क्यों चर्चा का विषय बन जाती है अंग्रेजी की ये बातचीत

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (फाइल फोटो)

बीएचयू के कुलपति और उस समय के एक छात्र नेता के बीच बातचीत का जिक्र प्रधानमंत्री वाजपेयी तक पहुंच गया था

पूर्वी यूपी में क्यों चर्चा का विषय बन जाती है अंग्रेजी की ये बातचीतसांकेतिक फोटो

आपातकाल के आस पास बीएचयू में वीसी और एक छात्र नेता के बीच एक बार बातचीत हुई थी. वो बातचीत कुछ इस कदर लोकप्रिय हुई कि आज भी उत्तर प्रदेश में चटखारे लेकर उसे सुना-सुनाया जाता है. चूंकि मसला छात्र संघ चुनाव के दौर का था, लिहाजा कोई भी चुनाव हों इसकी चर्चा चौराहों पर निकल ही आती है. बातचीत में रस कुछ ऐसा था कि उसे प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भी बता दिया गया. वो भी उस समय जब वीसी से बात करने वाला पात्र उनके पास पहुंचा ही था.

बीएचयू के धाकड़ वीसी

दरअसल, वही दौर था जब बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति के एन श्रीमाली थे. ये वही श्रीमाली हैं जो नेहरू केबिनेट में मंत्री भी रह चुके थे. जाहिर है उनकी खूब धाक थी. कोलंबिया और न्यूयार्क से पढ़ कर लौटे श्रीमाली जी जोरदार अंग्रेजी भी बोलते थे. उसी दौर में पूर्वांचल से एक छात्र नेता आए. स्वभाव से ही स्वतंत्र थे.कायदे और अनुशासन उन्हें अड़चन लगते थे. ऐसे में एक अनुशासनप्रिय वीसी से टकराव होना ही था.

अंग्रेजी में वीसी को काबू करने की कोशिश

कुछ साथियों ने समझा दिया कि वीसी साहेब अंग्रेजी में ही काबू में आ सकते हैं. पूरब से आए छात्र-नेता को अंग्रेजी का अभ्यास था नहीं. जो सीखा था उसमें भी पेचो-खम थे. लिहाजा उन्होंने किसी मौके पर वीसी साहेब को ललकारा – “आई स्पीक तो आई स्पीक, यू स्पीक तो यू स्पीक. डोंट स्पीक मिडिले-मिडिल”
मतलब निकाला जाता है कि शायद छात्र-नेता कहना चाहते थे जब वे बोले तो वही बोले और वीसी साहेब बोलें तो वीसी साहेब बोलें. बीच में और कोई न बोले. फिर क्या था उस छात्र नेता के इस बयान की जानकारी बाहर भी आ गई. दूसरे खेमें के छात्र नेताओं ने इसका खूब प्रचार किया. हर भाषण में इसका जिक्र आता है.

विरोधियों ने खूब प्रचार किया

उस दौर में विश्वविद्यालय छात्र संघ के चुनावों में हिस्सा ले चुके और जाने माने साहित्यकार चंचल ने बताया कि वीसी और उस छात्र नेता की इस बातचीत का जिक्र खुद कई बार उन्होने अपने भाषणों में किया. इसके जरिए वे उस छात्र नेता की प्राथमिकताओं में पढ़ाई लिखाई नगण्य होने का जिक्र  किया करते थे. यही वो दौर था जब कांग्रेस नेता मोहन प्रकाश भी छात्र संघ का चुनाव लड़ रहे थे.

संसद तक पहुंचे

मोहन प्रकाश से संवाद का जिक्र करने पर वे बहुत देर तक हंसते रहे. उन्होंने कहा- “चंचल जी ने बता ही दिया होगा.” छात्र नेता आरएसएस की छात्र शाखा से जुड़े रहे. बाद में बीजेपी में सक्रिय हो गए. विधायक भी बन गए. लेकिन लोकसभा का टिकट मोदी के दौर में ही मिला और मोदी जी की लहर में संसद में आ गए.

वाजपेयी जी को भी सुनाया गया किस्सा

बनारस के वरिष्ठ पत्रकार विभूति नारायण याद करते हैं, – “जब मैं दिल्ली में काम करता था, तो पता चला था कि नेता बनने के बाद वही छात्र नेता वाजपेयी जी से मिलने पहुंचे. वहीं मौजूद पूर्वांचल के जानकार किसी बड़े नेता को पता चला कि वाजपेयी जी से मिलने वे नेता भी आए हैं. बीएचयू वाले नेता का जिक्र सुन कर उनसे रहा न गया उन्होंने आई स्पीक वाली बात वाजपेयी जी को भी बता दी. वाजपेयी जी ने बीएचयू वाले नेता जी को मिलने बुला तो लिया लेकिन हंसते रहे. बाद में उस छात्र नेता को जब ये बात पता चली कि वाजपेयी जी क्यों हंस रहे थे तो वे झेंप गए.”

किस्सागो लोगों ने बढ़ाई बात

वैसे पूर्वांचल के किस्सागो लोगों ने इसे और बढ़ा दिया. कहा जाने लगा कि उन्होंने जो पूरी बात कही थी वो कुछ ऐसे थी – “सिक्स हंड्रेड सिक्सफुटाज आर रेडी फार साइनेडाई”. इसका मतलब बताया गया- “छह -छह-छह  के छह सौ जवान किसी भी समय विश्वविद्यालय में बंदी कराने के लिए हमेशा तैयार हैं.” बताया जाता है कि इस बारे में चर्चा करने पर अब वे छात्र नेता भड़क जाते हैं. लिहाजा उनका नाम नहीं लिखा गया वैसे नाम में क्या रखा है, मसला तो संवाद और अंग्रेजी में हाथ तंऊ होने के बाद भी अंग्रेजी में बात करने की मजबूरी निभाने की ही है न.

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