जिस बलिदान बैज पर हंगामा, उसके पैरा कमांडोज खा जाते हैं कांच 

क्या है बलिदान बैज और क्यों इसे पाना हर सेना के हर सैनिक का एक ख्वाब होता है. मगर इसके लिए जिस शरीर तोड़ देने वाली ट्रेनिंग से गुजरना पड़ता है, उसे सोचकर ही कई लोगों के होश उड़ जाते हैं.

पैरा कमांडोज को यह बैज दिया जाता है.पैरा कमांडोज को यह बैज दिया जाता है.

नई दिल्ली, 08 जून ! ग्लव्ज पर बने पैरा-कमांडोज के ‘बलिदान’ के निशान को लेकर आईसीसी और महेंद्र सिंह धोनी में से कोई झुकने को तैयार नहीं है. बीसीसीआई प्रशासकों की समिति के चेयरमैन विनोद राय ने साफ कर दिया है कि इस निशान को हटाने की जरूरत नहीं है. लेकिन क्या है बलिदान बैज और क्यों इसे पाना हर सेना के हर सैनिक का एक ख्वाब होता है. मगर इसके लिए जिस शरीर तोड़ देने वाली ट्रेनिंग से गुजरना पड़ता है, उसे सोचकर ही कई लोगों के होश उड़ जाते हैं.

सीने पर मेडल्स, गुलाबी टोपी, उस पर पैराशूट रेजीमेंट का निशान और सीने पर बलिदान बैज. सिर्फ यही पैरा-कमांडो (स्पेशल फोर्सेज) की पहचान नहीं है. सेना के सबसे घातक, काबिल, अत्याधुनिक हथियारों के अलावा बिना हथियारों के भी दुश्मनों का खात्मा करने में सक्षम होते हैं पैरा कमांडो. पैरा कमांडो बनने के लिए सभी जवानों को बतौर पैराट्रूपर्स क्वॉलिफाई करना होता है. उसमें सिलेक्ट होने के बाद वह स्पेशल फोर्सेज को चुन सकते हैं.

कौन होते हैं शामिल

भारतीय सेना में शामिल जवान ही पैराट्रूपर्स के लिए अप्लाई कर सकते हैं. इसके लिए 3 महीने का प्रोबेशन पीरियड होता है, जिसमें उन्हें कई तरह के शारीरिक और मानसिक परीक्षण से गुजरना होता है. इसमें कई जवान रिजेक्ट भी हो जाते हैं.

टेस्ट में पास होने वालों को यूपी के आगरा स्थित पैराट्रूपर्स ट्रेनिंग स्कूल भेज दिया जाता है, जहां उन्हें आसमान से 5 जंप लगानी होती है, जिसमें से एक रात को घने अंधेरे में लगाई जाती है. इसके बाद जो जवान पैरा (स्पेशल फोर्सेज) में जाना चाहते हैं, उन्हें तीन महीने की एक्स्ट्रा ट्रेनिंग करनी होती है. इसका मतलब स्पेशल फोर्सेज के लिए ट्रेनिंग 6 महीने की होती है.

ऐसी होती है ट्रेनिंग

पैरा (स्पेशल फोर्सेज) की ट्रेनिंग दुनिया में सबसे मुश्किल होती है, जिसमें जवान को हर उस दर्दनाक चीज से गुजरना पड़ता है, जिसे सोचकर ही एक आम इंसान की चीख निकल जाए. जवानों को सोने नहीं दिया जाता, भूखा रखा जाता है. मानसिक और शारीरिक तौर पर टॉर्चर किया जाता है. बुरी तरह थके होने के बावजूद ट्रेनिंग चलती रहती है. खाने को न मिले तो आसपास जो उपलब्ध हो, उसी से गुजारा करना पड़ता है. इतनी मुश्किल ट्रेनिंग को कई जवान छोड़ चले भी जाते हैं.

