कहीं दूसरे मणिशंकर अय्यर साबित न हों सैफुद्दीन सोज कांग्रेस के लिए

कांग्रेस जब अमित शाह से जुड़े बैंक में नोटबंदी के दौरान बड़े पैमाने पर जमा हुई रकम का मामला उठा रही थी, तब सोज ने उसे बैकफुट पर ला दिया.आजाद कश्मीर के बयान पर सवालों से बौखलाए सोज, बीच में ही इंटरव्यू छोड़ भागे
कहीं कांग्रेस के लिए दूसरे मणिशंकर अय्यर साबित न हों सैफुद्दीन सोज
कश्मीर जैसे संवेदनशील मामले पर सोज के बयान ने कांग्रेस का खेल बिगाड़ दिया है.

नई दिल्ली: एक ऐसे समय में जब जम्मू-कश्मीर में चल रहे राजनैतिक और घरेलू घटनाक्रम पर कांग्रेस फूंक-फूंक कर पांव आगे बढ़ा  रही है, तब कश्मीर से पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सैफुद्दीन सोज की एक किताब “कश्मीर- ग्लिम्सिज ऑफ हिस्ट्री एंड स्टोरी ऑफ स्ट्रगल” प्रकाशित हो रही है. यह किताब अभी सामने नहीं आई है, लेकिन मीडिया में उसके जो अंश आए हैं, उसमें सोज पाकिस्तान के पूर्व तानाशाह जनरल परवेज मुशर्रफ की उस सोच की तरफदारी कर रहे हैं, जिसमें कश्मीर की आजादी की बात स्वीकार करने को कहा गया था. बाद में एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि कश्मीर के लोगों की पहली मांग आजादी है, लेकिन आजादी मिल नहीं सकती, ऐसे में वहां के युवाओं से संवाद किया जाए.

जाहिर है सोज ने बार-बार कहा कि वे जो कह रहे हैं वह व्याहारिक बात है और कांग्रेस पार्टी का इससे कोई ताल्लुक नहीं है. लेकिन मौजूदा हालात में उनके बयान ने कश्मीर के मुद्दे पर घिरी बीजेपी को एक नया हथियार दे दिया है. इस हथियार की प्रवृत्ति कुछ वैसी ही होगी जैसी  कांग्रेस के निलंबित नेता मणिशंकर अय्यर के पूर्व में  दिए दो बयानों की हुई थी. अय्यर ने 2014 लोकसभा चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी को चायवाला कहा था और गुजरात विधानसभा 2017 के पहले मोदी के लिए आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल किया था.

दोनों ही मौकों पर बीजेपी ने इन शब्दों की अपने हिसाब से व्याख्या की और बात को कहीं से कहीं पहुंचा दिया. चायवाले बयान के समय तो कांग्रेस बहुत सतर्क नहीं थी, लेकिन गुजरात चुनाव के समय दिए गए बयान के बाद कांग्रेस ने अय्यर को तुरंत पार्टी से निकाल दिया. अय्यर पूर्व राजनयिक होने के साथ ही अत्यंत पढ़े-लिखे लोगों में शुमार होते हैं. लेकिन उन्होंने ऐसे मौकों पर गलत शब्दों का चयन कर लिया, जब पार्टी को उनसे बचने की जरूरत थी.

अबकी बार सोज भी यही कर रहे हैं. कश्मीर मुद्दे पर कांग्रेस की सतर्कता का आलम यह था कि 20 जून को जब इस विषय पर प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई तो कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यसभा में कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आजाद से संयुक्त राष्ट्र की उस रिपोर्ट के बारे में पूछा गया, जिसमें भारत पर कश्मीर में मानवाधिकार हनन के आरोप लगाए गए थे. आजाद ने इस सवाल को लेने से ही यह कहते हुए इनकार कर दिया कि उन्होंने ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं पढ़ी है. लिहाजा वे उस पर टिप्प्णी नहीं करेंगे. यानी कांग्रेस किसी भी संभावित विवाद से खुद को बचाना चाहती थी.

उधर 22 जून को जब सोज का बयान सामने आया तब कांग्रेस नोटबंदी के दौरान गुजरात के उस कोऑपरेटिव बैंक में बड़े पैमाने पर जमा हुए नोटों का मुद्दा उठाने वाली थी, जिसका संबंध बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से बताया जाता है. कांग्रेस लगातार इस बात को मुख्यधारा की बहस बनाना चाहती है कि अमित शाह और बीजेपी को नोटबंदी के दौरान गुजरात में बहुत फायदा हुआ. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तो ट्ववीट कर शाह पर इल्जाम लगाए.

लेकिन जिस प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस शाह को घेर रही थी, उस प्रेस कॉन्फ्रेंस के अंत में पत्रकारों के सवाल शाह की जगह सोज के बारे में आए. कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने यहां तक कहा कि अगर कोई अपनी किताब बेचने के लिए ओछे हथकंडे अपनाता है तो उससे कश्मीर की हकीकत नहीं बदल जाती. कश्मीर भारत का अंग था, है और सदैव रहेगा. सुरजेवाला ने यह भी याद दिलाने की कोशिश की कि पठानकोट हमले की जांच के नाम पर भारत सरकार ने आईएसआई के लोगों को भारत के सुरक्षा बेस में घुसने की छूट दी. सुरजेवाला ने बार-बार कहा कि यह सारा मामला अमित शाह और नोटबंदी में हुए खेल से ध्यान भटकाने के लिए किया जा रहा है.

लेकिन कश्मीर जैसे संवेदनशील मामले पर सोज के बयान ने कांग्रेस का खेल बिगाड़ दिया है. सोज के बोल कांग्रेस की रणनीति के उलट हैं. सोज से पहले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने भी आतंकवाद और आरएसएस के संबंधों को लेकर बयान दिया था. वह भी राहुल की कांग्रेस की नीति से अलग था.

राहुल गांधी इस समय जिस सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति पर चल रहे हैं, उसमें सोज, दिग्विजय या अय्यर के बयान पार्टी का माहौल ही बिगाड़ेंगे. कांग्रेस जिस तरह इस कोशिश में लगी है कि लोगों को याद दिलाया जाए कि आजादी की लड़ाई उसी ने लड़ी है और असली राष्ट्रवादी तो कांग्रेस ही है, उसमें कश्मीर के मामले में ऐसे बयान को संभालना पार्टी के लिए बहुत मुश्किल हो जाएगा.

जाहिर है सतह से उठने की कोशिश में जुटी राहुल की कांग्रेस फिर कुछ बड़े फैसले लेगी. लेकिन  ऐसे समय में जब तीन प्रमुख राज्यों में इसी साल चुनाव होने हैं और उसके बाद लोकसभा चुनाव भी सर पर हैं, तब अपने विरोधियों को थाली में परोसकर मुद्दा देने वाले नेताओं के बारे में राहुल गांधी को बहुत कुछ करना होगा.

–पियूष बबेले

जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर कांग्रेस नेता सैफुद्दीन सोज के बयान पर विवाद बढ़ता जा रहा है. सैफुद्दीन सोज ने पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के उस बयान का समर्थन किया है जिसमें उन्होंने कहा था कि कश्मीरी आजादी चाहते हैं. शुक्रवार सुबह जब इस मुद्दे पर आजतक ने उनसे बात की तो वह सवालों पर बौखला गए और बीच में ही इंटरव्यू छोड़ कर भाग गए.

आजतक के साथ बातचीत में उन्होंने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि कश्मीर में अगर शांति स्थापित करनी है तो हर किसी से बात करनी होगी. उन्होंने अलगाववादी नेताओं से भी बात करने का समर्थन किया. हालांकि, उन्होंने कहा कि इस बयान का उनकी पार्टी कांग्रेस से कोई लेना-देना नहीं है.

सैफुद्दीन सोज ने कहा कि कश्मीरी लोग ना हिंदुस्तान के साथ आना चाहते हैं ना ही पाकिस्तान के साथ, वो सब आजादी चाहते हैं. लेकिन ये आजादी नामुमकिन है.

कांग्रेस नेता ने कहा कि अगर केंद्र कश्मीर के मुद्दे को सुलझाना चाहता है कि उसे कश्मीरियों के प्रति एक ऐसा माहौल बनाना होगा जिससे वह सुरक्षित महसूस कर सकें और बातचीत को तैयार हो पाएं. बात करने के लिए हुर्रियत ग्रुप से पहले बात होनी चाहिए और उसके बाद मेनस्ट्रीम पार्टियों से बात होनी चाहिए. पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि घाटी में सेना बढ़ाने से सिर्फ कश्मीरी मारे जाएंगे लेकिन यहां शांति स्थापित नहीं हो पाएगी.

–मीनाक्षी कंडवाल

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