अयोध्या मामला: ‘ कहीं और शिफ्ट नहीं हो सकती राम की जन्मभूमि’

ayodhya case: 'ram's birthplace cannot be shifted'सुप्रीम कोर्ट (फाइल)

नई दिल्ली :सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद मामले की सुनवाई के दौरान हिंदू संगठनों की ओर से दलील दी गई कि बाबरी मस्जिद के लिए कोई विशेष स्थान और जगह का कोई महत्व नहीं है लेकिन राम जन्मस्थली का धार्मिक महत्व है और हिंदुओं के लिए इसकी महत्ता है, ऐसे में जन्मभूमि स्थल को कहीं और शिफ्ट नहीं किया जा सकता। रामलला विराजमान की ओर से ये दलील सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश की गई। मामले की अगली सुनवाई अब गर्मी की छुट्टियों के बाद 6 जुलाई को होगी।

राम लला विराजमान की ओर से पेश सीनियर ऐडवोकेट के. परासरन Image result for सीनियर एडवोकेट के. परासरणने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा Image result for चीफ जस्टिस दीपक मिश्राकी अगुआई वाली बेंच के सामने दलील दी कि ‘राम की जन्मभूमि को कहीं और शिफ्ट नहीं किया जा सकता। मस्जिद के लिए उस जगह विशेष की कोई धार्मिक महत्ता नहीं है। मुस्लिम नमाज के लिए कहीं और भी जा सकते हैं। अयोध्या में कई मस्जिदें हैं। विवाद 2.77 एकड़ जमीन पर है और वह हिंदुओं के लिए विशेष महत्व की जगह है क्योंकि वह राम जन्मभूमि है और ऐसे में उसे शिफ्ट नहीं किया जा सकता। जिस तरह से मुस्लिम के लिए मक्का और मदीना का विशेष महत्व है उसी तरह इसकी महत्ता है।’

मुस्लिम पक्षकारों की ओर से दलील दी गई है कि इस्माइल फारुकी जजमेंट में कहा गया है कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है और ऐसे में इस फैसले को दोबारा परीक्षण की जरूरत है और इसी कारण पहले मामले को संवैधानिक बेंच को भेजा जाना चाहिए। इस पर परासरन की दलील थी कि वह मुद्दा जमीन अधिग्रहण के संबंध में था और मौजूदा मामला टाइटल विवाद है और ऐसे में उक्त जजमेंट का इस मामले से लेना-देना नहीं है और ऐसे में मामले को लार्जर बेंच या संवैधानिक बेंच को नहीं भेजा जाना चाहिए।

परासरन ने कहा कि इस्माइल फारुकी जजमेंट कहता है कि मुस्लिम का नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न हिस्सा है लेकिन मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं माना गया है। ये व्याख्या मस्जिद के जमीन अधिग्रहण से संबंधित वाद में दी गई थी। वहां मुद्दा था कि जहां मस्जिद है वहां की जमीन का अधिग्रहण हो सकता है या नहीं। ऐसे में इस्माइल फारुकी केस में जो व्यवस्था दी गई थी उसका मौजूदा केस से लेना-देना नहीं है क्योंकि ये मामला टाइटल विवाद का है। ये मामला साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर तय हो सकता है। ऐसे में तीन जजों की बेंच ही मामले का निपटारा कर सकती है।

मुस्लिम पक्षकारों की ओर से राजीव धवन Image result for राजीव धवनने कहा था कि मामले को संवैधानिक बेंच को रेफर किया जाना चाहिए। उन्होंने इस्माइल फारुकी जजमेंट का हवाला दिया और कहा कि उस जजमेंट को ध्यान में रखकर ही हाई कोर्ट ने फैसला दिया है। 1994 के जजमेंट में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है और नमाज कहीं भी पढ़ा जा सकता है। मुस्लिम पक्षकारों का कहना है कि इस फैसले को पहले दोबारा देखा जाए उसके बाद ही जमीन विवाद मामले की सुनवाई की जाए। धवन की ओर से दलील पूरी कर ली गई। अब अगली सुनवाई 6 जुलाई को होगी।

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