टिहरी : आजादी को लडऩा पड़ा अपनों से भी

सकलाना के  पुजार गांव में 16 नवम्बर 1920 को जन्में नागेंद्र नें राजशाही से आजादी के लिए 11 जनवरी 1948 को कीर्तिनगर  में शहादत दे दी थी।कम्युनिस्ट पार्टी के निर्देश पर  नागेंद्र सकलानी टिहरी राजशाही के विरुद्ध लड़ाई तेज करने कीर्तिनगर पहुंचे ! यहां 11 जनवरी, 1948 को सकलानी के साथ ही मोलू भरदारी की भी शहादत हुई। मोलू भरदारी भी कम्युनिस्ट पार्टी के  सदस्य थे। इन दोनों शहीदों के मृत शरीरों को लेकर चन्द्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में जनता नें टिहरी मार्च किया। ये शहादत टिहरी राजशाही के ताबूत में अंतिम कील सिद्ध हुई।

नागेन्द्र सकलानी युवा थे.देहरादून में हाई स्कूल तक की शिक्षा ग्रहण करने के दौरान ही वे कम्युनिस्ट पार्टी के संपर्क में आये थे.टिहरी लौटने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ से वे राजशाही के विरुद्ध चलने वाले आन्दोलनों में ना केवल शरीक हुए बल्कि उन्हें संगठित करने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी.डांगचौरा के किसान आन्दोलन में काफी समय तक पुलिस को छकाते रहने के बाद उनकी गिरफ्तारी हो सकी थी.उसके बाद लम्बे अरसे तक राजा की आतातायी कैद में उन्हें रहना पडा…”देश की आजादी के पांच महीने बाद,जनता के शासन की मांग करना और इस मांग के लिए शहादत होना,सुनने में कुछ अजीब सा लगता है. लेकिन उत्तराखंड की तत्कालीन टिहरी रियासत में 11 जनवरी 1948 को दो नौजवानों-नागेन्द्र सकलानी और मोलू भरदारी की शहादत,रियासत में राजशाही से मुक्ति और जनता का शासन स्थापित करने के लिए हुई.देश में आजादी की लड़ाई दो मोर्चों पर लड़ी जा रही थी. एक तरफ अंग्रेजी राज से मुक्ति पाने की लड़ाई थी और दूसरी तरफ राजे-रजवाड़ों की रियासतों में इनके जुल्मी राज से निजात पाने का संघर्ष था.अंग्रेजों से मुक्ति तो 15 अगस्त 1947 को मिल गयी पर टिहरी रियासत के भीतर अंग्रेजों के चले जाने के जश्न से ज्यादा राजा के दमन से मुक्ति पाने की तीव्र खदबदाहट थी.

30 मई1930 में वर्तमान उत्तरकाशी जिले के रंवायीं क्षेत्र में तिलाड़ी में अन्यायी वन कानूनों के खिलाफ सभा करता हुए लोगों का कत्लेआम हुआ. तिलाड़ी के मैदान को तीन तरफ से शाही फ़ौज ने घेरा,जो हिस्सा फ़ौज ने नहीं घेरा था,वहाँ यमुना नदी बह रही था.मैदान में इकठ्ठा हुए लोगों के पास दो ही विकल्प बचे या तो राजा की फ़ौज की गोलियों से मरें या फिर यमुना में कूद कर.इस तरह टिहरी रियासत ने तिलाड़ी में अपना लोकल जलियांवाला बाग़ कांड रच कर,जुल्म करने के मामले में अपने औपनिवेशिक प्रभुओं की बराबरी करने की कोशिश की.25 जुलाई 1944 को 84 दिन के अनशन के बाद श्रीदेव सुमन की शहादत हुई,जो कि राजा के अधीन उत्तरदायी शासन की ही मांग कर रहे थे.

इन बलिदानों के बीच टिहरी रियासत के अन्दर जनता पर राजशाही का दमन जारी रहा.अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो दूर की कौड़ी थी.शांतिपूर्ण सभा,जुलुस प्रदर्शन आदि का अधिकार राजदरबार में बंधक था.नाममात्र की खेती पर भी राजा की तरफ से भारी कर थोप दिए गए थे.दलदली और ढलवां भूमि जिस पर बमुश्किल ही खेती हो पाती थी,उस पर भी 75 से 80 रुपया कर लिया जाता था.जिन क्षेत्रों में आलू उत्पादन अच्छा होता था,वहां इसे बेचने का अधिकार राजा ने आलू सिंडिकेट को दे दिया था.आलू सिंडिकेट वाले किसानों से बेहद मामूली दामों पर आलू खरीदते और उन्हें बाहरी प्रदेशों में ऊँचे दामों पर बेच कर भारी मुनाफा कमाते थे.

किसानों पर होने वाले जुल्म के विरुद्ध दादा दौलतराम और नागेन्द्र सकलानी के नेतृत्व में किसानों के संघर्षों को संगठित किया गया.नागेन्द्र सकलानी युवा थे.देहरादून में हाई स्कूल तक की शिक्षा ग्रहण करने के दौरान ही वे कम्युनिस्ट पार्टी के संपर्क में आये थे.टिहरी लौटने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ से वे राजशाही के विरुद्ध चलने वाले आन्दोलनों में ना केवल शरीक हुए बल्कि उन्हें संगठित करने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी.डांगचौरा के किसान आन्दोलन में काफी समय तक पुलिस को छकाते रहने के बाद उनकी गिरफ्तारी हो सकी थी.उसके बाद लम्बे अरसे तक राजा की आतातायी कैद में उन्हें रहना पडा.

राजा के जेल में कैसी नारकीय स्थितयां थी इसका अंदाजा नागेन्द्र सकलानी के कर्मभूमि साप्ताहिक में छपे पत्रों,जिन्हें प्रसिद्द इतिहासकार डा.शिव प्रसाद डबराल “चारण” ने अपनी पुस्तक-उत्तराखंड का इतिहास-भाग 6*टिहरी-गढ़वाल राज्य का इतिहास (1815-1949) में उद्धृत किया है, से पता चलता है.उक्त पत्रों के अनुसार जेल में ऐसे फटे-पुराने कम्बल दिए जाते थे,जिन पर गंदगी के चलते मक्खियाँ भिनभिना रही होती थी.इसी तरह के कपडे पहनने को भी दिए जाते थे.भीषण ठण्ड में कपड़ों के अभाव में बंदी सो भी नहीं पाते थे.नागेन्द्र सकलानी अपने एक पत्र में लिखते हैं कि “ऐसा प्रयत्न किया जाता था कि राजनीतिक बंदी दरबार के सम्मुख घुटने टेक दे.” शाह वंशीय टिहरी के राजाओं की न्याय व्यवस्था कितनी अन्यायकारी थी,इसका अंदाजा जेल में रहते हुए नागेन्द्र सकलानी Image result for मोलू भरदारीऔर दादा दौलत राम द्वारा 10 फरवरी 1947 को किये गए अनशन की मांगों से लगाया जा सकता है.

किसान आन्दोलन के दौरान छीनी गयी संपत्ति की वापसी और अन्य मांगों के साथ उनकी एक मांग यह भी थी कि या तो उनपर लगाए गए आरोप वापस हों या फिर उनपर लगे अभियोगों की सुनवाई ब्रिटिश अदालत में हो.जिन अंग्रेजों के न्याय के पाखण्ड को भगत सिंह और उनके साथी पहले ही बेपर्दा कर चुके थे,टिहरी रियासत के राजनीतिक बंदी यदि उन अंग्रेजों की अदालत में इन्साफ पाने की कुछ उम्मीद देख पा रहे थी तो इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि टिहरी रियासत की अदालतों में राजा की स्वेछाचारिता के अलावा न्याय की कोई अन्य कोटि रही ही नहीं होगी.

बहरहाल नागेन्द्र सकलानी और दादा दौलत राम के उक्त अनशन का समाचार फ़ैलने पर बड़ी राजनीतिक हलचल हुई.देशी राज्य लोकपरिषद,कांग्रेस,कम्युनिस्ट पार्टी,टिहरी राज्य प्रजामंडल और प्रवासी गढ़वालियों की संस्थाओं ने तत्काल राजनीतिक बंदियों की रिहाई की मांग की.मजबूरन राजा को घोषणा करनी पड़ी कि 21 फरवरी 1947 को राजनीतिक बंदियों को मुक्त कर दिया जाएगा.

