औरंगज़ेब की पुत्री ज़ेबुन्निसा का जन्म और महर्षि महेश योगी का निधन हुआ था आज

5 फ़रवरी का इतिहास

5 फरवरी का दिन भी भारतीय इतिहास में काफी महत्वपूर्ण दिन रहा है, इस दिन कई ऐसी घटनाएं घटीं, जो हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गईं। इसी दिन भारतीय मूल की सुनीता विलियम्स 2007 में सबसे ज्यादा समय बिताने वाली महिला बनी। इसके अलावा इस दिन अभिनेता अभिषेक बच्चन समेत कई ऐसी व्यक्तियों ने जन्म लिया, जिन्होंने देश-दुनिया के सामने अपनी प्रतिभा के बल पर अपनी एक अलग पहचान बनाई।5 फरवरी के दिन ही  कई दिग्गज इस दुनिया से हमेशा के लिए चले गए। हम आपको 5 फरवरी के दिन की कुछ ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण घटनाओं के बारे में बताएंगे जो कि इस प्रकार है –

5 February History

  • फ्रांस के साथ शांति समझौते पर जर्मन शासक लियोपोल्ड प्रथम ने 1679 में हस्ताक्षर किये।
  • इटली के कालाब्रिया में 1783 में हुए भीषण भूकंप में लगभग 25000 से ज्यादा लोगों की जाने गयी।
  • फिलाडेल्फिया के थियेटर में 1870 में पहली बार चलचित्र दिखाया गया।
  • ब्रिटेन और अमेरिका के बिच सन 1900 में पनामा नहर समझौते पर हस्ताक्षर।
  • क्यूबा देश अमेरिका के कब्जे से 1904 में मुक्त हुआ।
  • मैक्सिको ने 1917 में नया संविधान अंगीकृत किया।
  • ब्रिटिश समाचार पत्र “संडे टेलीग्राफ” के पहले संस्करण का प्रकाशन 1961 में हुआ।
  • अमेरिका ने 1970 नेवादा में परमाणु परीक्षण किया।
  • अपोलो 14 मिशन के अंतरिक्षयात्री चंद्रमा पर 5 फरवरी, 1971 को उतरे।
  • भारतीय क्रिकेटर दिलीप वेंगसरकर ने अपना आखिरी टेस्ट खेलकर 5 फरवरी, 1992 में क्रिकेट से संयास ले लिया।
  • 1996 में पहली बार जीएम टमाटरों से बनी प्यूरी इंग्लैंड के बाजारों में बिकनी शुरू हुई।
  • दक्षिणी अफ्रीका के राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला ने 5 फरवरी, 1999 को संसद में राष्ट्र को संबोधित करते हुए अपना आखिरी भाषण दिया और उसी साल मई में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
  • परमाणु प्रौद्योगिकी के ग़लत इस्तेमाल के मामले में परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कादिर ख़ान को पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ़ ने 2004 में माफी दी।
  • भारत की सुनीता विलियम्स 2007 में अंतरिक्ष में सबसे अधिक समय बिताने वाली महिला बनीं।
  • विवादों में रहने वाले पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कादिर खान को 5 फरवरी, 2008 के दिन सरकार ने अपने करीबी मित्रों से मिलने की अनुमति दी।
  • भारतीय निशानेबाज अभिनव बिंद्रा ने 2010 में नीदरलैंड इंटरनेशनल शूटिंग चैंपियनशिप में 600 में से 596 अंक हासिल कर स्वर्ण पदक जीत लिया।
  • 5 फरवरी 2016 को वित्त मंत्रालय ने यू-टयूब चैनल लॉन्च किया।

5 फ़रवरी को जन्मे व्यक्ति 

5 फरवरी को कई ऐसी शख्सियत ने जन्म लिया, जिन्होंने दुनिया में आकर बड़ा नाम किया, उनके बारे में हम आपको नीचे बता रहे हैं –

  • सिखों के सातवें गुरु हर राय का सन 1630 में पंजाब के कीरतपुर में जन्म हुआ।
  • मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब की पुत्री ज़ेबुन्निसा Image result for औरंगजेब की पुत्री जेबुन्निसाका 1639 में जन्म हुआ।जे़ब-अल-निसा (फ़ारसी: زیب النساء مخفی)5 फरवरी 1638 – 26 मई 1702) एक मुग़ल शहज़ादी और बादशाह औरंगज़ेब (3 नवंबर, 1618 – 3 मार्च 1707) और उसकी मुख्य मलिका दिलरस बानो बेगम की सबसे बड़ी औलाद थी। वह एक कवित्री भी थी, जो “मख़फ़ी” (مخفی) के छद्म नाम के तहत लिखा करती था। उसके जीवन के पिछले 20 वर्षों में उसे सलीमगढ़ क़िला, दिल्ली में उसके पिता द्वारा क़ैद रखा गया है। शहज़ादी जे़ब-उन-निसा को एक कवि के रूप में याद किया जाता है, और उसका लेखन दीवान-ए-मख़फ़ी के रूप में मरणोपरांत एकत्रित किया गया था।

    प्रारंभिक वर्ष

    जन्म

    जे़ब-अल-निसा (“नारीजगत का आभूषण “), राजकुमार मोहि-उद-दीन (भविष्य बादशाह औरंगजेब) की सबसे बड़ी औलाद थी। उस का जन्म 15 फरवरी 1638 में दौलताबाद, डेक्कन, में उसके माता-पिता की शादी ठीक नौ महीने के बाद हूई थी। उसकी माँ, दिलरस बानो बेगम थी, जो औरंगजेब की पहली और मुख्य पत्नी थी, और  ईरान (फारस) के शासक वंश सफ़ाविद राजवंश की राजकुमारी थी। जे़ब-अल-निसा अपने पिता की पसंदीदा बेटी थी, और इस वजह से वह उसे उन लोगों को क्षमा करने के लिए मजबूर कर सकती थी जिन्होंने उन्हें नाराज़ किया था।ज़ैबुन्निसा की सगाई शाहजहाँ की इच्छा के अनुसार भाई दारा शिकोह के पुत्र से हुई जिसकी असमय मृत्यु होने से निकाह न हो सका | कुछ समय पश्चात ज़ैबुन्निसा ने किसी समारोह में बुंदेला महाराजा छत्रसाल को देखा जो उस समय एक बार औरेंगजेब के लिए युद्ध लड़े थे पर उचित भाग न मिलने पर विद्रोह कर दिया था और अपनी अलग सल्तनत बना ली थी। ज़ैबुन्निसा छत्रसाल पर मोहित हो गई थीं और एक भरोसे की दासी से अपना प्रेम निवेदन राजा छत्रसाल तक पहुंचाया था । किन्तु उस समय औरंगजेब की सख्त पहरेदारी और परदेदारी की वजह से सम्भव न हो सका और उसके संदेश वाहक को औरंगजेब ने मरवा डाला व ज़ैबुन्निसा को सख्त फटकार लगाई क्यूंकि औरंगज़ेब छत्रसाल को अपना दुश्मन मानता था | बाप बेटी में काफी बहस हुई | पाठकों की जानकारी के लिए बता दूं कि राजा छत्रसाल ही बाजीराव पेशवा की दूसरी पत्नी मस्तानी के पिता थे । उसके बाद ज़ैबुन्निसा ने जब मराठा छत्रपति शिवाजी की बहादुरी के चर्चे सुने और आगरा में उनको देखा तो वो शिवाजी की बहादुरी की कायल हो गई और प्रेम -दीवानी हो गई | उसने अपना प्रेम निवेदन शिवाजी महाराज तक भिजवाया लेकिन विधर्मीं होने से व राजनैतिक कारणों से शिवाजी ने यह विवाह प्रस्ताव ठुकरा दिया क्योकि उनकी माता जीजाबाई ने समझाया कि एक मुसलमान से तुम्हारा विवाह सम्भव नहीं है | क्योकि औरंगजेब मरते दम तक इसकी इजाजत नहीं देगा | मायूस ज़ैबुन्निसा गमगीन होकर वापस अपनी शायरी की दुनिया मैं डूब गई | हम सभी जानते हैं की औरंगज़ेब एक हिन्दु विरोधी कट्टर मुस्लिम बादशाह था उसने हिन्दू त्यौहारों पर प्रतिबन्ध लगाया और सैकड़ों हिन्दू मंदिरों को तोडा गया और तोड़े गये मंदिरों की जगह पर मस्जिद और कसाईखाने कायम कर दिये | हिन्दुओं के दिल को दुखाने के लिए इस क्रूर शासक ने गो−वध करने तक की खुली छूट दे दी थी | लेकिन कहते हैं न कि ऊपर वाले की लाठी में आवाज नहीं होती | औरंगजेब पर भी ईश्वर की लाठी पड़ी | नतीजा यह हुआ कि जिस कृष्ण की संस्कृति को वह खत्म करने चला था | उसी संस्कृति की उसकी बेटी ‘ज़ैबुन्निसा’ दीवानी हो गई और कृष्ण भक्त बनकर उसके सामने खड़ी हो गई | ज़ैबुन्निसा भगवान कृष्ण की दीवानी थी और सूफियाना शायरा थी उसका स्थान उर्दू में वही हैं जो हिंदी में मीराबाई का था | उसकी शेरों शायरी भगवान कृष्ण को समर्पित थी | उसने विरह की अदा गोपियों से सीखी और विरह का प्यार राधा से सीखा | उसने एक बार कहा था उसने जिस प्रकार राधा कृष्ण की दीवानी थी उस प्रकार में भी कृष्ण की दीवानी हूँ | ज़ैबुन्निसा का प्यार भगवान कृष्ण के लिए निरंकार था चूकि ज़ेबुन्निसा मुसलमान थी अतः कृष्ण भक्त होने के बाबजूद भी वो इस्लाम की पक्की अनुगामी थी इसी वजह से वह कृष्ण के साकार रूप में न विश्वास रखते हुए कृष्ण की निरंकार रूप को मानती थी | ज़ैबुन्निसा का प्यार ब्रज क्षेत्र के लिए इतना था कि उसने अपने वालिदेन से एक बार झगड़ा होने पर कह दिया था चाहे आप मुझे जेल में डाल दो या मार डालो लेकिन मेरी आखिरी इच्छा ये है की मेरी मौत कहीं भी हो पर मेरे शरीर को ब्रज क्षेत्र की पवित्र मिटटी में ही दफ़न करना | इसके कुछ समय बाद मुशायरों और महफिलों में शिरकत करते-करते ज़ैबुन्निसा को शायर अकील खां रजी से प्रेम हो गया | शायर अक़ील खां रज़ी से उसकी बेपनाह मोहब्बत चर्चा ऐ आम हो गई थीं और दोनों ने साथ में जीने मरने की कसमें खाई | दोनों का प्यार मासूम हिरणियों की तरह कुलांचे मरने लगा | मुलाकातें बढ़ीं तो दोनों एक दूसरे की बाहों में समा गये | सलीमगढ़ का किला उन दोनों की बेलौस मोहब्बत का गवाह था | अपनी बेटी को एक मामूली शायर से प्रेम करना उसे बिलकुल गवारा न हुआ और उस धर्मांध ने अपनी जान से भी प्यारी बेटी ज़ैबुन्निसा को 1691 में दिल्ली के सलीमगढ़ किले में कैद करवा दिया गया | कल तक जो सलीमगढ़ का किला उसकी शबनमी मुहब्बत की दरो-दीवार था वहीं आज उसकी आजादी के बीच दीवार बन गया था | और उसके प्रेमी अकील रजी को उसी सलीमगढ़ के किले में औरंगजेब ने उसके सामने ही हाथियों से कुचलवा कर मरवा दिया और उसके शव को दूर लाहौर के एक गुमनाम स्थान पर दफनाया | वो बरसात की दोपहर थी मानों सलीमगढ़ का किला अपने भाग्य की बदहाली पर आंसू बहा रहा हो शायद सलीमगढ़ के किले ने ही औरंगजेब को बददुआ दी होगी जा तेरा सर्वनाश होगा | तू इतिहास में कभी सम्मान नहीं पा सकेगा और शीघ्र तेरा वंश नष्ट होगा | कालांतर में ऐसा ही हुआ और मुगल खानदान नष्ट हो गया। औरंगजेब ने दो प्रेमियों को अलग कर दिया पर दिलों को अलग न कर सका | कैदखाने में ज़ैबुन्निसा प्रेम अगन में तिल-तिल जलती रही | शमा की रोशनी में वो शायरी लिखती रही और अपने शरीर को गलाती रही । उसकी आँखे व शरीर बेहद कमजोर हो गया था | मगर उस ज़ालिम बादशाह को कोई रहम नहीं आया | यहाँ तक कि उसको अधिक लोगों से मिलने की इजाजत भी नहीं थी मानों उसने मुहब्बत न कर कोई बड़ा जुर्म किया हो | ज़ैबुन्निसा आजीवन अविवाहित रहीं | उनके प्रेम और विरह का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि क़ैद के दौरान ज़ेबुन्निसा ने 5,000 से भी ज्यादा ग़ज़लें, शेर और रुबाइयां और कविता संकलन ‘दीवान-ए-मख्फी’ लिखी | उनकी ज़िन्दगी के आखिरी बीस साल क़ैद की तन्हाई में ही गुज़रे और क़ैद में ही उनकी मौत हुई | उसे काबुली गेट के बाहर तीस हज़ारी बाग में दफनाया गया | हालाँकि औरंगजेब ने उसकी अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए अपने परदादा अकबर के पास ले जाकर एक गुमनाम कब्र को सिकन्दरा, आगरा में दफनाया | औरंगजेब इतना बेदर्द था कि ज़ैबुन्निसा के नाम की पट्टिका तक उसकी कब्र पर नहीं लगने दी | कैद मैं भी ज़ैबुन्निसा को चार लाख रुपये का सालाना शाही भत्ता मिलता था, जिसका अधिकांश भाग वह विद्वानों को प्रोत्साहन देने और प्रतिवर्ष ‘मक्का मदीना’ के लिये तीर्थयात्री भेजने में खर्च करती थी। उसने बहुत सुंदर पुस्तकालय तैयार किया था और सुंदर अक्षर लिखने वालों से दुर्लभ तथा बहुमूल्य पुस्तकों की नकल करावायी। ज़ेबुन्निसा ने साहित्यिक कृतियाँ तैयार करने वाले बहुत-से विद्वानों को अच्छे वेतन पर रखा और अपने अनुग्रहपात्र मुल्ला सैफुद्दीन अर्दबेली की सहायता से अरबी के ग्रंथ तफ़सीरे कबीर (महत् टीका) का ‘जेबुन तफ़ासिर’ नाम से फ़ारसी में अनुवाद भी किया। आज ऐसी शिक्षित महिला ज़ैबुन्निसा की गुमनाम कब्र अपने एकाकी पन पर रोती है और कहती है ऐ इस्लाम के रहनुमाओ क्या महिलाओं को प्यार और शायरी का हक़ नहीं | लेखक मनीष कुमार गुप्ता जब सम्राट अकबर की कब्र के मुख्य सेवादार इस्लामुद्दीन से मिले तो उन्होंने ये बताया कि यहाँ उसके अलावा कोई नहीं जनता कि सिकंदरा आगरा में औरंज़ेब कि बेटी ज़ैबुन्निसा दफन है | मुग़ल खानदान में उसके आखिरी शासक बहादुर शाह ज़फर के अलावा जेबुन्निसा ही ऐसी शख्स थी जिसकी शायरी को दुनिया भर में सम्मान के साथ पढ़ा और सराहा जाता है | हालांकि रूमान और असफल प्रेम की पीड़ा उसकी शायरी के केंद्र में है, लेकिन उसमें सूफी दर्शन व् कृष्ण का असर भी दिख जाता है | मिर्ज़ा ग़ालिब के पहले वह अकेली शायरा थी जिनकी रुबाइयों, गज़लों और शेरों के अनुवाद अंग्रेजी, फ्रेंच, अरबी सहित कई विदेशी भाषाओं में हुए हैं| दुर्भाग्य से उसके अपने देश में हिंदी और उर्दू में उनकी रचनाओं का अनुवाद, प्रकाशन और मूल्यांकन होना अभी बाकी है| ज़ैबुन्निसा की रूह को सलीमगढ़ क़िले में अपने अधूरे प्यार को पाने का इंतज़ार हैं | लोग कहते हैं कि ज़ैबुन्निसा की आत्मा आज भी आधी रात को अपने अधूरे प्यार को पुकारती हैं | आज इस सलीमगढ़ के किला को भुतहा कहते हैं और जाने से डरते हैं आइये मैं आपको इस किले के बारे में बताता हूँ | सलीमगढ़ के किले को सन 1526 में शेरशाह सुरी के बेटे इस्लाम शाह सूरी उर्फ़ सलीम शाह ने बनवाया था। यह लाल किले के ठीक उत्तर – पूर्व में यमुना नदी के किनारे बसा हुआ था | सलीमगढ़ मोटे तौर पर त्रिकोणाकार है जिसमें रोड़ी – कंकड़ से निर्मित स्थूल परकोटे हैं | इसमें मूलत: उन्नीस वृताकार बुर्ज थे | शहंशाह जहांगीर ने सलीमगढ़ और लाल किले को जोड़ने के लिए एक पांच कमान का पुल, जिसका पुराने नक़्शे में पांचपुला के नाम से उल्लेख है , का