चैनल न देखने की सलाह वालों को सरदाना का ‘करारा’ जवाब

हिंदी न्यूज चैनल ‘आजतक’ के एडिटर रोहित सरदाना का कहना है कि मीडिया में कुछ पत्रकार दोहरा मानक अपनाते हैं। ऐसे पत्रकार कुछ और कहते हैं, जबकि उनका चैनल किसी दूसरी लाइन पर चल रहा होता है। दरअसल, फेसबुक चैट के दौरान रोहित सरदाना से एक व्यक्ति ने पूछा था कि न्यूज वाले कह रहे हैं कि न्यूज देखना कुछ दिनों के लिए बंद करो। अब इसे न्यूज समझें या नसीहत?

इस पर रोहित सरदाना का कहना था कि इसे हम उन न्यूज वालों का दोहरा मानक मान सकते हैं, जिसे दोगलापन कहते हैं। नाम लिए बिना एक बड़े पत्रकार का जिक्र करते हुए रोहित सरदाना का कहना था, ‘उन्हीं पत्रकार के चैनल के ट्विटर हैंडल पर उन्हीं की फोटो बनाकर ट्वीट किया जाता है कि ‘डीडी फ्रीडिश’ पर हम इतने नंबर चैनल पर उपलब्ध हैं, आइए हमें देखिए।’ रोहित सरदाना का कहना था कि या तो उन पत्रकार की मान लो या उनके चैनल की मान लो।

इसके साथ ही रोहित सरदाना का यह भी कहना था, ‘असल में ये वही लोग हैं कि जब आतंकी हमला होगा तो कहेंगे कि बदला क्यों नहीं लेती भारत सरकार और आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब क्यों नहीं देती है, और जब हमारी सेना हमला करती है तो कहते हैं कि चुनाव आ गया, इसलिए देश को युद्ध में धकेल देना चाहते हैं।’

रोहित सरदाना के इस विडियो को आप यहां देख सकते हैं-

 निष्पक्षता के नाम पर ‘तटस्थता’ वाली एंकरिंग नहीं करता हूं: रोहित सरदाना

देश में टेलिविजन न्‍यूज इंडस्‍ट्री को नई दिशा देने और इंडस्‍ट्री को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने में अहम योगदान देने वालों को सम्मानित करने के लिए 16 फरवरी को नोएडा के होटल रेडिसन ब्लू में ‘एक्‍सचेंज4मीडिया न्‍यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड्स’ (enba) दिए गए। इनबा का यह 11वां एडिशन था और इस अवसर पर आयोजित समारोह में कई पैनल डिस्कशन भी हुए। ऐसे ही एक पैनल का विषय ‘क्या हमारे एंकर्स प्रवक्ताओं की तरह बनते जा रहे हैं?’ (Are our anchors becoming the new Spokesperson? ) रखा गया था, जिसमें मीडिया के दिग्गजों ने अपने विचार व्यक्त किए।

‘द हिन्दू’ (The Hindu)  के डिप्टी एडिटर संदीप फुकन ने बतौर सेशन चेयर इसे मॉडरेट किया। इस पैनल डिस्कशन में ‘जी बिजनेस’ (Zee Business) के मैनेजिंग एडिटर अनिल सिंघवी, ‘आजतक’ (AajTak) के एडिटर रोहित सरदाना ’टाइम्स नाउ’ (Times Now) की एंकर प्रीति दहिया, ‘रिपब्लिक टीवी’ (Republic TV) की सीनियर एडिटर दीप्ति सचदेवा, ‘न्यूज एक्स’ (News X) के मैनेजिंग एडिटर रिषभ गुलाटी और ‘विऑन’ (WION) की एसोसिएट एडिटर पलकी शर्मा,शामिल थे।

संदीप फुकन द्वारा यह पूछे जाने पर कि क्या हमारे एंकर्स प्रवक्ताओं की तरह बनते जा रहे हैं? ‘आजतक’ के एडिटर रोहित सरदाना का कहना था, ‘मुझे लगता है कि एंकर उस आदमी की भावना का प्रवक्ता होता है, जो उसे अपने सामने टीवी पर देखता है। हर समय यदि एंकर सामने वाले को बेवकूफ समझकर खुद का ज्ञान बखार रहा हो और अपने आपको ज्ञानी साबित करने की कोशिश कर रहा हो, तो आज के समय में वह ऑडियंस से कनेक्ट नहीं कर पाता है। आज के समय में कोई भी आदमी ‘मन की बात’ भी बहुत देर तक तभी सुनता है, जब आप उसके मन की बात कहें। केवल अपने मन की बात कहते रहेंगे तो वह बहुत देर तक आपसे कनेक्ट नहीं करेगा।’

