कांग्रेस ही थी जिसने पहली बार प्रचार में फिल्मी सितारा उतार हराया था अटल को

अटल को हराने के लिए नेहरू ने बलराज साहनी से करवाया था प्रचार,कहा जाता है कि नेहरू खुद अटल के खिलाफ प्रचार नहीं करना चाहते थे.

अटल को हराने के लिए नेहरू ने बलराज साहनी से करवाया था प्रचार

बलराज साहनी और अटल बिहारी वाजपेयी
1952 में अटल बिहारी वाजपेयी जनसंघ के टिकट पर लखनऊ से चुनाव लड़े और हारे. इसके बाद वे जनसंघ के टिकट पर तीन-तीन सीटों, लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़े. बलरामपुर में वे जीते. लखनऊ में दूसरे नंबर पर रहे लेकिन मथुरा में उनकी जमानत जब्त हो गई.
भले ही बलरामपुर में अटल ने कांग्रेस के हैदर हुसैन को मात दी हो लेकिन यह चुनाव जीतना उनके लिए आसान नहीं था. इस चुनाव में अटल को बलरामपुर के राजा के साथ मिलकर ऑल इंडिया राम राज्य परिषद् बनाने वाले करपात्री महाराज का समर्थन मिला था. और इसके साथ ही चुनावों का रंग भी सांप्रदायिक हो गया था. आखिरी तक आते-आते यह हिंदू बनाम मुस्लिम का मसला बन गया था, जिससे इस चुनाव में अटल को करीब 9 हजार वोटों से जीत मिली थी.इस चुनाव को जीतने के वक्त अटल की उम्र मात्र 33 वर्ष थी. इसके बाद अटल को पार्टी का नेता भी बना दिया गया. इसका एक कारण यह भी था कि जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु के बाद पार्टी एक तेज तर्राक और मंझे हुए नेता और वक्ता की कमी से जूझ रही थी.अगले लोकसभा चुनावों (1962) में अटल फिर इसी बलरामपुर सीट से चुनावों में उतरे. इस चुनाव में उनके सामने कांग्रेस से एक ब्राह्मण महिला उम्मीदवार सुभद्रा जोशी थीं. जो पंजाब की रहने वाली थीं और बंटवारे के बाद हिंदुस्तान चली आई थीं. इससे पहले वे दो बार अंबाला और करनाल से सांसद रह चुकी थीं और दिल्ली में बस गई थीं. लेकिन पं नेहरू के आग्रह पर वे बलरामपुर से चुनाव लड़ने को राजी हो गईं.

कहा जाता है कि इन चुनावों में सुभद्रा जोशी चाहती थीं कि नेहरू खुद उनका प्रचार करें लेकिन नेहरू, अटल के खिलाफ प्रचार नहीं करना चाहते थे. ऐसे में सुभद्रा जोशी का प्रचार करने के लिए खुद नेहरू ने बलराज जोशी को कहा था, जो ‘दो बीघा जमीन’ फिल्म से अपनी पहचान बना चुके थे और जनता पर बलराज साहनी के प्रचार करने का बहुत असर हुआ. हालांकि वाजपेयी का कद भी पांच सालों में बढ़ चुका था और उन्हें लोग पहचानने और पसंद करने लगे थे. ऐसे में टक्कर कांटे की थी. लेकिन जब नतीजे आए तो सुभद्रा जोशी ने वाजपेयी को 2052 मतों से हरा दिया था. यह भी कहा जाता है कि ये पहले चुनाव थे जिनमें किसी बॉलीवुड एक्टर ने प्रचार किया था.

हालांकि पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जिद के बाद वाजपेयी राज्ससभा से संसद में भेजा गया. बाद में वाजपेयी ने अपनी हार का बदला भी लिया. उन्होंने 1967 में बलरामपुर से ही सुभद्रा जोशी को 32 हजार से ज्यादा वोटों से हराया. आगे चलकर इमरजेंसी खत्म होने के बाद हुए चुनावों में (1977) इस सीट पर नानाजी देशमुख ने चुनाव लड़ा.

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