निर्माण करवाया था | बाद में ब्रिटिश शासकों ने वर्तमान रेल का पुल बनाने के लिए इसे ढहा दिया | औरंगजेब के शासन काल में सलीमगढ़ का इस्तेमाल एक जेल के रूप में किया जाता था | मुगलों के बाद इस जगह को अंग्रेज़ो ने भी जेल के रूप में ही रखा था और 1945 में आज़ाद हिन्द फौज के कई नेताओ को इस जेल में बंद कर दिया गया | कुछ कैदी तो अंग्रेज़ो के जुल्मो से पीड़ित होकर इन्ही काल कोठरियों में मर गये । इस किले को दिल्ली का सबसे भुतहा किलों में एक माना जाता है पुराने जमाने में यमुना लाल किले से दूर नहीं बहती थी बल्कि लाल किले और सलीम गढ़ के किले के बीच वाला जो रास्ता है जो आईएसबीटी को तरफ जाता है ये पूरा यमुना का डूब क्षेत्र था जिसका एक पुराना चित्र संलग्न है सलीमगढ़ का किला मुगल बादशाह बाबर को शेरशाह सूरी द्वारा दी गई हार का गवाह है इसलिए मुगलों ने इस किले को हमेशा अपने अपमान का प्रतीक समझा था और इसका सही उपयोग तक नहीं किया और वे इसका उपयोग कारागार के रूप में करते थे | नतीजन इसका महत्व घट गया और इतिहास से धूल-धूसरित होकर उतर गया क्योकि हमारे इतिहासकारों ने हमेशा से मुगलों का पक्ष लिया और अन्य राजाओं से द्धेष भाव रखा मानों इतिहासकार मुगलों के गुलाम थे | आज़ादी के लगभग 50 साल बाद भारत सरकार ने इसकी सुध ली और इसको स्वतंत्रता सेनानी स्मारक २ अक्टूबर 1995 में घोषित कर दिया | मगर इस किले की दुर्दशा जारी रही और ये अन्य मुगलकालीन इमारतों की तरह शाही सम्मान व महत्व न पा सका | क्यूँ न हो हमारे देश के पूर्ववती नेता मतलब की राजनीति करते रहे | आज ये किला अपनी बदहाली पर रोता है और इस स्वतंत्रता सेनानी स्मारक की देखभाल करने वाला कोई नहीं है | जिस इमारत को राष्ट्रीय महत्व देना चाहिए वो इतना गुमनाम है कि 125 करोड़ की आबादी की दिशा में शायद एक हज़ार लोग भी इसको नहीं जानते है | सलीमगढ़ का किला युमना नदी के तट पर बसा है जो कि असल में लाल किले से भी पुराना है और लाल किले और सलीमगढ़ के बीच का ISBT जाने वाला रास्ता इसको विभाजित करता है | लेकिन इसमें जाने के लिए हमे लाल किले के अंदर से ही जाना होगा और अंदर से इसको ढूढ़ कर इतनी दूर जा पाना एक दुष्कर काम है शायद इसीलिए इसके देखने वालों कि संख्या नगण्य है | साथियों ये किला हमारे दिल्ली के पर्यटन का मुख्य बिन्दु हो सकता है इसलिए दिल्ली सरकार, ASI व पर्यटन विभाग को इस पर ध्यान देना होगा | मेरा इस देश की सरकारों व् पर्यटन विभाग से विनम्र निवेदन है कि हमारे देश के इस ऐतिहासिक स्वाधीनता स्मारक का पुनरुद्धार करें और इस पर ध्यान दें ताकि यह एक पर्यटन का बिंदु बन सके और यहां आकर लोग अपने देशवासियों को याद कर सकें यहां आकर वह अपने उन राष्ट्रभक्तों को याद करें ताकी हमारे देश में देशभक्ति और राष्ट्रवाद की भावना जागृत हो | मेरा हाथ जोड़कर ASI विभाग से यह निवेदन है कि सलीमगढ़ के किले का रास्ता अलग से किया जाए ताकि जो लोग सिर्फ सलीमगढ़ किला देखना चाहते हैं वह सीधे सलीमगढ़ जा सके | वर्तमान में यह रास्ता लाल किले से होकर जाता है जिसकी वजह से पर्यटक जब पूरी तरह थक जाते हैं तो उनका सलीमगढ़ जाने का मन नहीं होता जिसकी वजह से यह स्थान अनदेखा ही रह जाता है |

    जे़ब-अल-निसा पैलेस, 1880, औरंगाबाद.

    उनके पिता ने हाफिजा मारीम, जो दरबार की महिलाओं में से एक थी, को ज़ेब-उल-निसा की शिक्षा का काम सौंपा। अपने पिता की बुद्धिमत्ता और साहित्यिक स्वाद का पैनापन उसे विरासत में मिला था क्योंकि ज़ेब-उल-निसा ने तीन साल में कुरान को याद किया और सात साल की उम्र में हाफिज बन गई थी। इस अवसर को उनके पिता ने एक महान दावत और सार्वजनिक अवकाश के साथ मनाया था। राजकुमारी को उसके प्रसन्न पिता ने 30,000 स्वर्ण टुकड़े का इनाम भी दिया था। औरंगजेब ने अपनी जहीन पुत्री को अच्छी तरह से पढ़ाने के लिए उस्ताद बी को 30,000 स्वर्ण टुकड़ों की राजसी राशि का भुगतान किया।जे़ब-अल-निसा ने मोहम्मद सईद अशरफ मज़ंधारानी, जो एक फारसी फारसी कवि भी थे, के साथ समय का विज्ञान भी सीखा।उसने दर्शन, गणित, खगोल विज्ञान,साहित्य सीखा , और फारसी, अरबी और उर्दू की धनी थी। सुलेख में भी उनकी अच्छी प्रतिष्ठा थी

    उसकी लाइब्रेरी ने अन्य सभी निजी संग्रहों को पार कर लिया, और उसने कई विद्वानों को उदारवादी वेतन पर अपनी बोली में साहित्यिक कार्यों का निर्माण करने या उसके लिए पांडुलिपियों की प्रतिलिपि बनाने के लिए रोजगार दिया। जे़ब-अल-निसा की लाइब्रेरी बादशाह अकबर के संग्रह से प्रेरित थी, जिसमें कुरान, हिंदू और जैन ग्रंथों, ग्रीक पौराणिक कथाएँ, फारसी ग्रंथों, विद्वान अल्बरूनी के यात्रा के अकाउन्ट, बाइबिल के अनुवाद और अपने पूर्वजों के बारे में समकालीन लेखन शामिल थे।उनकी लाइब्रेरी ने प्रत्येक विषय पर साहित्यिक काम भी प्रदान किए, जैसे कानून, साहित्य, इतिहास और धर्मशास्त्र।जे़ब-अल-निसा एक दयालु व्यक्ति थी और हमेशा लोगों की ज़रूरत में मदद करती थी। उसने विधवाओं और अनाथों की मदद की। न केवल उसने लोगों की मदद की, लेकिन हर साल उसने मक्का और मदीना को हज श्रद्धालुओं को भेजा। वह संगीत में रुचि लेती थी और कहा जाता है कि वह अपने समय की महिलाओं में सबसे अच्छी गायक थी। वह हथियारों के इस्तेमाल में भी कुशल थी और उसने युद्ध में कई बार भाग लिया था।

    जे़ब-अल-निसा ने 14 साल की उम्र से फ़ारसी में कविताएं कहनी शुरू कर दीं, लेकिन जैसा कि उसके पिता को कविता पसंद नहीं है, वह चुपके से लिखती थी।उस्ताद बयाज़, जो उनके शिक्षकों में से एक थे, ने उनकी कविताएं पाई और कहते रहने के लिए प्रोत्साहित किया। यह बताया जाता है कि औरंगजेब के अदालत में, गनी कश्मीरी, नामातुल्ला खान और अकिल खान राजी जैसे “महान” कवियों के बीच छिपी हुई साहित्यिक और काव्यवादी पार्टियां हुया करती थीं और जे़ब-अल-निसा ने इन पार्टियों में चुपके से भाग लिया।

  • प्रसिद्ध कवि जानकी वल्लभ शास्त्री का 1916 में जन्म हुआ।
  • राजनीतिज्ञ खुर्शीद आलम खान का 5 फरवरी, 1919 को जन्म हुआ।
  • स्विटजरलैंड के मशहूर चित्रकार एच.आर.गैगर का जन्म 5 फरवरी, 1940 में हुआ।
  • भारत के तेज गेंदबाज भुवनेश्वर कुमार का 5 फरवरी, 1990 में जन्म हुआ।
  • बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन के पुत्र और फ़िल्म अभिनेता अभिषेक बच्चन का 1976 जन्म हुआ।

5 फ़रवरी को हुए निधन 

5 फरवरी के दिन भारतीय फिल्म अभिनेता सुजीत कुमार समेत कई ऐसे दिग्गज व्यक्ति दुनिया छोड़कर चले गए, जिनके बारे में हम आपको नीचे बता रहे हैं –