उन्होंने कहा, ‘यदि देश के लोगों के मूड की बात करें तो दो दिन से हम देश के तमाम रंग दिखा रहे हैं। पुलवामा की घटना के बाद कहीं पर गम है, कहीं पर गुस्सा है, कहीं पर नाराजगी है तो कहीं पर विरोध-प्रदर्शन हो रहा है। इन चीजों को अपने चैनल पर दिखाते समय यदि हम इन सब बातों से कनेक्ट करने की कोशिश करते नहीं दिखेंगे तो सामने वाला कुछ समझ ही नहीं पाएगा। ऐसे में वह समझेगा कि या तो हम खुद कंफ्यूज हैं अथवा उसे कंफ्यूज करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में कोई यदि मुझसे कहे कि तुम तो वॉर पर केंद्रित हो, तो बता दूं कि जिसने अपने घर का बच्चा खो दिया है, जिसकी सगाई हुई थी और उसकी लाश भी इस बात से पहचानी गई कि उसकी एक उंगली में अंगूठी थी और बाकी की बॉडी नहीं मिली, उस जवान के माता-पिता और होने वाली बीवी कह रहे हैं कि हमें लाश नहीं चाहिए बल्कि बदला चाहिए। यदि मैं यह भावना देश को दिखा रहा हूं अथवा बता रहा हूं तो क्या मैं किसी राजनीतिक पार्टी का प्रवक्ता हूं। नहीं, ऐसा नहीं है। मैं तो उस परिवार का अथवा हर उस व्यक्ति का प्रवक्ता हूं, जो उस भावना को महसूस कर रहा है।’

एक उदाहरण देते हुए रोहित सरदाना ने कहा, ‘यदि हम दो लोगों को एक कमरे में बंद कर दें जो आपस में लड़ रहे हैं। इनमें एक कह रहा है कि बाहर बारिश हो रही है, जबकि दूसरा कह रहा है कि बारिश नहीं हो रही बल्कि धूप निकल रही है। ऐसे में वो टीवी के माध्यम से मेरे पास आते हैं तो मेरा काम तो यह है कि खिड़की खोलकर बता दूं कि बाहर बारिश हो रही है अथवा धूप है। एंकर का काम यह थोड़े ही है कि वह कहे कि दोनों तथ्य आपके सामने ऱख रहा हूं। एक कह रहा है कि धूप है और दूसरा कह रहा है कि बारिश है। अब आप दोनों तय कर लीजिए कि क्या सही है। ऐसे में उन लोगों का तो यही कहना होगा कि हमने सच पता करने के लिए ही तो टीवी खोला था।‘

रोहित सरदाना का यह भी कहना था, ‘अभी तक हम निष्पक्षता के नाम पर तटस्थता की पैरवी करते आए हैं। जबकि ये दोनों अलग-अलग चीज हैं। तटस्थता का मतलब तो ये है कि मैं जाकर कुछ भी उठा लाऊं और बिना सोच-समझे टीवी के जरिये दर्शकों को वह सूचना प्रेषित कर दूं कि आप देख लीजिए क्या सही है और क्या गलत। जबकि निष्पक्षता का मतलब ये है कि मैं सारी चीजें देखूं, समझूं, महसूस करूं और उसके बाद आपको बताऊं कि मुझे क्या ठीक लगा। यदि किसी भावना को अपनी आवाज देना और उसे जनता तक पहुंचाना और निष्पक्षता को सही तरह से सामने रख देना किसी का प्रवक्ता बनना होता है तो देश के लोगों के लिए इस तरह का प्रवक्ता बनने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है, जो मुझे टीवी पर देखते हैं और मुझ पर भरोसा करते है। वे लोग टीवी इसलिए देखते हैं कि आखिर देखें कि इस मामले में इनका क्या नजरिया है?

उन्होंने कहा, ‘दूसरे एंकर्स के बारे में तो नहीं कह सकता, लेकिन मैं तो आमतौर पर सिर्फ एक-डेढ़ घंटे के लिए टीवी पर आता हूं। वो एक घंटा उस दिन के विषय के हिसाब से तय होता है। ऐसे में सामने वाले को भी पता होता है कि शो में किसके साथ किस तरह के सवाल जवाब होने हैं। ऐसे में जिसे पता होता है कि आज उसका ‘बैंड’ बजने वाला है तो वह यह पहले से तय करके आता है कि ज्यादा होने पर कह देंगे कि एंकर तो राजनीतिक पार्टी के प्रवक्ता की तरह बात कर रहा है। ऐसे में राजनीतिक दल एंकर्स पर दूसरी पार्टियों का प्रवक्ता होने का आरोप लगाते हैं। वरिष्ठ पत्रकार एन. राम की चिट्ठी को लेकर सोशल मीडिया पर काफी कुछ छपा है, लेकिन उन्ही एन. राम की पिछली स्टोरी को लेकर वही नेता कितनी तारीफ करते रहे होंगे। दर्शक सब चीजों को समझते हैं। उन्हें पता होता कि यदि आज शो का मुद्दा ये है तो इसमें क्या होने वाला है।’

नीचे दिए गए विडियो पर क्लिक कर आप इस पूरी चर्चा को देख सकते हैं-

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