औरंगज़ेब की पुत्री ज़ेबुन्निसा का जन्म हुआ था आज

5 फ़रवरी का इतिहास

दोस्तों, इतिहास में हर दिन का कुछ न कुछ महत्व हैं उस दिन कुछ न कुछ महत्वपूर्ण घटनाएँ घटी हैं, वैसे ही आज के दिन इतिहास में यानि 5 फ़रवरी के इतिहास में भी कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाएँ घटी हैं, आज हम उन्ही घटनाओं के बारे में जानेंगे –

5 February History

  • फ्रांस के साथ शांति समझौते पर जर्मन शासक लियोपोल्ड प्रथम ने 1679 में हस्ताक्षर किये।
  • इटली के कालाब्रिया में 1783 में हुए भीषण भूकंप में लगभग 25000 से ज्यादा लोगों की जाने गयी।
  • फिलाडेल्फिया के थियेटर में 1870 में पहली बार चलचित्र दिखाया गया।
  • ब्रिटेन और अमेरिका के बिच सन 1900 में पनामा नहर समझौते पर हस्ताक्षर।
  • क्यूबा देश अमेरिका के कब्जे से 1904 में मुक्त हुआ।
  • मैक्सिको ने 1917 में नया संविधान अंगीकृत किया।
  • उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के पास चौरी चौरा कस्बे में भड़की हुयी भीड़ ने 1922 में पुलिस थाने में आग लगा दी जिसमें 22 पुलिसकर्मियों की मौत हो गयी।
  • ब्रिटिश समाचार पत्र “संडे टेलीग्राफ” के पहले संस्करण का प्रकाशन 1961 में हुआ।
  • अमेरिका ने 1970 नेवादा में परमाणु परीक्षण किया।
  • 1996 में पहली बार जीएम टमाटरों से बनी प्यूरी इंग्लैंड के बाजारों में बिकनी शुरू हुई।
  • परमाणु प्रौद्योगिकी के ग़लत इस्तेमाल के मामले में परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कादिर ख़ान को पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ़ ने 2004 में माफी दी।
  • भारत की सुनीता विलियम्स 2007 में अंतरिक्ष में सबसे अधिक समय बिताने वाली महिला बनीं।
  • भारतीय निशानेबाज अभिनव बिंद्रा ने 2010 में नीदरलैंड इंटरनेशनल शूटिंग चैंपियनशिप में 600 में से 596 अंक हासिल कर स्वर्ण पदक जीत लिया।

5 फ़रवरी को जन्मे व्यक्ति 

  • सिखों के सातवें गुरु हर राय का सन 1630 में पंजाब के कीरतपुर में जन्म हुआ।
  • मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब की पुत्री ज़ेबुन्निसा का 1639 में जन्म हुआ।ज़ेबुन्निसा (अंग्रेजी:Zeb-un-Nisa, जन्म- 5 फ़रवरी, 1639, दौलताबाद; मृत्यु- 1702, सलीमगढ़) मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब की संतानों में उसकी सबसे बड़ी पुत्री थी। वह काफ़ी प्रतिभाशाली तथा गुणों से सम्पन्न थी। ज़ेबुन्निसा का निकाह उसके चाचा दारा शिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह से तय हुआ था, किंतु सुलेमान की मृत्यु हो जाने से यह निकाह नहीं हो सका। विद्रोही शाहज़ादा अकबर के साथ गुप्त पत्र व्यवहार के कारण वर्ष 1691 ई. में ज़ेबुन्निसा को सलीमगढ़ के क़िले में बंद कर दिया गया और 1702 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।

    जन्म तथा शिक्षा

    बादशाह औरंगज़ेब की सबसे बड़ी संतान ज़ेबुन्निसा का जन्म 5 फ़रवरी, 1639 ई. को दक्षिण भारत के दौलताबाद स्थान पर फ़ारस के शाहनवाज ख़ाँ की पुत्री बेगम दिलरस बानो (रबिया दुर्रानी) के गर्भ से हुआ था। बचपन से ही ज़ेबुन्निसा बहुत प्रतिभाशाली और होनहार थी। हफीजा मरियम नामक एक शिक्षिका से उसने शिक्षा प्राप्त की और अल्प समय में ही सारा ‘क़ुरान कंठस्थ कर लिया। विभिन्न लिपियों की बहुत सुंदर और साफ लिखावट की कला में वह दक्ष थी।

