अंतर्राष्ट्रीय कम्प्यूटर साक्षरता दिवस है आज

2 दिसंबर का इतिहास

2 दिसंबर यानि हम सब इस दिन को इतिहास में आज के दिन और भी महत्वपूर्ण घटनाएँ घटी होंगी उन्ही महत्त्वपूर्ण घटनाओं के बारेमें जानकारी हम आपके लिए लाये हैं।

2 December History

 नेपोलियन बोनापार्ट की 1804  में फ्रांस के सम्राट के तौर पर ताजपोशी की गई।
  • फ्रांस जोसेफ 1848 में प्रथम ऑस्ट्रिया के सम्राट बने।
  • जॉर्ज पंचम और क्वीन मैरी 1911 में भारत आने वाले ब्रिटेन के पहले राजा,रानी बनें। उनके बंबई (अब मुम्बई) आगमन की याद में ही गेटवे ऑफ इंडिया बनाया गया।
  • पांडिचेरी (अब पुड्डुचेरी) में 1942 में श्री अरविंदो आश्रम स्कूल की स्थापना हुई जिसे बाद में श्री अरविंदो इंटरनेशनल सेंटर ऑफ एजुकेशन के नाम से जाना गया।
  • अमरीका और नेशनलिस्ट चीन के बीच 1954 में सुरक्षा संधि हुई।
  • सीमा सुरक्षा बल की स्थापना 1965 में हुई।
  • संयुक्त अरब अमीरात ने 1971 में ब्रिटेन से स्वतंत्र होने की घोषणा की।
  • फिदेल कास्त्रो 1976 में क्यूबा के राष्ट्रपति बने।
  • स्पेन की प्रथम संसद में समाजवादी बहुमत एवं फ़िलिप गोंजालेज 1982 में प्रधानमंत्री निर्वाचित।
  • बेनजीर भुट्टो ने 1988 में पाकिस्तान की प्रधानमंत्री का पद संभाला।
  • विश्वनाथ प्रताप सिंह 1989 में देश के सातवें प्रधानमंत्री बने।
  • बेरिंग्स बैंक कांड के चर्चित व्यक्ति निक लीसन को 1995 में सिंगापुर के न्यायालय द्वारा साढ़े छह वर्ष की क़ैद की सज़ा।
  • भारत में 1999 में बीमा क्षेत्र में निजी क्षेत्र के निवेश को मंजूरी मिली।
  • प्रशान्त महासागर के बोरा-बोरा द्वीप में 2002 में एक जलते यात्री जहाज़ ‘विडस्टार’ से 219 लोगों को सुरक्षित बचाया गया।
  • पाकिस्तान सरकार ने 2005 में मदरसों द्वारा धार्मिक नफ़रत फैलाने एवं आतंकवाद के लिए प्रेरणा देने वाले शिक्षा एवं साहित्य के प्रकाशन पर रोक के लिए क़ानून बनाया।
  • पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ़ ने 2007 में 8 जनवरी के प्रस्तावित चुनावों को देखते हुए देश में विरोध प्रदर्शनों और रैलियों पर प्रतिबन्ध लगाया।
  • पंजाब नेशनल बैंक ने 2008 में एफसीएनआर ब्याज दरों में कटौती की।

2 दिसंबर को जन्मे व्यक्ति

  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष एन.जी. चन्दावरकर का जन्म 1855 में हुआ।
  • उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध जनसेवक तथा संत बाबा राघवदास का जन्म 1886 में हुआ।
    1. हिन्दी के ख्यातिप्राप्त साहित्यकार और विद्वान् आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के सहयोगी डॉक्टर पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल का जन्म 1901 में हुआ।डॉक्टर पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल ( जन्म- 2 दिसम्बर1901गढ़वालउत्तराखण्ड; मृत्यु- 27 जुलाई1944हिन्दी के ख्यातिप्राप्त साहित्यकार थे। वे विद्वान् आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के सहयोगी रहे थे। उन्होंने ‘गोरख बानी’ और ‘रामानन्द’ की रचना की थी। पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल हिन्दी में ‘डी.लिट.’ की उपाधि प्राप्त करने वाले पहले शोध विद्यार्थी थे। उन्होंने अनुसंधान और खोज परंपरा का प्रवर्तन किया तथा आचार्य रामचंद्र शुक्ल और बाबू श्यामसुंदर दास की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए हिन्दी आलोचना को मजबूती प्रदान की। उन्होंने भावों और विचारों की अभिव्यक्ति के लिये भाषा को अधिक सामर्थ्यवान बनाकर विकासोन्मुख शैली को सामने रखा। वे उत्तराखंड की ही नहीं अपितु भारत की भी शान हैं, जिन्हें देश-विदेशों में सम्मान मिला। उत्तराखंड के लोक-साहित्य के प्रति भी उनका लगाव था।

      जन्म तथा शिक्षा

      डॉक्टर पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल का जन्म 2 दिसम्बर सन 1901 में उत्तराखण्ड के गढ़वाल ज़िले में लैंसडाउन के निकट पाली नामक ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम पण्डित गौरी दत्त था। डॉक्टर पीताम्बर  ने पिता से ही संस्कृत और हिन्दी की प्रारम्भिक शिक्षा घर पर प्राप्त की। बाद में श्रीनगर (गढ़वाल), लखनऊ और कानपुर की विभिन्न शिक्षा संस्थाओं से होते हुए वे ‘काशी हिन्दू विश्वविद्यालय‘ पहुँचे। वहाँ एम.ए. में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त करने के कुछ समय बाद वहीं हिन्दी के अध्यापक नियुक्त हो गए। इसके साथ ही उनका शोध कार्य भी चलता रहा। डॉक्टर पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल की गणना चोटी के विद्वानों में होती थी। 1940 में तिरुपति में आयोजित ‘प्राच्य विद्या सम्मेलन’ की हिन्दी शाखा की अध्यक्षता उन्होंने की थी। अध्यापक के रूप में उनकी बड़ी ख्याति थी। 1937 में वे ‘लखनऊ विश्वविद्यालय‘ के हिन्दी विभाग में आ गए थे।

      ‘अंबर’ नाम से लेखन

      हिन्दी साहित्य के फलक पर शोध प्रवृत्ति की प्रेरणा का प्रकाश बिखेरने वाले डॉक्टर बड़थ्वाल  ने अपनी साहित्यिक छवि के दर्शन बचपन में ही करा दिये थे। बाल्यकाल में ही वे ‘अंबर’ नाम से कविताएँ लिखने लगे थे। किशोरावस्था में पहुँचकर उन्होंने कहानी लेखन प्रारंभ कर दिया। 1918 के पुरुषार्थ में उनकी दो कहानियाँ प्रकाशित हुईं। कानपुर में अपने छात्र जीवन के दौरान ही उन्होंने ‘हिलमैन’ नामक अंग्रेज़ी मासिक पत्रिका का संपादन करते हुए अपनी संपादकीय प्रतिभा को भी प्रदर्शित किया। जिस समय डॉक्टर बड़थ्वाल  में साहित्यिक चेतना जगी, उस समय हिन्दी के समक्ष अनेक चुनोतियाँ थीं। कठिन संघर्षों और प्रयत्नों के बाद उच्च कक्षाओं में हिन्दी के पठन-पाठन की व्यवस्था तो हो गई थी, लेकिन हिन्दी साहित्य के गहन अध्ययन और शोध को कोई ठोस आधार नहीं मिल पाया था। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और बाबू श्याम सुन्दर दास जैसे रचनाकार आलोचना के क्षेत्र में सक्रिय थे। डॉक्टर बड़थ्वाल  ने इस परिदृश्य में अपनी अन्वेषणात्मक क्षमता के सहारे हिन्दी क्षेत्र में शोध की सुदृढ़ परंपरा की नींव डाली।

      भारत के प्रथम शोध छात्र

      डॉक्टर पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल  भारत के प्रथम शोध छात्र थे। उन्हें उनके शोध कार्य “हिन्दी काव्य में निर्गुणवाद” के लिए वर्ष 1933 के दीक्षांत समारोह में ‘डी.लिट.’ (हिन्दी) से नवाज़ा गया। पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल का आध्यात्मिक रचनाओं की तरफ लगाव था, जो उनके अध्यन व शोध कार्य मे झलकता है। उन्होंने संस्कृतअवधीब्रजभाषाअरबी एवं फ़ारसी के शब्दों और बोली को भी अपने कार्य में प्रयोग किया। उन्होंने संत, सिद्ध, नाथ और भक्ति साहित्य की खोज और विश्लेषण में अपनी रुचि दिखाई और अपने गूढ़ विचारों के साथ इन पर प्रकाश डाला। भक्ति आन्दोलन को हिन्दू जाति की निराशा का परिणाम नहीं माना, लेकिन उसे भक्ति धारा का विकास माना। उनके शोध और लेख उनके गम्भीर अध्ययन और उनकी दूर दृष्टि के भी परिचायक हैं। उन्होंने कहा था- “भाषा फलती-फूलती तो है साहित्य में, अंकुरित होती है बोलचाल में, साधारण बोलचाल पर बोली मँज-सुधरकर साहित्यिक भाषा बन जाती है।” वे दार्शनिक वयक्तित्व के धनी, शोधकर्ता, निबंधकार व समीक्षक थे। उनके निबंध/शोधकार्य को आज भी शोध विद्यार्थी प्रयोग करते हैं। उनके निबंध का मूल भाव उसकी भूमिका या शुरुआत में ही मिल जाता है।

    पीताम्बर दत्त  ‘गोस्वामी तुलसीदास’ तथा ‘रूपक रहस्य’ के सहलेखक और ‘कबीर ग्रंथावली’ एवं ‘राम चंद्रिका’ के सम्पादक भी रहे।पीताम्बर दत्त  की बहुत-सी रचनाओं में से कुछ एक पुस्तकें “वर्डकेट लाईब्रेरी” के पास सुरक्षित हैं। ‘हिन्दी साहित्य अकादमी’ अब भी उनकी पुस्तकें प्रकाशित करती है। कबीररामानन्द और गोरखवाणीपर पीताम्बर दत्त ने बहुत कार्य किया और इसे बहुत-से साहित्यकारों ने अपने लेखों में और शोध कार्यों में शामिल किया और उनके कहे को पैमाना माना। यह अवश्य ही चिंताजनक है कि सरकार और साहित्यकारों ने उनको वह स्थान नहीं दिया, जिसके वे हकदार थे। ‘प्रयाग विश्वविद्यालय’ के दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर डॉक्टर रानाडे ने भी कहा कि- “यह केवल हिंदी साहित्य की विवेचना के लिये ही नहीं अपितु रहस्यवाद की दार्शनिक व्याख्या के लिये भी एक महत्त्वपूर्ण देन है।”

    ‘नाथ सिद्धों की रचनाएँ’ (भूमिका)

    डॉक्टर हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने ‘नाथ सिद्धों की रचनाएँ’ की भूमिका में लिखा है कि-नाथ सिद्धों की हिन्दी रचनाओं का यह संग्रह कई हस्तलिखित प्रतियों से संकलित हुआ है। इसमें गोरखनाथ की रचनाएँ संकलित नहीं हुईं, क्योंकि स्वर्गीय डॉक्टर पीतांबर दत्त बड़थ्वाल ने गोरखनाथ की रचनाओं का संपादन पहले से ही कर दिया है और वे गोरख बानी नाम से प्रकाशित भी हो चुकी हैं। डॉक्टर बड़थ्वाल  ने अपनी भूमिका में बताया था कि उन्होंने अन्य नाथ सिद्धों की रचनाओं का संग्रह भी कर लिया है, जो इस पुस्तक के दूसरे भाग में प्रकाशित होगा। दूसरा भाग अभी तक प्रकाशित नहीं हुआ है। अत्यंत दुःख की बात है कि उसके प्रकाशित होने के पूर्व ही विद्वान् संपादक ने इहलोक त्याग दिया। डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल को खोज में 40 पुस्तकों का पता चला था, जिन्हें गोरखनाथ-रचित बताया जाता है। डॉ. बड़थ्वाल ने बहुत छानबीन के बाद इनमें प्रथम 14 ग्रंथों को निसंदिग्ध रूप से प्राचीन माना, क्योंकि इनका उल्लेख प्रायः सभी प्रतियों में मिला।13वीं पुस्तक ‘ग्यान चौंतीसा’ समय पर न मिल सकने के कारण उनके  संपादित संग्रह में नहीं आ सकी, परंतु बाकी 13 को गोरखनाथ की रचनाएँ समझकर उस संग्रह में उन्होंने प्रकाशित कर दिया था।

    मृत्यु

    पीताम्बर दत्त  ने बहुत ही कम आयु में इस संसार से विदा ले ली अन्यथा वे हिन्दी में और भी कई और रचनाओं को जन्म देते, जो हिन्दी साहित्य को नया आयाम देते। डॉक्टर संपूर्णानंद ने भी कहा था- “यदि आयु ने धोखा न दिया होता तो वे और भी गंभीर रचनाओं का सर्जन करते”।पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल की मृत्यु 27 जुलाई1944 को उनकी जन्म भूमि पाली ग्राम, गढ़वालउत्तराखण्ड में ही हुई।

    प्रमुख कृतियाँ

    निम्नलिखित कृ्तियाँ डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल की सोच, अध्यन व शोध को दर्शाती हैं

    1. ‘रामानन्द की हिन्दी रचनायें (वाराणसीविक्रम संवत 2012)
    2. ‘डॉ. बड़थ्वाल के श्रेष्ठ निबंध’ (स. श्री गोबिंद चातक)
    3. ‘गोरखवाणी’ (कवि गोरखनाथ की रचनाओं का संकलन व सम्पादन)
    4. ‘सूरदास जीवन सामग्री’
    5. ‘मकरंद’ (स. डॉ. भगीरथ मिश्र)
    6. ‘किंग आर्थर एंड नाइट्स आव द राउड टेबल’ का हिन्दी अनुवाद (बच्चों के लिये)
    7. ‘कणेरीपाव’
    8. ‘गंगाबाई’
    9. ‘हिन्दी साहित्य में उपासना का स्वरूप’
    10. ‘कवि केशवदास’
    11. ‘योग प्रवाह’ (स. डॉ. सम्पूर्णानंद)
    12. प्राणायाम विज्ञान और कला
    13. ‘ध्यान से आत्मचिकित्सा’
  • दक्षिण भारतीय सिनेमा के प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक बी. नागी रेड्डी का जन्म 1912 में हुआ।
  • प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मनोहर जोशी का जन्म 1937 में हुआ।
  • प्रसिद्ध फ़िल्म पटकथा लेखिका अचला नागर का जन्म 1939 में हुआ।
  • प्रसिद्ध भारतीय-अमेरिकी वैज्ञानिक शिवा अय्यदुरई का जन्म 1963 में हुआ।

2 दिसंबर को हुए निधन

  • भारत के प्रमुख शिक्षाशास्त्री गुरुदास बनर्जी का निधन 1918 में हुआ।
  • सोवियत संघ के राष्ट्रपति क्लिमेंट वोरोशिलोव का निधन 1969 में हुआ।
  • कनाडा के प्रसिद्ध उपन्यासकार, नाटककार और आलोचक राबर्टसन डेविस का निधन 1995 में हुआ।
  • प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के महामंत्री और पी.सी.सी. वर्किंग कमेटी के 30 वर्षो तक सदस्य मर्री चेन्ना रेड्डी का निधन 1996 में हुआ।
  • हिंदी सिनेमा की चरित्र अभिनेत्री प्रीति गांगुली का निधन 2012 में हुआ।
  • हिन्दी सिनेमा के प्रसिद्ध हास्य अभिनेता देवेन वर्मा का निधन 2014 में हुआ।
  • भारतीय राजनेता एवं महाराष्ट्र के 8वें मुख्यमंत्री ए आर अंतुले का निधन 2014 में हुआ।

2 दिसंबर के महत्त्वपूर्ण अवसर एवं उत्सव

  • अंतरराष्ट्रीय दास प्रथा उन्‍मूलन दिवस
  • राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस
  • अंतर्राष्ट्रीय कम्प्यूटर साक्षरता दिवसअंतर्राष्ट्रीय कम्प्यूटर साक्षरता दिवस के लिए इमेज परिणामजैसा कि आप जानते ही होगें कि आज के इस दौर में साक्षरता सबसे बड़ी जरूरतों में से एक है. इसका मानव जीवन में एक बड़ा प्रभाव पड़ता है. शिक्षा से ही मानव प्रगति की राह पर है. अब हम चाहे बात सामाजिक एवं आर्थिक विकास की करें दोनों में इसकी महत्वता है.वैसे भी आज आप देख ही रहे है की आज का युग आम शिक्षा से ऊपर उठकर कंप्यूटर द्वारा शिक्षा प्राप्त कर रहा है.अब मानव जीवन के प्रत्येक कार्य डिजिटल हो रहे है.हाल ही में नोटबंदी से लोगों के अधिकतर कार्य अब ऑनलॉइन (कंप्यूटर सिस्टम ) द्वारा किया जा रहा है. आने वाले कुछ समय पश्चात् मानव जीवन के प्रत्येक कार्य अब कंप्यूटरीकृत ही होगें.दुनिया से निरक्षरता को समाप्त करने के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए 2 दिसम्बर को विश्व कम्प्यूटर साक्षरता दिवस मनाया जाता है.आज कम्प्यूटर के बिना कोई भी काम संभव नहीं है. यह एक बहुपयोगी वैज्ञानिक अविष्कार है.युद्ध के दौरान शत्रु के आक्रमण की पूर्व सूचना से लेकर दुश्मन के मिसाइल तथा सेना की उपस्थिति बताने का काम कम्प्यूटर करने लगा है. आज विश्व में कम्प्यूटर क्रांति आ गई है.आज हर एक क्षेत्र में कंप्यूटर अपने कदम बढ़ा रहा है.

    विश्व भर में कंप्यूटर साक्षरता दिवस  प्रति वर्ष 2 दिसंबर को मनाया जाता है। कंप्यूटर साक्षरता का अर्थ है – कंप्यूटर क्या कर सकता है और क्या नहीं, इसका ज्ञान होना। भारत में तेजी से बढ़ती हुई डिजिटल तकनीक और डिजिटल भविष्य को ध्यान में रखते हुए कंप्यूटर का ज्ञान होना अति आवश्यक हो गया है।

     अगर हम आज की स्थिति में देखें तो पाएंगे कि कंप्यूटर का ज्ञान अधिकांश लोगों को है। कंप्यूटर का ज्ञान  आज की युवा पीढ़ी के साथ साथ हर व्यक्ति के लिए आवश्यक है।आज लोगों के हाथ में मोबाइल फोन और बढ़िया फीचर्स वाले स्मार्टफोन हैं, जिनमें कंप्यूटर जैसी खास सुविधा है।
    कंप्यूटर का ज्ञान आज की ज़रूरत ही नहीं बल्कि काफी फायदेमंद भी है। कंप्यूटर का ज्ञान शिक्षा के लिए ही नहीं रोजगार के लिए भी काफी आवश्यक है। आज के आधुनिक युग में तेजी से बढ़ती हुई तकनीक और डिजिटल क्रान्ति के कारण कंप्यूटर मानव जीवन का एक जरूरी हिस्सा बन गया है। कंप्यूटर से जुड़ी हुई जानकारी को प्राप्त करना आज के विद्यार्थियों के उतनी ही जरूरी है जितनी उनकी पढ़ाई। इसीलिए कंप्यूटर के विषय में अपनी जानकारी और क्षमता को बढ़ाने के लिए दुनिया भर में 2 दिसंबर को कंप्यूटर साक्षरता दिवस मनाया जाता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *