नेहरू ने भारत के बजाए चीन को दिला दी थी संरा की स्‍थाई सीट? क्या हुआ था तब

इस मामले में दूसरी पार्टी ने कांग्रेस अपने नेता शशि थरूर की किताब के चलते ही फंस गई है.इस मामले में दूसरी पार्टी ने कांग्रेस अपने नेता शशि थरूर की किताब के चलते ही फंस गई है.

भारतीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने द हिन्दू अखबार में प्रकाशित एक रिपोर्ट को दिखाते हुए मीडिया से कहा कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र (UN) में भारत की सीट ठुकरा कर चीन को स्‍थाई सदस्य बनवा दिया था. यह दावा उन्होंने तब किया जब पुलवामा हमले में आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद के हा‌थ के बाद भारत इसे ग्लोबल स्तर पर प्रतिबंध‌ित कराने की दिशा में अग्रसर था, लेकिन चीन ने इसमें अड़ंगा लगा दिया.

रविशंकर प्रसाद ने अपने दावे का आधार द हिन्दू में नौ जनवरी 2004 को प्रकाशित रिपोर्ट को बनाया था. जबकि द हिन्दू ने इस तथ्य के बारे में कांग्रेस नेता व संयुक्त राष्ट्र में अवर महासचिव रहे शशि थरूर की किताब, “नेहरू- द इन्वेंशन ऑफ़ इंडिया” को आधार बनाया था.

जब शशि थरूर की किताब को देखते हैं तो वे लिखते हैं कि उन्होंने कुछ भारतीय राजनयिकों से बातचीत के अधार पर इस तथ्य के बारे में लिखा है. कुछ राजनयिकों का कहना था कि उन्होंने कुछ ऐसे दस्तावेज देखे हैं, जिनमें भारत को यूपएन का स्‍थाई सदस्य बनाने का प्रस्ताव था. लेकिन पंडित जवाहर लाल नेहरू ने यह सीट पहले ताइवान और बाद में चीन को दे देने की वकालत कर दी.

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LIVE : Shri @rsprasad is addressing a press conference at BJP HQ. https://www.pscp.tv/w/b1omOzFZTEVKTlh4RG5ORU58MW1ueGVPZGFNeW9HWA7PpkHvG7bVXo1OMRJa11LIuwR01zYKx0R-_dcuVQph 

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लेकिन इस बात का कोई आखिरी स्रोत नहीं मिलता. एक शख्स के कहने के बाद दूसरे और दूसरे के कहने के बाद तीसरे की तरह ही यह बात आगे बढ़ रही है. हमने इस तथ्य को जानने की कोशिश की. ऐसा नहीं है कि यह मुद्दा पहली बार उठा है. 27 सितंबर, 1955 को भारतीय संसद में डॉ जेएन पारेख ने नेहरू से यह सवाल पूछा था. जानिए क्या था उनका जवाब-

1. संयुक्त राष्‍ट्र की स्‍थापना साल 1945 में हुआ था. तब भारत आजाद नहीं था.
2. 1945 में जब सुरक्षा परिषद के स्‍थाई सदस्य बनाए गए तब भारत आजाद नहीं था.
3. शशि थरूर ने लिखा, नेहरू को 1953 में स्‍थाई सदस्य बनने का प्रस्ताव मिला था.
4. 27 सितंबर, 1955 को जवाहर लाल नेहरू ने भारतीय संसद में इस बात को खारिज कर दिया था कि उन्हें यूएन से स्‍थाई सदस्य बनने का कोई प्रस्ताव मिला था. जिन संदर्भों का हवाला दिया जा रहा है, उनमें कोई सच्चाई नहीं है.
5. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एक ट्वीट में कहा, नेहरू ने दो अगस्त 1955 को मुख्यमंत्रियों को एक चिट्ठी लिखी थी. इससे जाहिर होता कि उन्होंने भारत के बजाए चीन को यह सीट दिलाई.

Arun Jaitley
@arunjaitley

The original mistake, both on Kashmir and China, was committed by the same person.

6. यह मसला साल 1949 में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के उद्भव के समय से जुड़ा है. तब चीन में च्यांग काई-शेक का शासन था. लेकिन 1950 के दशक में आक्रामक तरीके से माओ के पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना सत्ता में आई. यह बेहद शक्तिशाली संगठन के तौर पर उभरा था.

7. तब भारत और चीन की माओ की पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना पार्टी से खतरा था. दोनों देशों में जबर्दस्त तनातनी चल रही थी.
8. इतिहास के कुछ जानकार मानते हैं कि दोनों देशों में रिश्तों को सामान्य करने और माओ को खुश करने के चक्कर में जल्दबाजी में यूएन में उसको स्‍थाई सीट देने की वकालत की थी.
9. द डिप्लोमैट की एक रिपोर्ट स्थिति को और साफ करती है. द डिप्लोमैट के अनुसार, ”नेहरू के रुख को वाकई जानने के लिए पहले आपको उस अवधि में पहुंचना होगा. भारत सालों की गुलामी के बाद आजाद हुआ था. उस वक्त को देखते हुए नेहरू ने बड़ी शक्तियों को हितैषी बनाकर रखने और उनकी ताकतें विश्वपटल पर भी बनाए रखने के लिए ऐसा सकते हैं. नेहरू इतिहास के गहन जानकार थे.”
10. इसी बात को साउथ एशियन यूनिवर्सिटी में डिपार्टमेंट ऑफ इंटरनेशनल के असिस्टेंट प्रोफसर नबारुण रॉय अपने एक रिसर्च पेपर में लिखते हैं, “इस मसले का आधार 1949-50 से पुराना है. अप्रैल 1922 में जब जर्मनी और रूस के बीच रापालो संचि हुई तो पूरे यूरोप खलबली मच गई. यही नहीं पूरी दूनिया पर नये सिरे से खतरा मंडराने लगा था. इधर पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना अप्रत्याशित रूप से ताकतवर होता जा रहा था. ऐसे समय में चीन को अगर वैश्विक ताकतों के बीच नहीं उलझाया जाता तो यह शक्ति कई रूप भारत और एशिया को नुकसान पहुंचा सकता था. अगर चीन यूएन का हिस्सा ना होता तो यूएन का कोई नियम कानून उसके ऊपर लागू नहीं होता ना ही उस पर किसी तरह के नियंत्रण का कोई तरीका मौजूद होता. इन तथ्यों को ध्यान में रखकर अगर नेहरू ने चीन के लिए वकालत की ‌भी तो एक संतुलित कदम रहा होगा.”
हालांकि तमाम रिपोर्ट व छानबीन के बाद भी कोई ऐसा अंतिम स्रोत नहीं मिलता जिसमें ऐसे साक्ष्य हों कि नेहरू को औपचारिक अथवा अनौपचारिक तौर पर यूएन से ऐसा कोई प्रस्ताव मिला था. लेकिन तत्कालीन कई जानकारों का मानना है कि नेहरू ने यूएन में ताइवान के बजाए चीन को स्‍थाई सदस्य बना देने की वकालत की थी.

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