दुनिया में 2030 तक होगी टैलेंट की भारी कमी, भारतीय युवाओं की रहेगी चांदी

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नई दिल्ली, 08 मई ! साल 2030 तक जब दुनिया में टैलेंट की भारी तंगी होगी, तब भारत में सरप्लस टैलेंट होगा यानी जरूरत से ज्यादा प्रतिभाएं होंगी. इसका मतलब यह है कि दुनिया में टैलेंट की कमी का भारतीय प्रतिभावान युवा अच्छा फायदा उठा पाएंगे.

वैश्विक कंसल्टिंग फर्म कोर्न फेरी की एक स्टडी के अनुसार, साल 2030 तक दुनिया में प्रतिभावान लोगों की 8.5 करोड़ तक की भारी तंगी हो सकती है, जो कि जर्मनी की मौजूदा जनसंख्या से भी ज्यादा संख्या है. वैश्विक स्तर पर नजदीकी अवधि में अमेरिका, जापान, फ्रांस, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया को सबसे ज्यादा चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा.

रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2030 तक जब एशिया-प्रशांत के क्षेत्र में करीब 4.7 करोड़ प्रतिभावान कामगारों की भारी कमी होगी, तब भारत के पास 24.53 करोड़ का टैलेंट सरप्लस होगा यानी इतनी जरूरत से ज्यादा प्रतिभाएं होंगी. ‘ग्लोबल टैलेंट क्रंच’ शीर्षक की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भारत एकमात्र ऐसा देश होगा जिसके पास टैलेंट सरप्लस होगा.

भारत में सबसे ज्यादा 24.40 लाख का टैलेंट सरप्लस मैन्युफैक्चरिंग में, इसके बाद 13 लाख का टैलेंट सरप्लस टेक्नोलॉजी,मीडिया एवं दूरसंचार में और 11 लाख का टैलेंट सरप्लस वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में होगा.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुशल प्रतिभाओं की तंगी से यदि निपटा नहीं गया तो इससे 2030 तक एशिया-प्रशांत देशों की बड़ी अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ सकता है.

कोर्न फेरी के सीओओ (एशिया प्रशांत) माइकल डिस्टेफैनो ने कहा, ‘कंपनियों को अपना भविष्य बचाने के लिए इस संभावित प्रतिभा संकट से निपटना होगा. यदि इसके लिए समुचित उपाय नहीं किए गए तो यह तंगी समूचे एशिया-प्रशांत के बाजारों के ग्रोथ पर गहरा असर डालेगी.’

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘एश‍िया-प्रशांत इलाके में साल 2020 तक ही 1.23 करोड़ तक टैलेंट की भारी कमी हो जाएगी और साल 2030 तक यह बढ़कर 4.7 करोड़ तक पहुंच जाएगी. समस्या का समाधान नहीं किया गया तो इससे सालाना 4.24 लाख करोड़ डॉलर का नुकसान हो सकता है.’

अध्ययन के अनुसार, एशिया-प्रशांत की 20 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में टैलेंट की आपूर्ति और मांग में साल 2020, 2025 और 2030 में खाई मुख्यत: तीन सेक्टर- वित्तीय एवं कारोबारी सेवाओं, टेक्नोलॉजी, मीडिया एवं दूरसंचार और मैन्युफैक्चरिंग में होगी.

भारतीय क्रिएटिव नहीं, उनके लिए मर्सिडीज खरीदना मात्र सफलता :एप्प्ल को-फाउंडर

ऐपल को फाउंडर स्टीव वॉजनिएक (फाइल फोटो)पल को फाउंडर स्टीव वॉजनिएक (फाइल फोटो)

ऐपल के सह संस्थापक स्टीव वॉजनिएक ने ET को दिए इंटरव्यू में भारती शिक्षा व्यवस्था और यहां के रचनात्मकता पर अपनी राय रखी है. उन्होंने कहा है कि भारत में जॉब मिलने को सफलता कहा जाता है, लेकिन क्रिएटिविटी कहां है? स्टीव वॉजनिएक वही शख्स हैं जिन्होंने पहला ऐपल कंप्यूटर बनाया था जिसका नाम Apple 1 है.

दरअसल उन्होंने भारतीय शिक्षा व्यव्स्था के बारे में अपनी राय जाहिर की है. उन्होंने ये कहा है कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था पढ़ाई पर टिकी है लेकिन क्रिएटिविटी को बढ़ावा नहीं देती है.

एक इंटरव्यू में वॉजनिएक ने कहा है, ‘आप कितने टैलेंटेड हैं? अगर आप इंजीनियर हैं या एमबीए हैं तो आप अपनी डिग्री पर इठलाइए, लेकिन खुद से पूछिए कि आप मैं कितने क्रिएटिव हैं.

ET को दिए इंटरव्यू में उन्होंने यह भी कहा है कि उन्हें इस बात की उम्मीद नहीं है कि भारत में गूगल, फेसबुक और ऐपल जैसी दुनिया बड़ी टेक कंपनियों जैसी कंपनी तैयार हो सकती है. वॉजनिएक के मुताबित भारत में उदाहरण के तौर पर एक बड़ी टेक कंपनी इनफोसिस है और वो भी इनोवेटिव नहीं है. उन्होंने यह भी उम्मीद जताई है कि इनफोसिस फिलहाल तो ग्लोबल टेक दिग्गज कंपनियों के रेस में आ ही नहीं सकता है.

उन्होंने सवालों का जवाब देते हुए यह भी राय दी है कि भारतीय के पास क्रिएटिविटी की कमी है और उन्हें इस तरह के करियर के लिए बढ़ावा भी नहीं दिया जाता है. उन्होंने कहा, ‘यहां सफलता का मतलब ऐकेड्मिक ऐक्सेलेंस, पढ़ाई, सीखना, अच्छी जॉब और बेहतर लाइफ जीना है. क्रिएटिविटी तब खत्म हो जाती है जब आपका बिहैवियर को प्रेडिक्ट करना आसान हो जाता है सब एक जैसे हो जाते हैं. न्यूजीलैंड जैसे छोटे देश को देखिए जहां लेखक, सिंगर, खिलाड़ी हैं और यह एक अलग दुनिया है’

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