इतनी दर्दनाक ट्रेनिंग पूरी करने के बाद जवानों को गुलाबी टोपी दी जाती है. लेकिन इसके बाद उन्हें बेहद खास चीज मिलती है. वो होता है बलिदान बैज. लेकिन इसे हासिल करने के लिए भी जवानों को खतरनाक परीक्षा देनी होती है. पैरा कमांडोज को ‘ग्लास ईटर्स’ भी कहा जाता है यानी उन्हें कांच भी खाना पड़ता है. यह एक परंपरा है. टोपी मिलने के बाद उन्हें रम से भरा ग्लास दिया जाता है. इसे पीने के बाद जवानों को दांतों से ग्लास का किनारा काटकर उसे चबाकर अंदर निगलना पड़ता है. इसके बाद जवानों के सीने पर बलिदान बैज लगाया जाता है.

धोनी के ग्लव्स पर क्यों दिखा पैरा कमांडो का खास निशान, जानिये क्या है वजह

इन्हीं पैरा कमांडो को एक खास तरह की निशानी/चिन्ह दी जाती है जिसे बलिदान चिन्ह/बैज कहा जाता है। ये बैज उन्हें ही मिलता है जो स्पेशल पैरा फोर्सेज से जुड़े हों।

महेंद्र सिंह धोनी- India TV
महेंद्र सिंह धोनी, पूर्व भारतीय कप्तान 

भारतीय क्रिकेट टीम के मास्टर माइंड व पूर्व कैप्टन कूल महेंद्र सिंह धोनी ने विश्व कप के पहले मैच में भारतीय सेना को अद्भुत सम्मान दिया। क्रिकेट इतिहास में किसी खिलाडी द्वारा ऐसा पहले कभी नहीं देखा गया कि उसने अपनी किट में सेना का कोई चिन्ह बना रखा हो।जी हाँ भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच बुधवार को आईसीसी क्रिकेट विश्व कप मुकाबला खेला गया। धोनी इस मैच में विकेटकीपिंग के दौरान पैरा स्पेशल फोर्स के लोगो वाला ग्लव्स पहने नजर आए। दर्शकों की नजर धोनी के इस ग्लव्स पर उस वक्त पड़ी जब उन्होंने अफ्रीकी बल्लेबाज एंडिले फेहलुकवायो की स्टंपिंग की। धोनी की स्टंपिंग की भी जमकर तारीफ हो रही है। कई लोग इसे धोनी की बेस्ट स्टंपिंग बता रह हैं। सोशल मीडिया यूजर्स इस वीडियो क्लिप को खूब शेयर कर रहे हैं।

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Shiv Aroor
@ShivAroor

That’s the regimental dagger insignia of the Indian Para Special Forces on Dhoni’s gloves:

क्या है इस निशानी का मतलब?

भारतीय सेना की एक स्पेशल फोर्सेज की टीम होती है जो आतंकियों से लड़ने और आतंकियों के इलाके में घुसकर उन्हें मारने में दक्ष होती है। मुश्किल ट्रेनिंग और पैराशूट से कूदकर दुश्मन के इलाके में घुसकर दुश्मन को मारने में महारत हासिल करने वाले इन सैनिकों को पैरा कमांडो कहा जाता है।इन्हीं पैरा कमांडो को एक खास तरह की निशानी/चिन्ह दी जाती है जिसे बलिदान चिन्ह/बैज कहा जाता है। ये बैज उन्हें ही मिलता है जो स्पेशल पैरा फोर्सेज से जुड़े हों।

धोनी ने क्यों पहना बैज?

महेंद्र सिंह धोनी को 2011 में टेरीटोरियल आर्मी में लेफ्टिनेंट कर्नल की उपाधि से नवाजा गया था। उसके बाद साल 2015 में धोनी ने पैरा फोर्सेज के साथ बुनियादी ट्रेनिंग और फिर पैराशूट से कूदने की स्पेशल ट्रेनिंग भी पूरी की जिसके बाद धोनी को पैरा रेजिमेंट में शामिल किया गया और उन्हें ये बैज लगाने की अनुमति दी गई।

Shiv Aroor

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That’s the regimental dagger insignia of the Indian Para Special Forces on Dhoni’s gloves:

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Bhavesh Patil@Bhavesh10618238

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ऐसा पहली बार नहीं है जब धोनी ने पैरा फोर्सेज से जुड़ी निशानी को पहना हो, इससे पहले वो IPL के दौरान भी वो बलिदान बैज वाले टोपी और फोन के कवर पर इस निशानी को लगाए देखे जा चुके हैं।

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