क्या है केजरीवाल की ‘धरना पॉलिटिक्स’ की वजह  ?

अगर केजरीवाल और उनके मंत्रियों को लगता है कि दिल्ली की नौकरशाही उनके वैध आदेशों का पालन करने में नाकाम रही तो वह अदालत का दरवाजा खटखटा सकते थे, बजाय कि वे उप-राज्यपाल के ऑफिस में धरने पर बैठ जाते.

साल 2013 में जब मुख्यमंत्री के तौर पर शीला दीक्षित के 15 साल का कार्यकाल खत्म होने के कगार पर था, तब उनके कुछ करीबी नौकरशाहों ने दूसरे शहर में ट्रांसफर ले लिया. उसी वक्त मनोहर पर्रिकर गोवा का मुख्यमंत्री बनने के बाद टीम बना रहे थे. क्योंकि अरुणाचल प्रदेश, गोवा, मिजोरम, और केंद्रित शासित प्रदेशों में अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों एक कॉमन पूल है, इसलिए दिल्ली के कुछ अधिकारियों ने गोवा ट्रांसफर ले लिया.

उस वक्त एक अखबार ने अपनी हेडलाइन दी थी, ‘पर्रिकर की टीम में शीला के विश्वासपात्र.’ वैसे यह उतार-चढ़ाव देश में नौकरशाही के अराजनैतिक स्वभाव को भी प्रदर्शित करता है.राजनीतिक नेतृत्व के पास नौकरशाहों से काम कराने के साधन होने चाहिए, जो कि पूरी तरह डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा तैयार किए गए संविधान के लिए उत्तरदायी हैं, संसद द्वारा कानून पारित किए जाने के बाद पालन के नियम तय होते हैं.नौकरशाही को लोक प्रशासन के शब्दावली में स्थायी कार्यकारी के रूप में परिभाषित किया गया है, जिससे उम्मीद की जाती है कि वे अपने काम और चुने हुए प्रतिनिधियों के काम के बीच संतुलन बनाकर रखेंगे.

इस व्यवस्था में घर्षण (टकराव) शामिल है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आईआईटी में पढ़ाई के दौरान घर्षण के बारे में जरूर पढ़ा होगा. घर्षण आवश्यक ऊर्जा प्रदान करता है. घर्षण की सबसे अच्छी बात यह है कि यह हर वक्त बिना गिरे चलने में मदद करता है.

अगर केजरीवाल और उनके मंत्रियों को लगता है कि दिल्ली की नौकरशाही उनके वैध आदेशों का पालन करने में नाकाम रही तो वह अदालत का दरवाजा खटखटा सकते थे, बजाय इसके कि वे उप-राज्यपाल के ऑफिस में धरने पर बैठ जाते. यह कदम नौकरशाही को काम के प्रति उत्तरदायी बनाने के बजाय कुछ और उद्देश्य के लिए उठाया गया है. दरअसल यह गर्त में जाती आम आदमी पार्टी के पुनरुत्थान की कोशिश है.हालांकि केजरीवाल का मानना था कि राजधानी क्षेत्र अधिनियम 1993 के तहत दिल्ली में शक्ति मुख्यमंत्री के हाथ में होनी चाहिए न कि उप-राज्यपाल के हाथ में. इसी मुद्दे को लेकर 2016 में केजरीवाल कोर्ट गए, लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि उप-राज्यपाल दिल्ली में प्रशासनिक प्रमुख हैं और उनसे परामर्श किए बिना दिल्ली सरकार द्वारा लिए गए फैसले अवैध थे.

कोर्ट के इस आदेश के बाद केजरीवाल के पास राजनीतिक रुप से प्रासंगिक बने रहने के लिए तमाशा करने के अतिरिक्त दूसरा कोई विकल्प बचा नहीं रह गया था.कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी ‘आप’ को विपक्षी एकता के फ्रेम से बाहर रखते हुए बुधवार को रखी इफ्तार पार्टी में न्यौता नहीं दिया.

दिल्ली की चुनी हुई सरकार शिकायत कर सकती है कि अन्य राज्य सरकारों की तुलना में उन्हें प्रदेश को चलाने के लिए पूर्ण अधिकार नहीं मिल रहे, लेकिन उन्हें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि दिल्ली को इतना लाड-प्यार और प्रधान स्थिति केंद्र सरकार के हस्तक्षेप की वजह से ही मिलती है.वर्तमान में दिल्ली का सालाना बजट 50 हजार करोड़ है जो कई पूर्ण राज्यों के सालाना बजट से ज्यादा है.इसमें दिल्ली पुलिस का बजट शामिल नहीं है जो कि केंद्र सरकार के अंतर्गत आती है. यहां तक कि दिल्ली सरकार के पूर्व अधिकारियों के पेंशन का खर्च भी केंद्र सरकार ही उठाती है.

