अधूरी कामनाओं के वन में भटकती एक विवादास्पद कवियित्री कमला उर्फ माधव कुट्टी

‘..मुझे नहीं दरकार छलनामय घरेलू सुखों की ,

गुड-नाइट चुंबनों या साप्ताहिक खतों की
जो, ‘माय डियरेस्ट’ संबोधन से शुरू होते हैं
उन वैवाहिक कस्मों का खोखलापन
और डबलबैड का अकेलापन भी मैं जान चुकी हू,
जिस पर लेटा मेरा संगी स्वप्न देखता है किसी और का/ जो उसकी बीबी से कहीं बड़ी छिनाल है..’
(अन्नामलाई कविताओं से)

Kamala Das Google Doodle: अपनी कहानियों से सबके मन को छुआ

 कमला दास पर ताउम्र नारीवादी होने का ठप्पा लगा रहा। उनकी रचनाओं में स्त्रीमन की सेक्स इच्छा की खुली और स्वच्छंद प्रस्तुति देखने को मिलती है। यहां नारी के मन में अपनी यौन इच्छा को लेकर किसी किस्म की कुंठा या अपराध बोध नहीं है।

मशहूर लेखिका कमला दास को गूगल ने डूडल बनाकर सम्मान दिया है।

 गूगल ने आज (1 फरवरी) अपने होम पेज पर कमला दास को जगह दिया है। कमला दास दक्षिण भारत की मशहूर नारीवादी लेखिका हैं। लेखन के क्षेत्र में उन्हें कवियित्री, उपान्यासकार और कथाकार के रूप में प्रसिद्धि मिली। कमला दास का जन्म 13 मार्च 1934 को केरल के त्रिशूर के पुन्नायुर्कुलम में हुआ था। बचपन से ही इनके घर में साहित्यिक माहौल था। पिता वीएम नायर केरल के प्रख्यात अखबार मातृभूमि के मैनेजिंग संपादक थे, जबकि कमला दास की मां नलपत बालामणि अम्मा मलयाली भाषा की जानी-मानी कवि थीं। कमला दासका बचपन कलकत्ता में गुजरा, जहां उनके पिता एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में नौकरी करते थे, इसके बाद पुन्नायुर्कुलम में उन्होंने अपने बचपन के कुछ वक्त गुजारे। कमला दास की शादी 15 साल की उम्र में ही माधव दास से हो गई थी। माधव दास पेशे से बैंकर थे, उन्होंने कमला दास को लिखने के लिए प्रेरित किया। जल्द ही उनकी रचनाएं अंग्रेजी और मलयालय में छपने लगी। कमला दास के अंकल नलपत नारायण मेनन भी एक लेखक थे, कमला दास की जिंदगी पर उनका गहरा प्रभाव रहा है।

कमला दास अपने छद्म नाम ‘माधवीकुट्टी’ के नाम से अपनी रचनाएं लिखती थीं। अमी उनका घरेलू नाम था, जबकि सुरय्या नाम उन्होंने इस्लाम धर्म अपनाने के बाद रखा। कमला दास पर ताउम्र नारीवादी होने का ठप्पा लगा रहा। उनकी रचनाओं में स्त्रीमन की सेक्स इच्छा की खुली और स्वच्छंद प्रस्तुति देखने को मिलती है। यहां नारी के मन में अपनी यौन इच्छा को लेकर किसी किस्म की कुंठा या अपराध बोध नहीं है। इस अभिव्यक्ति ने उनकी रचनाओं को जबर्दस्त ताकत दी। कमला दास की आत्मकथा 1976 में ‘माई स्टोरी’ के नाम से रिलीज हुई। उनकी यह रचना काफी विवादों में रही। उनकी इस कृति को घर वालों ने रिलीज होने से रुकवाने की कोशिश की। पर इस किताब में माधवी कुट्टी की बेलाग टिप्पणियां, उनकी स्वीकारोक्ति ने लोगों को अचंभे में डाल दिया।

हालांकि कमला दास का जन्म पारंपरिक हिन्दू नायर (नलपत) परिवार में हुआ था, और इस परिवार का संबंध राज परिवार से था। लेकिन कमला दास ने 11 दिसंबर 1999 को 65 साल की उम्र में इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने अपना नाम कमला सुरय्या रखा। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि वो मृत व्यक्तियों को जलाने की हिन्दू प्रथा के खिलाफ थीं। उन्होंने दो मुस्लिम बच्चों को गोद भी लिया था। कमला दास को अपनी साहित्यिक कृतियों के लिए कई सम्मान से नवाजा गया। 1984 में उन्हें साहित्य अकादमी से पुरस्कृत किया गया।

1934 में केरल के अत्यंत संपन्न नायर परिवार में जन्मी कमला दास उर्फ माधवी उर्फ एमी उर्फ कमला सुरैया का जीवन विवादों से भरा रहा। अपनी एक शुरुआती रचना में उन्होंने लिखा था- ‘तुम एमी हो, या कमला या कि माधवी कुट्टी, अब वक्त आ गया है एक नाम एक रोल चुनने का।’उनका जीवन और लेखन दोनों अधूरी कामनाओं के वन में अपनी अस्मिता की एक लंबी तलाश है। 1975 में भारतीय महिलाओं की स्थिति के पहले गहरे और औपचारिक सरकारी आकलन-टुवर्ड्स इक्वॉलिटी, ने स्तब्धकारी ब्योरों और ऑंकड़ों से सिद्ध कर दिया, कि आजद भारत की महिला आबादी दरअसल कितनी दयनीय और परमुखापेक्षी स्थिति में जी रही है।

इसके सिर्फ एक साल बाद 1976 में कमला दास की बेबाक जीवनी ‘माय स्टोरी’ प्रकाशित हुई।  एक ऊपरी तौर से संपन्न सुखी गृहस्थ स्त्री की यौन कामनाओं के सामाजिक वजर्नाओं से टकराव और वैवाहिक जीवन की भीतरी दरारों के इस बेबाक चित्रण पर बहुत बबाल उठा था। बाद में उन्होंने इसे फिक्शन घोषित कर दिया, पर एक बच्चे की भोली बेबाकी से यह जोड़ना न भूलीं, कि ‘मुझे तो प्यार की तलाश थी। और अगर प्यार घर में न मिले, तो पैर तो भटकेंगे ही।’

उनके सबसे छोटे पुत्र जयसूर्या का कहना है कि उनकी माँ में गजब का ‘सेंस ऑफ ह्यूमर था और कोई हैरानी नही कि उनकी यौन कथाओं मे 95 प्रतिशत कल्पना हो ! उनके अनुसार बहुत संभव है कि उनकी माँ ने सब कुछ एक शानदार ड्रामे के लिए किया हो !असल  में मलयाली दैनिक ‘जन्मभूमि ‘की मुख्य संपादक और बाद में इंडियन एक्सप्रेस मे रही लीला मेनन ने भी ‘Ente Kamala”शीर्षक  से उनकी एक आत्मकथा लिखी थी जिसे उनके पुत्र नालापत और कथित प्रेमी पूर्व सांसद तथा बाद में कोटाकल से विधायक अब्दुस्समद समादानी ने प्रकाशित नही होने दिया ! लीला ने  उसमें कथित रूप से कमला के साक्षात्कारों के आधार पर अब्दुस्समद समादानी उनके रोमांस की कहानी भी लिखी कि समादानी (तब समादानी की उम्र 40 साल की थी और वह विवाहित था )  नदी स्नान के समय पीछा करता और गोद उठा कर अपने मल्लापुरम के कदावु निवास के  बैड रूम में ले जाकर गजल सुनाता और जमकर सेक्स करता था ! उनके अनुसार उन्हे समादानी के दांत बहुत अच्छे लगते थे !उसी ने उन्हे मुसलमान बनने पर विवाह का लालच दिया ! बाद में वह यह कह कर मुकर गया  कि वे उनकी माँ की उम्र की हैं ! बताया जाता है कि कमला अंत तक खुद को राधा और कृष्ण भक्त कहती रही ! उन्होने दोबारा हिन्दू बनने की भी कोशिश की लेकिन उनके बड़े  पुत्र नालापत और समादानी ने उन्हे यह कह कर डरा दिया कि ऐसा करने पर उग्र मुस्लिम गुट उनकी और पूरे परिवार की ह्त्या कर देंगे !

वे अपने छोटे पुत्र के पास पुणे चली आई और वहीं उनकी मृत्यु हुई ! मौत के बाद भी जमकर तमाशा हुआ और शव परिवार से छीन कर जुलूस के साथ तिरुअनंतपुरम लाया गया ! उन्हे वहीं दफनाया गया !

केरल पुन्नायरुकरुलम् (त्रिचूर जिला) के एक बहुत सम्पन्न मातृसत्ताक नायर परिवार में जन्मी कमला दास के पिता कलकत्ता में ऊॅंचे ओहदे पर थे। वहॉं उनका बचपन उस वक्त के दूसरे संभ्रांत सम्पन्न परिवारों  की  बच्चियों की ही तरह लिखने-पढ़ने-खाने-पीने की सुविधाओं के बावजूद घर की चहारदीवारियों  सिमटा रहा। उन्हें घर में ही पढ़ाया-लिखाया गया, और फिर जसा तब सामान्य चलन था, 15 वर्ष की कोमल आयु में अपनी उम्र से 15 वर्ष बड़े रिजर्व बैंक के एक आला अफसर से ब्याह दिया गया।

16 वर्ष की उम्र में मानसिक परिपक्वता पाने से पहले ही कमला मॉं बन चुकी थीं। बाद को उन्होंने बेबाकी से लिखा कि सचमुच में मॉं बनना क्या होता है, यह तो उन्होंने वर्षो बाद अपने तीसरे बेटे के जन्म के साथ ही समझ पाया। माधवी कुट्टी उनकी नानी का नाम था, जिससे वे मलयालम में लिखती थीं। अंग्रेजी में उन्होंने कमला दास के नाम से लिखा। लेखन और पेंटिंग से भी जीवन का सूनापन न भर पाईं तो 1984 में उन्होंने एक राजनैतिक पार्टी बना कर चुनाव भी लड़ा, पर जमानत जब्त हो गई।

इसके बाद वे राजनीति से हट गईं, और क्रमश: सार्वजनिक जीवन से भी। अपने पति की भूत पहले हो चुकी मृत्यु के बाद  1999 में अचानक धर्मातरण कर उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया तो सुरैया नाम भी उनसे जुड़ गया। बाद को पर्दाप्रथा के विरोध तथा अभिव्यक्ति की आजादी  की मॉंग को लेकर कट्टर मुल्लाओं से भी उनकी ठनी और ऐसे तमाम लंबे और टकराव से भरे दौरों से गुजरती कमला ने लगातार तीन दशकों तक कविता, कहानी, उपन्यास और आत्मवृत्त लिखे।

कुछ साल पहले राजधानी से प्रकाशित होने वाली एक जानीमानी लघु पत्रिका ‘दि लिटिल मैगजीन’ द्वारा जब सत्तर पार कर चुकी कमला सुरैया को द. एशियाई साहित्य सम्मान से नवाज गया, तब तक वे व्हील चेयर से बंध चुकी थीं। उनका सहज सौंदर्य और ओजस्वी वक्तृता अलबत्ता बरकरार थे। अपने भाषण में उन्होंने अपने मार्मिक संस्मरणों और दहलाने वाली बेबाकी से श्रोताओं को हिला दिया।

उन्होंने बताया कि किस तरह पति की मौत के बाद तीन बेटों के बावजूद वे लगातार एकाकी होती चली गईं। उपेक्षित मॉं और समृद्ध लेकिन नौकरों पर आश्रित पर्दानशीन विधवा के सूने जीवन ने उन्हें एक बार मृत्यु का वरण करने को बहुत उकसाया तो वे बुर्का पहन कर एक पेशेवर हत्यारे के पास (घर के नौकरों से छिपकर) त्रिची की अंधेरी गलियों के बीच एक बदनाम इलाके में एक स्कूटर में बैठ कर ज पहुंचीं।

उन्होंने मवाली से पूछा कि क्या तुम पैसे लेकर लोगों को खलास करने का काम करते हो? तो पहले तो वह भी भौंचक्का रह गया। फिर वह उग्र हुआ, और गरज, कौन हो तुम? किसने मेरा पता दिया तुम्हें? कमला ने अपने स्वाभाविक भोलेपन से उसे पता देने वालों का नाम बताया, तो मवाली ने कुछ आश्वस्त होकर पूछा- ‘किसे खत्म करना है?’ कमला ने कहा- ‘मुझे।’ –
‘क्यों ?’
‘क्योंकि मैं जीवन से उकता चुकी हू, और अपने हाथों अपने को मारने की हिम्मत नहीं कर पाती। तुम्हें जितना चाहिए मुझसे एडवांस में ले लो।’ कमला ने कहा। मवाली कुछ देर तो स्तब्ध इस विचित्र महिला को ताकता रहा, फिर समझा बुझा कर उन्हें वापस घर छोड़ गया।

बाद में इस अनुभव पर उन्होंने मलयालम में कहानी लिखी, तो उनके आलोचकों ने मुंह बिचकाया- भला उच्च परिवारों की महिलाओं के साथ ऐसा भी कहीं होता है? कमला के जीवन को लेकर यह सवाल कई बार पूछा जता रहा। बचपन से ही उन्मुक्त साहित्यिक परिवेश में पली कमला की मॉं, नालापट बालमणि अम्मा मलयाली की चर्चित कवियित्री थीं, और उनके नाना-मामा भी लेखक रहे। बड़े पुत्र प्रख्यात मलयालम दैनिक मातृभूमि के प्रधान सम्पादक थे।

अपने जीवनकाल में कमला साहित्य अकादमी, एशियन पोएट्री अवार्ड तथा कई अन्य पुरस्कारों से वे नवाजी गईं। पर पुरस्कार के लिए वे नहीं लिखती थीं, न ही अभिव्यक्ति की आजदी की लड़ाई इतने मोर्चो पर मुखरता से लड़ने के बावजूद वे नारी मुक्ित की पैरोकार बनीं। उल्टे जीवनभर मुक्ति की तलाश करने के बाद अंत में उन्होंने स्वेच्छया धर्मातरण कर पर्दे के पीछे छिपना चुन लिया।

कमला का पूरा रचनाकर्मी जीवन आज समग्रता से देखने पर हमारे समाज की एक ऐसी मेधावी रचनाधर्मी औरत की कहानी लगती है, जो दिए गए जीवन में बदलाव की जरूरत पहचानती तो है, पर फिर भी कहीं वह पारंपरिक स्त्रीत्व के बीच ही अपनी मुक्ति खोजना चाहती है।

इसलिए उनकी रचनाओं में स्वतंत्रता की एक स्पष्ट कल्पना और परिभाषा की बजए परतंत्रता का मुखर निषेध और प्रतिरोध ही अधिक मार्मिकता से उभरे हैं। अपनी सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति के क्षणों में उनका लेखन भाषा और कथ्य दोनों स्तरों पर परंपरा के पाखण्ड का संहार करता है, पर अपनी कमजोरी के बिंदु पर अपनी लेखनी क्रोध और झुंझलाहट आत्मदया से भरे स्वरों में विलीन हो जती है। फिर भी इस लेखिका की मूल ईमानदारी और लेखन के प्रति समर्पण असंदिग्ध हैं।

कोच्चि की हवा को अपने लिए दमघोंट और अपने पाठकों को विमुख हुआ कह कर कमला सुरैया ने जीवन के अंतिम दो वर्ष पुणो में अपने छोटे बेटे के साथ बिताए। पर जब मरने के बाद बेटों के बीच लंबे वाद-विवाद के बाद उन्हें इस्लामिक रिवाजों के अनुसार उनके मातृदेश में ही राजकीय सम्मान के साथ दफनाया गया तो उनके प्रशंसकों की भारी भीड़ ने उनकी लोकप्रियता को रेखांकित किया।

जाने अपने अंतिम संस्कार और जनता के जुड़ाव को लेकर लेखिका कमला सहमत होती या नहीं, पर यदि यह तय है कि वे जिंदा हो पातीं, तो जाते-जाते इस पर भी शायद एक और मार्मिक कहानी लिख डालतीं। भारत में उनका जीवन और प्रेम सम्बंध जसे अप्रत्याशित और नियम विरुद्ध रहे, वैसे ही उनका अंत भी।

शायद कुल मिलाकर किसी भी लेखक की तरह वह भी अपने को पारदर्शिता से अभिव्यक्त करना चाहती थीं, और यह उन्होंने किया, कभी सफलतापूर्वक, कभी नहीं। अपनी रचनाओं में अपने स्त्री-हृदय को निर्वसन कर चुकी कमला सुरैया भारतीय स्त्री की उन शिल्प आकृतियों की तरह है, जो सदियों से आलोचना से लापरवाह उन्मुक्त, निर्वसन र्निबध स्वतंत्रता की सुन्दर जीवंत परिभाषा व्यक्त कर रही हैं।

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