैल १८१४
    राज्याभिषेक २८ मई १८०५
    पूर्वाधिकारी स्वयं-इटली के राष्ट्रपति
    उत्तराधिकारी विक्टर इम्मान्युल द्वितीय
    पत्नी जोसेफीनब्युहनेंस और मेरी लुईस
    पूरा नाम नेपोलियन बोनापार्ट
    जन्म नेपोलियन बोनापार्ट
    १५ अगस्त १७६९ 
    अज़ाशियो
    मृत्यु 5 मई १८२१ (उम्र 51)
    लांगवुड, सेंट हेलेना
    कब्र लेस इनव्हालिडेस्
    सन्तान नेपोलियन द्वितीय
    कुल बोनापार्ट कुल
    पिता कार्लो बोनापार्ट

    नेपोलियन बोनापार्ट (15 अगस्त 1769 – 5 मई 1821) (जन्म नाम नेपोलियोनि दि बोनापार्टेफ्रान्स की क्रान्ति में सेनापति, 11 नवम्बर 1799 से 18 मई 1804 तक प्रथम कांसल के रूप में शासक और 18 मई 1804 से 6 अप्रैल 1814 तक नेपोलियन I के नाम से सम्राट रहा। वह पुनः 20 मार्च से 22 जून 1815 में सम्राट बना। वह यूरोप के अन्य कई क्षेत्रों का भी शासक था।इतिहास में नेपोलियन विश्व के सबसे महान सेनापतियों में गिना जाता है। उसने एक फ्रांस में एक नयी विधि संहिता लागू की जिसे नेपोलियन की संहिता कहा जाता है।

    वह इतिहास के सबसे महान विजेताओं में से एक था। उसके सामने कोई रुक नहीं पा रहा था। जब तक कि उसने 1812 में रूस पर आक्रमण नहीं किया, जहां सर्दी और वातावरण से उसकी सेना को बहुत क्षति पहुँची। 18 जून 1815 वॉटरलू के युद्ध में पराजय के पश्चात अंग्रज़ों ने उसे अन्ध महासागर के दूर द्वीप सेंट हेलेना में बन्दी बना दिया। छः वर्षों के अन्त में वहाँ उसकी मृत्यु हो गई। इतिहासकारों के अनुसार अंग्रेज़ों ने उसे संखिया (आर्सीनिक) का विष देकर मार डाला।

    मूल और शिक्षा

    तेईस (२३) वर्ष की आयु में नैपोलियन फ्रांस के नेशनल गार्ड में लेफ्टिनेन्ट कर्नल था।

    नैपोलियन कार्सिका और फ्रांस के एकीकरण के अगले वर्ष ही १५ अगस्त १७६९ ई॰ को अजैसियों में पैदा हुआ था। उसके पिता चार्ल्स बोनापार्ट एक चिरकालीन कुलीन परिवार के थे। उनका वंश कार्सिका के समीपस्थ इटली के टस्कनी प्रदेश से संभूत बताया जाता है। चार्ल्स बोनापार्ट फ्रेंच दरबार में कार्सिका का प्रतिनिधित्व करते थे। उन्होंने लीतिशिया रेमॉलिनो (Laetitia Ramolino) नाम की एक उग्र स्वभाव की सुंदरी से विवाह किया था जिससे नैपोलियन पैदा हुआ। चार्ल्स ने फ्रेंच शासन के विरुद्ध कार्सिकन विद्रोह में भाग भी लिया था, किंतु अंतत: फ्रेंच शक्ति से साम्य स्थापित करना ही श्रेयस्कर समझा। फ्रेंच गवर्नर मारबिफ (Marbeuf) की कृपा से उन्हें वर्साय की एक मंत्रणा में सम्मिलित होने का अवसर भी मिला। चार्ल्स के साथ उसकी द्वितीय पुत्र नैपोलियन भी था। उसके व्यक्तित्व से जिस उज्वल भविष्य का संकेत मिलता था उससे प्रेरित होकर फ्रेंच अधिकारियों ने ब्रीन (Brienne) की सैनिक अकैडैमी में अध्ययन करने के लिए उसे एक छात्रवृत्ति प्रदान की और वहाँ उसने १७७९ से १७८४ तक शिक्षा पाई। तदुपरांत पैरिस के सैनिक स्कूल में उसे अपना तोपखाने संबंधी ज्ञान पुष्ट करने का अवसर लगभग एक वर्ष तक मिला। इस प्रकार नैपोलियन का बाल्यकाल फ्रेंच वातावरण में व्यतीत हुआ।

    प्रारंभिक कैरियर

    सम्राट नेपोलियन, १८१२ में चित्रित

    बाल्यवस्था में ही सारे परिवार के भरण पोषण का उत्तरदायित्व कोमल कंधों पर पड़ जाने के कारण उसे वातावरण की जटिलता एवं उसके अनुसार व्यवहार करने की कुशलता मिल गई थी। अतएव फ्रेंच क्रांति में उसका प्रवेश युगांतरकारी घटनाओं का संकेत दे रहा था। फ्रांस के विभिन्न वर्गों से संपर्क स्थापित करने में उसे कोई संकोच या हिचकिचाहट नहीं थी। उसने जैकोबिन दल में भी प्रवेश किया था और २० जून के तुइलरिए (Tuileries) के अधिकार के अवसर पर उसे घटनाओं से प्रत्यक्ष परिचय हुआ था। फ्रांस के राजतंत्र की दुर्दशा का भी उसे पूर्ण ज्ञान हो गया था। यहीं से नैपोलियन के विशाल व्यक्तित्व का आविर्भाव होता है।

    नैपोलियन के उदय तक फ्रेंच क्रांति पूर्ण अराजकता में परिवर्तित हो चुकी थी। जैकोबिन और गिरंडिस्ट दलों की प्रतिद्वंद्विता और वैमनस्य के परिणाम स्वरूप ही उस ‘आतंक का शासन’ संचालित किया गया था, जिसमें एक एक करके सभी क्रांतिकारी यहाँ तक कि स्वयं राब्सपियर भी मार डाला गया था। १७९३ ई॰ में टूलान (Toulan) के घेरे में नैपोलियन को प्रथम बार अपना शौर्य एवं कलाप्रदर्शन का अवसर मिला था। डाइरेक्टरी का एक प्रमुख शासक बैरास उसकी प्रतिभा से आकर्षित हो उठा। फिर १७९५ में जब भीड़ कंर्वेशन को हुई थी, तो डाइरेक्टरी द्वारा विशेष रूप से आयुक्त होने पर नैपोलियन ने कुशलतापूर्वक कंवेंशन की रक्षा की और संविधान को होने दिया। इन सफलताओं ने सारे फ्रांस का ध्यान नैपोलियन की ओर आकृष्ट किया और डाइरेक्टरी ने उसे इटली के अभियान का नेतृत्व दिया (२ मार्च १७९६)। एक सप्ताह पश्चात् उसने जोज़ेफीन (Josephine) से विवाह किया और तदुपरांत अपनी सेना सहित इटली में प्रवेश किया।

    इतालवी अभियान तथा अन्य सैनिक अभियान

    Image result for नेपोलियन बोनापार्टइटली का अभियान नैपोलियन की सैनिक तथा प्रशासकीय क्षमता का ज्वलंत उदाहरण था। इस बात की घोषणा पूर्व ही कर दी गई थी कि फ्रेंच सेना इटली को ऑस्ट्रिया की दासता से मुक्त कराने आ गयी है। उसने पहले तीन स्थानों पर शत्रु को परास्त कर ऑस्ट्रिया का (Piedmont) से संबंध तोड़ दिया। तब सारडीनिया को युद्धविराम करने के लिए विवश कर दिया। फिर लोडी के स्थान में उसे मीलान प्राप्त हुआ। रिवोली के युद्ध में मैंटुआ को समर्पण करना पड़ा। आर्कड्यूक चार्ल्स को भी संधिपत्र प्रस्तुत करना पड़ा और ल्यूबन (Leoben) का समझौता हुआ। इन सारे युद्धों और वार्ताओं में नैपोलियन ने पेरिस से किसी प्रकार का आदेश नहीं लिया। पोप को भी संधि करनी पड़ी। लोंबार्डी को सिसालपाइन तथा जिनोआ को लाइग्यूरियन गणतंत्र में परिवर्तित कर फ्रेंच नमूने पर एक विधान दिया। इन सफलताओं से ऑस्ट्रिया के पैर उखड़ गए और उसे कैंपो फौर्मियों (Campo Formio) की संधि के लिए नैपोलियन के संमुख नत होना पड़ा तथा इस जटिल परिस्थिति में ऑस्ट्रिया को अपने बेललियम प्रदेशों से और राइन के सीमांत क्षेत्रों तथा लोंबार्डी से अपना हाथ खींच लेना पड़ा। नैपोलियन के इन युद्धों से तथा छोटे राज्यों को समाप्त कर वृहत् इकाई में परिवर्तित करने के कार्यों से, इटली में एक राष्ट्रीय आंदोलन खड़ा हुआ जो इतिहास में रीसॉर्जीमेंटो (Risorgimento) के नाम से प्रसिद्ध है।

    इटालियन अभियान से लौटने पर नैपोलियन का भव्य स्वागत हुआ। डाइरेक्टरी भी भयभीत हो गई तथा नैपोलियन को फ्रांस से दूर रखने का उपाय सोचने लगी। इस समय फ्रांस का प्रतिद्वंद्वी केवल ब्रिटेन रह गया था। नैपोलियन ने ब्रिटेन को हराने के लिए उसके साम्राज्य पर कुठाराघात न करना उचित समझा तथा अपनी मिस्र-अभियान-योजना रखी। डाइरेक्टरी ने उसे तुरंत स्वीकार कर लिया। १७९८ ई॰ में बोनापार्ट ने मिस्र के लिए प्रस्थान किया। ब्रिटेन पर प्रत्यक्ष आक्रमण करने के स्थान पर ब्रिटेन के पूर्वी साम्राज्य को मिस्त्र के माध्यम से समाप्त करने की योजना फ्रेंच शासकों को संगत प्रतीत हुई। मैमलुक तुर्की से इसका सामना पैरामिड के तथाकथित युद्ध में हुआ। किंतु ब्रिटिश नौसेना का भूमध्यसागरीय अध्यक्ष कमांडर नेल्सन नैपोलियन का पीछा कुशलतापूर्वक कर रहा था। उसने आगे बढ़कर फ्रांसीसियों को नील नदी के युद्ध में तितर-बितर कर दिया तथा टर्की को भी इंगलैड की ओर से युद्ध में प्रवेश करने के लिए विवश कर दिया। नेल्सन की इस सफलता ने ब्रिटेन को एक द्वितीय गुट बनाने का अवसर दिया और यूरोप के वे राष्ट्र, जिन्हें नैपोलियन दबा चुका था, फ्रांस के विरुद्ध अभियान की तैयारी करने लगे।Image result for नेपोलियन बोनापार्ट

    तुर्की के युद्ध में प्रविष्ट हो जाने पर नैपोलियन ने सीरिया का अभियान छेड़ा। केवल तेरह हजार की एक सीमित टुकड़ी के साथ एकर (Acre) की ओर बढ़ा किंतु सिडनी स्मिथ जैसे कुशल सेनानी द्वारा रोक दिया गया। यह नैपोलियन के लिए वरदान सिद्ध हुआ। अब नैपोलियन सीरिया में एक दूसरे फ्रेंच साम्राज्य की रचना में लग गया। किंतु फ्रांस इस समय एक नाजुक स्थिति से गुजर रहा था। अत: नैपोलियन ने मिस्र में अपनी सत्ता स्थापित करने में सफलीभूत होते हुए भी फ्रांस में प्रकट हो जाना वांछनीय समझा। नैपोलियन के फ्रांस में प्रवेश करते ही हलचल पैदा हो गई। अनुकूल वातावरण पाकर नवंबर, १७९९ में नैपोलियन ने सत्ता हथिया कर डायरेक्टरी का विघटन किया और नया विधान बनाया। इस विधान के अनुसार तीन कौंसल (Consul) नियुक्त हुए। कुछ समय पश्चात् सारी शक्तियाँ प्रथम कौंसल नैपोलियन में केद्रित हो गई। फ्रांस एक दीर्घ अशांति से थक चुका था तथा क्रांति को स्थापित्व की ओर ले जाने के लिए अन्तरकालीन शांति परम आवश्यक थी। किंतु शांति स्थापना के पूर्व ऑस्ट्रिया को नतमस्तक कर देने के लिए एक इटालियन अभियान आवश्यक था।

    नैपोलियन ने १८०० ई॰ में इटली का दूसरा अभियान बसंत ऋतु में प्रारंभ किया तथा मेरेंगो (Marengo) की विजय प्राप्त कर आस्ट्रिया को ल्यूनविल (Luneville) की संधि के लिए विवश कर दिया, जिसमें पहले की कैम्पोफोर्मियों की सारी शर्तें दोहराई गई। अब द्वितीय गुट टूट गया और नेपोलियन ने इंगलैंड से आमिऐं (Amiens) की संधि १८०१ ई॰ में की, जिसके अंतर्गत दोनों राष्ट्रों ने एक दूसरे के विजित प्रदेश वापस किए। अब नेपोलियन ने एक सुधार योजना कार्यान्वित कर फ्रांस को शासन और व्यवस्था दी। फ्रांस की आर्थिक स्थिति में अनुशासन दिया। शिक्षा पद्धति में अभूतपूर्व परिवर्तन किए। भूमिकर व्यवस्था सुदृढ़ की। पेरिस का सौंदर्यीकरण किया। सेना में यथेष्ट परिवर्तन किए तथा फ्रांस की व्यवस्था को एक वैज्ञानिक आधार दिया, जो अब भी नेपोलियन कोड के नाम से विख्यात है। पोप से एक कॉन कौरडेट (Concordat) कर कैथलिक जगत् का समर्थन प्राप्त कर लिया।

    फ्रांस का सम्राट

    बर्लिन में नैपोलियन का प्रवेश (२७ अक्टूबर १८०६)

    इन सुधारों से नैपोलियन को यथेष्ट सफलता प्राप्त हुई और मार्च १८०४ ई॰ में वह फ्रांस का सम्राट् बन गया। इस घटना से सारे यूरोप में एक हलचल पैदा हुई। फ्रांस और ब्रिटेन के बीच फिर युद्ध के बादल मंडराने लगे। नैपोलियन ने इंगलैंड पर आक्रमण करने के लिए उत्तरी समुद्री तट पर बोलोन(Boulogne) में अपनी सेना भेजी। इंगलैंड ने इसके उत्तर में अपने इंग्लिश चैनल स्थित नौसेना की टुकड़ी को जागरुक किया और फिर हर भिड़ंत में नैपोलियन को चकित करता गया। आमिऐं की संधि के समाप्त होते ही विलियम पिट शासन में आया और उसने इंगलैंड, ऑस्ट्रिया, यस आदि राष्ट्रों को मिलाकर एक तृतीय गुट (१८०५) बनाया। नैपोलियन ने फिर ऑस्ट्रिया के विरुद्ध मोर्चाबंदी की और सिसआलपाइन गणतंत्र को समाप्त कर स्वयं इटली के राजा का पद ग्रहण किया। ऑस्ट्रिया को उल्म (Ulm) के युद्ध में हराया। ऑस्ट्रिया का शासक फ्रांसिस भाग गया और जार की शरण ली। इधर ट्राफलगर के युद्ध में नेलसन ने नैपोलियन की जलसेना को हरा दिया था, जिससे ऑस्ट्रिया को फिर से नैपोलियन को चुनौती देने का मौका मिल गया था। लेकिन आस्टरलिट्ज के युद्ध में हार जाने पर आस्ट्रिया को प्रेसवर्ग की लज्जापूर्ण संधि स्वीकार करनी पड़ी। इस सफलता से नैपोलियन का उल्लास बढ़ गया और अब उसने जर्मनी को रौंदना प्रारंभ किया। जेना (Jena) और आरसटेड (Auerstedt) के युद्धों में १४ अक्टूबर १८०६ ई॰ में हराकर राइन संधि की रचना कर अपने भाई जोसेफ बोनापर्ट के शासन को मजबूत किया। अब केवल रूस रह गया जिसे नैपोलियन ने जून १८०७ ई॰ में फ्रीडलैंड (Friedland) के युद्ध में हराकर जुलाई १८०७ की टिलसिट (Tilsit) की संधि के लिए विवश किया।

    सारे यूरोप का स्वामी हो जाने पर अब नेपोलियन ने इंगलैंड को हराने के लिए एक आर्थिक युद्ध छेड़ा । सारे यूरोप के राष्ट्रों का व्यापार इंगलैंड से बंद कर दिया तथा यूरोप की सारी सीमा पर एक कठोर नियंत्रण लागू किया। ब्रिटेन ने इसके उत्तर में यूरोप के राष्ट्रों का फ्रांस के व्यापार रोक देने की एक निषेधात्मक आज्ञा प्रचारित की। ब्रिटेन ने अपनी क्षतिपूर्ति उपनिवेशों से व्यापार बढ़ा कर कर ली, किंतु यूरोपीय राष्ट्रों की आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी और वे फ्रांस की इस यातना से पीड़ित हो उठे। सबसे पहले स्पेन ने इस व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह किया। परिणामस्वरूप नैपोलियन ने स्पेन पर चढ़ाई की और वहाँ की सत्ता छीन ली। इस पर स्पेन में एक राष्ट्रीय विद्रोह छिड़ गया। नेपोलियन इसको दबा भी नहीं पाया था कि उसे ऑस्ट्रिया के विद्रोह को दबाना पड़ा और फिर क्रम से प्रशा और रूस ने भी इस व्यवस्था की अवज्ञा की। रूस का विद्रोह नेपोलियन के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ। उसके मॉस्को अभियान की बर्बादी इतिहास में प्रसिद्ध हो गयी है। पेरिस लौटकर नेपोलियन ने पुन: एक सेना एकत्र की किंतु लाइपत्सिग (Leipzig) में उसे फिर प्रशा, रूस और आस्ट्रिया की संमिलित सेनाओं ने हराया। चारों ओर राष्ट्रीय संग्राम छिड़ जाने से वह सक्रिय रूप से किसी एक राष्ट्र को न दबा सका तथा १८१४ ई॰ में एल्बा द्वीप (Elba Island) भेज दिया गया। मित्र राष्ट्रों की सेनाएं वापस भी नहीं हो पायीं थीं कि सूचना मिली कि नेपोलियन का शतदिवसीय शासन शुरू हुआ। अत: मित्र राष्ट्रों ने उसे १८१५ में वाटरलू के युद्ध में हराकर सेंट हेलेना (St. Helena) का कारावास दिया। वहाँ १८२१ ई॰ में पाँच मई को उसकी मृत्यु हुई।

    नेपोलियन के सुधार

    नेपोलियन बोनापार्ट ने 1799 में सत्ता को हाथों में लेकर अपनी स्थिति सुदृढ़ करने तथा फ्रांस को प्रशासनिक स्थायित्व प्रदान करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में सुधार किए। वस्तुतः डायरेक्टरी के शासन को समाप्त कर नेपालियन ने सत्ता की थी और फ्रांस की जनता ने उस परिवर्तन को स्वीकार किया था तो इसका कारण था वह अराजकता और अव्यवस्था से उब चुकी थी। अतः नेपोलियन के लिए यह जरूरी था कि वह आंतरिक क्षेत्र में एक सुव्यवस्थित शासन और कानून व्यवस्था की स्थापना करे।

    संविधान निर्माण

    प्रथम काउंसल बनने के बाद नेपोलियन ने फ्रांस के लिए एक नवीन संविधाान का निर्माण किया जो क्रांति युग का चौथा संविधान था। इसके द्वारा कार्यपालिका शक्ति तीन कांउसलरों में निहित कर दी गई। प्रधान काउंसल को अन्य काउंसलरों से अधिक शक्ति प्राप्त थी। वास्तव में संविधान में गणतंत्र का दिखाया तो जरूर था लेकिन राज्य की सम्पूर्ण सत्ता नेपालियन के हाथों में केन्द्रित थी।

    प्रशासनिक सुधार

    नेपोलियन ने शासन व्यवस्था का केंन्द्रीकरण किया और डिपार्टमेण्त्स तथा डिस्ट्रिक्ट की स्थानीय सरकारों को समाप्त कर प्रीफेक्ट (perfects) एवं सब-प्रीफेक्ट्स की नियुक्ति की। इनकी नियुक्ति तथा गांव और शहरों के सभी मेयरों की नियुक्ति सीधे केंन्द्रीय सरकार से की जाने लगी। इस प्रकार प्रशासन के क्षेत्र नेपोलियन ने इन अधिकारियों पर पर्याप्त नियंत्रण रख प्रशासन को चुस्त-दुरूस्त बनाए रखा साथ ही योग्यता के आधार पर इनकी नियुक्ति की।प्रशासनिक क्षेत्रों में नेपोलियन के सुधार एक प्रकार से क्रांति के विरोधी के रूप में थे क्योंकि नेशनल एसेम्बली ने क्रांति के दौरान प्रशासनिक ढांचे का पूर्ण विकेन्द्रीकरण कर दिया था तथा देश का शासन चलाने का दायित्व निर्वाचित प्रतिनिधियों को दिया गया था लेकिन नेपालियन ने इस व्यवस्था को उलट दिया और क्रांतिपूर्व व्यवस्था को फिर से स्थापित किया। उस दृष्टि से वह क्रांति का हंता था।

    आर्थिक सुधार

    नेपोलियन ने फ्रांस की जर्जर आर्थिक स्थिति से उसे उबारने का प्रयत्न किया। इस क्रम में उसने सर्वप्रथम कर प्रणाली को सुचारू बनाया। कर वसूलने का कार्य केन्द्रीय कर्मचारियों के जिम्मे किया तथा उसकी वसूली सख्ती से की जाने लगी। उसने घूसखोरी, सट्टेबाजी, ठेकेदारी में अनुचित मुनाफे पर रोक लगा दी। उसने मितव्ययिता पर बल दिया और फ्रांस की जनता पर अनेक अप्रत्यक्ष कर लगाए। नेपोलियन ने फ्रांस में वित्तीय गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाने के लिए बैंक ऑफ फ्रांस की स्थापना की जो आज भी कायम है। राष्ट्रीय ऋण को चुकाने के लिए उसने एक पृथक कोष की भी स्थापना की। नेपोलियन ने जहां तक संभव हुआ सेना के खर्च का बोझ विजित प्रदेशों पर डाला और फ्रांस की जनता को इस बोझ से मुक्त रखने की कोशिश की। नेपोलियन ने कृषि के सुधार पर भी बल दिया और बंजर और रेतीले इलाके को उपजाऊ बनाने की योजना बनाई।व्यापार के विकास के लिए नेपोलियन ने आवागमन के साधनों की तरफ पर्याप्त ध्यान दिया। सड़कें, नहरें बनवाई गई विभिन्न प्रकार के व्यवसायों की प्रगति के लिए यांत्रिक शिक्षा की व्यवस्था की। फ्रांसीसी औद्योगिक वस्तुओं को लोकप्रिय बनाने के लिए प्रदर्शनी के आयोजन को बढ़ावा दिया और स्वदेशी वस्तुओं एवं उद्योगों को प्रोत्साहन दिया। बेरोजगारी की समस्या को दूर करने के लिए निर्माण कार्य को प्रोत्साहन दिया। इस तरह नेपोलियन ने फ्रांस को जर्जर और दिवालियेपन की स्थित से उबारा।

