दो प्रधानमंत्री आरक्षण मुद्दे पर नहीं बचा पाए थे सरकार, वही गलती तो नहीं कर रहे मोदी?

इतिहास पर नजर डालें तो बैलेंस करने में कई प्रधानमंत्री दोबारा शासन नहीं कर पाए हैं. 90 के दशक की राजनीति से वर्तमान प्रधानमंत्री तीसरे राजनेता हैं, जिन्होंने ये जुआ खेला है.

पहले भी दो प्रधानमंत्री आरक्षण के मुद्दे पर नहीं बचा पाए थे सरकार, कहीं गलती तो नहीं कर रहे मोदी

नरेंद्र मोदी सरकार तीन राज्यों में बीजेपी की हार से घबरा गई है. पार्टी का मानना है कि एससी-एसटी एक्ट में संशोधन की वजह से उच्च जाति के हिंदू नाराज हो गए हैं. इस वजह से बीजेपी को इन जातियों ने वोट नहीं किया है. इन सभी जातियों का ज्यादा वोट बीजेपी को मिलता रहा है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सरकार के रवैये से ये तबका पार्टी से दूर हुआ है.लोकसभा चुनाव का काउंटडाउन शुरू हो गया है. मोदी सरकार ने उच्च जाति को आरक्षण का लॉलीपाप दिया है. सरकार का संविधान संशोधन विधेयक पास हो जाएगा, क्योंकि चुनाव के समय कोई भी दल इसका विरोध करने का साहस नहीं कर पाएगा. हालांकि आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने 50 फीसदी का कैप लगा रखा है.

क्यों अवसरवादी राजनीति?

पिछले साढ़े चार साल में मोदी सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया है. बीएसपी जैसी छोटी पार्टी भी इस तरह के आरक्षण की वकालत करती रही है, लेकिन सरकार साहस नहीं जुटा पाई थी. चुनाव से ऐन पहले इस तरह का राजनीतिक कदम सरकार अपने फायदे के लिए उठा रही है. इस पूरे काम में सरकार जल्दबाजी में है. इतने बड़े काम के लिए सर्वदलीय बैठक भी बुलाना मुनासिब नहीं समझा है. इसका मकसद साफ है कि बीजेपी खुद क्रेडिट लेना चाह रही है.हालांकि इसका नुकसान भी है अचानक ऐसा फैसला करने से पूरा मामला कानूनी पचड़े में फंसता है तो उंगली बीजेपी पर ही उठेगी. दूसरा इतना बड़ा काम करने के बाद भी अगर दूसरे आरक्षित वर्ग गोलबंद हुए तो नुकसान बीजेपी का ही होगा. ना खुदा मिलेगा ना विसाल-ए-सनम. इससे पहले एससी/एसटी एक्ट में संशोधन का राजनीतिक नुकसान बीजेपी को झेलना पड़ा है.

चुनाव से पहले तुष्टिकरण

narendra modi

उच्च जाति में आर्थिक तंगी है. इससे इनकार नहीं किया जा सकता है. हालांकि 8 लाख का इनकम लेवल ज्यादातर सवर्ण जातियों को इस दायरे में ले आएगा. जो गरीब सवर्ण हैं उनको इसका लाभ नहीं मिल पाएगा. जिस आधार पर ये पूरी कवायद चल रही है. उसके फेल होने की आशंका ज्यादा है. इसलिए ये तुष्टिकरण से ज्यादा कुछ नहीं है. बल्कि इससे बवाल पैदा होगा.सरकार ने ना कोई स्टडी कराई है. ना ही कोई कमेटी बनाई है. एक बार ये सीमा बढ़ाई गई तो कई ओर इसकी मांग उठ सकती है. खासकर अल्पसंख्यक वर्ग की तरफ से जिनके पास सच्चर कमेटी जैसा दस्तावेज है. उनको नई सरकार किस तरह से इनकार कर पाएगी?

