औरंगजेब ने आज ही की थी छत्रपति शिवाजी पुत्र संभाजी की हत्या

11 मार्च का इतिहास

दोस्तों आज जानते हैं 11 मार्च का इतिहास के कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं के बारें मे, उन लोगों के जन्मदिन के बारे में जिन्होंने दुनिया में आकर बहुत बड़ा नाम किया साथ ही उन मशहूर लोगों के बा रेंमे जो इस दुनिया से चले गए।

11 March History

  • दिल्ली सहित उत्तर भारत में मारकाट मचाने के बाद तैमूर लंग ने 1399 में सिन्धु नदी पार की।
  • सन 1881 में रामनाथ टैगोर की प्रतिमा कोलकाता के टाउन हॉल में स्थापित की गई।
  • बगदाद पर ब्रिटिश फौजो ने 1917 में कब्जा किया।
  • सन 1918 में मास्को रूस की राजधानी बनी।
  • बैंक कनाडा का 1935 में गठन किया गया।
  • सोमालिया ने 1963 में ब्रिटेन के साथ राजनयिक संबंध तोड़े।
  • चिली में 1981 में संविधान लागू हुआ।
  • लिथुआनिया ने 1990 में स्वतंत्रता की घोषणा की।
  • इंफोसिस कंपनी पहली भारतीय कंपनी है जो 1999 में नशदाक (NASDAQ) अंतरराष्ट्रीय स्टॉक एक्सचेंज की सूची में आई।
  • पुलेला गोपीचंद 2001 में बैडमिंटल में विश्व चैंपियन बने।
  • सन 2004 में स्पेन में तीन रेलवे स्टेशनों पर हुए बम विस्फोटों में 190 मरे, 1200 घायल।
  • यूनानी संसद ने 2006 में दाह-संस्कार को अनुमति देने वाले क़ानून को बहुमत से पारित किया।
  • सुनिता ने 2007 में कोलकाता से वाघा तक के 2,012 किमी के सफर को रिवर्स गियर में गाड़ी चलाकर पूरा किया।
  • पाकिस्तान के लाहौर में 2008 में हुए दो आत्मघाती विस्फोटों में 26 लोग मारे गये।
  • अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के यान एंडेवर ने 2008 में अंतरिक्ष स्टेशन की ओर उड़ान भरी।
  • सन 2011 में तोहोकू के नज़दीक भूकंप से जापान में सुनामी और फुकुशिमा परमाणु संयंत्र हादसा हुआ।

11 मार्च को जन्मे व्यक्ति 

  • 1915 में क्रिकेट खिलाड़ी विजय हजारे का जन्म हुआ।
  • 1925 में हैदराबाद रियासत के साथ संघर्ष करने वाले प्रमुख व्यक्तियों में से एक मदनसिंह मतवाले का जन्म हुआ।
  • 1927 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता भारतीय महिला चिकित्सक वी.शांता का जन्म हुआ।

11 मार्च को हुए निधन 

  • औरंगजेब ने 1689 में छत्रपति शिवाजी महाराज के पुत्र संभाजी की हत्या की। सम्भाजी (शिवाजी महाराज के पुत्र धर्मवीर छत्रपति संभाजी राजे भोसले) या शम्भाजी (1657-1689) मराठा सम्राट और छत्रपति शिवाजी के उत्तराधिकारी। उस समय मराठाओं के सबसे प्रबल शत्रु मुगल बादशाह औरंगजेब बीजापुर और गोलकुण्डा का शासन हिन्दुस्तान से समाप्त करने में उनकी प्रमुख भूमिका रही। सम्भाजी अपने शौर्य के लिये काफी प्रसिद्ध थे। सम्भाजी ने अपने कम समय के शासन काल मे १२० युद्ध किये और इसमे एक प्रमुख बात ये थी कि उनकी सेना एक भी युद्ध मे पराभूत नहीं हुई। इस तरह का पराक्रम करने वाले वह शायद एकमात्र योद्धा होंगे। उनके पराक्रम की वजह से परेशान हो कर दिल्ली के बादशाह औरंगजेब ने कसम खायी थी कि जब तक छत्रपति संभाजी पकडे नहीं जायेंगे, वो अपना किमोंश सर पर नहीं चढ़ाएगा।छत्रपति संभाजी नौ वर्ष की अवस्था में छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रसिद्ध आगरा यात्रा में यह साथ गया था। औरंगजेब के बंदीगृह से निकल, छत्रपति शिवाजी महाराज के महाराष्ट्र वापस लौटने पर, मुगलों से समझौते के फलस्वरूप, संभाजी मुगल सम्राट् द्वारा राजा के पद तथा पंचहजारी मंसब से विभूषित हुए। औरंगाबाद की मुगल छावनी में, मराठा सेना के साथ, उसकी नियुक्ति हुई (1668)। युगप्रवर्तक राजा के पुत्र रहते उनको यह नौकरी मान्य नहीं थी। किन्तु स्वराज्य स्थापना की शुरू के दिन होने के कारन और पिता के आदेश के पालन हेतु केवल 9 साल के उम्र में ही इतना जिम्मेदारी का लेकिन अपमान जनक कार्य उन्होंने धीरज से किया। उन्होंने अपने उम्र के केवल 14 साल में उन्होंने बुधाभुषणम, नखशिख, नायिकाभेद तथा सातशातक यह तीन संस्कृत ग्रंथ लिखे थे। छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के बाद स्थापित अष्टप्रधान मंत्रिमंडल में से कुछ लोगों की राजकारण के वजह से यह संवेदनशील युवराज काफी क्षतिग्रस्त हुए थे। पराक्रमी होने के बावजूद उन्हें अनेक लड़ाईयोंसे दूर रखा गया। स्वभावत: संवेदनशील रहनेवाले संभाजी अपना पराक्रम दिखाने की कोशिश में मुघल सेना से जा मिले (16 दिसम्बर 1678). किन्तु कुछ ही समय में जब उनको अपनी गलती समझ आई तब वो वहां से पुन: स्वराज्य में आये। मगर इस प्रयास में वो अपने पुत्र शाहू, पत्नी रानी येसूबाई और बहेन गोदावरी उनको अपने साथ लेन में असफल रहे।

    छत्रपति शिवाजी महाराज की मृत्यु (20 जुलाई 1680) के बाद कुछ लोगों ने संभाजी के अनुज राजाराम को सिंहासनासीन करने का प्रयत्न किया। किन्तु सेनापति मोहिते के रहते यह कारस्थान नाकामयाब हुआ और 10 जनवरी 1681 को संभाजी महाराज का विधिवत्‌ राज्याभिषेक हुआ। इसी वर्ष औरंगजेब के विद्रोही पुत्र अकबर ने दक्षिण भाग कर संभाजी का आश्रय ग्रहण किया। अकेले मुग़ल, पोर्तुगीज, अंग्रेज़ तथा अन्य शत्रुओं के साथ लड़ने के साथ ही उन्हें अंतर्गत शत्रुओंसे भी लड़ना पड़ा। राजाराम को छत्रपति बनाने में असफल रहने वाले राजाराम समर्थकोने औरंगजेब के पुत्र अकबर से राज्य पर आक्रमण कर के उसे मुग़ल साम्राज्य का अंकित बनाने की गुजारिश करने वाला पत्र लिखा। किन्तु छत्रपति संभाजी के पराक्रम से परिचित और उनका आश्रित होने के कारण अकबर ने वह पत्र छत्रपति संभाजी को भेज दिया। इस राजद्रोह से क्रोधित छत्रपति संभाजीने अपने सामंतो को मृत्युदंड दिया। तथापि उन में से एक बालाजी आवजी नामक सामंत की समाधी भी उन्होंने बनायीं जिनके माफ़ी का पत्र छत्रपति संभाजी को उन सामंत के मृत्यु पश्चात मिला।

    1683 में उसने पुर्तगालियों को पराजित किया। इसी समय वह किसी राजकीय कारन से संगमनेर में रहे थे। जिस दिन वो रायगड के लिए प्रस्थान करने वाले थे उसी दिन कुछ ग्रामास्थो ने अपनी समस्या उन्हें अर्जित करनी चाही। जिसके चलते छत्रपति संभाजी महाराज ने अपने साथ केवल 200 सैनिक रख के बाकि सेना को रायगड भेज दिया। उसी वक्त उनके साले गनोजी शिर्के, जिनको उन्होंने वतनदारी देने से इन्कार किया था, मुग़ल सरदार इन्सिलब खान के साथ गुप्त रास्ते से 5000 के फ़ौज के साथ वहां पहुंचे। यह वह रास्ता था जो सिर्फ मराठों को पता था। इसलिए संभाजी महाराज को कभी नहीं लगा था के शत्रु इस और से आ सकेगा। उन्होंने लड़ने का प्रयास किया किन्तु इतनी बड़ी फ़ौज के सामने 200 सैनिकों का प्रतिकार काम कर न पाया और अपने मित्र तथा एकमात्र सलाहकार कविकलश के साथ वह बंदी बना लिए गए (1 फरबरी, 1689)।Image result for छत्रपति शिवाजी महाराज के पुत्र संभाजीImage result for छत्रपति शिवाजी महाराज के पुत्र संभाजी

    दोनों को मुसलमान बनाने के लिए औरंगजेब ने कई कोशिशें की। किन्तु धर्मवीर छत्रपति संभाजी महाराज और कवि कलशने धर्म परिवर्तन से इनकार कर दिया। औरंगजेब ने दोनों की जुबान कटवा दी, आँखें निकाल दी किन्तु शेर छत्रपति शिवाजी महाराज के इस सुपुत्र ने अंत तक धर्म का साथ नहीं छोड़ा। 11 मार्च 1689 हिन्दू नववर्ष दिन को दोनों के शरीर के टुकडे कर के औरंगजेब ने हत्या कर दी।Image result for छत्रपति शिवाजी महाराज के पुत्र संभाजी किन्तु ऐसा कहते है की हत्या पूर्व औरंगजेब ने छत्रपति संभाजी महाराज से कहा के मेरे 4 पुत्रों में से एक भी तुम्हारे जैसा होता तो सारा हिन्दुस्थान कब का मुग़ल सल्तनत में समाया होता। जब छत्रपति संभाजी महाराज के टुकडे तुलापुर की नदी में फेंकें गए तो उस किनारे रहने वाले लोगों ने वो इकठ्ठा कर के सिला के जोड़ दिए (इन लोगों को आज ” शिवले ” इस नाम से जाना जाता है) जिस के उपरांत उनका विधिपूर्वक अंत्यसंस्कार किया। औरंगजेब ने सोचा था की मराठी साम्राज्य छत्रपति संभाजी महाराज के मृत्यु पश्चात ख़त्म हो जाएगा। छत्रपति संभाजी महाराज के हत्या की वजह से सारे मराठा एक साथ आकर लड़ने लगे। अत: औरंगजेब को दक्खन में ही प्राणत्याग करना पड़ा। उसका दक्खन जीतने का सपना इसी भूमि में दफन हो गया।
    इतने बड़े साहसी और उत्तम शासक होने के बावजूद कुछ अंतर्गत विरोधियों के कारण उनका चरित्र एक चरित्रहीन तथा व्यसनी राजा का दिखाया गया है। यह काफी अचम्भे की बात है के छत्रपति संभाजी महाराज के बारे में लिखी गयी बाते ये उनके मृत्यु के पश्चात 100 साल गुजरने पर लिखी गयी और यह लिखने वाले व्यक्ति शिर्के खानदान के वंशज थे जिनको वतनदारी देने से महाराज ने इन्कार किया था। ( वतनदारी एक ऐसी प्रथा थी जिसमे सरदार को एक नियोजित प्रांत में से कर वसूल करने का अधिकार दिया जाता था। यह प्रथा छत्रपति शिवाजी महाराज ने बंद करवाई थी क्योंकि आम जनता और किसान इस प्रथा से त्रस्त थी।)

  • 1980 में प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री चन्द्रभानु गुप्त का निधन।

11 मार्च के महत्त्वपूर्ण अवसर एवं उत्सव

  • अंडमान-निकोबार दिवस.

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