योगी अरबिंदो का निधन व परमवीर कैप्टन गुरबचन सिंह सालारिया का बलिदान हुआ था आज

5 दिसंबर आज का इतिहास

दोस्तों, हम हर बार सुनते हैं की हमारा इतिहास बहुत पुराना हैं, लेकिन हमें हमारे देश और दुनिया के इतिहास की पूरी जानकारी नहीं इसलिए हम यहाँ हमारा एक छोटा सा प्रयास कर रहे हैं जो आपको पूरे देश और दुनिया की इतिहास की और आज के इतिहास की जानकारी मिल सके ताकि आपका ज्ञान और बढ़ सके। तो चलिए दोस्तों आज जानते हैं 5 दिसंबर के इतिहास की कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं के बारें मे,

5 December History

 शाहजहां के छोटे बेटे मुराद ने 1657 में खुद को बादशाह घोषित किया।
  • नेपोलियन बोनापार्ट रुस में भारी पराजय और नुक़सान का सामना करने के बाद 1812 में फ़्रास लौटे।
  • रूस में 1917 में नई क्रांतिकारी सरकार गठन तथा रूस-जर्मनी के बीच युद्ध विराम।
  • कनाडा में 1917 में हुए दो जहाजों के भीषण टक्कर में कम से कम 15 सौ लोगों की मौत हो गई।
  • ब्रिटिश संसद द्वारा 1922 में आयरिश स्वतंत्र राज्य संविधान अधिनियम को स्वीकृति मिली।
  • जापानी हवाई जहाज ने 1943 में कोलकाता पर बम गिराया।
  • भारत में 1946 में होमगार्ड संगठन की स्थापना हुई।
  • सिक्किम 1950 में भारत का संरक्षित राज्य बना।
  • लंबी दूरी के टेलिफोन कॉल को हर घर तक पहुंचा देने वाली एसटीडी सेवा 1955 में आज ही के दिन अस्तित्व में आई.
  • अफ्रीकी देश घाना ने 1960 में बेल्जियम के साथ राजनयिक संबंध समाप्त किये।
  • भारत ने 1971 में बांग्लादेश को एक देश के रूप में मान्यता दी।
  • गेराल्ड फोर्ड ने 1973 में अमेरिका के उपराष्ट्रपति के रूप में शपथ ली।
  • माल्टा 1974 में गणराज्य घोषित।
  • मुलायम सिंह यादव 1989 में पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।
  • विवादास्पद लेखक सलमान रुश्दी दो वर्ष के अंतराल के बाद 1990 में पहली बार लोगों के सामने आये।
  • मुलायम सिंह यादव 1993 में पुन: (उत्तर प्रदेश) के मुख्यमंत्री बने थे।
  • भगवान बुद्ध की जन्मस्थली लुम्बिनी, इटली में पोम्पेली और हम्रयूलेनियम स्थल, पाकिस्तान में शेरशाह सूरी निर्मित रोहतास का क़िला और बांग्लादेश में सुंदरवन को 1997 में यूनेस्को ने विश्व धरोहर में शामिल या।
  • चेचेन्या में रूस ने 1999 में अस्थायी तौर पर सेना तैनात करने की घोषणा की।
  • भारतीय सुंदरी युक्ता मुखी 1999 में ‘मिस वर्ल्ड’ चुनी गईं।
  • अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 2000 में राष्ट्रपति चुनाव में जार्ज बुश के पक्ष में फैसला दिया।
  • अफ़ग़ानिस्तान में 2001 में हामिद करजई के नेतृत्व में अंतरिम सरकार के गठन पर चारों गुट सहमत।
  • अमरीकी सेनाओं ने 2001 में ओसामा बिन लादेन के अफगानिस्तान स्थित तोरा बोरा पहाड़ी ठिकाने पर कब्जा किया।
  • चीन में 2003 में पहली बार आयोजित विश्व सुंदरी प्रतियोगिता में आयरलैंड की रोसन्ना दाविसन विजयी।
  • चेचेन्या में ट्रेन में 2003 में हुए आत्मघाती हमले में 42 लोगों की मृत्यु, जबकि 160 घायल। राष्ट्रकुल देशों के शासनाध्यक्षों का चार दिवसीय सम्मेलन अबुजा में प्रारम्भ।
  • सन 2005 में बनाये गए एक नये क़ानून द्वारा ब्रिटेन में समलैंगिक पुरुष (गो) और समलैंगिक स्त्री (लेस्बियन) का वैध सम्बन्ध स्थापित करने की मान्यता दी गयी।
  • रूस के राष्ट्रपति दामित्री मे देवेदेव ने 2008 में अगली पीढ़ी की परमाणु अभियांत्रिकी को भारत के साथ संयुक्त रूप से विकसित करने का प्रस्ताव किया।
  • काँग्रेस ने 2008 में अशोक चव्हाण को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा की।
  • यमन की राजधानी सेना में रक्षा मंत्रालय परिसर पर 2013 में हुए आतंकवादी हमले में 52 लोगों की मौत।

5 दिसंबर को जन्मे व्यक्ति

  • ब्रिटेन के विख्यात कवि और ड्रामा लेखक जॉन्सन का 1573 में जन्म हुआ।
  • आधुनिक पंजाबी काव्य और गद्य के निर्माता के रूप में प्रसिद्ध कवि भाई वीर सिंह का 1872 में जन्म हुआ।
  • भारत और पाकिस्तान के प्रसिद्ध उर्दू कवि जोश मलीहाबादी का 1894 में जन्म हुआ।
  • भारत के क्रांतिकारियों में से एक एच. सी. दासप्पा का 1894 में जन्म हुआ।
  • जम्मू और कश्मीर के  नेता शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला का 1905 में जन्म हुआ।
  • हिन्दी फ़िल्मों की मशहूर अभिनेत्री नादिरा का 1932 में जन्म हुआ।
  • गुजराती साहित्यकार रघुवीर चौधरी का 1938 में जन्म हुआ।
  • भारत की प्रसिद्ध महिला निशानेबाज़ अंजलि भागवत का 1969 में जन्म हुआ।

5 दिसंबर को हुए निधन

  • जर्मनी के रसायन शास्त्री और दार्शनिक अलबर्ट महान का 1230 में निधन हुआ।
  • स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षाविद्‌ और सामाजिक कार्यकर्ता एस. सुब्रह्मण्य अय्यर का 1924 में निधन हुआ।
  • प्रसिद्ध भारतीय महिला चित्रकार अमृता शेरगिल का 1941 में निधन हुआ।
  • भारतीय लेखक अरबिंदो घोष का 1950 में निधन हुआ।
    श्री अरविन्द घोष
    श्री अरविंद
    श्री अरविन्द घोष का सन् १९१६ में लिया गया चित्र।
    जन्म अरविन्द अक्रोद्य घोष
    15 अगस्त 1872
    कलकत्ताब्रिटिश भारत
    मृत्यु 5 दिसम्बर 1950
    पाण्डिचेरी
    दर्शन हिन्दुत्व
    साहित्यिक कार्य दिव्य जीवन, द मदर, लेटर्स आन् योगा, सावित्री, योग समन्वय, फ्यूचर पोयट्री
    हस्ताक्षर
    धर्म हिन्दू
    दर्शन हिन्दुत्व

    अरविन्द घोष या श्री अरविन्द (बांग्ला: শ্রী অরবিন্দ, जन्म: १८७२, मृत्यु: १९५०) एक योगी एवं दार्शनिक थे। वे १५ अगस्त १८७२ को कलकत्ता में जन्मे थे। इनके पिता एक डाक्टर थे। इन्होंने युवा अवस्था में स्वतन्त्रता संग्राम में क्रान्तिकारी के रूप में भाग लिया, किन्तु बाद में यह एक योगी बन गये और इन्होंने पांडिचेरी में एक आश्रम स्थापित किया। वेदउपनिषद ग्रन्थों आदि पर टीका लिखी। योग साधना पर मौलिक ग्रन्थ लिखे। उनका पूरे विश्व में दर्शन शास्त्र पर बहुत प्रभाव रहा है और उनकी साधना पद्धति के अनुयायी सब देशों में पाये जाते हैं। यह कवि भी थे और गुरु भी।

  • प्रारम्भिक शिक्षा

    अरविन्द के पिता डॉक्टर कृष्णधन घोष उन्हें उच्च शिक्षा दिला कर उच्च सरकारी पद दिलाना चाहते थे, अतएव मात्र ७ वर्ष की उम्र में ही उन्होंने इन्हें इंग्लैण्डभेज दिया। उन्होंने केवल १८ वर्ष की आयु में ही आई० सी० एस० की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी। इसके साथ ही उन्होंने अंग्रेजीजर्मनफ्रेंचग्रीक एवं इटैलियनभाषाओँ में भी निपुणता प्राप्त की थी।

    युवावस्था

    देशभक्ति से प्रेरित इस युवा ने जानबूझ कर घुड़सवारी की परीक्षा देने से इनकार कर दिया और राष्ट्र-सेवा करने की ठान ली। इनकी प्रतिभा से बड़ौदा नरेश अत्यधिक प्रभावित थे अत: उन्होंने इन्हें अपनी रियासत में शिक्षा शास्त्री के रूप में नियुक्त कर लिया। बडौदा में ये प्राध्यापक, वाइस प्रिंसिपल, निजी सचिव आदि कार्य योग्यता पूर्वक करते रहे और इस दौरान हजारों छात्रों को चरित्रवान देशभक्त बनाया। 1896 से 1905 तक उन्होंने बड़ौदा रियासत में राजस्व अधिकारी से लेकर बड़ौदा कालेज के फ्रेंच अध्यापक और उपाचार्य रहने तक रियासत की सेना में क्रान्तिकारियों को प्रशिक्षण भी दिलाया था। हजारों युवकों को उन्होंने क्रान्ति की दीक्षा दी थी।
    वे निजी रुपये-पैसे का हिसाब नहीं रखते थे परन्तु राजस्व विभाग में कार्य करते समय उन्होंने जो विश्व की प्रथम आर्थिक विकास योजना बनायी उसका कार्यान्वयन करके बड़ौदा राज्य देशी रियासतों में अन्यतम बन गया था। महाराजा मुम्बई की वार्षिक औद्योगिक प्रदर्शनी के उद्धाटन हेतु आमन्त्रित किये जाने लगे थे।
    लार्ड कर्जन के बंग-भंग की योजना रखने पर सारा देश तिलमिला उठा। बंगाल में इसके विरोध के लिये जब उग्र आन्दोलन हुआ तो अरविन्द घोष ने इसमे सक्रिय रूप से भाग लिया। नेशनल लाॅ कॉलेज की स्थापना में भी इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। मात्र ७५ रुपये मासिक पर इन्होंने वहाँ अध्यापन-कार्य किया। पैसे की जरूरत होने के बावजूद उन्होंने कठिनाई का मार्ग चुना। अरविन्द कलकत्ता आये तो राजा सुबोध मलिक की अट्टालिका में ठहराये गये। पर जन-साधारण को मिलने में संकोच होता था। अत: वे सभी को विस्मित करते हुए 19/8 छक्कू खानसामा गली में आ गये। उन्होंने किशोरगंज (वर्तमान में बंगलादेश में) में स्वदेशी आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया। अब वे केवल धोती, कुर्ता और चादर ही पहनते थे। उसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय विद्यालय से भी अलग होकर अग्निवर्षी पत्रिका वन्देमातरम् का प्रकाशन प्रारम्भ किया।

    ब्रिटिश सरकार इनके क्रन्तिकारी विचारों और कार्यों से अत्यधिक आतंकित थी अत: २ मई १९०८ को 40  युवकों के साथ उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इतिहास में इसे ‘अलीपुर षडयन्त्र केस‘ के नाम से जानते है। उन्हें एक वर्ष तक अलीपुर जेल में कैद रखा गया।| अलीपुर जेल में ही उन्हें हिन्दू धर्म एवं हिन्दू-राष्ट्र विषयक अद्भुत आध्यात्मिक अनुभूति हुई। इस षड़यन्त्र में अरविन्द को शामिल करने के लिये सरकार की ओर से जो गवाह तैयार किया था उसकी एक दिन जेल में ही हत्या कर दी गयी। घोष के पक्ष में प्रसिद्ध बैरिस्टर चितरंजन दास ने मुकदमे की पैरवी की थी। उन्होने अपने प्रबल तर्कों के आधार पर अरविन्द को सारे अभियोगों से मुक्त घोषित करा दिया। इससे सम्बन्धित अदालती फैसले ६ मई १९०९ को जनता के सामने आये। ३० मई १९०९ को उत्तरपाड़ा में एक संवर्धन सभा की गयी वहाँ अरविन्द का एक प्रभावशाली व्याख्यान हुआ जो इतिहास में उत्तरपाड़ा अभिभाषण के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने अपने इस अभिभाषण में धर्म एवं राष्ट्र विषयक कारावास-अनुभूति का विशद विवेचन करते हुए कहा था:।

    जब मुझे आप लोगों के द्वारा आपकी सभा में कुछ कहने के लिए कहा गया तो में आज एक विषय हिन्दू धर्मं पर कहूँगा। मुझे नहीं पता कि मैं अपना आशय पूर्ण कर पाउँगा या नहीं। जब में यहाँ बैठा था तो मेरे मन में आया कि मुझे आपसे बात करनी चाहिए। एक शब्द पूरे भारत से कहना चाहिये। यही शब्द मुझसे सबसे पहले जेल में कहा गया और अब यह आपको कहने के लिये मैं जेल से बाहर आया हूँ।
    एक साल हो गया है मुझे यहाँ आए हुए। पिछली बार आया था तो यहाँ राष्ट्रीयता के बड़े-बड़े प्रवर्तक मेरे साथ बैठे थे। यह तो वह सब था जो एकान्त से बाहर आया जिसे ईश्वर ने भेजा था ताकि जेल के एकान्त में वह इश्वर के शब्दों को सुन सके। यह तो वह ईश्वर ही था जिसके कारण आप यहाँ हजारों की संख्या में आये। अब वह बहुत दूर है हजारों मील दूर।

    अरविन्द की प्रमुख कृतियाँ

    • योगिक साधन
    • कारा काहिनी

    प्रमुख शिष्य

    चम्पकलालनलिनि कान्त गुप्तकैखुसरो दादाभाई सेठनानिरोदबरनपवित्रएम पी पण्डितप्रणबसतप्रेमइन्द्र सेन

    ग्रन्थ

    सम्पूर्ण संस्करण

    Complete Works of Sri Aurobindo (CWSA). Pondicherry: Sri Aurobindo Ashram 1995

    1. Early Cultural Writings. 2. Collected Poems. 3.-4. Collected Plays and Stories. 5. Translations. 6.-7. Bande Mataram. 8. Karmayogin. 9. Writings in Bengali and Sanskrit. 10.-11. Record of Yoga. 12. Essays Divine and Human. 13. Essays in Philosophy and Yoga. 14. Vedic and Philological Studies. 15. The Secret of the Veda. 16. Hymns to the Mystic Fire. 17. Isha Upanishad. 18. Kena and Other Upanishads. 19. Essays on the Gita. 20. The Renaissance of India with a Defence of Indian Culture. 21.-22. The Life Divine. 23.-24. The Synthesis of Yoga. 25. The Human Cycle – The Ideal of Human Unity – War and Self-Determination. 26. The Future Poetry. 27. Letters on Poetry and Art 28.-31. Letters on Yoga. 32. The Mother with Letters on the Mother. 33-34. Savitri – A Legend and a Symbol. 35. Letters on Himself and the Ashram. 36. Autobiographical Notes and Other Writings of Historical Interest. 37. Reference Volume (unpublished)

    मुख्य ग्रन्थ हिंदी में

    • दिव्य जीवन
    • सावित्री (पद्यानुवाद)
    • योग-समन्वय
    • श्रीअरविन्द अपने विषय में
    • माता
    • भारतीय संस्कृति के आधार
    • वेद-रहस्य
    • केन एवं अन्यान्य उपनिषद्
    • ईशोपनिषद
    • गीता-प्रबंध
  • प्रख्यात कलाकार तथा साहित्यकार अवनीन्द्रनाथ ठाकुर का 1951 में निधन हुआ।
  • प्रसिद्ध शायर मजाज़ का 1955 में निधन हुआ।
  • परमवीर चक्र से सम्मानित गुरबचन सिंह सालारिया गुरबचन सिंह सालारिया के लिए इमेज परिणामका 1961 में निधन हुआ।

    कैप्टन गुरबचन सिंह सालारिया (, जन्म: 29 नवम्बर1935; शहादत: 5 दिसम्बर1961परमवीर चक्र से सम्मानित भारतीय सैनिक थे। इन्हें यह सम्मान सन 1961 में मरणोपरांत मिला। संयुक्त राष्ट्र संघ की शांति सेना के साथ कांगो के पक्ष में बेल्जियम के विरुद्ध बहादुरी पूर्वक प्राण न्योछावर करने वाले योद्धाओं में कैप्टन गुरबचन सिंह सालारिया का नाम लिया जाता है जिन्हें 5 दिसम्बर 1961 को एलिजाबेथ विला में लड़ते हुए अद्भुत पराक्रम दिखाने के लिए मरणोपरांत परमवीर चक्र दिया गया। वह उस समय केवल 26 वर्ष के थे।

    गुरबचन सिंह का जन्म 29 नवम्बर 1935 को शकरगढ़ के जनवल गाँव में हुआ था। यह स्थान अब पाकिस्तान में है। इनके पिता भी फौजी थे और ब्रिटिश-इंडियन आर्मी के डोगरा स्क्वेड्रन, हडसन हाउस में नियुक्त थे। इनकी माँ एक साहसी महिला थीं तथा बहुत सुचारू रूप से गृहस्थी चलाते हुए बच्चों का भविष्य बनाने में लगी रहती थीं। पिता के बहादुरी के किस्सों ने गुरबचन सिंह को भी फौजी जिंदगी के प्रति आकृष्ट किया। इसी आकर्षण के कारण गुरबचन ने 1946 में बैंगलोर के किंग जार्ज रॉयल मिलिट्री कॉलेज में प्रवेश लिया। अगस्त 1947 में उनका स्थानांतरण उसी कॉलेज की जालंधर शाखा में हो गया। 1953 में वह नैशनल डिफेंस अकेडमी में पहुँच गये और वहाँ से पास होकर कारपोरल रैंक लेकर सेना में आ गए। वहाँ भी उन्होंने अपनी छवि वैसी ही बनाई जैसी स्कूल में थी यानी आत्म सम्मान के प्रति बेहद सचेत सैनिक माने गए। एक बार इन्हें एक छात्र ने तंग करने की कोशिश की। वह एक तगड़ा सा दिखने वाला लड़का था लेकिन इसी बात पर गुरबचन सिंह ने उसे बॉक्सिंग के लिए चुनौती दे डाली। मुकाबला तय हो गया। सबको यही लग रहा था कि गुरबचन सिंह हार जायेंगे, लेकिन रिंग के अंदर उतरकर जिस मुस्तैदी से गुरबचन सिंह ने मुक्कों की बरसात की, उसके आगे वह कुशल प्रतिद्वंद्वी भी ठहर नहीं पाया और जीत गुरबचन सिंह की हुई। एक बार एक  लड़का कुएँ में गिर गया, गुरबचन सिंह वहीं थे। उन्हें बच्चे पर तरस आया और वह उसे बचाने को कुएँ में कूदने को तैयार हो गये, जब कि उन्हें खुद भी तैरना नहीं आता था।

    भारतीय सेना में योगदान

    3/1 गोरखा राइफल्स के कैप्टन गुरबचन सिंह सालारिया को संयुक्त राष्ट्र के सैन्य प्रतिनिधि के रूप में एलिजाबेथ विला में दायित्व सौंपा गया था। 24 नवम्बर 1961 को संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद ने यह प्रस्ताव पास किया था कि संयुक्त राष्ट्र की सेना कांगो के पक्ष में हस्तक्षेप करे और आवश्यकता पड़ने पर बल प्रयोग करके भी विदेशी व्यवसायियों पर अंकुश लगाए। संयुक्त राष्ट्र के इस निर्णय से शोम्बे के व्यापारी भड़क उठे और उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की सेनाओं के मार्ग में बाधा डालने का उपक्रम शुरु कर दिया। संयुक्त राष्ट्र के दो वरिष्ठ अधिकारी उनके केंद्र में आ गये। उन्हें पीटा गया। 3/1 गोरखा राइफल्स के मेजर अजीत सिंह को भी उन्होंने पकड़ लिया था और उनके ड्राइवर की हत्या कर दी थी। इन विदेशी व्यापारियों का मंसूबा यह था कि वह एलिजाबेथ विला के मोड़ से आगे का सारा संवाद तंत्र तथा रास्ता काट देंगे और फिर संयुक्त राष्ट्र की सैन्य टुकड़ियों से निपटेंगे। 5 दिसम्बर 1961 को एलिजाबेथ विला के रास्ते इस तरह बाधित कर दिये गए थे कि संयुक्त राष्ट्र के सैन्य दलों का आगे जाना एकदम असम्भव हो गया था। क़रीब 9 बजे 3/1 गोरखा राइफल्स को यह आदेश दिये गए कि वह एयरपोर्ट के पास के एलिजाबेथ विला के गोल चक्कर का रास्ता साफ करे। इस रास्ते पर विरोधियों के क़रीब डेढ़ सौ सशस्त्र पुलिस वाले रास्ते को रोकते हुए तैनात थे। योजना यह बनी कि 3/1 गोरखा राइफल्स की चार्ली कम्पनी आयरिश टैंक के दस्ते के साथ अवरोधकों पर हमला करेगी। इस कम्पनी की अगुवाई मेजर गोविन्द शर्मा कर रहे थे। कैप्टन गुरबचन सिंह सालारिया एयरपोर्ट साइट से आयरिश टैंक दस्तें के साथ धावा बोलेंगे ! इस तरह अवरोधकों को पीछे हटकर हमला करने का मौका न मिल सकेगा। कैप्टन गुरबचन सिंह सालारिया की ए कम्पनी के कुछ जवान रिजर्व में रखे जाएँगे। गुरबचन सिंह सालारिया न इस कार्यवाही के लिए दोपहर का समय तय किया, जिस समय उन सशस्त्र पुलिसबालों को हमले की ज़रा भी उम्मीद न हो। गोविन्द शर्मा तथा गुरबचन सिंह दोनों के बीच इस योजना पर सहमति बन गई।

    शहादत

    कैप्टन गुरबचन सिंह सालारिया 5 दिसम्बर 1961 को एलिजाबेथ विला के गोल चक्कर पर दोपहर की ताक में बैठे थे कि उन्हें हमला करके उस सशस्त्र पुलिसवालों के व्यूह को तोड़ना है, ताकि सैन्य दल आगे बढ़ सकें। इस बीच गुरबचन सिंह सालारिया अपनी टुकड़ी के साथ अपने तयशुदा ठिकाने पर पहुँचने में कामयाब हो गई। उन्होंने ठीक समय पर अपनी रॉकेट लांचन टीम की मदद से रॉकेट दाग कर दुश्मन की दोनों सशस्त्र कारें नष्ट कर दीं। यही ठीक समय था जब वह सशस्त्र पुलिस के सिपाहियों को तितर-बितर कर सकते थे। उन्हें लगा कि देर करने से फिर से संगठित होने का मौका मिल जाएगा। ऐसी नौबत न आने देने के लिए कमर तुरंत कस ली। उनके पास केवल 16 सैनिक थे, जबकि सामने दुश्मन के सौ जवान थे। फिर भी, वह परवाह किए वह और उनका दल दुश्मन पर टूट पड़े। आमने-सामने मुठभेड़ होने लगी जिसमें गोरखा पलटन की खुखरी ने तहलका मचाना शुरू कर दिया। दुश्मन के 100 में से 40 जवान वहीं ढेर हो गए लेकिन दुश्मन के बीच खलबली मच गई। और वह बौखला उठा ! तभी गुरबचन सिंह एक के  एक दो गोलियों का निशाना बन गए।

  • दक्षिण अफ़्रीका के पूर्व राष्ट्रपति एवं भारत रत्न सम्मनित नेल्सन मंडेला का 2013 में निधन हुआ।
  • तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री एवं ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (ए.आइ.ए.डी.एम.के.) पार्टी की प्रसिद्ध नेता जयललिता का 2016 में निधन हुआ।

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