अयोध्या मामले में बड़ा कदम,सुको में केंद्र की अर्जी- मंदिर बनाने को राम जन्मभूमि न्यास को दे अविवादित जमीन

केंद्र सरकार ने कहा कि विवादित 2.77 एकड़ जमीन के अलावा बाकी जमीन पर कोई विवाद नहीं है, इसलिए उस पर यथास्थित बरकरार रखने की जरूरत नहीं है.सुप्रीम कोर्ट में केंद्र की अर्जी- मंदिर बनाने के लिए राम जन्मभूमि न्यास को दिया जाए जमीन का हिस्सा

नई दिल्ली। अयोध्या मामले में केंद्र सरकार बड़ा कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई। सरकार ने अयोध्या में विवादित जमीन छोड़कर बाकी जमीन को लौटने और इस पर जारी यथास्थिति हटाने की मांग की है। सरकार ने अपनी अर्जी में 67 एकड़ जमीन में से कुछ हिस्सा सौंपने की अर्जी दी है। ये 67 एकड़ जमीन 2.67 एकड़ विवादित जमीन के चारो ओर स्थित है। सुप्रीम कोर्ट ने विवादित जमीन सहित 67 एकड़ जमीन पर यथास्थिति बनाने को कहा था।

भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने ट्वीट कर कहा कि राम जन्मभूमि मामले में केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। राम जन्मभूमि विवाद मामले में केंद्र सरकार ने बड़ा दांव चला है। केंद्र इस केस में आज सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। सरकार ने अयोध्या विवाद मामले में विवादित जमीन छोड़कर बाकी जमीन को लौटने की मांग की है और इस पर जारी यथास्थिति हटाने की मांग की है। सरकार के इस कदम का हिंदूवादी संगठनों ने स्वागत किया है।
1993 में केंद्र सरकार ने अयोध्या अधिग्रहण ऐक्ट के तहत विवादित स्थल और आसपास की जमीन का अधिग्रहण कर लिया था और पहले से जमीन विवाद को लेकर दाखिल तमाम याचिकाओं को खत्म कर दिया था। सरकार के इस ऐक्ट को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। तब सुप्रीम कोर्ट ने इस्माइल फारुखी जजमेंट में 1994 में तमाम दावेदारी वाले सूट (अर्जी) को बहाल कर दिया था और जमीन केंद्र सरकार के पास ही रखने को कहा था और निर्देश दिया था कि जिसके फेवर में अदालत का फैसला आता है, जमीन उसे दी जाएगी।

कोर्ट में लंबित है मामला
अयोध्या जमीन विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर सुनवाई टल गई है। इसके पीछे 5 जजों की बेंच में जस्टिस एसए बोबडे की गैर-मौजूदगी वजह बताई जा रही है। इस मामले की सुनवाई 29 जनवरी से शुरू होने वाली थी। हालांकि, सुनवाई की अभी नई तारीख के बारे में कोई सूचना नहीं है। जस्टिस एसए बोबेड को कुछ दिन पहले ही इस बेंच में शामिल किया गया था। 5 जजों की इस बेंच में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एसए बोवडे, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अब्दुल नजीर हैं।

भूमि विवाद से संबंधित मामले में 14 अपीलें दायर
बता दें, सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या 2.77 एकड़ भूमि विवाद से संबंधित मामले में 14 अपीलें दायर की गई है। यह सभी अपील 30 सितंबर, 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2:1 के बहुमत के फैसले के खिलाफ है। इस फैसले में हाईकोर्ट ने विवादित भूमि को भूमि सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला विराजमान के बीच बराबर- बराबर बांटने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मई, 2011 को स्टे का ऑर्डर दिया था। इसके बाद पिछले दिनों मामले की सुनवाई के लिए पांच जजों की बेंच का गठन किया गया था। इस बेंच में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के अलावा अलावा जज जस्टिस एसए बोवडे, जस्टिस एनवी रमन्ना, जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ शामिल थे।

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाई है कि अयोध्या में 67 एकड़ जमीन सरकार की है. सरकार ने कहा है कि अयोध्या में सिर्फ 2.77 एकड़ जमीन पर विवाद है और बाकी जमीन पर कोई विवाद नहीं, इसलिए जमीन का कुछ हिस्सा राम जन्मभूमि न्यास को दिया जाए.

केंद्र सरकार ने अपनी याचिका में कहा कि 67 एकड़ जमीन का सरकार ने अधिग्रहण किया था, जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति बरकरार रखने का आदेश दिया है. सरकार ने कहा कि 2.77 एकड़ विवादित जमीन के अलावा बाकी जमीन पर कोई विवाद नहीं है, इसलिए उस पर यथास्थित बरकरार रखने की जरूरत नहीं है.

केंद्र सरकार ने आगे कहा कि अधिग्रहण किए गए 67 एकड़ जमीन में से 48 एकड़ राम जन्मभूमि न्यास का है. इसमें से 41 एकड़ जमीन कल्याण सिंह सरकार ने 1991 में उन्हें दी थी. बाकी उन्होंने खरीदी थी. वहीं बाकी की 19 एकड़ जमीन सरकार की है क्योंकि उसके ज्यादातर मालिकों ने सरकार से मुआवजा ले लिया है.
वहीं इस मामले में पक्षकार इकबाल अंसारी ने कहा कि उन्हें सरकार की इस याचिका से कोई आपत्ति नहीं है. उन्होंने कहा, ‘बाबरी मस्जिद के अलावा सरकार जमीन का कोई भी दूसरा हिस्सा लेने को आज़ाद है. हमें सरकार की याचिका पर कोई आपत्ति नहीं है.’

वहीं रामलला के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास ने कहा कि विवाद केवल 2.77 एकड़ जमीन पर है, लेकिन जब तक इस जमीन का निस्तारण नहीं होता, तब तक राम मंदिर नहीं बन पाएगा.’

मोदी सरकार की अर्जी की 5 बड़ी बातें
  1. सरकार ने कहा कि 67 एकड़ जमीन का सरकार ने अधिग्रहण किया था जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति बरकरार रखने का आदेश दिया. जमीन का विवाद सिर्फ 2.77 एकड़ का है बल्कि बाकी जमीन पर कोई विवाद नहीं है. इसलिए उस पर यथास्थिति बरकरार रखने की जरूरत नही है.
  2. सरकार चाहती है जमीन का बाकी हिस्सा राम जन्भूमि न्यास को दिया जाए और सुप्रीम कोर्ट इसकी इज़ाजत दे.
  3. सरकार विवादित 0.313 एकड़ जमीन पर प्रवेश व निकासी के लिए योजना तैयार कर देगी ताकि जमीनी विवाद पर जो भी कोर्ट से केस जीते उसे 0.313 एकड़ जमीन पर जाने- आने में कोई परेशानी ना हो.
  4. जो असली विवाद है वो 0.313 एकडट जमीन ही है. इसलिए 1993 में जो अतिरिक्त जमीन अधिग्रहीत की गई उसे वापस करने पर 1994 के संविधान पीठ के फैसले में कोई पाबंदी नहीं है.
  5. न्याय के हित में ये सही होगा कि सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले में संशोधन करे ताकि केंद्र मालिकों को जमीन वापस कर दे.

 

क्या है मामला?
बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद सरकार ने विवादित ढांचे के आसपास 67 एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर लिया था. कोर्ट ने इस जमीन पर यथास्थिति बनाए रखने का फैसला दिया था. सरकार ने जमीन का अधिग्रहण किया था ताकि विवादित जमीन जिस पार्टी को मिलेगी उसे यह जमीन दे दी जाएगी. सरकार चाहती है कि विवादमुक्त 67 एकड़ जमीन पर यथास्थिति बनाए रखने का फैसला वापस ले लिया जाए.

केंद्र का तर्क है कि विवादित जमीन पर फैसला आने में वक्त लग रहा है ऐसे में मंदिर ट्रस्ट को उनकी जमीन वापस दी जा सकती है ताकि वे मंदिर निर्माण कर सकें.

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