    किन्तु आर्थिक सुधारों की दृष्टि से भी नेपोलियन के कार्य क्रांति विरोधी दिखाई देते हैं। क्रांतिकाल में प्रत्यक्ष करो पर बल दिया गया था जबकि नेपोलियन ने अप्रत्यक्ष करों पर बल देकर पुरातन व्यवस्था को स्थापित करने की कोशिश की। इसी प्रकार नेपोलियन ने वाणिज्यिवादी दर्शन को प्राथमिकता देकर क्रांतिविरोधी मानसिकता का प्रदर्शन किया। उसका मानना था कि राज्य को कोष की सुरक्षा एवं व्यापार में संतुलन लाने के लिए सक्रिय हस्तक्षेप करना होगा जबकि क्रांति का बल तो मुक्त व्यापार पर था।Image result for नेपोलियन बोनापार्ट

    शिक्षा संबंधी सुधार

    नेपालियन ऐसे नागरिकों को चाहता था जो उसके एवं उसके तंत्र के प्रति विश्वास रखे। इसके लिए उसने शिक्षा के राष्ट्रीय एवं धर्मनिरपेक्ष स्वरूप अपनाते हुए सुधार किए। शिक्षा को प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च स्तरों पर संगठित किया। सरकार के द्वारा नियुक्त शिक्षकों की सहायता से चलने वाले इन स्कूलों में एक ही पाठ्यक्रम, एक ही पाठ्यपुस्तकें एक ही वर्दी रखी जाती थी। नेपोलियन ने पेरिस में एक विश्वविद्यालय की स्थापना की और उसमें लैटिन, फ्रेंच, विज्ञान, गणित इत्यादि विषयों की शिक्षा दी जाती थी। यह यूनिवर्सिटी विश्वविद्यालय के सामान्य अर्थ में कोई यूनिवर्सिटी नहीं थी वरन् प्राथमिक से उच्चतर शिक्षा तक की सभी संस्थाओं को एकसूत्र में बांधने वाली एक व्यवस्था की। शिक्षा पर अधिकाधिक सरकारी नियंत्रण रखना तथा विद्यार्थियों को शासन के प्रति निष्ठावान बनाना इसका उद्देश्य था। नेपोलियन ने शोध कार्यों के लिए इंस्टीच्यूट ऑफ फ्रांस की स्थापना की।

    नेपोलियन की नारी शिक्षा में कोई रूचि नहीं दिखाई। उनकी शिक्षा का भार धार्मिक संस्थाओं पर छोड़ दिया गया।

    धार्मिक सुधार

    फ्रांस की बहुसंख्यक जनता कैथोलिक चर्च के प्रभाव में थी। क्रांति के दौरान चर्च की शक्ति को कमजोर कर उसे राज्य के अधीन ले आया गया। चर्च की सम्पति का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया और पादरियों को राज्य की वफादारी की शपथ लेने को कहा गया। इससे पोप नाराज हुआ और आम जनता को विरोध करने के लिए उकसाया। फलतः सरकार और आमजनता के बीच तनाव पैदा हो गया। नेपोलियन ने इसे दूर करने के लिए 1801 से पोप के साथ समझौता किया जिसे कॉनकारडेट (Concordate) कहा जाता है। उसके निम्नलिखित प्रावधान थे।

    • विशपों की नियुक्ति प्रथम काउंसलर के द्वारा होगी पर वे अपने पद में पोप द्वारा दीक्षित होंगे। शासन की स्वीकृति पर ही छोटे पादरियों की नियुक्ति विशप करेगा। सभी चर्च के अधिकारियों को राज्य के प्रति भक्ति लेना आवश्यक था। इस तरह चर्च राज्य का अंग बन गया और उसके अधिकारी राज्य से वेतन पाने लगे।
    • गिरफ्तार पादरी छोड़ दिए गए और देश से भागे पादरियों को वापस आने की इजाजत दे दी गई।
    • चर्च की जब्ज संपत्ति एवं भूमि से पोप ने अपना अधिकार त्याग दिया।
    • क्रांति काल के कैलेण्डर को स्थगित कर दिया गया तथा प्राचीन कैलेण्डर एवं अवकाश दिवसों को पुनः लागू कर दिया गया।
    • इस प्रकार नेपोलियन ने राजनीतिक उद्देश्यों से परिचालित होकर पोप से संधि की और क्रांतिकालीन अव्यवस्था को समाप्त कर चर्च को राज्य का सहभागी बनाया। प्रकारांतर से नेपोलियन ने चर्च के क्रांतिकालीन घावों पर मरहम लगाने की कोशिश की।
    • किन्तु इस समझौते के द्वारा नेपोलियन ने कैथोलिक धर्म को राज्य धर्म बनाकर राज्य के धर्मनिरपेक्ष भावना को ठेस पहुंचाई। धर्म को राज्य का अंग मानने वाले नेपोलियन का पोप के साथ यह समझौता अस्थायी रहा क्योंकि 1807 ई. में पोप के साथ उसे संघर्ष करना पड़ा तथा पोप के राज्य पर नियंत्रण स्थापित किया।Image result for नेपोलियन बोनापार्ट

    कानून संहिता (नेपोलियन कोड) का निर्माण

    नेपोलियन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और स्थायी कार्य था- विधि संहिता का निर्माण। वस्तुतः क्रांति के पहले फ्रांस की कानून व्यवस्था छिन्न-भिन्न थी और इतने प्रकार के कानून थे कि कानून का पालन कराने वालों को भी उनका ज्ञान नहीं था और क्रांति के दौरान भी यह अराजकता बढ़ गई थी। नेपोलियन ने इस अव्यवस्था को दूर किया। स्वयं नेपोलियन अपनी विधि संहिता को अपने 40 युद्धों से अधिक शक्तिशाली मानता था। इस कोड के द्वारा नेपोलियन ने फ्रांस में सार्वलौकिक कानून पद्धति की स्थापना की।नागरिक संहिता के तहत उसने परिवार के मुखिया का अधिकार सुदृढ़ किया। स्त्रियाँ पुरूषों के अधीन रखी गई और पति का कार्य पत्नी की रक्षा करना है। तलाक की पद्धति को कठिन बनाया गया। सिविल विवाह की व्यवस्था भी इस संहिता में की गई। इस प्रकार सिविल विवाह और तलाक की प्रथा को मान्यता देकर नेपोलियन ने यूरोप में इस बात का प्रचलन किया कि बिना पादरियों के सहयोग के भी समाज का काम चल सकता है।

    इस प्रकार अन्य संहिताएँ जैसे व्यापार संबंधी कानून संहिता, Code of Criminal Proc. आदि बनाए गए। उसके व्यापारिक कोड में श्रमजीवियों के हितों की उपेक्षा की गई थी और उनके संघों पर प्रतिबन्ध को जारी रखा गया था। इस दृष्टि से नेपोलियन ने क्रांति के आदर्शों के विरूद्ध कार्य किया।इसके बावजूद इस विधि संहिता की महत्ता समूचे देश में कानून की एकरूपता प्रदान करने तथा व्यावहारिक रूप से न्याय व्यवस्था को आसान बनाने में थी। जहाँ-जहाँ नेपोलियन की सेनाएँ गई यह संहिता लागू की गई और नेपोलियन के पराजय के बाद भी बरकरार रही। यह नेपोलियन की एक स्थायी कीर्ति है।नेपोलियन के विधि संहिता में बुर्जुआ वर्ग के हितों पर ज्यादा जोर दिया गया है। भूमि संबंधी अधिकारी को और मजबूत बनाया गया और व्यक्ति संपति की रक्षा को और मजबूत बनाया गया और व्यक्तिगत संपति की रक्षा के लिए कई कानून बनाए। टे्रड यूनियन बनाना अपराध घोषित किया गया। मुकदमें की स्थिति में मजदूरों की दलीलों के बदले मालिकों की बातों को न्यायालयों को मानने को कहा गया।