    प्रतिभाशाली

    ज़ेबुन्निसा अपनी बाल्यावस्था से ही पहले अरबी और फिर फ़ारसी में ‘मखफी’, अर्थात्‌ ‘गुप्त’ उपनाम से कविता लिखने लगी थी। उसकी मँगनी शाहजहाँ की इच्छा के अनुसार उसके चाचा दारा शिकोह के पुत्र तथा अपने चचेरे भाई सुलेमान शिकोह से हुई, किंतु सुलेमान शिकोह की असमय ही मृत्यु हो जाने से यह विवाह नहीं हो सका।

    शिवाजी महाराज से प्रेम करती थी औरंगजेब की बेटी जेबुन्निसा ,शादी के लिए बादशाह ने रखी धर्म बदलने की शर्त

    शिवाजी जेबुन्निसा की भावनाओं की बहुत कद्र करते थे लेकिन उन्हें धर्म बदलना स्वीकार नहीं था। इसलिए उन्होंने शादी का प्रस्ताव ठुकरा दिया। जब शिवाजी महाराज को औरंगजेब ने आगरा के किले में नजरबन्द किया तो कहा जाता है कि कोई अज्ञात शख्स ऐसा भी था जो शिवाजी की मदद कर रहा था जिसके इशारे पर औरंगजेब के विश्वस्त लोगों को पहरे से हटाकर राजा मान सिंह के लोगों को पहरे पर तैनात किया गया था. शिवाजी की सुरक्षा मान सिंह की नैतिक जिम्मेदारी थी क्योंकि वही शिवाजी महाराज को औरंगजेब के दरबार में लेकर आए थे. ये अज्ञात शख्स थी औरंगजेब की बेटी जेबुन्निसा जो मन ही मन महाराज को अपना दिल दे बैठी थी. ये कहानी है जेबुन्निसा और शिवाजी महाराज के बारे में। इस कहानी का जिक्र किताब शिवाजी द ग्रेट फ्राम आगरा नाम की किताब में किया गया है।

    औरंगजेब के शासन में शिवाजी की बहादुरी की कहानी न सिर्फ दिल्ली बल्कि देश के और भी कोनों में तेजी से फैल रही थी।शिवाजी अपने पराक्रम से कई राजाओं को धूल चटा चुके थे। इन  में मुगल घराने का शायिस्ता खान भी शामिल था। शायिस्ता खान से हुई जंग में शिवाजी ने उसके महल में घुसकर उसके बेटे का सिर धड़ से अलग कर दिया था। धीरे-धीरे दिन गुजरते गए और मुगल दरबार में शिवाजी के किस्से बढ़ते चले गए। जेबुन्निसा का लगाव शिवाजी के लिए बढ़ता ही जा रहा था। जेबुन्निसा को 27 साल की ही उम्र में ही मराठा योद्धा से प्यार हो गया था। उस वक्त शिवाजी की उम्र 39 साल थी और उनका आठ साल का एक बेटा भी था।


    मान सिंह के समझाने पर जब शिवाजी मुगल दरबार पहुंचे तो जेबुन्निसा नंगे पैर भागती हुई दरबार तक पहुंच गई। उस समय दरबार में राजकुमारी किसी के सामने नहीं जा सकती थी। औरंगजेब शिवाजी की ताकत को जानता था। वो सोचने लगा कि अगर इस योद्धा की शादी अपनी बेटी से कर दे तो मुगलों को मराठाओं से फिर कोई भी चिंता नहीं होगी। औरंगजेब को शिवाजी को लेकर अपनी बेटी जेबुन्निसा की भावनाओं का पता था इसलिए उसने एक चाल चली .औरंगजेब ने शिवाजी को अपने बेटी से शादी करने का प्रस्ताव दिया लेकिन इसके लिए उसने एक शर्त रखी। औरंगजेब ने कहा कि वो छत्रपति महराज को अपनी बेटी और राजा का भी पद देगा लेकिन इसके लिए उन्हें इस्लाम कुबूल करना होगा। शिवाजी जेबुन्निसा की भावनाओं की बहुत कद्र करते थे लेकिन उन्हें धर्म बदलना स्वीकार नहीं था। इसलिए उन्होंने शादी का प्रस्ताव ठुकरा दिया।

    इस तरह शिवाजी को कैद कर लिया गया .मराठी साहित्य के जानकारों का ये भी कहना है कि शिवाजी और जेबुन्निसा की शादी इसलिए नहीं हो पाई क्योंकि औरंगजेब की तरफ से ये शर्त रखी गई थी कि शिवाजी को मुसलमान बनना पड़ेगा। साहित्यकारों के मुताबिक जब जेबुन्निसा को जब इस शर्त के बारे में पता चला तो उन्हें अपने पिता से नफरत हो गई। वो पूरी जिंदगी कुंवारी रहीं और अपने पिता से नफरत करती रहीं। कहते हैं कि जेबुन्निसा ने भले ही शिवाजी से शादी नहीं की। लेकिन उनका प्यार मराठा योद्धा के लिए हमेशा जवान रहा। जेबुन्निसा ने ‘मक्फी’ नाम की अपनी रचना में शिवाजी के लिए उनके प्रेम का जिक्र किया है। ये भारत के इतिहास की सबसे अलग और अमर प्रेम कहानियों में से एक है, जहां धर्म के बंधन को तोड़ कर सुल्तान की बेटी ने एक मराठा योद्धा से प्यार किया। आज भी ये कहानी लोगों को मिसाल के रूप में दी जाती है।

    धर्मपरायण

    ज़ेबुन्निसा को  दारा शिकोह बहुत प्यार करता था और वह सूफ़ी प्रवृत्ति की धर्मपरायण स्त्री थी। ज़ेबुन्निसा को चार लाख रुपये का जो वार्षिक भत्ता मिलता था, उसका अधिकांश भाग वह विद्वानों को प्रोत्साहन देने, विधवाओं तथा अनाथों की सहायता करने और प्रतिवर्ष ‘मक्का मदीना’ के लिये तीर्थयात्री भेजने में खर्च करती थी। उसने बहुत सुंदर पुस्तकालय तैयार किया था और सुंदर अक्षर लिखने वालों से दुर्लभ तथा बहुमूल्य पुस्तकों की नकल करावायी।

    अनुवाद कार्य

    ज़ेबुन्निसा ने प्रस्ताव के अनुसार साहित्यिक कृतियाँ तैयार करने वाले बहुत-से विद्वानों को अच्छे वेतन पर रखा और अपने अनुग्रहपात्र मुल्ला सैफुद्दीन अर्दबेली की सहायता से अरबी के ग्रंथ तफ़सीरे कबीर (महत्‌ टीका) का ‘जेबुन तफ़ासिर’ नाम से फ़ारसी में अनुवाद किया।

    कवियित्री

    सत्रहवीं सदी की बेहतरीन कवियित्री जेबुन्निसा उर्फ मखफी की कहानी मध्यकाल की सबसे त्रासद कहानियों में एक रही है। ज़ेबुन्निसा को अपने पिता के परस्पर-विरोधी कई व्यक्तित्वों में से उसका शायराना व्यक्तित्व विरासत में मिला था। 14 साल की उम्र में ही उसने मखफी उपनाम से फ़ारसी में शेर, ग़ज़ल और रुबाइयां कहनी शुरू कर दी थीं। औरंगजेब के दरबार में मुशायरों पर प्रतिबंध की वज़ह से ज़ेबुन्निसा चुपके-चुपके अदब की गोपनीय महफ़िलों में शिरक़त करती थी। उन महफ़िलों में उस दौर के प्रसिद्ध शायर अक़ील खां रज़ी, नेमतुल्लाह खां, गनी कश्मीरी आदि शामिल होते थे। मुशायरों के दौरान शायर अक़ील खां रज़ी से उसकी बेपनाह मुहब्बत चर्चा का विषय बनी तो अनुशासन के पाबन्द औरंगजेब ने उसे दिल्ली के सलीमगढ़ के क़िले में क़ैद कर दिया।

    जेबुन्निसा आजीवन अविवाहित रही। उसकी ज़िन्दगी के आखिरी बीस साल क़ैद की तन्हाई में ही गुज़रे और क़ैद में ही उसकी मौत हुई। क़ैद के मुश्किल दिनों में ही उसके कविता संकलन ‘दीवान-ए-मखफी‘ की पांडुलिपि तैयार हुई, जिसमें उसकी 5000 से ज्यादा ग़ज़लें, शेर और रुबाईयां संकलित हैं। इस दीवान की पांडुलिपियां पेरिस और लंदन की नेशनल लाइब्रेरियों में आज भी सुरक्षित हैं। पहली बार 1929 में दिल्ली से और 2001 में तेहरान से इसका प्रकाशन हुआ। मिर्ज़ा ग़ालिब के पहले ज़ेबुन्निसा ऐसी अकेली शायरा थी, जिसकी ग़ज़लों और रुबाईयों के अनुवाद उर्दू, अंग्रेज़ी और फ्रेंच समेत कई भाषाओं में हुए थे।