20 फरवरी 1947 को  ब्रिटेन की संसद में तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने जून 1948 से पहले भारत से अंग्रेजी राज के रुखसत होने का ऐलान कर दिया था.जिस समय जवाहरलाल नेहरू के आह्वान पर देसी राज्यों की कई रियासतों के प्रतिनिधि संविधान सभा में हिस्सा लेने आ रहे थे,लगभग उसी वक्त टिहरी के राजा ने “टिहरी गढ़वाल मेंटेनेंस ऑफ पब्लिक ऑर्डर एक्ट” पर दस्तखत कर दिए.इसके तहत राजदरबार के किसी भी कर्मचारी को राज्य की व्यवस्था भंग करने वाले को गिरफ्तार करने का अधिकार दे दिया गया था.स्पष्ट तौर पर यह राजशाही के विरुद्ध उठने वाले प्रतिरोध को कुचलने के लिए किया गया था.जहां राजा देश में चल रही बदलाव की लहर को अनदेखा करते हुए अपना दमनकारी शासन कायम रखना चाहता था,वहीँ प्रजा हर हाल में राजशाही की गुलामी से मुक्ति पाना चाहती  थी.

जनता की इस मुक्ति की चाह और नागेन्द्र सकलानी जैसे नेत्रित्वकारियों के साहस का परिणाम था कि टिहरी रियासत के भीतर सकलाना से शुरू होकर जगह-जगह आजाद पंचायतें कायम होने लगी.इन आजाद पंचायतों ने राज कर्मचारियों को खदेड़ दिया,पटवारी चौकियों पर कब्जा कर लिया,शराब की भट्टियां तोड़ डाली और राजधानी टिहरी पर कब्जा करने के लिए सत्याग्रही भर्ती करने का ऐलान किया.कीर्तिनगर में ऐसी ही आजाद पंचायत के गठन के लिए कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ से नागेन्द्र सकलानी और त्रेपनसिंह पहुंचे थे.

10 जनवरी 1948 को नागेन्द्र सकलानी की अगुवाई में कीर्तिनगर में सभा हुई और वहां राजा के न्यायालय पर कब्जा कर,उसपर राष्ट्रीय ध्वज फहरा कर आजाद पंचायत की स्थापना की घोषणा कर दी गयी.11 जनवरी को राजा के सब डिविजनल ऑफिसर(एस.डी.ओ.) और पुलिस सुपरिंटेंडेंट के नेतृत्व में पुलिस ने  न्यायालय पर कब्जा करना चाहा.लोगों ने उन्हें बंधक बनाने की कोशिश की.एस.डी.ओ. के आदेश पर आंसू गैस के गोले लोगों पर छोड़े गए.क्रुद्ध जनता ने राजा के न्यायालय भवन पर आग लगा दी.आग लगी देख एस.डी.ओ. और पुलिस सुपरिंटेंडेंट जंगल की तरफ भागने लगे.नागेन्द्र सकलानी और मोलू भरदारी उन्हें पकड़ने दौड़े तो एस.डी.ओ. ने उनपर गोली चला दी,जिससे दोनों शहीद हो गए.

पेशावर विद्रोह के नायक कामरेड चन्द्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में दोनों शहीदों का जनाजा टिहरी ले जाया गया और राजाओं के शमशान घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया.अपने पुत्र मानवेन्द्र शाह को गद्दी सौंप कर भी राज्य पर नियंत्रण रखने वाले राजा नरेन्द्र शाह को टिहरी के अन्दर नहीं घुसने दिया गया.टिहरी में प्रजामंडल के नेतृत्व में अंतरिम सरकार गठित हुई और 1949 में टिहरी का भारत में विलय हो गया. कामरेड नागेन्द्र सकलानी और कामरेड मोलू भरदारी(ये कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीद्वार सदस्य थे) की शहादत टिहरी राजशाही के ताबूत में अंतिम कील साबित हुई.

 

-अंग्रेजी हुकूमत तो थी ही, राजशाही के भी सहे जुल्म -अंग्रेजों व राजशाही के खिलाफ एक साथ लगते थे नारे -देश की आजादी के करीब पांच माह बाद आजाद हुआ था टिहरी ,  15 अगस्त, भले ही देश भर में यह दिन आजादी के दिन के रूप में जाना जाता है, लेकिन गढ़वाल का टिहरी ऐसा इलाका है, जहां 15 अगस्त को आजादी का जश्न मनाने वाले लोगों को जेलों में ठूंसा जा रहा था। दरअसल, उस समय टिहरी रियासत हुआ करती थी। ऐसे में यहां अंग्रेजों के साथ राजसत्ता का भी प्रभाव था। इसके चलते यहां के बाशिंदों को आजादी के लिए दोहरी लड़ाई लडऩी पड़ी। यही वजह है कि बाकी देश के करीब छह माह बाद टिहरी में आजादी की किरन पहुंच सकी। सर्वविदित है कि स्वतंत्रता के पूर्व देश सैकड़ों छोटी-बड़ी रियासतों में बंटा हुआ था। इन्हीं में से एक थी टिहरी रियासत। यहां के बाशिंदे को एक ओर तो अंग्रेजी दासता की बेडिय़ों में जकड़े हुए थे, वहीं रियासत की ओर से लागू किए गए नियम, कायदे और प्रतिबंधों का पालन करने को भी वे मजबूर थे। यही वजह थी कि यहां के लोगों को आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों के साथ राजसत्ता से भी संघर्ष करना पड़ा। टिहरी के 244 लोग स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहे। 15 अगस्त 1947 को देश के आजाद होने के बाद टिहरी रिसासत के राजा ने अपना शासन जारी रखने की घोषणा की थी। इस दौरान जब स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने परिपूर्णानंद पैन्यूली के नेतृत्व में आजादी का जश्न मनाते हुए टिहरी बाजार में जुलूस निकाला, तो उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया था। दर्जनों सत्याग्रहियों को जेल में बंद करने से आम जनता का आक्रोश फूट पड़ा और राजशाही के खिलाफ आंदोलन ने जोर पकड़ लिया। राजशाही के खात्मे के लिए दादा दौलतराम, नागेंद्र सकलानी, वीरेंद्र दत्त सकलानी व परिपूर्णानंद पैन्यूली ने नेतृत्व संभाला। सिंतबर-अक्टूबर 1947 में आंदोलनकारियों ने सकलाना क्षेत्र को आजाद घोषित कर पंचायत शासन स्थापित कर दिया। इसी बीच कीर्तिनगर के कड़ाकोट क्षेत्र में आंदोलन के नेता नागेंद्र सकलानी व मोलू भरदारी 11 जनवरी 1948 को राजशाही पुलिस की ओर से हुई गोलीबारी में शहीद हो गए, जबकि एक सत्याग्रही तेगा सिंह घायल हुए। इस गोली कांड के विरोध में पूरी रियासत (टिहरी-उत्तरकाशी) में अभूतपूर्व विद्रोह शुरू हो गया। टिहरी में हजारों लोग उमड़ पड़े, जनता ने पुलिस अधिकारियों को जेल में डाल दिया और राजा को टिहरी से खदेड़ दिया गया। इसके बाद 14 जनवरी 1948 को टिहरी रियासत की आजादी की घोषणा की गई। इस प्रकार देश की आजादी के पूरे पांच माह बाद टिहरी के लोग आजाद हो पाए। उल्लेखनीय है कि टिहरी पर पंवार वंश के राजाओं का शासन सदियों से था। राजा के ऊपर पहले इस्ट इंडिया कंपनी और फिर सीधे तौर पर ब्रिटिश सरकार का हस्तक्षेप रहा। ब्रिटिश सरकार की इच्छा के बिना राजा कोई भी कदम नहीं उठाता था। यही वजह थी कि रियासत में अंग्रेजों के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को राजशाही दमनपूर्वक दबा देती थी।

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