जीबी रोड दिल्ली : इस सड़क का अंत नहीं..

बेकार होने के बाद कैसे जिंदा रहती हैं जीबी रोड की औरतें ?

नई दिल्ली, 3 अगस्त | दिल्ली की एक सड़क है, जिसका नाम सुनते ही लोगों की भौंहें तन जाती हैं और वे दबी जुबान में फुसफुसाना शुरू कर देते हैं। स्कूल में जब मैंने पहली बार इसके बारे में सुना था, तो कौतूहल था कि आखिर कैसी होगी यह सड़क? फिल्मों में अक्सर देखे गए कोठे याद आने लगते थे। याद आती थी मर्दो को लुभाने वाली सेक्स वर्कर्स, जिस्म की मंडी चलाने वाली कोठे की मालकिन और न जाने क्या-क्या। यही कौतूहल इतने सालों बाद मुझे जी.बी. रोड खींच लाया। बीते रविवार सुबह आठ बजे जब मैं जी.बी.रोड पहुंची, तो यह सड़क दिल्ली की अन्य सड़कों की तरह आम ही लगी। सड़क के दोनों ओर दुकानों के शटर लगे हुए थे। इन दुकानों के बीच से ही सीढ़ी ऊपर की ओर जाती हैं और सीढ़ियों की दीवारों पर लिखे नंबर कोठे की पहचान कराते हैं। कुछ लोग सड़कों पर ही चहलकदमी कर रहे हैं और हमें हैरानी भरी नजरों से घूर रहे हैं। हमने तय किया कि कोठा नंबर 60 में चला जाए।Image result for जीबी रोडImage result for जीबी रोड

एनजीओ में काम करने वाले अपने एक मित्र के साथ फटाफट सीढ़ियां चढ़ते हुए मैं ऊपर पहुंची, चारों तरफ सन्नाटा था। शायद सब सो रहे थे, आवाज दी तो पता चला, सब सो ही रहे हैं कि तभी अचरज भरी नजरों से हमें घूरता एक शख्स बाहर निकला। बड़े मान-मनौव्वल के बाद बताने को तैयार हुआ कि वह राजू (बदला हुआ नाम) है, जो बीते नौ सालों से यहां रह रहा है और लड़कियों (सेक्स वर्कर्स) का रेट तय करता है।

पहचान उजागर न करने की शर्त के साथ राजू ने एक सेक्स वर्कर सुष्मिता (बदला हुआ नाम) से हमारी मुलाकात कराई, जिसे जगाकर उठाया गया था। मैं सुष्मिता से अकेले में बात करना चाहती थी, लेकिन राजू को शायद डर था कि कहीं वह कुछ ऐसा बता न दे, जो उसे बताने से मना किया गया है।Image result for जीबी रोड

सुष्मिता की उम्र 23 साल है और उसे तीन साल पहले नौकरी का झांसा देकर पश्चिम बंगाल से दिल्ली लाकर यहां बेच दिया गया था। सुष्मिता ठीक से हिंदी नहीं बोल पाती, वह कहती है, मैं पश्चिम बंगाल से हूं, मेरा परिवार बहुत गरीब है। एक पड़ोसी का हमारे घर आना-जाना था। उसने कहा, दिल्ली चलो। वहां बहुत नौकरियां हैं तो उसके साथ दिल्ली आ गई। एक दिन तो मुझे किसी कमरे में रखा और अगले दिन यहां ले आया।

यह पूछने पर कि क्या वह अपने घर लौटना नहीं चाहती है? काफी देर चुप रहकर वह कहती है, नहीं। घर नहीं जा सकती। बहुत मजबूरियां हैं। यहां खाने को मिलता है, कुछ पैसे भी मिल जाते हैं, जो छिपाकर रखने पड़ते हैं।

सुष्मिता बीच में ही कहती है, किसी को बताना मत..। इससे आगे कुछ पूछने की हिम्मत की नहीं हुई। सुष्मिता है तो 23 की, लेकिन उसका शरीर देखकर लगता है कि जैसे 15 या 16 की होगी, दुबली-पतली कुपोषित लगती है।Image result for जीबी रोडImage result for जीबी रोड

इमारत की पहली और दूसरी मंजिल पर जिस्मफरोशी का धंधा चलता है। इच्छी हुई कि इन कमरों के अंदर देखा जाए कि यहां कैसे रहते हैं? अंदर घुसी की एक अजीब सी गंध ने नाक ढकने को मजबूर कर दिया। इतने छोटे और नमीयुक्त कमरे हैं, सोचती रही कि कोई यहां कैसे रह सकता है।

राजू बताता है कि एक कोठे में 13 से 14 सेक्स वर्कर हैं और सभी अपनी मर्जी से धंधा करती हैं लेकिन गीता (बदला हुआ नाम) की बात सुनकर लगा कि ये मर्जी में नहीं मजबूरी में धंधा करती हैं। गीता कहती है, जैसे आप नौकरी करके पैसे कमाती हो। वैसे ही ये हमारी नौकरी है। आप बताइए, हमारी क्या समाज में इज्जत है, कौन हमें नौकरी देगा। जिस्म बेचकर ही हम अपना घर चला रहे हैं। बेटी को पढ़ा रही हूं, ये छोड़ दूंगी तो बेटी का क्या होगा।

गीता कहती है कि वो एक साल में तीन कोठे बदल चुकी है। वजह पूछने पर कहती है, पैसे अच्छे नहीं मिलेंगे तो कोठा तो बदलना पड़ेगा ना। गीता की ही दोस्त रेशमा (बदला हुआ नाम) कहती है, हम जैसे हैं, खुश हैं। सरकार हमारे लिए क्या कर रही है। हमारे पास ना राशन कार्ड है, ना वोटर कार्ड ना आधार। हमारे पास कोई वोट मांगेन भी नहीं आता। सरकार ने हमारे लिए क्या किया। कुछ नहीं।Image result for जीबी रोड

जेहन में ढेरों सवाल लेकर एक और कोठे पर गई, जहां 15 से लेकर 19 साल की कई सेक्स वर्कर मिली, जो शायद रातभर की थकान के बाद देर सुबह तक सो रही हैं।

जी.बी रोड का पूरा नाम गारस्टिन बास्टियन रोड है, जहां 100 साल पुरानी इमारतें भी हैं। जगह-जगह दलालों के झांसे में नहीं आने और जेबकतरों और गुंडों से सावधान रहने की चेतावनी लिखी हुई है। इसके बारे में राजू कहते हैं, रात आठ बजे के बाद यहां का माहौल बदल जाता है। कोठे पर आने वालों की संख्या बढ़नी शुरू हो जाती है। अकेले आने वाले शख्स को जेबकतरे लूट लेते हैं, चाकूबाजी की भी कई वारदातें हुई हैं।Image result for जीबी रोडयहां आकर लगता है कि एक शहर के अंदर कोई और शहर है। जिस्मफरोशी के लिए यहां लाई गई या यहां खुद अपनी मर्जी से पहुंचीं औरतों की जिंदगी दोजख से कम कतई नहीं है। अपने साथ कई सवालों के जवाब लिए बिना वापस जा रही हूं, इस उम्मीद में कि जल्द लौटकर जवाब बटोर लूंगी।

बेकार होने के बाद कैसे जिंदा रहती हैं जीबी रोड की औरतें ?

मासिक धर्म, माहवारी, पीरियड्स– इन सब नामों से हम सब वाकिफ़ हैं. अच्छी तरह नहीं तो सतही ही सही, लेकिन वाकिफ़ ज़रूर हैं. और ये भी जानते हैं इसकी अहमियत क्या है किसी औरत के लिए. एक औरत के लिए प्रजनन सबसे बड़ा गुण है और माँ बनना सबसे बड़ा सुख. लेकिन दुनिया में एक तबका ऐसा भी है जिसके लिए माहवारी और माँ बनना एक अभिशाप से कम नहीं है.

बेकार होने के बाद कैसे जिंदा रहती हैं जीबी रोड की औरतें, जाने!
ANIL ARORAANIL ARORA

पिछले साल बरसात के मौसम की बात है. अपनी एक महिला मित्र को छोड़ने नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन गया था. ट्रेन आने में वक़्त था इसलिए जनरल वेटिंग एरिया में बैठ कर बातें कर रहे थे. दोपहर का वक़्त था. तभी सामने एक अधेड़ सी महिला पर नज़र पड़ी. फर्श पर लेटी थी, हुलिए से भिखारन लगती थी. उसके हाव भाव ने ध्यान अपनी तरफ खींचा. एक कोल्ड ड्रिंक की पुरानी-सी बोतल में पानी ले कर लेटी थी और थोड़ा-थोड़ा पानी हाथों में ले कर बार बार शरीर पर यहाँ-वहाँ रगड़ रही थी, जैसे उन हिस्सों में जलन हो रही हो. अजीब-अजीब सी शक्लें बनाती, जैसे तेज़ जलन का दर्द हो. हरक़तें असामान्य थीं, शायद मानसिक विक्षिप्त थी. हम दोनों उसे देखते हुए अपनी बातें जारी रखे हुए थे, लेकिन ध्यान उसी पर था.
थोड़ी देर में एक स्वीपर उधर से गुज़रा तो उत्सुकतावश उससे पूछ ही लिया, कौन है वो? उसने कहा, साहब ‘उधर से आई है’, और हाथ उस तरफ दिखा दिया जिधर दिल्ली का सबसे बदनाम इलाका है, जीबी रोड कहते हैं उसे.
इतना सुन कर हज़ार सवाल और पैदा हो गए और जिज्ञासा शांत होने की जगह बढ़ने लगी. मैंने कहा, “लेकिन उधर ये सब कहां होता है?” मेरा तात्पर्य भीख वगैरह के धंधे से था.Image result for जीबी रोड
स्वीपर थोड़ा जल्दी में था, लेकिन फिर भी मेरे मतलब की बात बता गया.
उस औरत का नाम रत्ना था, उम्र लगभग 45 साल. कुछ साल पहले तक जीबी रोड पर ‘धंधेवाली’ थी. फिर एक रोज़ वो हुआ जिसके न होने की कामना हर धंधेवाली करती है.
ढलती उम्र में ग्राहकों की कमी ने ग्राहकों की वाज़िब-ग़ैरवाज़िब हर मांग को मानने पर मजबूर कर दिया उसे. और एक दिन गर्भ ठहर गया. उसकी गलती उसके लिए बहुत बड़ी साबित हुई. गिरा तो दिया लेकिन जो वक़्त सेहत सुधरने में लगा उसने उसके बचे-खुचे ग्राहक भी छीन लिए. फिर एक दिन उसके दलाल ने उसके साथ वही किया जो बाकी “बेकार” हो चुकी धंधे वालियों के साथ होता है.
रेड लाइट एरिया में कोई रिटायरमेंट प्लान नहीं होता. कहीं ये बेकार औरतें बोझ न बन जाएं इसलिए इनके साथ अमानवीय काम होते हैं. रत्ना के ऊपर सोते वक़्त किसी ने एसिड की बोतल उड़ेल दी. छह-सात महीने अस्पताल में गुज़ारने के बाद कोई और ठिकाना नहीं मिला तो वापस उसी दलदल में पहुंच गयी ज़िन्दगी बचाने की उम्मीद लिए. दिमागी हालात भी बदतर होते जा रहे थे. लिहाज़ा बाकी बेकार औरतों जैसे उसे भी नए धंधे पर लगा दिया गया. अब सुबह आठ बजे गाड़ी स्टेशन पर छोड़ जाती है और रात में दस बजे ले जाती है. दिन भर स्टेशन में कहीं पड़ी रहती है और लोग तरस खा कर दो, पांच, दस, जितना तरस जेब पर भारी न पड़े, उतना दे देते हैं. दिन भर के कलेक्शन में सत्तर फ़ीसदी हिस्सा मालिक ले लेता है. लेकिन ज़िन्दगी बची है, इस बात से खुश हो जाती है रत्ना.Image result for जीबी रोड
कोई दुकान वाला खाना दे देता है, तो कोई यात्री कोई कपड़ा. नहीं मिलता तो आधा-पूरा बदन उघारे लोटती रहती हैं किसी न किसी प्लेटफार्म पर. कभी कभी होश में रहने पर वो हंस कर कहती है, ‘मैं माँ नहीं बन सकती, अब मेरे को महीना नहीं आता.’ फिर रुआंसी हो कर कहती है, ‘लेकिन अब कोई कस्टमर भी नहीं आता.’
असल में वेश्याएं, ‘धन्धेवालियां’, ‘रंडियां’ वगैरह औरतों की जमात का वो हिस्सा हैं जिनके लिए औरतपन गुनाह है. वो घर नहीं बसा सकतीं, मां नहीं बन सकतीं, बच्चे नहीं पाल सकतीं, परिवार का हिस्सा नहीं बन सकतीं. और तो और,अपने मासिक को भी दवाओं के भरोसे चलाती हैं. कभी दो रोज़ आगे, तो कभी दो रोज़ पीछे. कच्ची उम्र में गर्भ रोकना पड़ता है ताकि छाती में दूध भर सके. इंजेक्शन लेती हैं ताकि छातियां 30 से 34 और 34 से 38 हो जाएं. धंधे की मांग जो ठहरी. ग्राहकों को दूध से भरी छातियाँ बहुत पसंद हैं. गर्भवतियों की अलग डिमांड है. कुछ फ़ैंटेसी के मारे माहवारीशुदा “माल” खोजते हैं. बाक़ायदा उसके एक्स्ट्रा पैसे भी देते हैं, और सारा खेल पैसे के लिए ही तो होता है, इसलिये जैसी डिमांड हो वैसी सप्लाई भी करनी पड़ती है.

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