चुनाव के ऐन वक्त क्या मिलेगा

बीजेपी के इस पूरे फैसले से चुनाव की मजबूरी साफ नजर आ रही है. हालांकि चुनाव के वक्त के पहले लिए गए फैसले ज्यादा कारगर साबित नहीं हुए हैं. ये राजनीतिक बैलेंसिंग कभी भी बैलेंस बिगाड़ सकती है. सोशल मीडिया पर तस्वीर वायरल हो रही है, नोटा के बदले कोटा जिसमें प्रधानमंत्री सवर्ण मतदाता के पीछे कोटा लेकर दौड़ रहे हैं.हालांकि इतिहास पर नजर डालें तो बैलेंस करने में कई प्रधानमंत्री दोबारा शासन नहीं कर पाए हैं. 90 के दशक की राजनीति से वर्तमान प्रधानमंत्री तीसरे राजनेता हैं, जिन्होंने ये जुआ खेला है. सबसे पहले राजीव गांधी का नाम है. दूसरे वीपी सिंह का नाम आता है.

राजीव गांधी 1984-1989

राजीव गांधी इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री बने, फिर चुनाव में प्रचंड बहुमत मिला जिसमें कांग्रेस के 403 सांसद चुने गए थे. इस बहुमत के बाद राजीव गांधी का पाला ट्रिपल तलाक की पीड़ित शाह बानो प्रकरण से हुआ. 1985 में शाह बानो प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने भरण पोषण के हक में फैसला दिया पहले राजीव गांधी ने इस फैसले से सहमति जताई, तब उनकी सरकार के मंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने मुस्लिम जमातों की मांग को खारिज कर दिया था.

Rajiv-Gandhi

राजीव गांधी

अचानक राजीव गांधी मुस्लिम संगठनों के दबाव में आ गए और कोर्ट का फैसला संसद ने पलट दिया. इस वाकये के बाद राजीव गांधी को लगा कि गलत हो गया है. राजीव गांधी ने फिर बहुसंख्यक वर्ग को खुश करने की कवायद शुरू की थी. जिसमें अयोध्या में विवादित परिसर का 1986 में ताला खुलवाने में अहम भूमिका निभाई थी. राम मंदिर के निर्माण के लिए 1989 में शिलान्यास भी कराया, इस साल चुनाव हुए नतीजे सबके सामने हैं. बोफोर्स का मसला चुनाव में हावी हो गया और वीपी सिंह प्रधानमंत्री बन गए थे.

कमंडल की जगह मंडल

वीपी सिंह की सरकार बनते ही बीजेपी ने अयोध्या आंदोलन तेज कर दिया. लाल कृष्ण आडवाणी ने रथ यात्रा का एलान कर दिया. इस यात्रा के जवाब में अगस्त 1990 में वीपी सिंह ने बी.पी. मंडल आयोग की सिफारिश लागू कर दी. जिसमें पिछड़े वर्ग को रिजर्वेशन दिया गया लेकिन इसके खिलाफ इतना भयानक आंदोलन हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने स्टे लगा दिया था.वीपी सिंह को कदम वापस खींचना पड़ा था. इस आंदोलन में कई छात्रों को जान से हाथ धोना पड़ा था. 25 सितंबर 1990 को एल.के. आडवाणी ने रथ यात्रा शुरू की थी. बिहार में आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया. बीजेपी ने सरकार गिरा दी. वीपी सिंह की पार्टी टूट गई और कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर की सरकार बन गई.

पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह

विश्वनाथ सिंह

तिहासिक गलती दोहरा रहे मोदी

बैलेसिंग राजनीति का घिसा-पिटा फॉर्मूला नरेंद्र मोदी सरकार अपना रही है. बीजेपी के विरोधी चुनावी स्टंट बता रहे हैं. बीजेपी के समर्थक मास्टरस्ट्रोक से नवाज रहे है. हालांकि ये सिर्फ लाज बचाने की तरकीब है. इससे ये साबित हो रहा है कि सरकार चुनाव में जाने के लिए नया नैरेटिव नहीं ढूंढ पा रही है. बल्कि जो एजेंडा सरकार के सामने होना चाहिए उसे नजरअंदाज किया जा रहा है.

ये भी कहा जा सकता है कि सरकार असल मुद्दों से मुंह फेर रही है. जिस तरह कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा देने की कोशिश की थी. जब नतीजे आए तो कांग्रेस को फायदा नहीं मिला था. 2014 से पहले तत्कालीन यूपीए सरकार ने जैन समुदाय को अल्पसंख्यक दर्जा दिया था.

2019 में सरकार के सामने चुनौती

नरेंद्र मोदी सरकार के सामने पांच साल की एंटी इनकंबेसी है. कई अहम मसलों पर 2014 का वायदे पूरे नहीं हुए. काला धन का मामला, बेरोजगारी और आर्थिक कमजोरी अहम मसला हैं. नोटबंदी पर सरकार कोई माकूल जवाब नहीं ढूंढ पा रही है. किसान की बदहाली पर सरकार उदासीन है. आवारा पशु फसल की तबाही का कारण बन गए हैं. मसले यही हैं देश के सामने, जिनका ठीक से सामना करने पर ही जनादेश मिल सकता है.

Syed Mojiz Imam स्वतंत्र पत्रकार

सामान्य वर्ग को आरक्षण देकर बीजेपी को क्यों नहीं मिलेगा फ़ायदा: नज़रिया

बीजेपी

पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जब साल 1990 में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण की नीति लागू की थी जिसे हम सभी मंडल आयोग के तौर पर जानते हैं तब उनके इस क़दम को मास्टरस्ट्रोक कहा गया था. क्योंकि कोई भी राजनीतिक दल उनके इस क़दम का खुलकर विरोध नहीं कर पाया था.मौजूदा दौर में जब बीजेपी ने जनरल कैटगरी में आर्थिक रूप से कमज़ोर तबक़े के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की बात कही है तो इसे भी 2019 के लोक सभा चुनाव से पहले मोदी सरकार का एक बड़ा मास्टर स्ट्रोक बताया जा रहा है.वीपी सिंह के नेतृत्व वाली सरकार हालांकि अपने इस महत्वपूर्ण क़दम के बाद महज़ एक साल ही सरकार में टिक पाई थी, उन्हें इस क़दम का कोई बहुत अधिक लाभ नहीं मिल पाया था, लेकिन मंडल आयोग लागू करने का असर उत्तर भारत सहित पूरे देश की राजनीति पर पड़ा.बीजेपी के इस क़दम को भी मास्टर स्ट्रोक इसीलिए कहा जा रहा है क्योंकि कोई भी दल इसका विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा.जैसे कि मंडल आयोग को उसकी घोषणा होने के कुछ सालों बाद ही लागू किया जा सका था. उसी तरह आरक्षण से जुड़े इस नए बिल को लागू करने में भी कुछ वक़्त तो ज़रूर लगेगा.

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कितनी है सवर्णों की संख्या?

इस बीच बीजेपी अभी से अपने इस क़दम का राजनीतिक फ़ायदा उठाने की कोशिश करती हुई दिख रही है.हालांकि उसे इसका बहुत अधिक फ़ायदा मिलता हुआ नज़र नहीं आता, इसके पीछे दो अहम कारण हैं.पहला तो देश में सवर्णों की संख्या बहुत ज़्यादा नहीं है और दूसरा यह वर्ग पहले से ही बीजेपी का वोटर रहा है.उत्तर भारतीय राज्यों की राजनीति में सवर्ण जातियां अहम किरदार अदा करती हैं जबकि इस बात का कोई आधिकारिक आंकड़ा अभी तक नहीं है कि अलग-अलग राज्यों में कितने प्रतिशत सवर्ण मौजूद हैं.अगर हम सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ डेवेलपिंग सोसाइटी (सीएसडीएस) के सर्वे की बात करें तो उसके अनुसार देश के अलग-अलग राज्यों में सवर्ण जातियों के लोगों की संख्या 20 से 30 प्रतिशत के बीच है.हिंदी भाषी राज्यों की बात करें तो बिहार में 18 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 22 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 25 प्रतिशत, दिल्ली में 50 प्रतिशत, झारखंड में 20 प्रतिशत, राजस्थान में 23 प्रतिशत, हरियाणा में 40 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ में 12 प्रतिशत सवर्ण जातियों के लोग हैं.इसके अलावा कुछ ग़ैर हिंदी भाषी राज्यों में भी सवर्णों की संख्या ठीक समझी जाती है. जैसे, असम में 35 प्रतिशत, इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

सवर्ण पहले से बीजेपी के वोटर

ख़ैर जहां तक दूसरे दलों की बात की जाए तो वे भी इस प्रस्तावित बिल का विरोध नहीं करेंगे. लेकिन इन सब बातों से यह मान लेना कि बीजेपी को इसका बहुत अधिक फ़ायदा मिल जाएगा, एक बड़ी भूल होगी.

इसके पीछे सीधा सा कारण यह है कि जिन राज्यों में बीजेपी ने साल 2014 में अच्छा प्रदर्शन किया था जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, झारखंड छत्तीसगढ़ और कुछ अन्य. इनमें सवर्ण जातियां बीजेपी का मज़बूत वोटबैंक रही हैं.

सीएसडीएस का सर्वे बताता है कि हिंदी भाषी राज्यों में सवर्ण जातियों के वोटर्स ने तमाम चुनावों में बीजेपी को ही अपना मत दिया.

इस क़दम का बीजेपी को सिर्फ़ यह फ़ायदा मिलेगा कि सवर्ण जातियों के वो वोटर जो बीजेपी से नाराज़ होकर उससे दूर जाने लगे थे वे वापस लौट आएंगे.

हाल ही में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीजेपी को मिली हार के पीछे यह एक बड़ी वजह मानी गई थी कि इन राज्यों में सवर्णों ने बीजेपी को वोट नहीं दिया था.

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मानकों के आधार पर कितने सवर्णों को आरक्षण?

इसके अलावा प्रस्तावित बिल में आरक्षण के लिए जो मानक तय किए गए हैं उसका आधार इतना विस्तृत है कि उसमें सवर्ण जातियों का एक बड़ा तबक़ा समाहित हो जाएगा.

अगर हम प्रस्तावित बिल के तय मानकों पर नज़र डालें तो उसके अनुसार जिस परिवार की सालाना आय 8 लाख रुपए से कम होगी, या जिनके पास 5 हेक्टेयर से कम कृषि योग्य ज़मीन होगी, या जिनके पास 1000 वर्ग फुट से कम का मकान होगा या जिनके पास नगरपालिका में शामिल 100 गज़ से कम ज़मीन होगी या नगरपालिका में ना शामिल 200 गज़ से कम ज़मीन होगी. ये तमाम लोग आर्थिक आधार पर मिलने वाले आरक्षण के योग्य होंगे.

इस तरह से सवर्ण जातियों के लगभग 85 से 90 प्रतिशत लोग इस आरक्षण को प्राप्त करने के योग्य हो जाएंगे.

इन सबके बीच अगर उन राज्यों की बात की जाए जहां बीजेपी का बहुत अधिक जनाधार नहीं है जैसे केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना. यहां इस क़दम का बहुत ही कम असर पड़ेगा.

इन राज्यों की राजनीति में वहां की क्षेत्रीय पार्टियों का ही दबदबा रहता है, और यह मान लेना कि बीजेपी के इस एक क़दम से इन राज्यों के वोटर बीजेपी की तरफ़ पूरी तरह झुक जाएंगे अपने आप में बेमानी होगा.

एक तरह से साफ़ है कि बीजेपी को इन राज्यों में तो अपने इस मास्टर स्ट्रोक का बहुत अधिक फ़ायदा नहीं मिलने वाला.

गैर हिंदी भाषी राज्यइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

जहां बीजेपी का वोट बढ़ा…

इसके अलावा कुछ और राज्य भी हैं जहां साल 2014 के चुनाव में बीजेपी बहुत अधिक मज़बूत नहीं थी, जैसे पश्चिम बंगाल या ओडिशा.

इन राज्यों में ऐसे संकेत मिले हैं कि बीजेपी का वोटबैंक कुछ हद तक बढ़ा है. लेकिन इसके पीछे सवर्ण जातियों का वोट नहीं है. इस वोटबैंक के बढ़ने के पीछे असल में लोगों की सत्ताधारी दलों के प्रति नाराज़गी है.

हालांकि कुछ राज्यों में बीजेपी ने हिंदू कार्ड के दम पर बहुत अहम बढ़त भी बनाई है, जिसमें असम एक बड़ा राज्य है.

यह माना जा सकता है कि इन राज्यों में बीजेपी को 2014 के मुक़ाबले 2019 में अधिक वोट मिल सकते हैं लेकिन इसके पीछे सवर्ण जातियों का वोट नहीं होगा.

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कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि बीजेपी सरकार का सवर्ण जातियों को आर्थिक आधार पर 10 प्रतिशत आरक्षण देने का फ़ैसला उसे बहुत अधिक राजनीतिक लाभ तो नहीं देने वाला.

इस प्रस्तावित बिल का मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों में जितना हल्ला हो रहा है, असल में बीजेपी को इससे उतने अधिक फ़ायदे की उम्मीद नहीं करनी चाहिए.

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