ज्यादा वोट पाने के बावजूद क्यों घट गईं कांग्रेस की सीटें, समझें समीकरण

इस एक सीट के नतीजे देख लीजिए, कांग्रेस की छीछालेदर समझ में आ जाएगी,उल्टा पड़ा कांग्रेस का दांव, टीपू सुल्तान के इलाके में BJP पर बरसे वोट

 ज्यादा वोट पाने के बावजूद कांग्रेस को कम सीटें ज्यादा वोट पाने के बावजूद कांग्रेस को कम सीटें

कर्नाटक में साल 2013 के 122 सीटों से घटकर इस बार कांग्रेस 78 सीटों पर सिमट गई है. यह तब है, जब उसे इस बार ज्यादा वोट हासिल हुए हैं. आखिर ऐसा क्यों हुआ, आइए समझते हैं.

येदियुरप्पा और श्रीरामुलू का असर

कांग्रेस को इस बार करीब 38 फीसदी वोट मिले हैं, जबकि 2013 में उसे 36.6 फीसदी वोट मिले थे. यही नहीं उसे इस बार बीजेपी से भी करीब 2 फीसदी ज्यादा वोट मिले हैं, इसके बावजूद उसकी सीटें बीजेपी से 26 कम हैं. इसकी एक वजह यह है कि बीजेपी के कद्दावर नेता बीएस येदियुरप्पा पिछली बार पार्टी से बाहर थे और उन्होंने एक अलग पार्टी बनाकर चुनाव लड़ा था.

बीजेपी के मतों में बिखराव कम

इस बार येदियुरप्पा और एक बागी नेता श्रीरामुलू बीजेपी के साथ थे और इन सबके प्रभाव वाले जो वोट थे, वे बीजेपी को मिले. हालांकि, साल 2013 में बीजेपी और इन दोनों नेताओं के दलों को मिलाकर कुल 32 फीसदी वोट ही हासिल हुए थे. यानी इस बार बीजेपी कम से कम चार फीसदी वोटों को अपने पक्ष में बढ़ाने में कामयाब रही. एक तथ्य यह है कि बीजेपी के वोटों में कांग्रेस के मुकाबले बिखराव कम था, जिसकी वजह से वह कम मत हासिल करके भी ज्यादा सीटें हासिल करने में सफल हुई.

इसी तरह, जेडी (एस) को साल 2013 के मुकाबले इस बार करीब दो फीसदी कम वोट मिले हैं, फिर भी इस बार वह ज्यादा सीटें हासिल करने में सफल हुई है. साल 2013 में जेडी (एस) को 20.2 फीसदी वोट मिले थे, लेकिन इस बार उसे 18.3 फीसदी वोट ही हासिल हुए. जेडी (एस) को सीटें ज्यादा मिलने की वजह यह है कि उसका असर दक्ष‍िण कर्नाटक के वोक्कालिगा प्रभुत्व वाले इलाकों में केंद्रित है.

टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, हैदराबाद-कर्नाटक और ओल्ड मैसूर में कांग्रेस को बीजेपी से ज्यादा वोट मिले हैं. इन दोनों इलाकों में करीब 99 सीटें हैं. अन्य क्षेत्रों में बीजेपी को ज्यादा वोट मिले हैं. साल 2013 से तुलना करें तो कांग्रेस को इस बार ओल्ड मैसूर, बॉम्बे-कर्नाटक और हैदराबाद-कर्नाटक में ज्यादा वोट हासिल हुए हैं, लेकिन बाकी इलाकों में उसके वोट खिसक गए हैं.

ग्रामीण इलाकों में बीजेपी का बेहतर प्रदर्शन

कर्नाटक चुनाव में वोटिंग ट्रेंड में भी बदलाव देखने को मिला. बीजेपी ने शहरी क्षेत्र से ज्यादा ग्रामीण इलाकों में बेहतर प्रदर्शन किया. इसके पीछे किसानों की अहम भूमिका रही. राज्य में ग्रामीण क्षेत्र की 166 विधानसभा सीटें आती हैं. इनमें से 74 सीटें बीजेपी को मिली हैं. जबकि कांग्रेस 57 सीटें ही जीत सकी. वहीं जेडीएस के खाते में 33 और 2 सीटें अन्य को मिली हैं.

दोनों पार्टियों के बीच वोट का सबसे ज्यादा अंतर शहरी क्षेत्र की 20 सीटों पर देखा गया. इन शहरी क्षेत्रों में कांग्रेस को 38.3 फीसदी वोट मिले हैं, जबकि बीजेपी को महज 32.3 फीसदी. हालांकि दोनों को ही इनमें 7-7 सीटें मिली हैं.

आरक्षि‍त सीटों पर वोट ज्यादा सीटें कम

इसी तरह अनुसूचित जाति के लिए आरक्ष‍ित सीटों पर भी कांग्रेस को बीजेपी से ज्यादा वोट मिले हैं, लेकिन सीटें उसे बीजेपी से कम हासिल हुई हैं. कांग्रेस को एससी के लिए आरक्ष‍ित सीटों में से 12 और बीजेपी को 16 सीटें हासिल हुई हैं. इसी तरह एसटी के लिए आरक्ष‍ित सीटों पर बीजेपी को वोट ज्यादा मिले हैं, लेकिन सीटें कम हासिल हुई हैं. बीजेपी को ऐसी 6 सीटें, जबकि कांग्रेस को 8 सीटें हासिल हुई हैं.

लिंगायत इलाकों में कांग्रेस के वोट बढ़े

लिंगायत प्रभाव वाले 120 सीटों में कांग्रेस ने साल 2013 के मुकाबले अपनी वोट हिस्सेदारी 35.9 फीसदी से बढ़ाकर 38.1 फीसदी कर ली है. हालांकि बीजेपी को उससे ज्यादा 40.6 फीसदी वोट मिले हैं.

पूरे कर्नाटक में एक सा नहीं रहा जनादेश, 6 जोन से आए 6 तरह के नतीजे

यूं दरक गया कांग्रेस का किलायूं दरक गया कांग्रेस का किला
कर्नाटक विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने सत्तारूढ़ कांग्रेस को पटखनी दे दी है. कांग्रेस को यह शिकस्त कर्नाटक के उन सभी 6 राजनीतिक जोन में मिली है जिनमें से कम से कम तीन जोन को कांग्रेस का गढ़ कहा गया है. राज्य विधानसभा की 222 सीटों पर वोटों की गिनती पूरी होने के बाद बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी और 36.2 फीसदी वोट शेयर के साथ 104 सीटों पर विजयी हुई. वहीं 38 फीसदी वोट शेयर के साथ राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस को महज 78 सीटों पर जीत मिली. राज्य की क्षेत्रीय पार्टी जेडीएस ने 18.3 फीसदी वोट शेयर के साथ 38 सीटों पर जीत हासिल हुई.

बीजेपी की इस जीत के लिए यदि कर्नाटक के सभी जोन ओल्ड मैसूर, कोस्टल-कर्नाटक, बंगलुरू-कर्नाटक, मुंबई-कर्नाटक, सेंट्रल कर्नाटक और हैदराबाद-कर्नाटक जिम्मेदार है तो वहीं कांग्रेस के लिए इन सभी जोन में खराब प्रदर्शन के साथ-साथ कोस्टल कर्नाटक, सेंट्रल-कर्नाटक, हैदराबाद कर्नाटक और ओल्ड मैसूर के अपने गढ़ को गंवा दिया.

ओल्ड मैसूर क्षेत्र

ओल्ड मैसूर क्षेत्र में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब रहा. हालांकि यहां बीजेपी की क्षेत्रीय पार्टी जेडीएस से सांठगांठ तुरुप का इक्का साबित हुआ. इन चुनावों में कांग्रेस को 17 सीटों पर जीत मिली तो बीजेपी को 9 सीटों पर जीत दर्ज हुई. बीजेपी-जेडीएस का कांग्रेस के खिलाफ लामबंदी से इस क्षेत्र में जेडीएस को कुल 28 सीटों पर जीत हासिल हुई.

वहीं 2013 के विधानसभा चुनावों में इस क्षेत्र में कांग्रेस को 40 सीट तो 2008 के चुनावों में उसे 41 सीटों पर जीत मिली थी. वहीं 2008 में जेडीएस को ओल्ड मैसूर क्षेत्र में 18 सीट तो 2013 में उसे 30 सीटों पर जीत मिली थी. वहीं 2013 में बीजेपी को इस क्षेत्र में महज 5 सीटों पर जीत दर्ज हुई थी.

इन आंकड़ों से साफ है कि इस क्षेत्र में बीजेपी-जेडीएस सांठगांठ से कांग्रेस को यह मजबूत गढ़ गंवाना पड़ा. वहीं बीजेपी ने इस क्षेत्र में कांग्रेस के बराबर पकड़ बनाई तो सबसे ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज कर जेडीएस ने कांग्रेस की सरकार बनाने की क्षमता को सबसे करारा झटका दिया.

कोस्टल-कर्नाटक क्षेत्र

कर्नाटक का कोस्टल क्षेत्र में अच्छे प्रदर्शन के बूते कांग्रेस ने 2013 में राज्य की सरकार का नेतृत्व किया था लेकिन इन चुनावों में कांग्रेस को यहां बीजेपी के हाथों मुंह की खानी पड़ी. इन चुनावों में जहां कांग्रेस को महज 3 सीट जीतने को मिली वहीं क्षेत्र की 21 सीटों में बीजेपी को 18 सीटों पर जीत हासिल हुई. वहीं 3 सीटें अन्य के खाते में गई है.

ठीक इसी तरह 2013 के चुनावों में बीजेपी को इस क्षेत्र में मुंह की खानी पड़ी थी और वह सिर्फ एक सीट जीतने में सफल हुई थी. वहीं 2008 के चुनावों बीजेपी ने इस क्षेत्र की दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों में 13 सीटों पर जीत दर्ज की थी. गौरतलब है कि 2013 से पहले इस क्षेत्र को बीजेपी का सबसे मजबूत किला समझा जाता था और अब 2018 में इस प्रदर्शन के बाद एक बार फिर कोस्टल कर्नाटक राज्य की सत्ता को बीजेपी के हाथ सुपुर्द करने में सबसे कारगर भूमिका में रहा.

बंगलुरू-कर्नाटक क्षेत्र

कर्नाटक राजनीति की दिशा बेंगलुरू में हुई वोटिंग से भी निर्धारित होती है. राजधानी बेंगलुरू और इर्दगिर्द की विधानसभा सीटों पर आमतौर पर विकास के नाम पर वोटिंग देखने को मिलती है. इन चुनावों में इस क्षेत्र की 15 सीटों पर कांग्रेस को जीत मिली तो 11 सीटों पर बीजेपी के उम्मीदवार हावी रहे. यहां 4 सीटें जेडीएस के खाते में गई.

विधानसभा चुनाव 2008 में इस क्षेत्र ने बीजेपी से उम्मीद रखी थी लेकिन 2013 के चुनावों में इस क्षेत्र ने विकास के लिए कांग्रेस पर भरोसा किया. 2013 के चुनावों में बीजेपी को कांग्रस से एक कम सीट पर जीत दर्ज हुई थी. इस क्षेत्र की कुल 28 विधानसभा सीटों में 201 के चुनावों में बीजेपी को 12 और कांग्रेस को 13 सीटों पर जीत मिली थी. वहीं 2008 के चुनावों में इस क्षेत्र में बीजेपी को कुल 17 सीटों पर जीत दर्ज हुई थी. 2018 के चुनाव नतीजों में एक बार फिर बीजेपी को कांग्रेस से अधिक सीटें मिल रही है.

मुंबई-कर्नाटक क्षेत्र

कर्नाटक के मुंबई-कर्नाटक क्षेत्र में उत्तर कर्नाटक के सात जिले शामिल हैं. 2018 विधानसभा चुनावों के नतीजों में इस क्षेत्र में कांग्रेस को महज 17 सीटें तो बीजेपी को 30 सीटों पर जीत मिली है. वहीं जेडीएस के खाते में 2 और अन्य के खाते में 1 सीट दर्ज हुई है.

राज्य में सरकार बनाने के लिए यह एक अहम क्षेत्र है. विधानसभा चुनाव 2013 के नतीजों के आधार पर इस क्षेत्र को कांग्रेस का गढ़ माना गया क्योंकि इन चुनावों में कांग्रेस ने बीजेपी को तगड़ी शिकस्त देते हुए अपनी उम्मीद से भी अधिक 34 सीटों पर जीत दर्ज की थी. वहीं बीजेपी को महज 14 सीटों से संतोष करना पड़ा था. वहीं 2008 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को इस क्षेत्र में 38 सीटों पर अप्रत्याशित जीत देखने को मिली थी.

सेंट्रल कर्नाटक क्षेत्र

विधानसभा चुनाव 2018 में कांग्रेस को सेंट्रल कर्नाटक का अपना मजबूत गढ़ गंवाना पड़ा. इस क्षेत्र में कर्नाटक के टुमकुर, दावनगेरे, चित्रदुर्ग और शिमोगा जिले की विधानसभा सीटें शामिल हैं. इन चुनावों में इस क्षेत्र की 11 सीटों पर कांग्रेस को जीत मिली को 24 सीटें बीजेपी के नाम रही. वहीं जेडीएस को भी इस क्षेत्र में एक भी सीट पर जीत नहीं मिली.

2013 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने 18 सीटों पर जीत दर्ज की थी. वहीं जेडीएस ने इन चुनावों में कुल 10 सीटों पर जीत दर्ज करते हुए बीजेपी को महज 2 सीट पर सीमित कर दिया था.

हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र

हैदराबाद कर्नाटक क्षेत्र राज्य का वह क्षेत्र है जो आंध्रप्रदेश से सटा हुआ है. इस क्षेत्र में कुल 31 विधानसभा सीटें शामिल हैं. इन चुनावों में इस क्षेत्र पर कांग्रेस ने अपनी साख बचाने में थोड़ी सफलता पाई है. कांग्रेस के 15 उम्मीदवार इस क्षेत्र से विजयी रहे जबकि बीजेपी को यहां 13 सीटों पर जीत दर्ज हुई है. जेडीएस ने यहां 3 सीटों पर जीत दर्ज की है. 2013 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को इस क्षेत्र में 19 सीटों पर जीत दर्ज हुई थी वहीं बीजेपी को महज 4 सीटें मिली थी.

इस एक सीट के नतीजे देख लीजिए, कांग्रेस की छीछालेदर समझ में आ जाएगी

 सिद्धारमैया. कर्नाटक के मुख्यमंत्री, जिनके चेहरे पर कांग्रेस ने 2018 का चुनाव लड़ा. नतीजे आए तो बीजेपी कर्नाटक में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. दूसरे नंबर आने के बाद भी कांग्रेस ने जेडीएस के एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री की कुर्सी ऑफर कर दी. हर कोशिश की कि बीजेपी को सत्ता न मिले. और कांग्रेस की इस हालत के लिए जिम्मेदार कौन है? जवाब ज्यादा मुश्किल नहीं है. फिर भी बताए देते हैं. वो हैं सिद्धारमैया.

सिद्धारमैया ने 2018 के विधानसभा चुनाव में दो जगहों से पर्चा दाखिल किया था. पहली सीट थी चामुंडेश्वरी, जहां से सिद्धारमैया 36 हजार से भी ज्यादा वोटों से हार गए और जनता दल (एस) के जीटी देवगौड़ा ने जीत दर्ज की.

सिद्धारमैया की दूसरी सीट थी बादामी. इस सीट से सिद्धा जीत तो गए हैं, लेकिन उनकी जीत का अंतर महज 1500 है.

अब इन आंकड़ों के आधार पर अंदाजा लगाइए. जिस एक सिद्धा के कंधे पर कांग्रेस ने पूरा कर्नाटक चुनाव छोड़ दिया था, वो आदमी खुद की सीट नहीं बचा पाया. जो एक सीट बची, वो भी किसी तरह से जीत पाए. ऐसे में कर्नाटक में कांग्रेस की छीछालेदर तो तय ही थी. और अब तक के नतीजों से ये साफ दिख रहा है.

उल्टा पड़ा कांग्रेस का दांव, टीपू सुल्तान के इलाके में BJP पर बरसे वोट

जानें टीपू सुल्तान के इलाके में किसे मिली जीत?जानें टीपू सुल्तान के इलाके में किसे मिली जीत?

कर्नाटक चुनावों में टीपू सुल्तान एक अहम मुद्दा बना. इस मुद्दे पर राज्य में तीनों प्रमुख पार्टियों बीजेपी, कांग्रेस और जेडीएस ने वोट बटोरने में कोई कसर नहीं छोड़ी. कर्नाटक के मौजूदा जिला श्रृरंगापट्टना, मैसूर, कुर्ग और मैंगलोर की कुल 9 विधानसभा क्षेत्रों को टीपू सुल्तान का क्षेत्र कहा जा सकता है और इनमें से 6 सीटों पर केन्द्र में सत्तारूढ़ बीजेपी ने शानदार जीत दर्ज की. वहीं कांग्रेस को 2 सीटों पर जीत मिली तो क्षेत्रीय पार्टी जेडीएस को महज एक सीट पर अपने उम्मीदवार के लिए समर्थन मिला.

कर्नाटक विधानसभा चुनावों में बीजेपी को 222 में 105 सीटों पर जीत के साथ राज्य की सबसे प्रभावशाली पार्टी बनने का मौका मिला. इन नतीजों के साथ बीजेपी देश के 29 में से 21वें राज्य में सरकार बनाने की संभावना तलाश रही है हालांकि दूसरे नंबर पर बैठी कांग्रेस और जेडीएस ने गठबंधन करते हुए बीजेपी को सरकार बनाने से रोकने की पहल भी कर दी है.

क्या कर्नाटक चुनावों में टीपू सुल्तान मुद्दा बना? बीते पांच साल के दौरान राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी ने टीपू सुल्तान को इतिहास के पन्नों से निकाल कर एक राष्ट्रवादी छवि देने की कोशिश की. हालांकि इसके विरोध में केन्द्र में सत्तारूढ़ और राज्य में विपक्ष में बैठी बीजेपी ने इसका जमकर विरोध किया. ऐसी स्थिति में इस सवाल का जवाब कि क्या कर्नाटक के चुनावों में टीपू सुल्तान मुद्दा बना या नहीं का जवाब इन 9 विधानसभा क्षेत्रों वाले जिलों में जनता की वोटिंग से मिलता है.

श्रृरंगापट्टना: इस क्षेत्र में 2004 से लगातार जेडीएस का उम्मीदवार जीत रहा है. इन चुनावों में एक बार फिर जेडीएस के उम्मीदवार रविन्द्र श्रीकान्तइया को जीत मिली है. हालांकि इस विधानसभा क्षेत्र में सत्ता कांग्रेस और जेडीएस के बीच रही है. टीपू सुल्तान के क्षेत्र में श्रृरंगापट्टना बेहद अहम है. इस क्षेत्र में मुस्लिम वोटरों की अच्छी संख्या है और कांग्रेस की टीपू सुल्तान को राष्ट्रीय छवि देने की कोशिश के पक्ष में यह समुदाय खड़ा है. इसके बावजूद कांग्रेस उम्मीदवार को इस सीट पर इस बार जीत हासिल नहीं हो सकी.

मैसूर: मैसूर वोडेयार वंश का क्षेत्र रहा है. इस क्षेत्र में कुल तीन विधानसभा सीटें कृष्णाराजा, चमाराजा और नरसिंम्हराजा आती है और नरसिंम्हराजा में मुस्लिम वोटर की अच्छी संख्या है. इस सीट पर कांग्रेस की सैत परिवार का वर्चस्व 1999 से कायम है. इन चुनावों में एक बार फिर कांग्रेस के तनवीर सैत को चुना गया है. वहीं मैसूर क्षेत्र की दोनों अन्य सीटों पर 2013 से कांग्रेस के उम्मीदवार जीत रहे थे लेकिन इन चुनावों में दोनों सीट बीजेपी के खाते में गई है.

कूर्ग: टीपू सुल्तान के प्रभाव क्षेत्र में अगला विधानसभा क्षेत्र कूर्ग या कोडागू है. कर्नाटक के इस पहाड़ी इलाके की अर्थव्यवस्था कॉफी प्लानटेशन पर निर्भर है. इस जिले में दो विधानसभा क्षेत्र हैं- विराजपेट और मादिकेरी. इन दोनों सीटों पर बीते 15 साल से बीजेपी का वर्चस्व रहा है और एक बार फिर दोनों ही सीटों पर बीजेपी के उम्मीदवारों को जीत मिली है.

मैंगलुरू: टीपू सुल्तान के प्रभाव क्षेत्र में आखिरी जिला मैंगलुरू है. इस जिले में तीन विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं- मैंगलुरू सिटी नॉर्थ, मैंगलुरू सिटी साउथ और मैंगलुरू है. इन तीनों सीटों को कांग्रेस का मजबूत किला माना जाता था क्योंकि 2013 से लगातार कांग्रेस का वर्चस्व इन तीनों सीटों पर रहा है. हालांकि इन चुनावों में बीजेपी ने इसे भेदने का काम किया और मैंगलुरू सिटी नॉर्थ के साथ-साथ मैंगलुरू सिटी साउथ की सीट पर बीजेपी उम्मीदवार जीत गए जबकि मैंगलुरू सीट को बचाने में कांग्रेस सफल हुई है.

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