    नज़रबंदी तथा मृत्यु

    अपने पिता औरंगज़ेब के विरुद्ध विद्रोह करने वाले शाहज़ादा अकबर के साथ गुप्त पत्र-व्यवहार का पता चल जाने पर ज़ेबुन्निसा का निजी भत्ता बंद कर दिया, जमींदारी जब्त कर ली गई और उसे जनवरी, 1691 में दिल्ली के सलीमगढ़ क़िले में नजरबंद कर दिया गया। ज़ेबुन्निसा की मृत्यु 1702 में हुई। उसे काबुली गेट के बाहर ‘तीस हज़ारा बाग़’ में दफ़नाया गया।

    इसलिए बेटी की परछाई देख औरंगजेब ने कटवा दी थी कारीगरों की अंगुली

    औरंगजेब ने पानी में देखा था बे�

     – एक्जीबिटर रामानन ने मसलिन जामदानी साड़ियों का जिक्र करते हुए बताया कि औरंगजेब की बेटी जेबुन्निसा एक दिन जामदानी साड़ी पहनकर महल के ऊपरी हिस्से पर टहल रही थीं। इसी दौरान औरंगजेब का वहां से गुजरना हुआ।

    – औरंगजेब ने देखा कि महल के बीचाेबीच बने तालाब में जेबुन्निसा की परछाईं दिखाई दे रही है। परछाईं देख औरंगजेब को लगा कि बेटी ने कोई वस्त्र जैसे पहने ही ना हो। वे तत्काल जेबुन्निसा के पास पहुंचे तो देखा कि उन्होंने एक बहुत ही खूबसूरत साड़ी पहन रखी है। औरंगजेब को वह साड़ी और कारीगरी इतनी भाई कि उन्होंने उसे बुनने वाले बुनकरों बुलाकर उनकी अंगुली कटवा दी, जिससे ,फिर से कहीं ऐसी कारीगरी नहीं हो सके।

    – उन्होंने कहा कि आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जेबुन्निसा ने इस साड़ी को सात परत में पहना था, बावजूद वह दूर से ऐसे प्रतीत हाे रही थीं जैसे उन्होंने कोई वस्त्र पहना ही ना हो। औरंगज़ेब के कहने पर ही इन खूबसूरत साड़ियां को बनाया गया था।
    – उन्होंने आगे बताया कि मसलिन जामदानी साड़ियों को परिवार के लोग घर की बेटियों के सामने भी नहीं बनाते हैं। उनका मानना है कि बेटी के जरिए कहीं एक परिवार की कारीगरी दूसरे परिवार में न पहुंच जाए। घर के पुरुष ही साड़ियों का काम करते हैं।
    – मसलिन कॉटन की सबसे उम्दा क्वालिटी है। ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे जो कॉटन पैदा करते थे उससे मसलिन बनता है। नदी के पानी, मिट्टी की तासीर और जलवायु का कॉटन पर ऐसा असर होता है कि उसके रेशे हल्के और चमकदार निकलते हैं। पहले सिर्फ यह कपड़ा राजघरानों के लिए तैयार होता था। मसलिन जामदानी साड़ियों का इतिहास बहुत पुराना है। ये साड़ियां औरंगज़ेब के समय से बनती आ रही हैं। ये वही साड़ियां हैं, जिसे बनाने के बाद औरंगज़ेब ने बुनकरों को बुलाकर उनकी अंगुली कटवा दी थी। औरंगज़ेब ने ऐसा इसलिए किया था कि ऐसी खूबसूरत कारीगरी दोबारा नहीं की जाए।  ये इतनी पारदर्शी थी कि औरंगजेब की बेटी ने इसे सात लेयर में पहना था, लेकिन ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उन्होंने कुछ पहना ही ना हो। जो किसी तरह बच गए, उनका परिवार आज भी वो बेमिसाल कारीगरी कर रहा है। ये रोचक बात एग्ज़ीबिटर श्यामला रामानन ने बताई।
  • प्रसिद्ध कवि जानकी वल्लभ शास्त्री का 1916 में जन्म हुआ।
  • बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन के पुत्र और फ़िल्म अभिनेता अभिषेक बच्चन का 1976 जन्म हुआ।

5 फ़रवरी को हुए निधन 

  • 2014 में प्रसिद्ध भजन गायिका जुथिका रॉयका निधन।
  • 2010 में भोजपुरी और हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता सुजीत कुमार का निधन।
  • 2008 में भारतीय आत्मिक योगी महर्षि महेश योगी का निधन।
  • 1927 में भारतीय सूफ़ी संत इनायत ख़ान का निधन।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *