छठे गुरु गुरु हरगोविंद सिंह का जन्म हुआ था आज

14 जून का इतिहास14 जून ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का 165वाँ (लीप वर्ष में 166 वाँ) दिन है। साल में अभी और 200 दिन बाकी हैं।

14 June History

  • प्रमुख घटनाएँ

    रूस और पोलैंड के बीच पोलियानोव शांति समझौते पर 1634 में हस्ताक्षर हुए।

  • ड्यून्स की लडाई में ब्रिटिश और फ्रांसीसी सेनाओं ने 1658 में स्पेन को हराया।
  • 1777-फिलाडेलफिया कांग्रेस में अमेरिकियों ने अपना झंडा अपनाया।अमेरिकी सेना की स्थापना की गई।
  • 1901- पहली बार गोल्फ प्रतियोगिता का आयोजन हुआ।
  • इंग्लैंड पर जर्मनी का पहला हवाई हमला 1917 में हुआ उसमे पूर्वी लंदन में सौ से ज्यादा लोगों की मौत।
  • अमेरिकी राष्ट्रपति वारेन जी. हार्डिंग ने 1922 में रेडियो पर अपना पहला भाषण दिया।
  • 1922- अमेरिकी राष्ट्रपति वारेन जी. हार्डिंग ने रेडियो पर अपना पहला भाषण दिया।
  • वियतनाम राष्ट्र का गठन 1949 में हुआ।
  • डॉ सी.वी. रमन को क्रेमलिन में लेनिन शांति पुरस्कार 1958 को प्रदान किया गया।
  • पेरिस में यूरोपीयन अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की स्थापना 1962 में की गई।
  • 1940- नाजियों ने विजित देश पोलैंड में यातना शिविर खोला।
  • 1962- पेरिस में यूरोपीयन अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की स्थापना की गई।
  • 1980- अर्जेंटीना के सैनिकों ने ब्रिटिश सेना के समक्ष फोकलैंड द्वीप में आत्मसमर्पण किया ।
  • 2001- चीन, रूस, कजाकिस्तान, किरगीस्तान, ताजिकिस्तान और उजबेकिस्तान ने संघाई सहयोग संगठन (एससीओ) बनाया।
  • जांच आयोग ने 2001 दीपेन्द्र को ही शाही परिवार का हत्यारा बताया।
  • पंचशील सिद्धान्त की 50वीं वर्षगांठ पर 2004 में बीजिंग में अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार।
  • माइकल जैक्सन बच्चों के साथ 2005 में यौन दुर्व्यवहार से जुड़े दस मामलों में बरी।
  • चीन के गोवी रेगिस्तान में 2007 को पक्षीनुमा विशाल डायनसोर के जीवाश्म मिले।
  • केन्द्र सरकार ने 2008 में अलग गोरखालैंण्ड राज्य के निर्माण की सम्भावना को ख़ारिज किया।
  • राजस्थान के बाँसवाड़ा ज़िले में 96 मीट्रिक टन की सोने की ख़ान का पता चला।
    • सिक्खों के छठे गुरु गुरु हरगोविंद सिंह का जन्म 1595 में हुआ।
      गुरु हरगोबिंद सिंह
      Guru-hargobind.jpg
      जन्म 14 जून, सन् 1595
      जन्म भूमि बडाली, अमृतसर
      मृत्यु 3 मार्च, 1644
      मृत्यु स्थान कीरतपुर, (पंजाब)
      अभिभावक माता- गंगा, पिता- गुरु अर्जन देव
      कर्म भूमि भारत
      पुरस्कार-उपाधि सिक्खों के छ्ठे गुरु
      विशेष योगदान गुरु हरगोबिंद सिंह ने एक मज़बूत सिक्ख सेना संगठित की और अपने पिता गुरु अर्जुन के निर्देशानुसार सिक्ख पंथ को योद्धा-चरित्र प्रदान किया था।
      पूर्वाधिकारी गुरु अर्जन देव
      उत्तराधिकारी गुरु हरराय

      गुरु हरगोबिंद सिंह Guru Har Gobind.jpgਗੁਰੂ ਹਰਿਗੋਬਿੰਦ ਜੀ  सिक्खों के छठे गुरु थे, जिनका जन्म माता गंगा व पिता गुरु अर्जुन सिंह के यहाँ 14 जून, सन् 1595 ई. में बडाली (भारत) में हुआ था। गुरु हरगोबिंद सिंह ने एक मज़बूत सिक्ख सेना संगठित की और अपने पिता गुरु अर्जुन के (मुग़ल शासकों के हाथों 1606 में पहले सिक्ख शहीद) निर्देशानुसार सिक्ख पंथ को योद्धा-चरित्र प्रदान किया था। गुरु हरगोबिंद सिंह 25 मई, 1606 ई. को सिक्खों के छठे गुरु बने थे और वे इस पद पर 28 फ़रवरी, 1644 ई. तक रहे।गुरू हरगोबिन्द सिखों के छठें गुरू थे। साहिब की सिक्ख इतिहास में गुरु अर्जुन देव जी के सुपुत्र गुरु हरगोबिन्द साहिब की दल-भंजन योद्धा कहकर प्रशंसा की गई है। गुरु हरगोबिन्द साहिब की शिक्षा दीक्षा महान विद्वान् भाई गुरदास की देख-रेख में हुई। गुरु जी को बराबर बाबा बुड्डा का भी आशीर्वाद प्राप्त रहा। छठे गुरु ने सिक्ख धर्म, संस्कृति एवं इसकी आचार-संहिता में अनेक ऐसे परिवर्तनों को अपनी आंखों से देखा जिनके कारण सिक्खी का महान बूटा अपनी जडे मजबूत कर रहा था। विरासत के इस महान पौधे को गुरु हरगोबिन्द  ने अपनी दिव्य-दृष्टि से सुरक्षा प्रदान की तथा उसे फलने-फूलने का अवसर भी दिया। अपने पिता श्री गुरु अर्जुन देव की शहीदी के आदर्श को उन्होंने न केवल अपने जीवन का उद्देश्य माना, बल्कि उनके प्रारम्भ किए महान कार्य  सफलता पूर्वक सम्पूर्ण करने के लिए आजीवन अपनी प्रतिबद्धता भी दिखलाई।

      बदलते हुए हालातों के मुताबिक गुरु हरगोबिन्द ने शस्त्र एवं शास्त्र की शिक्षा भी ग्रहण की। वह महान योद्धा भी थे। विभिन्न प्रकार के शस्त्र चलाने का उन्हें अद्भुत अभ्यास था। गुरु हरगोबिन्द का चिन्तन भी क्रान्तिकारी था। वह चाहते थे कि सिख कौम शान्ति, भक्ति एवं धर्म के साथ-साथ अत्याचार एवं जुल्म का मुकाबला करने के लिए भी सशक्त बने। वह अध्यात्म चिन्तन को दर्शन की नई भंगिमाओं से जोडना चाहते थे। गुरु- गद्दी संभालते ही उन्होंने मीरी एवं पीरी की दो तलवारें ग्रहण की।Image result for गुरु हरगोबिन्द मीरी और पीरी की दोनों तलवारें उन्हें बाबा बुड्डा ने पहनाई। यहीं से सिख इतिहास एक नया मोड लेता है। गुरु हरगोबिन्द मीरी-पीरी के संकल्प के साथ सिख-दर्शन की चेतना को नए अध्यात्म दर्शन के साथ जोड देते हैं। इस प्रक्रिया में राजनीति और धर्म एक दूसरे के पूरक बने। गुरु जी की प्रेरणा से श्री अकाल तख्त साहिब का भी भव्य अस्तित्व निर्मित हुआ। देश के विभिन्न भागों की संगत ने गुरु जी को भेंट स्वरूप शस्त्र एवं घोडे देने प्रारम्भ किए। अकाल तख्त पर कवि और ढाडियों ने गुरु-यश व वीर योद्धाओं की गाथाएं गानी प्रारम्भ की। लोगों में मुगल सल्तनत के प्रति विद्रोह जागृत होने लगा।Image result for गुरु हरगोबिन्द गुरु हरगोबिन्द नानक राज स्थापित करने में सफलता की ओर बढने लगे। जहांगीर ने गुरु हरगोबिन्द को ग्वालियर के किले में बन्दी बना लिया। इस किले में और भी कई राजा, जो मुगल सल्तनत के विरोधी थे, पहले से ही कारावास भोग रहे थे। गुरु हरगोबिन्द लगभग तीन वर्ष ग्वालियर के किले में बन्दी रहे। महान सूफी फकीर मीयांमीर गुरु घर के श्रद्धालु थे। जहांगीर की पत्‍‌नी नूरजहां मीयांमीर की सेविका थी। इन लोगों ने भी जहांगीर को गुरु  की महानता और प्रतिभा से परिचित करवाया। बाबा बुड्डा व भाई गुरदास ने भी गुरु साहिब को बन्दी बनाने का विरोध किया। जहांगीर ने केवल गुरु जी को ही ग्वालियर के किले से आजाद नहीं किया, बल्कि उन्हें यह स्वतन्त्रता भी दी कि वे 52राजाओं को भी अपने साथ लेकर जा सकते हैं। इसीलिए सिख इतिहास में गुरु जी को बन्दी छोड़ दाता कहा जाता है। ग्वालियर में इस घटना का साक्षी गुरुद्वारा बन्दी छोड़ है। अपने जीवन मूल्यों पर दृढ रहते गुरु जी ने शाहजहां के साथ चार बार टक्कर ली। वे युद्ध के दौरान सदैव शान्त, अभय एवं अडोल रहते थे। उनके पास इतनी बडी सैन्य शक्ति थी कि मुगल सिपाही प्राय: भयभीत रहते थे। Image result for गुरु हरगोबिन्दगुरु जी ने मुगल सेना को कई बार कड़ी पराजय दी। गुरु हरगोबिन्द ने अपने व्यक्तित्व और कृत्तित्वसे एक ऐसी अदम्य लहर पैदा की, जिसने आगे चलकर सिख संगत में भक्ति और शक्ति की नई चेतना पैदा की। गुरु जी ने अपनी सूझ-बूझ से गुरु घर के श्रद्धालुओं को सुगठित भी किया और सिख-समाज को नई दिशा भी प्रदान की। अकाल तख्त साहिब सिख समाज के लिए ऐसी सर्वोच्च संस्था के रूप में उभरा, जिसने भविष्य में सिख शक्ति को केन्द्रित किया तथा उसे अलग सामाजिक और ऐतिहासिक पहचान प्रदान की। इसका श्रेय गुरु हरगोबिन्द को ही  है।

      गुरु हरगोबिन्द बहुत परोपकारी योद्धा थे। उनका जीवन दर्शन जन-साधारण के कल्याण से जुडा हुआ था। यही कारण है कि उनके समय में गुरमतिदर्शन राष्ट्र के कोने-कोने तक पहुंचा। श्री गुरु ग्रन्थ साहिब के महान संदेश ने गुरु-परम्परा के उन कार्यो को भी प्रकाशमान बनाया जिसके कारण भविष्य में मानवता का महा कल्याण होने जा रहा था।

      गुरु जी के इन अथक प्रयत्‍‌नों के कारण सिख परम्परा नया रूप भी ले रही थी तथा अपनी विरासत की गरिमा को पुन:नए सन्दर्भो में परिभाषित भी कर रही थी। गुरु हरगोबिन्द की चिन्तन की दिशा को नए व्यावहारिक अर्थ दे रहे थे। वास्तव में यह उनकी आभा और शक्ति का प्रभाव था। गुरु जी के व्यक्तित्व और कृत्तित्वका गहरा प्रभाव पूरे परिवेश पर भी पडने लगा था। गुरु हरगोबिन्द ने अपनी सारी शक्ति हरमन्दिर व अकाल तख्त साहिब के आदर्श स्थापित करने में लगाई। गुरु हरगोबिन्द प्राय: पंजाब से बाहर भी सिख धर्म के प्रचार हेतु अपने शिष्यों को भेजा करते थे।Image result for गुरु हरगोबिन्द

      गुरु हरगोबिन्द  ने सिक्ख जीवन दर्शन को सम-सामयिक समस्याओं से केवल जोडा ही नहीं, बल्कि एक ऐसी जीवन दृष्टि का निर्माण भी किया जो गौरव पूर्ण समाधानों की संभावना को भी उजागर करता था। सिख लहर को प्रभावशाली बनाने में गुरु जी का अद्वितीय योगदान रहा।

      गुरु जी कीरतपुर साहिब में ज्योति-जोत समाए। गुरुद्वारा पाताल पुरी गुरु जी की याद में आज भी हजारों व्यक्तियों को शान्ति का संदेश देता है। भाई गुरुदास ने गुरु हरगोबिन्द  की गौरव गाथा का इन शब्दों में उल्लेख किया है:

      पंज पिआलेपंजपीर छटम्पीर बैठा गुर भारी, अर्जुन काया पलट के मूरत हरगोबिन्दसवारी,

      चली पीढी सोढियां रूप दिखावनवारो-वारी,

      दल भंजन गुर सूरमा वडयोद्धा बहु-परउपकारी॥

      “दाता बन्दी छोड़”Image result for गुरु हरगोबिन्द

      गुरु हरगोबिंद  जब कश्मीर की यात्रा पर थे तब उनकी मुलाकात माता भाग्भरी से हुई थी जिन्होंने पहली मुलाकात पर उनसे पूछा कि क्या आप गुरु नानक देव  हैं क्योंकि उन्होंने गुरु नानक देव  को नहीं देखा था। उन्होंने गुरु नानक देव  के लिए एक बड़ा सा चोला (एक पहनने का वस्त्र) बनाया था जिसमे 52 कलियाँ थी ये चोला उन्होंने उनके बारे में सुनकर कि उनका शरीर थोडा भारी है ये वस्त्र थोडा बड़ा बनाया था। माता की भावनाओं को देखते हुए गुरु साहिब ने ये चोला उनसे लेकर पहन लिया। गुरु साहिब जब ग्वालियर के किले से मुक्त किये गए तो उन्होंने यही चोला पहन रखा था जिसकी ५२ कलियों को पकड़ कर किले की जेल में बंद सारे ५२ राजा एक एक कर बाहर आ गए, तभी से गुरु हरगोबिन्द साहिब जी “दाता बन्दी छोड़” कहलाये।

    • वैज्ञानिक सतीश चंद्र दासगुप्ता का जन्म 1880 में हुआ।
    • प्रसिद्ध शास्त्रीय संगीतकार हीराभाई बादोडेकर का जन्म 1905 में हुआ।
    • केरल के महान नेता ईएमएस नंबूदिरीपाद का जन्म 1909 में हुआ।
    • भारतीय अभिनेता भारत भूषण का जन्म 1920 में हुआ।
    • भारतीय फ़िल्म निर्देशक,फ़िल्म निर्माता तथा पटकथा लेखक के. आसिफ़ का जन्म 14 जून 1922 को उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में हुआ था।
    • क्यूबा की मुक्ति में अपनी अह्म भूमिका निभानेवाले महान क्रांतिकारी चे ग्वेरा Che Guevaraका जन्म 1928 में हुआ।
    • टॉक शो से लेकर फिल्मों में काम करने वाली किरण खेर का जन्म 1955 में हुआ।
    • हिन्दी फ़िल्म अभिनेता एवं दूरदर्शन कलाकार शेखर सुमन का जन्म 1960 में हुआ।
    • आदित्य बिड़ला समूह के भारतीय उद्योगपति और अध्यक्ष कुमार मंगलम बिड़ला का जन्म 1967 में हुआ।
    • महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के संस्थापक और अध्यक्ष राज ठाकरे का जन्म 1968 में हुआ।
    • पंजाबी गायक सरबजीत चीमा का जन्म 1968 में हुआ।
    • 22 ग्रैंड स्लैम जीतन वाली टेनिस स्टार स्टेफी ग्राफ का जन्म 1969 में हुआ।
    • दक्षिण अफ्रीका के बल्लेबाज बोएटा डिपेनार का जन्म 1977 में हुआ।

      जन्म

      • 1969- स्टेफी ग्राफ, विश्व की सर्वश्रेष्ठ महिला टेनिस खिलाड़ी (अमेरिकी)
      • किरण खेर, हिंदी और बाँग्ला चलचित्र अभिनेत्री (बारीबाली) (देवदास)
      • 1968, -सरबजीत चीमा पंजाबी गायक
      • भारतीय फ़िल्म निर्देशक ,फ़िल्म निर्माता तथा पटकथा लेखक के. आसिफ़ का जन्म 14 जून 1922 को उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में हुआ था.
      • 14 जूूून 1999 अर्जुन देवासी का जन्म राजस्थान के केेरिया गाँव में हुआ था ।
    14 जून को हुए निधन
    • प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक एवं इतिहासकार मैक्स वेबर का निधन 1920 में हुआ।
    • प्रसिद्ध भारतीय भौतिक वैज्ञानिक कार्यमाणिवकम श्रीनिवास कृष्णन का निधन 14 जून 1961 को हुआ था।
    • कुर्त वॉल्डहाइम का निधन 2007 में हुआ वो संयुक्त राष्ट्र संघ के चौथे महासचिव थे।
    • काल्पनिक और गैर कथा के भारतीय लेखक मनोहर मालगोनकर का निधन 2010 में हुआ।
    • रुद्रवीणा वादक असद अली ख़ाँ का निधन 2011 में हुआ।
    •  भारतीय भौतिक वैज्ञानिक कार्यमाणिवकम श्रीनिवास कृष्णन का निधन 14 जून 1961  को हुआ था.

उत्सव/अवसर

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