दिल्ली सरकार अपना बजट मात्र तीन नगर निगमों पर खर्च करती है. वह नई दिल्ली नगर निगम (एनडीएमसी) और दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) को कोई फंड आवंटित नहीं करती.ये नगर निकाय अपना राजस्व स्वयं जुटाते हैं और कमी को केंद्र सरकार पूरा करती है. इस स्थिति में अगर केंद्र दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देते हुए एनडीएमसी को दिल्ली सरकार के अंतर्गत कर देता है तो दिल्ली का बजट 80 हजार करोड़ के पार पहुंच जाएगा. ऐसे में बाकी का खर्च कहां से आएगा?

हालांकि यह भी भुलाया नहीं जाना चाहिए कि अतीत में दिल्ली ने भी अपने साधनों के तहत असमीति राजकोषीय स्वायत्तता का आनंद लिया है. ऐसा सकारात्मक नगदी संतुलन से ऐसा संभव हो पाया. लेकिन जब भी राज्य सरकार अपने साधनों से परे जाने की कोशिश करती है तो उसे केंद्र के पास निवेदक के रूप में जाना पड़ता है, क्योंकि उसके पास अपने राजस्व के साधन बहुत कम होते हैं.ऐसी परिस्थितियों सभी प्रशासनिक निर्णयों को प्रभावित करने वाले वित्तीय निर्णय केंद्रीय मंजूरी के अधीन हो जाते हैं. इस प्रकार दरवाजे पर राशन की डिलीवरी के लिए धन की आवश्यकता होगी, जिसे केंद्र द्वारा प्रदान किया जाना है.

आम आदमी पार्टी ने 2015 के विधानसभा चुनावों में जो वायदे किए उन्हें पूरा करने के लिए बड़े बजट की आवश्यकता है. ‘सब्सिडी’ संचालित मतदान अभियान अब केजरीवाल सरकार के लिए बोझ बनता जा रहा है.दिल्ली सरकार खुद के द्वारा तैयार की गई स्थिति में खुद ही फंस गई है. चुनावों की तारीख करीब आ रही है. आम आदमी पार्टी प्रासंगिक बने रहने के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन की कोशिश कर रही है लेकिन अब तक असफल रही है. ऐसे में पार्टी ने प्रासंगिक बने रहने के लिए अपने पुराने हथियार ‘धरना’ का इस्तेमाल शुरू कर दिया है.
(लेखक सिद्धार्थ मिश्रा वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 एलजी आवास पर हड़ताल का मामला हाईकोर्ट पहुंचा

दिल्ली हाईकोर्ट सोमवार को इस मामले में सुनवाई करेगी. पिछले चार दिन से एलजी आवास में बैठे हैं सीएम और उनके तीन मंत्री.

अरविंद केजरीवाल का एलजी आवास पर हड़ताल का मामला हाईकोर्ट पहुंचाधरने पर बैठे अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, गोपाल राय और सत्येंद्र जैन.

दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनके तीन मंत्रियों द्वारा सोमवार से उपराज्‍यपाल अनिल बैजल के आवास पर धरना देने का मामला अब हाईकोर्ट पहुंच गया है. अपनी अर्जी में याचिकाकर्ता ने कहा है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को हाईकोर्ट आदेश दे कि वो अपना हड़ताल वापस ले. याचिका में यह भी कहा गया है कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के हड़ताल पर बैठने से दिल्ली में संवैधानिक इमरजेंसी जैसी स्थिति आ गई है. दिल्ली हाईकोर्ट सोमवार को इस मामले में सुनवाई करेगी.

गौरतलब है कि दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उपमुख्‍यमंत्री मनीष सिसोदिया, सत्‍येंद्र जैन और गोपाल राय पिछले सोमवार से एलजी आवास में धरना दे रहे हैं. अरविंद केजरीवाल की मांग है कि दिल्ली में चार महीने से हड़ताल कर रहे आईएएस अधिकारियों को काम पर लौटने के निर्देश दिये जाएं. चार महीनों से काम रोकने वाले आईएएस अधिकारियों को सजा दी जाए. राशन की घर पहुंच व्यवस्था को स्वीकृति दी जाए. अपनी मांगों को लेकर सत्‍येंद्र जैन और मनीष सिसोदिया ने अनशन भी शुरू कर दिया है.

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