  • 1927 में भारतीय सूफ़ी संत इनायत ख़ान का निधन।
  • 2008 में भारतीय आत्मिक योगी महर्षि महेश योगी का निधन।महर्षि महेश योगी का जन्म 12 जनवरी 1918 को छत्तीसगढ़ के राजिम शहर के पास पांडुका गाँव में हुआ था। उनका मूल नाम महेश प्रसाद वर्मा था। उन्होने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से भौतिकी में स्नातक की उपाधि अर्जित की। उन्होने तेरह वर्ष तक ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती के सानिध्य में शिक्षा ग्रहण की। महर्षि महेश योगी ने शंकराचार्य की मौजूदगी में रामेश्वरम में 10 हजार बाल ब्रह्मचारियों को आध्यात्मिक योग और साधना की दीक्षा दी। हिमालय क्षेत्र में दो वर्ष का मौन व्रत करने के बाद सन् 1955 में उन्होने टीएम तकनीक की शिक्षा देना आरम्भ की। सन् 1957 में उनने टीएम आन्दोलन आरम्भ किया और इसके लिये विश्व के विभिन्न भागों का भ्रमण किया। महर्षि महेश योगी द्वारा चलाया गए आंदोलन ने उस समय जोर पकड़ा जब रॉक ग्रुप ‘बीटल्स’ ने 1968 में उनके आश्रम का दौरा किया। इसके बाद गुरुजी का ट्रेसडेंशल मेडिटेशन अर्थात भावातीत ध्यान पूरी पश्चिमी दुनिया में लोकप्रिय हुआ। उनके शिष्यों में पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी से लेकर आध्यात्मिक गुरू दीपक चोपड़ा तक शामिल रहे।महर्षि महेश योगी ने वेदों में निहित ज्ञान पर अनेक पुस्तकों की रचना की। महेश योगी अपनी शिक्षाओं एवं अपने उपदेश के प्रसार के लिये आधुनिक तकनीकों का सहारा लेते हैं। उन्होने महर्षि मुक्त विश्वविद्यालय स्थापित किया जिसके माध्यम से ‘आनलाइन’ शिक्षा दी जाती है। वे साप्ताहिक विडियो पत्रकार वार्ता आयोजित करते हैं। वे महर्षि प्रसारण के लिये उपग्रह व अन्तरजाल का सहारा लेते हैं।अपनी विश्व यात्रा की शुरूआत 1959 में अमेरिका से करने वाले महर्षि योगी के दर्शन का मूल आधार था, ‘ जीवन परमआनंद से भरपूर है और मनुष्य का जन्म इसका आनंद उठाने के लिए हुआ है। प्रत्येक व्यक्ति में ऊर्जा, ज्ञान और सामर्थ्य का अपार भंडार है तथा इसके सदुपयोग से वह जीवन को सुखद बना सकता है।’ वर्ष 1990 में हॉलैंड के व्लोड्राप गाँव में ही अपनी सभी संस्थाओं का मुख्यालय बनाकर वह यहीं स्थायी रूप से बस गए और संगठन से जुड़ी गतिविधियों का संचालन किया। दुनिया भर में फैले लगभग 60 लाख अनुयाईयों के माध्यम से उनकी संस्थाओं ने आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति और प्राकृतिक तरीके से बनाई गई कॉस्मेटिक हर्बल दवाओं के प्रयोग को बढ़ावा दिया।
    हॉलैंड के व्लोड्राप नगर में महर्षि का वैदिक विश्वविद्यालय

    डच के स्थानीय समय के अनुसार एम्सटर्डम के पास छोटे से गाँव व्लोड्राप में स्थित अपने आवास में मंगलवार देर रात उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया। पिछले महीने 11 जनवरी को महर्षि योगी ने ये कहते हुए अपने आपको सेवानिवृत्त घोषित कर दिया था कि उनका काम पूरा हो गया है और अपने गुरु के प्रति जो कर्तव्य था वो पूरा कर दिया है।Image result for महर्षि महेश योगी

    मुद्रा ‘राम’

    महर्षि योगी ने एक मुद्रा की स्थापना भी की थी। महर्षि महेश योगी की मुद्रा राम  को नीदरलैंड में क़ानूनी मान्यता प्राप्त है। राम नाम की इस मुद्रा में चमकदार रंगों वाले एक, पाँच और दस के नोट हैं। इस मुद्रा को महर्षि की संस्था ग्लोबल कंट्री ऑफ वर्ल्ड पीस ने अक्टूबर २००२ में जारी किया था। डच सेंट्रल बैंक के अनुसार राम का उपयोग क़ानून का उल्लंघन नहीं है। बैंक के प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि इसके सीमित उपयोग की अनुमति ही दी गई है। अमरीकी राज्य आइवा के महर्षि वैदिक सिटी में भी राम  का प्रचलन है। वैसे 35 अमरीकी राज्यों में राम  पर आधारित बॉन्डस चलते हैं। नीदरलैंड की डच दुकानों में एक राम  के बदले दस यूरो मिल सकते हैं। डच सेंट्रल बैंक के प्रवक्ता का कहना है कि इस वक्त कोई एक लाख राम  नोट चल रहे हैं।

  • 2010 में भोजपुरी और हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता सुजीत कुमार का निधन।
  • 2014 में प्रसिद्ध भजन गायिका जुथिका रॉयका निधन।
  • मप्र केसरी के सम्मान से नवाजे गए बीजेपी के दिग्गज नेता हुकुमचंद यादव का 5 फरवरी 2017 को निधन।

5 फ़रवरी के महत्त्वपूर्ण उत्सव

5 फरवरी के दिन को उत्सव के रुप में भी मनाया जाता है –

  • वन अग्नि सुरक्षा दिवस (सप्ताह)

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