पाक पत्रकार गौहर वजीर की रिहाई की मांग, क्यों जोर पकड़ रहा है पश्तून आंदोलन ?

पाकिस्तान के टीवी रिपोर्टर गौहर वजीर को गिरफ्तार किए जाने के बाद से कई अंतरराष्ट्रीय संगठन उनकी रिहाई की मांग कर रहे हैं। पाकिस्तान के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय पश्तूनों के आंदोलन में शामिल होने के आधार पर वजीर को अरेस्ट किया गया है। पश्तून आंदोलन ने पाक में पिछले कुछ वक्त में जोर पकड़ा है।

  • पश्तून तहफ्फुज आंदोलन में हिस्सा लेने के कारण पत्रकार गौहर वजीर को गिरफ्तार किया गया
  • पिछले एक साल में पाकिस्तान में अल्पसंख्यक पश्तूनों के प्रदर्शनों ने जोर पकड़ा है
  • पश्तून पाकिस्तान के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय हैं और अधिकारों की अनदेखी का आरोप लगाते रहे हैं
इस्लामाबाद/ न्यूयॉर्क :न्यूयॉर्क स्थित पत्रकारों की कमिटी ने पाकिस्तान के उत्तरी वजीरिस्तान से गिरफ्तार किए गए पत्रकार गौहर वजीर को तत्काल रिहा करने की अपील जारी की है। गौहर को इसी सप्ताह पाकिस्तानी अधिकारियों ने अरेस्ट किया है। पश्तून तहफ्फुज आंदोलन (पीटीए) में हिस्सा लेने को आधार बनाकर पत्रकार की गिरफ्तारी का विरोध दुनियाभर की कई संस्थाएं कर रही हैं। 
पाकिस्तान में अल्पसंख्यक पश्तूनों पर प्रशासन की सख्ती 

उत्तरी वजीरिस्तान सीमावर्ती इलाका है और खैबर पख्तूनख्वा क्षेत्र में यह इलाका है। अफगानिस्तान से लगे इस इलाके में पश्तूनों की अच्छी आबादी है। पिछले साल हुए चुनाव में इमरान खान की पार्टी ने इस क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन किया है। पाकिस्तान में पश्तूनों की आबादी (15%) है और यह देश की सबसे बड़ी अल्पसंख्यक आबादी है। पाकिस्तान प्रशासन पश्तूनों के आंदोलनों को लेकर हमेशा से ही सख्त रही है। पश्तून कार्यकर्ता इस इलाके में मानव अधिकारों के हनन का आरोप लगाते रहे हैं। पाकिस्तान इस इलाके में होनेवाले आंदोलनों के लिए अफगान और भारतीय इंटेलिजेंस को जिम्मेदार ठहराता है। पाकिस्तान ऐसे ही आरोप बलूचिस्तान इलाके के लिए भी लगाता रहा है। तालिबान को खत्म करने के हवाले से पाक सेना की सैन्य कार्रवाई में कई पश्तूनों की मौत की खबरें भी मीडिया में आई हैं।
मॉडल समेत 3 की हत्या से मचा था बवाल 
इस इलाके में पाक शासन के खिलाफ आक्रोश उस वक्त भड़क गया था जब एक पश्तून मॉडल समेत 3 लोगों की हत्या हुई थी। प्रशासन ने शुरू में इसे आतंक के खिलाफ कार्रवाई में हुई मौत बताया था, लेकिन आंदोलन भड़कने के बाद हुई जांच में कुछ और ही सच निकलकर आया। इसी हत्या के बाद पीटीएम आंदोलन ने जोर पकड़ा और इस साल के शुरुआत में एक कोर्ट ने मृतकों पर लगाए गए आतंकी होने के आरोप रद्द कर दिया। इसके बाद से पीटीएम आंदोलन ने क्षेत्र में और जोर पकड़ा। पिछले महीने ही एक सैन्य प्रवक्ता ने कहा कि उनका टाइम अब खत्म हो गया है।

रविवार को हुए प्रदर्शनकारियों पर सेना ने चलाई गोली 

पीटीएम आंदोलन के तहत ही रविवार को (26 मई) को एक सभा बुलाई गई थी। सभा में ‘मिसिंग लोगों’ को तत्काल रिहा करने की मांग की जा रही थी। पीटीएम कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सेना ने इन लोगों को गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में लिया। सभा में पश्तूनों पर होने वाले अत्याचार को तत्काल रोकने की मांग की जा रही थी। आंदोलनकारियों का आरोप है कि सेना ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों पर गोली चलाई, जिसमें 3 लोगों की मौत और कई घायल हो गए। हालांकि, अभी तक इसे लेकर कोई स्पष्ट आंकड़ा आधिकारिक तौर पर जारी नहीं किया गया है। सुरक्षा बलों का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने सैन्यकर्मियों पर अटैक किया था। सुरक्षाकर्मियों ने पश्तून सांसद अली वजीर को भी हिरासत में लिया गया। एक अन्य पश्तून सांसद मोहसिन डावर घटना के बाद से गायब है। पीटीएम के 22 और कार्यकर्ताओं को भी गिरफ्तार किया गया। 
  • गौहर वजीर (तस्वीर: विडियो से)

    पश्तून प्रदर्शन को कवर करने पर पाक में पत्रकार गिरफ्तार

    पश्तून आंदोलन

    पाकिस्तान में एक पत्रकार को पश्तून तहफूज़ प्रदर्शन पर रिपोर्टिंग के लिए गिरफ्तार कर लिया गया है। यह एक अधिकारों पर आधारित गठबंधन है और पत्रकार ने उनके नेताओं का इंटरव्यू भी लिया था। बीते रविवार को पश्तूनों ने हक़ के लिए प्रदर्शन किया था। खबरों के मुताबिक, प्रदर्शनकारी भीड़ पर सुरक्षा सैनिको ने गोलीबारी कर दी थी और इसमें चार लोगो की मौत हो गयी थी और 50 से अधिक प्रदर्शनकारी बुरी तरह जख्मी हो गए थे।

    स्थानीय पत्रकारों के अनुसार, पाकिस्तानी सेना ने पीटीएम के नेताओं को प्रदर्शन स्थल पर जाने से रोका था क्योंकि उन्हें यकीन था कि नेता वहां वह भाषण दे सकते हैं। नेताओं के समर्थकों ने जब बैरियर्स को हटाने की कोशिश की तो पाकिस्तानी सैनिको ने प्रदर्शनकारियों पर ओपन फायरिंग शुरू कर दी थी। पीटीएम के नेताओं और सदस्यों की गिरफ्तारी के बाद हिंसा बढ़ गयी थी।

    पाकिस्तान के पश्तून भाषा के चैनल खैबर न्यूज़ के पत्रकार गोहर वज़ीर को सुरक्षा अधिकारीयों ने उत्तरी वज़ीरिस्तान में पीटीएम के नेताओं का इंटरव्यू और प्रदर्शन पर रिपोर्टिंग करने के बाद गिरफ्तार कर लिया था। गिरफ्तारी से पूर्व उन्होंने पीटीएम के दिग्गज नेता मशिन दवार का इंटरव्यू लिया था। दवार को बीते वर्ष पाकिस्तान की राष्ट्रीय संसद के लिए चयनित हुए थे।

    वज़ीर और अन्यो को मैंटेनेंस ऑफ़ पब्लिक आर्डर आर्डिनेंस के तहत गिरफ्तार किया गया था। पत्रकारों का संरक्षण करने वाली समिति ने तत्काल गोहर वज़ीर को रिहा करने की मांग की है। एशिया प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर के सीपीजे स्टीवन बटलर ने कहा कि “न्यूज़ रिपोर्टिंग करने के अपने कर्तव्य का पालन करने के लिए गोहर वज़ीर को गिरफ्तार नहीं करना चाहिए था। चाहे वह पश्तून तहफूज़ आंदोलन जैसे विवादस्पद मुद्दों पर ही रिपोर्टिंग क्यों न कर रहे हों। पाकिस्तानी मीडिया पर पाबंदी सिर्फ पाकिस्तानी लोकतंत्र की मज़बूती को नज़रअंदाज़ करने की तरफ इशारा कर रही है।”

    वज़ीर की गिरफ्तारी से पूर्व में खैबर न्यूज़ के चार पत्रकारों को रिपोर्टिंग के दौरान मार दिया गया था। इसमें मालिक मुमताज़ और अल्लाह नूर वज़ीर क्रमश उत्तरी और दक्षिणी वज़ीरिस्तान के आदिवासी क्षेत्रों से थे। अल्लाह नूर पाकिस्तानी तालिबान के तत्कालीन प्रमुख बैतुल्लाह महसूद और नयी कानून प्रवर्तन विभागों के बीच साल 2005 में शान्ति समझौते की स्टोरी को कवर करने के लिए गए थे।

    मालिक मुमताज़ को साल 2013 में कार से एक अज्ञात आदमी ने गोली मार दी थी। आदिवासी जिले में कार्य करने वाले पत्रकारो के मुताबिक, उन्हें चरमपंथी समूहों, आपराधिक गुटों से भी खतरा है और साथ ही पाकिस्तानी सेना और ख़ुफ़िया विभाग भी धमकिया देता है। हालिया वर्षों में पाकिस्तान में पत्रकारों की हत्या की संख्या में गिरावट आयी है सीपीजे ने सेना के तरफ से मीडिया पर बढ़ते दबाव पर चिंता व्यक्त की है।

    बलूचिस्तान का  लफड़ा क्या है?

    पाकिस्तान आतंकवाद को शह देता है. इत्ता तो आप जानते ही हैं. लेकिन वो कहते हैं न कि जो औरों के लिए गड्ढा खोदते हैं वो खुद गड्ढे में गिर जाते हैं. ऐसे ही एक गड्ढे, आई मीन मुद्दे की बात करेंगे, जिसमें पाकिस्तान गिरता चला जा रहा है. नाम है – बलूचिस्तान.

    शॉर्ट नोट्स: साउथ वेस्ट एशिया का पाकिस्तानी प्रांत बलूचिस्तान. 1947 में तीन रियासतों को पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में शामिल कर लिया गया. तत्कालीन ब्रिटेन के प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने 535 रियासतों को आजाद रहने की छूट दी थी. लिहाजा कलात के किंग अहमद यार खान ने चुनी आजादी और पाक में विलय से किया इंकार, पर ऐसा हो न सका. यहीं से उठी आजादी की चिंगारी. शुरू से ही बलूच लोग आजादी की मांग कर रहे हैं. बलूचिस्तान समर्थकों का तर्क है कि पाकिस्तान ने सिर्फ पंजाब और सिंध प्रांत में विकास किया. आजाद बलूचिस्तान की मांग और प्रदर्शनकारियों के कुछ गुटों ने आतंक का रास्ता अपना लिया है.

    ‘भारतीय प्रधानमंत्री खुले तौर पर आतंकवाद का समर्थन कर रहे हैं. रिसर्च एनालिसिस विंग क्वेटा के पास स्मांगली और खलिद के मिलिट्री बेस पर हुए हमलों के लिए जिम्मेदार है.’

    – सरफराज बुगती, बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में. तारीख 8 जून 2015

    3,47,190 स्कॉयर किलोमीटर में फैला पाकिस्तान के चार प्रांतों में से एक बलूचिस्तान. अफगानिस्तान, ईरान और पाकिस्तान के बॉर्डर से मिलती सरहदें. बलूच लोगों की वजह से यहां का नाम पड़ा बलूचिस्तान. मकरान, खारन, लसबेला और 1955 में कलात चार रियासतों के मिलने से बना बलूचिस्तान. कलात ने पाकिस्तान में शामिल होने के लिए कुछ शर्तें रखी थीं. डिफेंस, करेंसी, विदेश नीति और वित्तीय मामले संघीय सरकार संभाले लेकिन बाकी मामलों में फैसले बलूचिस्तान ही करेगा. तब शर्तें मानने का वादा किया गया. लेकिन बलूच राष्ट्रवादियों की मानें तो पाकिस्तान ने कभी भी बलूचिस्तान की बेहतरी के लिए कदम नहीं उठाए. कलात के किंग की आजाद रहने की इच्छा साल 1955 में तब पूरी तरह खारिज हो गई, जब कलात बलूचिस्तान प्रांत यानी पाकिस्तान में शामिल हो गया. पाकिस्तान ने 1947 के बाद से ही कलात को बलूचिस्तान में शामिल करने को लेकर सैन्य कार्रवाई शुरू कर दी थी.

    दूसरी चिंगारी: नवाब नवरोज खान, आजाद बलूचिस्तान आंदोलन का प्रतीक. नवरोज खान ने कलात की बलूचिस्तान की आजादी को लेकर हथियार उठाकर पाकिस्तान के खिलाफ गुरिल्ला वॉर छेड़ दी. गिरफ्तार हुए. परिवार के पांच लोगों को फांसी दे दी गई. नवाब नवरोज खान की पाकिस्तान में कैद के दौरान मौत हो गई.

    वन यूनिट की मांग: साल 1963-69 के बीच अलगाववादी नेताओं की ओर से बलूचिस्तान के लिए नए संविधान की मांग की गई. शेर मुहम्मद बिजरानी खां जैसे नेताओं ने ‘सुई गैस फील्ड’ से होने वाली कमाई के बंटवारे को लेकर अपनी मांगें आक्रामक तरीके से उठाईं. लड़ाई तब खत्म हुई, जब साल 1970 में तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति याह्या खान ने ‘वन यूनिट पॉलिसी’ को माना और बलूच नेताओं के साथ सीजफायर को लेकर सहमति बनी. ‘वन यूनिट पॉलिसी’ यानी जियोपॉलिटिकल प्रोग्राम, जिसके जरिए दो पॉलिसी होने की वजह से शासन करने में आने वाली दिक्कतों को दूर करने की कोशिश की गई.

    पाक का मिलिट्री ऑपरेशन: 1973 में बलूचिस्तान में मिलिट्री ऑपरेशन शुरू. तत्कालीन राष्ट्रपति जुल्फीकार अली भुट्टो ने बलूचिस्तान की सरकार को भंग कर दिया. बलूचिस्तानी नेता खैर बख्श मर्री ने पाकिस्तान सरकार के खिलाफ एकजुट होते हुए बलूचिस्तान पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट का गठन किया. कहा जाता है कि सेना और बलूच लड़ाकों के इस हिंसा में पाकिस्तान के करीब 400 और लगभग 8 हजार बलूच नागरिक-लड़ाकों की मौत हो गई थी.

    अब भी जारी है आजादी की जंग: आजादी की मांग करने वाले बलूच संगठनों ने 2003 में फिर से गुरिल्ला हमले का रास्ता चुना. बलूचिस्तान आंदोलन के ज्यादातक नेता पाकिस्तान से बाहर किसी दूसरे में रहकर आजादी की मांग कर रहे हैं. बताया जाता है कि बलूचिस्तानी लड़ाके पहले सिर्फ सेना पर हमला करते थे लेकिन अब निशाने पर गैर बलूच लोग भी हैं. 2005 में बलूचिस्तानी नेताओं नवाब अकबर खां बुगती और मीर बालच मर्री ने पाकिस्तान सरकार के सामने 15 सूत्रीय एजेंडा रखा. एजेंडे में बलूच प्रांत के लिए ज्यादा अधिकारों की मांग की गई. नवाब अकबर खां बुगती बलूचिस्तान के 13वें गवर्नर और पांचवें मुख्यमंत्री भी रह चुके थे. अगस्त 2006 में बुगती को पाकिस्तानी सेना ने फायरिंग में मार गिराया. पाक सेना के करीब 60 से ज्यादा अधिकारियों ने भी जान गंवाई. बुगती पर पाक के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ पर हमले का आरोप लगाया गया. अगस्त 2009 में मीर सुलेमान दाउद ने खुद को आजाद बलूचिस्तान का शासक घोषित कर दिया.

    BLA: बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) बलोच अलगाववादियों का सबसे बड़ा संगठन है.  साल 2000 से लेकर अब तक BLA पर पाकिस्तान पर कई हमले किए. आजाद बलूचिस्तान की मांग करने वाले संगठनों के कुछ और नाम बलूचिस्तान रिपब्लिकन पार्टी, लश्कर-ए-बलूचिस्तान और बलूच लिबरेशन फ्रंट हैं. इनमें ऐसे भी संगठन हैं जो पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान के बलूच इलाकों को मिलाकर आजाद बलूचिस्तान की मांग करते रहे हैं. प्राकृतिक संसाधनों से लबरेज और कम आबादी वाला बलूचिस्तान बीते 70 सालों से आजादी और अधिकारों के लिए जूझ रहा है.

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