    सामाजिक क्षेत्र में सुधार

    नागरिक संहिता का आधार सामाजिक समता भी है। विशेषाधिकार और सामंती नियम का संहिता में कोई स्थान नहीं था। बड़े पुत्र को संपत्ति का उत्तराधिकारी मानने का कानून भी नहीं था संपत्ति पर सभी पुत्रों को बराबरी का अधिकार दिया गया। नेपोलियन ने समाज में एक नवीन कुलीन वर्ग की स्थापना की। उसने आय के हिसाब से उपाधियों का क्रम निर्धारित किया। नेपोलियन का यह कार्य क्रांति के आदर्शों के विपरीत था।

    नेपोलियन के पतन के कारणImage result for नेपोलियन बोनापार्ट

    युरोप राजनीतिक क्षितिज पर नेपोलियन का प्रादुर्भाव एक घूमकेतु की तरह हुआ और अपनी प्रक्रिया तथा परिश्रम के बल पर वह शीघ्र ही यूरोप का भाग्यविधाता बन बैठा। उसमें अद्भुत सैनिक तथा प्रशासनिक क्षमता से सभी को चकित कर दिया। परंतु उसकी शक्ति का स्तंभ जैसे बालु की भीत पर खड़ा था। जो कुछ ही वर्षों में ध्वस्त हो गया ! वस्तुत: नेपोलियन का उत्थान और पतन चकाचौंध करने वाली उल्का के समान हुआ। वह युरोप के आकाश में सैनिक सफलता के बल पर चमकता रहा परन्तु पराजय के साथ ही उसके भाग्य का सितारा डुब गया। जिस साम्राज्य की कठिन परिश्रम के पश्चात कायम किया गया था वह देखते ही देखते समाप्त हो गया उसके पतन के अनेक कारण थे ।

    असीम महात्वाकांक्षा-

    नेपोलियन असीम महात्वकांक्षी था। असीम महात्वकांक्षी किसी व्यक्ति के पतन का मुख्य कारण साबित होती है। नेपोलियन के साथ भी यही बात थी। युद्ध में जैसे- जैसे- उसकी विजय होती गई वैसे- वैसे महात्वकांक्षा बढ़ाता गया और वह विश्व राज्य की स्थापना का स्वपन देखने लगा। यदि थोड़े से ही वह संतुष्ट हो जाता और जीते हुए साम्राज्य की देखभाल करता और अपना समय उसमें लगाता तो उसे पतन का दुर्दशा नहीं देखना पड़ता।

    चारित्रिक दुर्बलता-

    नेपोलियन में साहस संयम और धैर्य कुट- कुट कर भरा था परन्तु उसकी दृष्टि में घृणा उसका प्रतिशोध उसका कर्तव्य तथा क्षमादान कलंक था। उसके चरित्र की बड़ी दुर्बलता यह थी कि वह संधि को सम्मानित समझौता नहीं मानता था। किसी भी देश की मैत्री उसके लिए राजनीतिक आवश्यकता से अधिक नहीं थी। धीरे- धीरे वह जिद्दी बनता गया उसे यह विश्वास था कि उसका प्रत्येक कदम ठीक है। वह कभी भूल नहीं कर सकता वह दूसरों की सलाह की उपेक्षा करने लगा। फलत: उसके सच्चे मित्र भी उससे दूर होते चले गए।

    नेपोलियन की व्यवस्था का सैन्यवाद पर आधारित होना-

    उसकी राजनीतिक प्रणाली सैन्यवाद पर आधारित थी जो इसके पतन का प्रधान कारण साबित हुआ। वह सभी मामलों में सेना पर निर्भर रहता था फलत: वह हमेशा युद्ध में ही उलझा रहा। वह यह भूल गया कि सैनिकवाद सिर्फ संकट के समय ही लाभकारी हो सकता है। जब तक फ्रांस विपत्तियों के बादल छाए रहे वहाँ की जनता ने उसका साथ दिया विपत्तियों के हटते ही जनता ने उसका साथ देना छोड़ दिया। फ्रांसीसी जनता की सहानुभुति और प्रेम का खोना उसके लिए घातक सिद्ध हुआ। उसके अतिरिक्त पराजित राष्ट्र उसके शत्रु बनते गए जो अवसर मिलते ही उसके खिलाफ उठ खड़े हुए। इतिहासकार काब्बन ने ठीक ही लिखा है। ‘नेपोलियन का साम्राज्य युद्ध में पनपा था युद्ध ही उसके अस्तित्व का आधार था और युद्ध में ही उसका अंत हुआ।’

    दोषपुर्ण सैनिक व्यवस्था-

    प्रारंभ में फ्रांस की सेना देश प्रेम की भावना से ओतप्रोत थी। उसके समक्ष एक आदर्श का और वह एक उद्देश्य की पूर्ति के लिए युद्ध करता था। परन्तु ज्यों- ज्यों उसके साम्राज्य का विस्तार हुआ सेना का राष्ट्रीय रूप विधितत होता गया। पहले उसकी सेना में फ्रांसीसी सैनिक ते परन्तु बाद में उसमें जर्मन इटालियन पुर्तेगाली और डच सैनिक शामिल कर लिया गया। फलत: उसकी सेना अनेक राज्यों की सेना बन गई। उनके सामने कोई आदर्श और उद्देश्य नहीं था। अत: उसकी सैनिक शक्ति कमजोर पड़ती गई और यह उसके पतन का महत्वपूर्ण कारण साबित हुआ।Image result for नेपोलियन बोनापार्ट

    नौसेना की दुर्बलता-

    नेपोलियन ने स्थल सेना का संगठन ठीक से किया था किन्तु उसके पास शक्तिशालि नौसेना का अभाव था, जिसके कारण उसे इंगलैंड से पराजित होना पड़ा। अगर उसके पास शक्तिशाली नौसेना होती तो उसे इंगलैंड से पराजित नहीं होना पड़ता।

    विजित प्रदेशों में देशभक्ति का अभाव-

    उसने जिन प्रदेशों पर विजय प्राप्त की वहीँ की जनता के ह्रदय में उसके प्रति सदभावना और प्रेम नहीं था। वे नेपोलियन की शासन से घृणा करते थे। जब उसकी शक्ति कमजोर पड़ने लगी तो उसके अधीनस्थ राज्य अपनी स्वतंत्रता के लिए प्रयत्न करने लगे। यूरोपीय राष्ट्र ने उसके खिलाफ संघ के लिए चतुर्थ गुट का निर्माण किया और इसी के चलते वाटरलु के युद्ध में उसे पराजित होना पड़ा।

    पोप से शत्रुता-

    महाद्वीपीय व्यवस्था के कारण उसने पोप को अपना शत्रु बना लिया। जब पोप ने उसी महाद्वीपीय व्यवस्था को मानने से इंकार कर दिया तो उसने अप्रैल 1808 में रोम पर अधिकार कर लिया। और 1809 ई. में पोप को बंदी बना लिया फलत: कैथोलिकों को यह विश्वास हो गया कि नेपोलियन ने केवल राज्यों की स्वतंत्रता नष्ट करने वाला दानव है। वरना उनका धर्म नष्ट करने वाला भी है।

    औद्योगिक क्रांति-

    कहा जाता है कि उसकी पराज वाटरलु के मैदान में न होकर मैनचेस्टर के कारखानों और बरकिंगधन के लोहे के भदियाँ में हुई। औद्योगिक क्रांति के फलस्वरुप इंगलैंड में बड़े -2 कारखाने खोले गए और देखते ही देखते इंगलैंड समृद्ध बन गया। फलत: वह अपनी सेना की आधुनिक हत्यार से सम्पन्न कर सका जो नेपोलियन के लिए घातक सिद्ध हुआ।

    महाद्वीपीय व्यवस्था-

    महाद्वीपीय व्यवस्था उसकी जबर्दस्त भुल थी। वह इंगलैंड को सबसे बड़ा शत्रु मानता था। इंगलैंड की शक्ति का मुख्य आधार नौसेना और विश्वव्यापी व्यापार ता उसकी नौशक्ति को नेपोलियन समाप्त नहीं कर सका इसलिए उसके व्यापार पर आघात करने की चेष्टा की गई। इसी उद्देश्य से उसने महाद्वीपीय व्यवस्था को जन्म दिया उसने आदेश जारी किया कि कोई देश इंगलैंड के साथ व्यापार नहीं कर सकता है। और न तो इंगलैंड की बनी हुई वस्तु का इस्तेमाल कर सकता है। यह नेपोलियन की भयंकर भूल थी। इस व्यवस्था ने उसे एक ऐसे जाल में फसा दिया जिससे निकलना मुश्किल हो गया। इसलिए महाद्वीपीय व्यवस्था इसके पतन का मुख्य कारण माना जाता है।Image result for नेपोलियन बोनापार्ट

    पुर्तेगाल के साथ युद्ध –

    पुर्तेगाल का इंगलैंड के साथ व्यापारिक संबंध था किन्तु नेपोलियन के दवाब के कारण उसे इंगलैंड से संबंध तोड़ना पड़ा। इससे पुर्तेगाल को काफी नुकसान हुआ। इसलिए उसने फिर से इंगलैंड के साथ व्यापारिक संबंध कायम किया। इसपर नेपोलियन ने क्रोधित होकर पुर्तेगाल पर आक्रमण कर दिया। यह भी नेपोलियन के लिए घातक सिद्ध हुआ।

    स्पेन के साथ संघर्ष-

    नेपोलियन की तीसरी भुल स्पेन के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप था। इसके लाखों सैनिक मारे गए। फलत: इस युद्ध में उसकी स्थिति बिल्कुल कमजोर हो गई जिससे उसके विरोधियों को प्रोत्साहन मिला ! जब नेपोलियन ने अपने भाई को स्पेन का राजा बनाया तो वहाँ के निवासी उस विदेशी को राजा मानने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने नेपोलियन की सेना को स्पेन से भगा दिया। उस विद्रोह से अन्य देशों को भी प्रोत्साहन मिला और वे भी विद्रोह करने लगे जिससे उसका पतन अवश्यम्भावी हो गया।

    रुस का अभियान-

    नेपोलियन ने रुस पर आक्रमण कर भारी भुल की ! रुस ने इसकी महाद्वीपीय व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया। इसपर नेपोलियन ने रुस पर आक्रमण कर दिया। इसमें यद्धपि मास्को पर इसका आधिकार हो गया लेकिन उसे महान क्षति उठानी पड़ी। उसके विरोधियों ने आक्रमण करने की योजना बनाई। इसे आक्रमण में उसे पराजित होना पड़ा।

    थकान-

    अनेक युद्ध में लगातार व्यस्त रहने के कारण वह थक चुका था 50 सैलानियों ने लिखा है नेपोलियन के पतन का समस्त कारण एक ही शब्द थकान में निहित है। ज्यों- ज्यों वह युदध में उलझता गया त्यों- 2 उसकी शक्ति कमजोर पड़ती गई  !वह थक गया और उसके चलते भी उसका पतन जरुरी हो गया।

    सगे संबंधी-

    उसके पतन के लिए उसके सगे संबधी भी कम उत्तरदायी नहीं थे।हालांकि वह अपने संबंधियों के प्रति उदारता का बर्ताव करता था। लेकिन जब भी वह संकट में पड़ता था तो उसके संबंधी उसकी मदद नहीं करते थे।

    चतुर्थगुट के संगठन-Image result for नेपोलियन बोनापार्ट

    नेपोलियन की कमजोरी से लाभ उठाकर उसके शत्रुओं ने चतुर्थ गुट का निर्माण किया और मित्र राष्ट्रों ने उसे पराजित किया। उसे पकड़ कर सलबाई भेजा गया और उसे वहाँ का स्वतंत्र शासक बनाया गया लेकिन नेपोलियन वहाँ बहुत दिनों तक नहीं रह सका वह शीघ्र ही फ्रांस लौट गया और वहाँ का शासक बन बैठा। लेकिन इसबार वह सिर्फ सौ दिनों तक के लिए सम्राट रहे। मित्र राष्ट्रों ने 18 जुन 1815 ई. को वाटरलु के युद्ध में अंतिम रूप से पराजित कर दिया। वह पकड़ लिया गया मित्र राष्ट्रों ने उसे कैदी के रूप में सेंट हैलेना नामक टापू पर भेज दिया जहाँ 52 वर्षों की आयु में 1821 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार उपर्युक्त सभी कारण प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से उसके पतन के लिए उत्तरदायी थे उसने युद्ध के द्वारा ही अपने साम्राज्य का निर्माण किया था और युद्धों के चलते ही उसका पतन भी हुआ। अर्थात जिन तत्वों ने नेपोलियन के साम्राज्य का निर्माण किया था उन्हीं तत्वों ने उसका विनाश भी कर दिया।

    • (१) युद्ध दर्शन : वस्तुतः नेपोलियन का उद्भव एक सेनापति के रूप में हुआ और युद्धों ने ही उसे फ्रांस की गद्दी दिलवाई थी। इस तरीकें से युद्ध उसके अस्तित्व के लिए अनिवार्य पहलू हो गया था। उसने कहा भी “जब यह युद्ध मेरा साथ न देगा तब मैं कुछ भी नहीं रह जाऊंगा तब कोई दूसरा मेरी जगह ले लेगा।” अतः निरंतर युद्धरत रहना और उसमें विजय प्राप्त करना उसके अस्तित्व के लिए जरूरी था। किन्तु युद्ध के संदर्भ में एक सार्वभौमिक सत्य यह है कि युद्ध समस्याओं का हल नहीं हो सकता है और न अस्तित्व का आधार। इस तरह नेपोलियन परस्पर विरोधी तत्वों को साथ लेकर चल रहा था। अतः जब मित्रराष्ट्रों ने उसे युद्ध में पराजित कर निर्वासित कर दिया तब इस पराजित नायक को फ्रांस की जनता ने भी भूला दिया। इस संदर्भ में ठीक ही कहा गया- “नेपोलियन का साम्राज्य युद्ध में पनपा, युद्ध ही उसके अस्तित्व का आधार बना रहा और युद्ध में ही उसका अंत होना था।” दूसरे शब्दों में नेपोलियन के उत्थान में ही उसके विनशा के बीच निहित थे।
    • (२) राष्ट्रवाद की भावना का प्रसार : नेपोलियन ने साम्राज्यवादी विस्तार कर दूसरे देशों में अपना आधिपत्य जमाया और हॉलैंड, स्पेन, इटली आदि के अपने संबंधियों को शासक बनाया। इस तरह दूसरे देशों में नेपोलियन का शासन विदेशी था। राष्ट्रवाद की भावना से प्रभावित होकर यूरोपीय देशों के लिए विदेशी शासन का विरोध करना उचित ही था। राष्ट्रपति विरोध के आगे नेपोलियन की शक्ति टूटने लगी और उसे जनता के राष्ट्रवाद का शिकार होना पड़ा।
    • (३) महाद्वीपीय व्यवस्था : महाद्वीपीय नीति नेपोलियन के लिए आत्मघाती सिद्ध हुई। इस व्यवस्था ने नेपोलियन को अनिवार्य रूप से आक्रामक युद्ध नीति में उलझा दिया जिसके परिणाम विनाशकारी हुए उसे भारी कीमत चुकानी पड़ी। इसी संदर्भ में उसे स्पेन और रूस के साथ संघर्ष करना पड़ा।
    • (४) नेपोलियन की व्यक्तिगत भूलें : स्पेन की शक्ति को कम समझना, मास्को अभियान में अत्यधिक समय लगाना, वाटरलू की लड़ाई के समय आक्रमण में ढील देना आदि उसकी भंयकर भूलें थीं। इसी संदर्भ में नेपोलियन ने कहा कि “मैने समय नष्ट किया और समय ने मुझे नष्ट किया।” इतना ही नहीं नेपोलियन ने इतिहास की धारा को उलटने की कोशिश की। वस्तुतः फ्रांसीसी क्रांति ने जिस सामंती व्यवस्था का अंत कर कुलीन तंत्र पर चोट कर राजतंत्र को हटा गणतंत्र की स्थापना की थी नेपोलियन ने पुनः उसी व्यवस्था को स्थापित करने का प्रयास किया और कई जगह अपने ही बंधु बांधवों को सत्ता सौंप वंशानुगत राजतंत्र की स्थापना की। क्रांति ने जिस राष्ट्रवाद को हवा दिया, नेपोलियन ने दूसरे देशों में उसी राष्ट्रवाद को कुचलने का प्रयास किया। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि जिन तत्वों से उसका साम्राज्य निर्मित था उन्हीं तत्वों ने उसका विनाश भी कर दिया।
    • (६) फ्रांस की नौसैनिक दुर्बलता
  • 1848 – फ्रांस जोसेफ प्रथम ऑस्ट्रिया के सम्राट बने।
  • 1911 – जॉर्ज पंचम और क्वीन मैरी भारत आने वाले ब्रिटेन के पहले राजा,रानी बनें। उनके बंबई (अब मुम्बई) आगमन की याद में ही गेटवे ऑफ इंडिया बनाया गया।
  • 1942 – पांडिचेरी (अब पुड्डुचेरी) में श्री अरविंदो आश्रम स्कूल की स्थापना हुई जिसे बाद में श्री अरविंदो इंटरनेशनल सेंटर ऑफ एजुकेशन के नाम से जाना गया।
  • 1965 – सीमा सुरक्षा बल की स्थापना हुई।
  • 1971 – संयुक्त अरब अमीरात ने ब्रिटेन से स्वतंत्र होने की घोषणा की।
  • 1976 – फिदेल कास्त्रो क्यूबा के राष्ट्रपति बने।
  • 1982 – स्पेन की प्रथम संसद में समाजवादी बहुमत एवं फ़िलिप गोंजालेज प्रधानमंत्री निर्वाचित।
  • 1989 – विश्वनाथ प्रताप सिंह à¤µà¤¿à¤¶à¥à¤µà¤¨à¤¾à¤¥ प्रताप सिंहदेश के सातवें प्रधानमंत्री बने।विश्वनाथ प्रताप सिंह भारत गणराज्य के आठवें प्रधानमंत्री थे और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके है। उनका शासन एक साल से कम चला, २ दिसम्बर १९८९ से १० नवम्बर १९९० तक। विश्वनाथ प्रताप सिंह (जन्म- 25 जून 1931 उत्तर प्रदेश; मृत्यु- 27 नवम्बर 2008, दिल्ली)। विश्वनाथ प्रताप सिंह भारत के आठवें प्रधानमंत्री थे। राजीव गांधी सरकार के पतन के कारण प्रधानमंत्री बने विश्वनाथ प्रताप सिंह ने आम चुनाव के माध्यम से 2 दिसम्बर 1989 को यह पद प्राप्त किया था। सिंह प्रधान मंत्री के रूप में भारत की पिछड़ी जातियों में सुधार करने की कोशिश के लिए जाने जाते हैं।विश्वनाथ प्रताप सिंह का जन्म 25 जून 1931 उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद ज़िले में एक राजपूत ज़मीनदार परिवार में (मंडा संपत्ति पर शासन किया) हुआ था। वह राजा बहादुर राय गोपाल सिंह के पुत्र थे। उनका विवाह 25 जून 1955 को अपने जन्म दिन पर ही सीता कुमारी के साथ सम्पन्न हुआ था। इन्हें दो पुत्र रत्नों की प्राप्ति हुई। उन्होंने इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश) में गोपाल इंटरमीडिएट कॉलेज की स्थापना की थी।विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इलाहाबाद और पूना विश्वविद्यालय में अध्ययन किया था। वह 1947-1948 में उदय प्रताप कॉलेज, वाराणसी की विद्यार्थी यूनियन के अध्यक्ष रहे। विश्वनाथ प्रताप सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्टूडेंट यूनियन में उपाध्यक्ष भी थे। 1957 में उन्होंने भूदान आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। सिंह ने अपनी ज़मीनें दान में दे दीं। इसके लिए पारिवारिक विवाद हुआ, जो कि न्यायालय भी जा पहुँचा था। वह इलाहाबाद की अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के अधिशासी प्रकोष्ठ के सदस्य भी रहे।

    राजनीतिक जीवनImage result for विश्वनाथ प्रताप सिंह

    विश्वनाथ प्रताप सिंह को अपने विद्यार्थी जीवन में ही राजनीति से दिलचस्पी हो गई थी। वह समृद्ध परिवार से थे, इस कारण युवाकाल की राजनीति में उन्हें सफलता प्राप्त हुई। उनका सम्बन्ध भारतीय कांग्रेस पार्टी के साथ हो गया। 1969-1971 में वह उत्तर प्रदेश विधानसभा में पहुँचे। उन्होंने उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री का कार्यभार भी सम्भाला। उनका मुख्यमंत्री कार्यकाल 9 जून 1980 से 28 जून 1982 तक ही रहा। इसके पश्चात्त वह 29 जनवरी 1983 को केन्द्रीय वाणिज्य मंत्री बने। विश्वनाथ प्रताप सिंह राज्यसभा के भी सदस्य रहे। 31 दिसम्बर 1984 को वह भारत के वित्तमंत्री भी बने। भारतीय राजनीति के परिदृश्य में विश्वनाथ प्रताप सिंह उस समय वित्तमंत्री थे जब राजीव गांधी के साथ में उनका टकराव हुआ। विश्वनाथ प्रताप सिंह के पास यह सूचना थी कि कई भारतीयों द्वारा विदेशी बैंकों में अकूत धन जमा करवाया गया है। इस पर वी. पी. सिंह अर्थात् विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अमेरिका की एक जासूस संस्था फ़ेयरफ़ैक्स की नियुक्ति कर दी ताकि ऐसे भारतीयों का पता लगाया जा सके। इसी बीच स्वीडन ने 16 अप्रैल 1987 को यह समाचार प्रसारित किया कि भारत के बोफोर्स कम्पनी की 410 तोपों का सौदा हुआ था, उसमें 60 करोड़ की राशि कमीशन के तौर पर दी गई थी। जब यह समाचार भारतीय मीडिया तक पहुँचा, यह ‘समाचार’ संसद में मुद्दा बन कर उभरा। इससे जनता को यह पता चला कि 60 करोड़ की दलाली में राजीव गांधी का हाथ था। बोफोर्स कांड के सुर्खियों में रहते हुए 1989 के चुनाव भी आ गए। वी. पी. सिंह और विपक्ष ने इसे चुनावी मुद्दे के रूप में पेश किया। यद्यपि प्राथमिक जाँच-पड़ताल से यह साबित हो गया कि राजीव गांधी के विरुद्ध जो आरोप लगाया गया था वो बिल्कुल ग़लत तो नहीं है, साथ ही ऑडिटर जनरल ने तोपों की विश्वसनीयता को संदेह के घेरे में ला दिया था। भारतीय जनता के मध्य यह बात स्पष्ट हो गई कि बोफार्स तोपें विश्वसनीय नहीं हैं तो सौदे में दलाली ली गई थी। इससे पर्दाफाश के कारण राजीव गांधी ने वी. पी. सिंह को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया। चोरों को सजा तो देनी ही थी, जनता ने राजीव गांधी को अपने किए की सजा दी, और सत्ता से निष्कासित कर दिया। राजीव गांधी के कारण अफ़सरशाही और नौकरशाही भ्रष्ट हो चुकी थी। उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार के दावे ने भारत के सभी वर्गों को चौंका दिया। वी. पी. सिंह की खुलासे सत्य साबित हुए!Image result for विश्वनाथ प्रताप सिंह

    वी. पी. सिंह ने चुनाव की तिथि घोषित होने के बाद जनसभाओं में दावा किया कि बोफोर्स तोपों की दलाली की रक़म ‘लोटस’ नामक विदेशी बैंक में जमा कराई है और वह सत्ता में आने के बाद पूरे प्रकरण का ख़ुलासा कर देंगे। कांग्रेस में वित्त एवं रक्षा मंत्रालय सर्वेसर्वा रहा व्यक्ति यह आरोप लगा रहा था, इस कारण लिया कि वी. पी. सिंह के दावों में अवश्य ही सच्चाई होगी। अब यहाँ यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि वी. पी. ने जो बताया था वो सच था, राजीव गांधी ने सत्ता में रहते हुए एक दस्यु की भूमिका निभाई, यही बात बोफोर्स सौदे के मामले में भी हुई।। इस प्रकार इस चुनाव में वी. पी. सिंह की छवि एक ऐसे राजनीतिज्ञ की बन गई जिसकी ईमानदारी और कर्तव्य निष्ठा पर कोई शक़ नहीं किया जा सकता था। उत्तर प्रदेश के युवाओं ने तो उन्हें अपना नायक मान लिया था। वी. पी. सिंह छात्रों की टोलियों के साथ-साथ रहते थे। वह मोटरसाइकिल पर चुनाव प्रचार करते छात्रों के साथ हो लेते थे। उन्होंने स्वयं को साधारण व्यक्ति प्रदर्शित करने के लिए यथासम्भव कार की सवारी से भी परहेज किया। फलस्वरूप इसका सार्थक प्रभाव देखने को प्राप्त हुआ। वी. पी. सिंह ने एक ओर जनता के बीच अपनी सत्यवादी की छवि बनाई तो दूसरी ओर घोटालेबाज कांग्रेस को तोड़ने का काम भी आरम्भ किया। जो लोग राजीव गांधी से असंतुष्ट थे, उनसे वी. पी. सिंह ने सम्पर्क करना आरम्भ कर दिया। वह चाहते थे कि असंतुष्ट कांग्रेसी राजीव गांधी और कांग्रेस पार्टी से अलग हो जाएँ। उनकी इस मुहिम में पहला नाम था-आरिफ़ मुहम्मद का। आरिफ़ मुहम्मद एक आज़ाद एवं प्रगतिशील विचारों के व्यक्ति थे। इस कारण वह चाहते थे कि इस्लामिक कुरीतियों को समाप्त किया जाना आवश्यक है। आरिफ़ मुहम्मद तथा राजीव गांधी एक-दूसरे के बेहद क़रीब थे लेकिन एक घटना ने उनके बीच गहरी खाई पैदा कर दी। दरअसल हुआ यह कि हैदराबाद में शाहबानो को उसके पति द्वारा तलाक़ देने के बाद मामला अदालत तक जा पहुँचा। अदालत ने मुस्लिम महिला शाहबानो को जीवन निर्वाह भत्ते के योग्य माना। लेकिन मुस्लिम कट्टरपंथी चाहते थे कि ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ’ के आधार पर ही फैसला किया जाए। इस कारण यह विवाद काफ़ी तूल पकड़ चुका था। ऐसी स्थिति में राजीव गांधी ने आरिफ़ मुहम्मद से कहा कि वह एक ज़ोरदार अभियान चलाकर लोगों को समझाएँ कि मुस्लिमों को नया क़ानून मानना चाहिए और ‘मुस्लिम व्यक्तिगत क़ानून’ पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।

    वी. पी. सिंह ने विद्याचरण शुक्ल, रामधन तथा सतपाल मलिक और अन्य असंतुष्ट कांग्रेसियों के साथ मिलकर 2 अक्टूबर 1987 को अपना एक पृथक मोर्चा गठित कर लिया। इस मोर्चे में भारतीय जनता पार्टी भी सम्मिलित हो गई। वामदलों ने भी मोर्चे को समर्थन देने की घोषणा कर दी। इस प्रकार सात दलों के मोर्चे का निर्माण 6 अगस्त 1988 को हुआ और 11 अक्टूबर 1988 को राष्ट्रीय मोर्चा का विधिवत गठन कर लिया गया।

    प्रधानमंत्री के पद पर

    1989 का लोकसभा चुनाव पूर्ण हुआ। कांग्रेस को भारी क्षति उठानी पड़ी। उसे मात्र 197 सीटें ही प्राप्त हुईं। विश्वनाथ प्रताप सिंह के राष्ट्रीय मोर्चे को 146 सीटें मिलीं। भाजपा और वामदलों ने राष्ट्रीय मोर्चे को समर्थन देने का इरादा ज़ाहिर कर दिया। तब भाजपा के पास 86 सांसद थे और वामदलों के पास 52 सांसद। इस तरह राष्ट्रीय मोर्चे को 248 सदस्यों का समर्थन प्राप्त हो गया। वी. पी. सिंह स्वयं को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बता रहे थे। उन्हें लगता था कि राजीव गांधी और कांग्रेस की पराजय उनके कारण ही सम्भव हुई है। लेकिन चन्द्रशेखर और देवीलाल भी प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शरीक़ हो गए। ऐसे में यह तय किया गया कि वी. पी. सिंह की प्रधानमंत्री पद पर ताजपोशी होगी और चौधरी देवीलाल को उपप्रधानमंत्री बनाया जाएगा। प्रधानमंत्री बनते ही उन्होंने सिखों के घाव पर मरहम रखने के लिए स्वर्ण मन्दिर की ओर दौड़ लगाई।

    विश्वनाथ प्रताप सिंह के ऐतिहासिक निर्णय

    व्यक्तिगत तौर पर विश्वनाथ प्रताप सिंह बेहद निर्मल स्वभाव के थे और प्रधानमंत्री के रूप में उनकी छवि एक मजबूत और सामाजिक राजनैतिक दूरदर्शी व्यक्ति की थी। उन्होंने मंडल कमीशन की सिफारिशों को मानकर देश में वंचित समुदायों की सत्ता में हिस्सेदारी पर मोहर लगा दी।

    निधन

    27 नवम्बर 2008 को 77 वर्ष की अवस्था में वी. पी. सिंह का निधन दिल्ली के अपोलो हॉस्पीटल में हो गया।

  • 1995 – बेरिंग्स बैंक कांड के चर्चित व्यक्ति निक लीसन को सिंगापुर के न्यायालय द्वारा साढ़े छह वर्ष की क़ैद की सज़ा।
  • 1999 – भारत में बीमा क्षेत्र में निजी क्षेत्र के निवेश को मंजूरी मिली।
  • 2002 – प्रशान्त महासागर के बोरा-बोरा द्वीप में एक जलते यात्री जहाज़ ‘विडस्टार’ से 219 लोगों को सुरक्षित बचाया गया।
  • 2003 – हेग स्थित संयुक्त राष्ट्र के युद्धापराध न्यायालय ने बोस्नियाई सर्ब के पूर्व सैन्य कमांडर मोमिर निकोलिक को 1995 में हुए सर्बनिका नरसंहार में दोषी पाया गया और 27 साल कैद की सजा सुनाई।
  • 2005 – पाकिस्तान सरकार ने मदरसों द्वारा धार्मिक नफ़रत फैलाने एवं आतंकवाद के लिए प्रेरणा देने वाले शिक्षा एवं साहित्य के प्रकाशन पर रोक के लिए क़ानून बनाया।
  • 2006 – फिलीपींस में ज्वालामुखी का मलबा गिरने से 208 लोगों की मृत्यु तथा 261 लोग घायल।
  • 2007 – पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने 8 जनवरी के प्रस्तावित चुनावों को देखते हुए देश में विरोध प्रदर्शनों और रैलियों पर प्रतिबन्ध लगाया।
  • 2008 – पंजाब नेशनल बैंक ने एफसीएनआर ब्याज दरों में कटौती की।

जन्म

निधन

महत्त्वपूर्ण अवसर एवं उत्सव

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