नीरव मोदी और माल्या को भगाने में मदद की थी आलोक वर्मा ने ?

केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई के पूर्व डायरेक्टर आलोक वर्मा ने पद से हटाए जाने के तरीके पर सवाल उठाते हुए नई जिम्मेदारी स्वीकार करने से इनकार कर दिया था. उन्होंने शुक्रवार को नौकरी से इस्तीफा भी दे दिया है.पूर्व CBI चीफ आलोक वर्मा ने नीरव मोदी और माल्या को भगाने में की थी मदद?(फाइल फोटो- आलोक वर्मा)

सीबीआई के पूर्व निदेशक आलोक वर्मा पर रिश्वतखोरी से लेकर पशु तस्करों की मदद करने के आरोप हैं. केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) इन आरोपों की जांच कर रही है. इन आरोपों को आधार बनाकर प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में हाई पावर कमिटी ने 2:1 से वर्मा को हटाने का फैसला लिया. अब उन पर भगोड़े आर्थिक अपराधी विजय माल्या और फरार हीरा व्यापारी नीरव मोदी की मदद करने का आरोप लग रहा है.
अब आ रही मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सीवीसी ने उन पर 6 और आरोपों की जांच शुरू कर दी है. इसमें बैंक घोटालों के आरोपी नीरव मोदी, विजय माल्या और एयरसेल के पूर्व प्रमोटर सी शिवशंकरन के खिलाफ लुक आउट सर्कुलर के आंतरिक ईमेल को लीक करने का आरोप भी शामिल हैं.
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टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक आलोक वर्मा पर लगे नए आरोपों के संबंध में सीवीसी ने सरकार को सूचित किया है. इस संबंध में पिछले साल 12 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट के सामने वर्मा की जांच रिपोर्ट दाखिल करने के बाद एंटी करप्शन टीम की ओर से शिकायतें मिली थीं.
वर्मा के खिलाफ उनके ही पूर्व नंबर दो विशेष निदेशक राकेश अस्थाना द्वारा लगाए गए 10 आरोपों की जांच के आधार पर रिपोर्ट में कहा गया था कि वर्मा से पूछताछ की जानी चाहिए.
बता दें कि सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना ने एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे. सीबीआई ने अस्थाना के खिलाफ 3 करोड़ रुपये की रिश्वत लेने के आरोप में 15 अक्टूबर को शिकायत दर्ज की थी. वहीं अस्थाना ने वर्मा के खिलाफ कैबिनेट सचिव को 24 अगस्त को शिकायत दी थी. कैबिनेट सचिव ने अस्थाना की शिकायत को सीवीसी को बढ़ा दिया था. शिकायत में वर्मा के खिलाफ कथित भ्रष्टाचार की बात कही गई.
रिपोर्ट के मुताबिक, एक पत्र के माध्यम से सीवीसी ने सीबीआई से सभी आरोपों से संबंधित दस्तावेजों को उपलब्ध कराने को कहा है. नीरव मोदी और शराब कारोबारी विजय माल्या देश से फरार चल रहे हैं. हाल ही में लंदन के एक कोर्ट ने विजय माल्या को भारत प्रत्यर्पित करने का फैसला सुनाया था.

विजय माल्या की मदद
आलोक वर्मा पर आरोप हैं कि उन्होंने 2015 में विजय माल्या के खिलाफ जारी लुकआउट सर्कुलर को कमजोर किया था जिसकी मदद से माल्या को देश छोड़कर भागने में मदद मिली.

पीएनबी स्कैम
रिपोर्ट के मुताबिक आलोक वर्मा पर आरोप है कि उन्होंने नीरव मोदी के केस में सीबीआई के कुछ आंतरिक ईमेलों के लीक होने पर आरोपी को ढूंढने की बजाय वह मामले को छिपाने की कोशिश करते रहे, जबकि उस वक्त पीएनबी घोटाले की जांच जारी थी.
जानकारी के लिए बता दें जांच एजेंसी ने जून 2018 में तत्कालीन संयुक्त निदेशक राजीव सिंह (जो नीरव मोदी केस की जांच कर रहे थे) के कमरे को बंद कर दिया था और डेटा प्राप्त करने के लिए आईटी मंत्रालय के कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम (सीईआरटी) को भी बुलाया था. हालांकि, एजेंसी के इस कदम की वजह कभी नहीं बताई गई.
केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई के पूर्व डायरेक्टर आलोक वर्मा ने पद से हटाए जाने के तरीके पर सवाल उठाते हुए नई जिम्मेदारी स्वीकार करने से इनकार कर दिया था. उन्होंने शुक्रवार को नौकरी से इस्तीफा भी दे दिया है.

जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने बताया जस्टिस सीकरी ने आलोक वर्मा मामले पर क्यों दिया मोदी का साथ

आलोक वर्मा मामले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस काटजू ने उन कारणों को बताया है, जिसकी वजह से जस्टिस सीकरी को मल्लिकार्जुन खड़गे के विरोध के बाद पीएम मोदी के निर्णय का समर्थन करना पड़ा.

जस्टिस मार्कंडेय काटजू का दावा: जस्टिस सीकरी ने आलोक वर्मा मामले पर क्यों दिया PM मोदी का साथ आलोक वर्मा को हटाए जाने को लेकर जस्टिस सीकरी के माध्यम से जस्टिस काटजू का खुलासा 

प्रधान मंत्री मोदी की अध्यक्षता में तीन सदस्यों की सेलेक्सन कमेटी द्वारा 2-1 के फैसले से आलोक वर्मा को सीबीआई डारेक्टर के पद से हटाए जाने के बाद मामला और भी गहराता जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने उन कारणों को बताया है, जिसकी वजह से जस्टिस सीकरी को मल्लिकार्जुन खड़गे के विरोध के बाद  प्रधान मंत्री मोदी के निर्णय का समर्थन करना पड़ा. बता दें कि आलोक वर्मा को हटाने वाली सलेक्शन कमेटी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और सीजेआई के प्रतिनिधि के तौरपर जस्टिस एके सीकरी शामिल थे. बता दें कि आलोक वर्मा ने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और इस मसले पर अब सियासत गर्म है.

इस मामले पर जस्टिस काटजू ने 10 जनवरी को एक फेसबुक पोस्ट लिखा- ‘आलोक वर्मा को प्रधान मंत्री, मल्लिकार्जुन खड़गे (विपक्ष का प्रतिनिधित्व करते हुए) और न्यायमूर्ति ए.के. सिकरी (CJI के प्रतिनिधि) की एक समिति द्वारा सीबीआई निदेशक के पद से हटा दिया गया है.  प्रधान मंत्री और जस्टिस सीकरी ने उन्हें हटाने का फैसला किया, जबकि खड़गे ने इसका विरोध किया. इस सिलसिले में मुझे रिश्तेदारों और दोस्तों से जस्टिस सीकरी के बारे में पूछताछ के लिए कई टेलीफोन कॉल आए, क्योंकि जाहिर तौर पर यह उनकी राय थी जो निर्णायक थी, और यही मैंने उन्हें बताया.’

‘मैं जस्टिस सीकरी को अच्छी तरह से जानता हूं क्योंकि मैं दिल्ली उच्च न्यायालय में उनका मुख्य न्यायाधीश था और मैं उनकी ईमानदारी की गारंटी ले सकता हूं. उन्होंने तब तक निर्णय नहीं लिया होगा, जब तक उन्हें आलोक वर्मा के खिलाफ रिकॉर्ड में कुछ मजबूत तथ्य नहीं मिले होंगे. वह तथ्य क्या हैं मुझे नहीं पता. लेकिन मैं जस्टिस सीकरी को जानता हूं, और व्यक्तिगत तौर पर कह सकता हूं कि वह किसी से भी प्रभावित नहीं हो सकते. जो भी उनके बारे में कहा जा रहा है वह गलत और अनुचित है.’

आलोक वर्मा पर सेलेक्शन कमेटी के दो-एक के फैसले के बाद जस्टिस काटजू ने जस्टिस सीकरी के हवाले से एक और फेसबुक पोस्ट किया और आलोक वर्मा को हटाए जाने के कारणों का खुलासा किया है. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने पोस्ट में लिखा है कि जब सेलेक्शन कमेटी ने आलोक वर्मा को हटाया, तो मैंने एक फेसबुक पोस्ट किया था. बहुत से लोगों ने मुझे फोन कर इस बात पर सवाल उठाया कि आलोक वर्मा को अपनी सफाई रखने का मौका आखिर क्यों नहीं दिया गया. इस कारण मैंने जस्टिस सीकरी से फोन पर बातचीत की. इस बातचीत में आलोक वर्मा मामले में हुए फैसले के पीछे के कारण सामने आए, जिन्हें जस्टिस सीकरी की अनुमति से मैं फेसबुक पर पोस्ट कर रहा हूं.

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस मार्कंडेय काटजू का मानना है कि जस्टिस सीकरी के पास PM मोदी के फैसले से सहमत होने के कई कारण थे.

जस्टिस सीकरी ने जो कहा वे हैं:

  1. सीवीसी ने पाया कि आलोक वर्मा के खिलाफ आरोप गंभीर हैं और प्रारंभिक जांच में भी सीवीसी को कुछ सबूत और निष्कर्ष मिले थे.
  2. सीवीसी ने प्रथम दृष्टया सामने आ रहे निष्कर्ष को अपनी रिपोर्ट में दर्ज करते हुए आलोक वर्मा को सुनवाई का मौका दिया था.
  3. प्रथम दृष्टया इन सबूतों और निष्कर्षों के आधार पर ही जस्टिस सीकरी का मानना था कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती और जब तक यह फैसला नहीं हो जाता कि आलोक वर्मा दोषी हैं या निर्दोष तब तक उन्हें सीबीआई चीफ के पद पर नहीं रहना चाहिए. मगर इस दौरान उनकी रैंक के बराबर उन्हें किसी अन्य पद पर स्थानांतरित कर दिया जाए.
  4. आलोक वर्मा को बर्खास्त नहीं किया गया है, जैसा कि कुछ लोगों का मानना है. उन्हें निलंबित भी नहीं किया गया है. आलोक वर्मा को उनकी रैंक और उसी सैलरी के बराबर वाले पद पर ट्रांसफर किया गया है.
  5. अब जहां आलोक वर्मा का पक्ष नहीं सुनने की बात है तो इसका भी तय सिद्धांत है कि बिना किसी सुनवाई के पद से नहीं हटाया जाता, मगर किसी अधिकारी को निलंबित किया जा सकता है. निलंबित रहने के दौरान भी जांच जारी रहती है, जो कि सामान्य प्रक्रिया है.
  6. वर्मा के मामले में न तो उन्हें निलंबित किया गया और न ही हटाया गया, बल्कि उन्हें सिर्फ सीबीआई डायरेक्टर के बराबर वाले दूसरे पद पर स्थानांतरित किया गया है.

आलोक वर्मा पर क्या है सीवीसी की रिपोर्ट

  1. जांच एजेंसी के 50 साल से अधिक के इतिहास में यह अपनी तरीके का पहला मामला है. सीवीसी की जांच रिपोर्ट में खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ द्वारा की गई ‘टेलीफोन निगरानी’ का हवाला दिया गया.
  2. सीवीसी रिपोर्ट में विवादित मांस कारोबारी मोइन कुरैशी के मामले का जिक्र किया गया और दावा किया गया कि इस मामले पर गौर कर रही सीबीआई टीम हैदराबाद के कारोबारी सतीश बाबू सना को इस मामले में आरोपी बनाना चाहती थी लेकिन वर्मा ने मंजूरी नहीं दी. इस मामले में जांच विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के नेतृत्व में की गई. अस्थाना और वर्मा को 23 अक्टूबर को छुट्टी पर भेजा था.
  3. अधिकारियों ने कहा कि सीवीसी रिपोर्ट में बाहरी खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ द्वारा फोन पर पकड़ी गई बातचीत का भी जिक्र है. खास बात यह है कि सना, अस्थाना के खिलाफ दर्ज मामले में शिकायतकर्ता है. उसने इस मामले में अपने बिचौलियों को दी गई रिश्वत के बारे में जानकारी दी थी.
  4. उसने ‘रॉ’ के दूसरे शीर्ष अधिकारी सामंत गोयल के नाम पर भी जिक्र किया जो बिचौलिये मनोज प्रसाद को बचाने में कथित रूप से शामिल थे.
  5. एक अन्य मामला सीबीआई द्वारा गुड़गांव में भूमि अधिग्रहण के बारे में दर्ज शुरुआती जांच से संबंधित है. सीवीसी ने आरोप लगाया कि इस मामले में वर्मा का नाम सामने आया था. सीवीसी ने इस मामले में विस्तृत जांच की सिफारिश की थी.
  6. सीवीसी ने यह भी आरोप लगाया था कि वर्मा ने पूर्व केन्द्रीय मंत्री लालू प्रसाद से जुड़े आईआरसीटीसी मामले के एक अधिकारी को बचाने का प्रयास भी किया था.  आयोग ने यह भी आरोप लगाया कि वर्मा सीबीआई में दागी अधिकारियों को लाने की कोशिश कर रहे हैं.

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