एयर स्ट्राइक में आतंकी ही नहीं, मोदी विरोधी मुद्दे भी ध्वस्त

सोचिए 14 फरवरी को हुए पुलवामा घटना के बारे में, अगर ऐसी हालात किसी दूसरी पार्टी के कार्यकाल में हुए होते तो वो उसका सबसे बड़ा फेलियर होता. लेकिन मोदी सरकार के पैंतरे और डिप्लोमेसी ने इसे संजीवनी में बदल दिया. इसके लिए पुलवामा घटना के बाद मोदी ने तीन फ्रंटों पर मोर्चा संभाला.

  • आतंकी घटना में मारे गये शहीदों के परिवारों को सरकार के खिलाफ भटकने से रोकने की कोशिश
  • पुलवामा का ऐसा जवाब जो युद्ध जैसा तो दिखे लेकिन परिणाम ‘ज्यादा’ हानिकारक न हो
  • विपक्षी पुलवामा को सरकार की बड़ी असफलता न साबित कर पायें, लिहाजा उन्हें राष्ट्रीयता और नैतिकता में उलझाकर रखा

पिछले कुछ दिनों में क्या-क्या हुआ?

पूरी घटना को एक दूसरे नजर से देखिए…पुलवामा में आतंकी हमला Image result for पुलवामा में आतंकी हमलाहुए, देश में मातम और गुस्से में डूब गया. सरकार पहले ही विपक्षियों के हमले झेल रही थी और अब आतंकी भी सरकार के लिए बड़ी परेशानी लेकर आए. पिछले चार दशकों में देश की ये दूसरी बड़ी घटना है जब एक साथ इतने जवान शहीद हुए. करीब 9 साल पहले छत्तीसगढ़ के बस्तर में हुए माओवादी घटना में 76 जवान मारे गए थे.

लाजमी था कि विरोधी पार्टियां 56 इंच का सीना दिखाने वाले मोदी सरकार को उसी के अंदाज में लपेटेंगी. और ये दिखने भी लगा. इससे पहले लखनऊ में 11 फरवरी को प्रियंका गाधी की पॉलिटिकल इंट्री के ट्रेलर से भगवा सरकार बेचैन थी ही. 17 फरवरी से प्रियंका पूरी तैयारी से फुल फ्लेज चुनावी मैदान में उतरने वाली थी. मूल बात यह है कि भारतीय जनता पार्टी के लिए सरकार में वापसी की चुनौतियां बढ़ रही थी.

एक साथ कई मोर्चे पर जूझ रहे थे प्रधानमंत्री मोदी

प्रधानमंत्री मोदी एक साथ कई मोर्चे पर जूझ रहे थे, खासकर यूपी में. कांग्रेस का बढ़ता ग्राफ देखकर बीजेपी की सहयोगी पार्टियां अपना दल की अनुप्रिया पटेल और ओमप्रकाश राजभर ने बार्गेनिंग तेज कर दी थी. बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस थी, क्योंकि सियासत में कदम रखने के साथ ही प्रियंका चारों तरफ छा गई.

चाहे न्यूज चैनल हो या फिर सोशल मीडिया. सिर्फ प्रियंका का डंका बज रहा था.प्रधानमंत्री मोदी के लिए दूसरी बड़ी चुनौती यूपी में सपा-बसपा का मजबूत गठबंधन. साल 2014 में बीजेपी ने उत्तर प्रदेश से 71 सीटें हासिल की थी… लेकिन सपा-बसपा के गठबंधन के बाद हालात अचानक बदल गए. जमीनी स्तर पर बीजेपी को भारी नुकसान की आहट मिलने लगी थी. टीवी चैनलों के सर्वे तो बीजेपी को सिर्फ 20-25 सीटें ही दे रहे थे. ऐसे में 40-50 सीटों के नुकसान की आशंका ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नींद उड़ा दी. उस पर से पुलवामा घटना ने राजनीति का भूगोल ही गड़बड़ा दिया.

बीजेपी ने सड़कों पर विपक्ष की भी भूमिका निभाई!

पुलवामा आतंकी घटना से देश में राष्ट्रवाद का ज्वार उफनने लगा. सभी पार्टियों से शहादत पर सियासत छोड़ देश के साथ खड़े होने की अपील की. विपक्षियों ने भी उससे एक कदम आगे बढ़ते हुए सरकार के हर फैसले पर साथ रहने का भरोसा दिलाया. बीजेपी को छोड़ सभी पार्टियों के नेता और कार्यकर्ताओं ने सरकार के खिलाफ चुप्पी साथ ली. इतनी नैतिकता दिखाई कि वो एकदम से गायब ही हो गये. इस बीच बीजेपी ने जमकर फिल्डिंग की. गली-गली, गांव-गांव बीजेपी और तिरंगे झंडों के साथ लोगों की टोलियों में पूरे देश में शहीदों में सम्मान में नारे लगाते रहे. कैंडिल मार्च निकाला. कह सकते हैं कि बीजेपी ने सड़कों पर विपक्ष की भी भूमिका निभाई. चार-पांच दिनों तक दूसरी पार्टियां इस उधेड़बुन पर लगी रही है कि क्या करें, क्या न करें. लेकिन इस बीच बीजेपी ने मैदान मार लिया.

बड़े-बड़े मुद्दे कहां गायब हो गये, पता ही नही चला

राफेल, बेरोजगारी, राम मंदिर का मुद्दा जो सरकार के बिल्कुल खिलाफ जा रहा था फिलहाल गायब है. सुप्रीम कोर्ट में चल रहे राम मंदिर के मामले में 26 फरवरी को ही सुनवाई भी थी, जिसका बड़ी बेसब्री से लोगों को इंतजार था. लेकिन शायद ही किसी ने उधर ध्यान दिया होगा. वहीं दूसरी तरफ बीजेपी ने इस आपाधापी के बीच शहादत की राष्ट्रीयता भी दिखायी और सियासत में भी नही चूकें.

Image result for विक्रांत दुबे, ’द क्विंटविक्रांत दुबे, ’द क्लिंट’ से साभार

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *